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April, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ज्ञानंरजन ने कहा-पारदर्शी हो साहित्यिक पुरस्कारों की प्रक्रिया

प्रसिद्ध साहित्यकार और पहल के संपादक ज्ञानरंजन ने कहा है कि प्राय: पुरस्कृत और सम्मानित लोग आत्मकथन की तरफ जाते हैं, परन्तु मेरे लिए भारतीय भाषा परिषद का सम्मान एक दर्पण की तरह है, जिसमें मैं खुद को और अपने अतीत को निहारता हूं। मत-मतांतर के साथ पत्रकारी किस्म के विवाद व अवसर के बाद विलक्षणता की ऐसी घड़ी चल रही है, जिसमें एक घातक हिंसा पैदा हो चुकी है। उन्होंने कहा कि साहित्य व राजनीति के बीच किसी भी तरह का फर्क गायब हो चुका है। ज्ञानरंजन कहते हैं कि उनकी सोच यह है कि हमें अपने समस्त सांस्कृतिक उपक्रमों व उसके प्रबंधन पर बाजार के रिवाज से हट कर नए सिरे से विचार कर एक नया सांस्कृतिक आंदोलन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें अपने पुरस्कारों की प्रक्रिया को खोल देना चाहिए और उसकी राजनीति व गोपनीयता को भंग कर देना चाहिए। ज्ञानरंजन ने कहा-‘‘मैंने जो कुछ भी कहा है, वह मेरी तथा मेरी कहानियों की ही आवाज है।"
उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध साहित्यकार और पहल के संपादक ज्ञानरंजन को पिछले दिनों कोलकाता में हिंदी साहित्य में अमूल्य योगदान देने के लिए भारतीय भाषा परिषद ने वर्ष 2008 के साधना सम्मान से सम्…

प्रतिरोध को थिएटर का माध्यम बनाने वाले रंगकर्मी बादल सरकार

बादल सरकार का नाम देश में नाटक का पर्याय है। कलकत्ता में जन्में बादल सरकार ने कई वर्ष इंजीनियर के रूप में काम किया। विदेश से रंगकर्म का डिप्लोमा लेने के पश्चात् उन्होंने रंग जगत में प्रवेश किया। उनके अभिनव तरीके ने रंगमंच में उनकी अलग पहचान विकसित की और बादल सरकार रंग जगत का एक शीर्ष नाम बन गया। बादल दा ने गत 15 जुलाई को जीवन के 83 वर्ष पूर्ण किए हैं।
बादल सरकार से प्रेरित हो कर देश के सैकड़ों रंगकर्मी सड़कों पर नाटक करने उतरे और प्रतिरोध के लिए थिएटर को माध्यम बनाया। थिएटर आडोटोरियम और उसके तमाम तामझाम को छोड़ कर ‘सुधीन्द्र नाथ सरकार’ ने जब थिएटर को जनता से सीधे संवाद करने का माध्यम बना कर नुक्कड़ नाटक की अपनी शैली विकसित की, तो रंग जगत में एक तूफान सा आ गया। सन् 1970 के आसपास उन्होंने थिएटर आडोटोरियम से नुक्कड़ की यात्रा शुरू की। उस समय बांगला थिएटर जगत में शंभू मित्र, तृप्ति मित्र और उत्पल दत्त के नाम शीर्ष पर थे। बादल सरकार बताते हैं- ‘‘मैंने अपना काम कविताओं से शुरू किया। सन् 1956 में मैंने अपना पहला नाटक साल्यूशन एक्स लिखा। फिर सन् 1956 में बारो पिशीमा आया। अभी हाल ही में उनकी दो पुस्त…

इप्टावार्ता हिंदी की शुरूआत

आज से जबलपुर की भारतीय जन नाट्य संघ (इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन-इप्टा) की प्रतिनिधि संस्था विवेचना के महासचिव हिमांशु राय ने इप्टावार्ता हिंदीके माध्यम से एक नया ब्लाग शुरू किया है। इस ब्लाग में इप्टा वार्ता की सामग्री भी नाट्य प्रेमी और रंगमंच में रूचि रखने वाले लोग पढ़ सकेंगे। हिमांशु राय का ब्लाग जगत में स्वागत है।

टैगोर गार्डन के मायने

जबलपुर में बड़े शहरों की तरह आम लोगों के लिए पार्क या उद्यानों की कमी हर समय महसूस होती रहती है। नगर निगम के भंवरताल और नेहरू उद्यान जैसे एक-दो पार्क जरूर हैं, लेकिन अव्यवस्थाओं के कारण यहां आम लोग आने से बिचकते हैं। ले-देकर केंटोमेंट बोर्ड का टैगोर उद्यान ही सुबह-शाम लोगों के लिए घूमने के लिए बचता है। साफ-सफाई और झूलों, फिसलनी, मेरी गो-राउंड के कारण टैगोर उद्यान बच्चों के साथ बुजुर्गों को सबसे अधिक आकर्षित करता है। मुझे याद है कि हम लोग बचपन में टैगोर उद्यान को किंग्स गार्डन के नाम से पहचानते थे। बाद के दिनों परम्परानुसार अंग्रेजों द्वारा स्थापित किए गए पार्कों, रेलवे स्टेशनों और हास्पिटलों का नामकरण भारतीय नामों से किया गया, इसलिए किंग्स गार्डन भी रवीन्द्रनाथ टैगोर उद्यान हो गया। लोगबाग इसे अब इसे टैगोर गार्डन ही कहना पसंद करते हैं।
टैगोर गार्डन में सुबह घूमने वालों के लिए प्रवेश नि:शुल्क रखा गया है। दिन और शाम को यहां आने वालों को एक या दो रूपए प्रवेश शुल्क के रूप में देना पड़ते हैं। 12 वर्ष तक के बच्चों के लिए प्रवेश मुफ्त है। मैं सप्ताह के सातों दिन सुबह के समय टैगोर गार्डन में घूमन…

तारे जमीं पर और आमिर खान का भला हो!

भारतीय समाज में हिंदी फिल्मों का कितना व्यापक प्रभाव है, इसकी बानगी पिछले दिनों उस समय देखने को मिली, जब बच्चों के स्कूल के रिजल्ट आए। भला हो आमिर खान का और उनकी फिल्म ‘तारे जमीं पर’ का कि उनकी फिल्म से प्रभावित हो कर अभिभावकों ने खराब रिजल्ट लाने के बावजूद बच्चों को न तो डांटा और न ही पीटा। एक ओर वे अभिभावक थे, जो कि बच्चों के अच्छे रिजल्ट से गौरवान्वित थे, तो वहीं कुछ ऐसे अभिभावक भी मिले जो गर्वपूर्वक बता रहे थे कि उनका बेटा परीक्षा में कुछ लिख कर नहीं आया। बिल्कुल ‘तारे जमीं पर’ के ईशान अवस्थी की तरह। ऐसे अभिभावकों को अपने बच्चे में ईशान अवस्थी की भूमिका निभाने वाले दर्शनील सफारी की छवि उभर रही थी।
अमीर लेकिन कम पढ़े-लिखे एक अभिभावक ने तो भौंएं ऊपर करते हुए कहा - ‘‘बेटे ने तो कापियों में सिर्फ आड़ी-टेढ़ी लाइनें ही खींच दीं, अपने आमिर खान की फिल्म जैसे। मेडम भी आश्चर्य कर रहीं थीं कि फिल्म की तरह कैसे हो गया।’’ यहां अभिभावक के साथ स्कूल की टीचर भी हतप्रभ थीं। मैंने पूछा कि बच्चे की रिजल्ट पर क्या प्रतिक्रिया थी ? अभिभावक ने गर्व से कहा-‘‘वह कह रहा था कि बिल्कुल ‘तारे पर जमीं’ जैसा हो गय…

विख्यात साहित्यकार ज्ञानरंजन को भारतीय भाषा परिषद का प्रतिष्ठित साधना सम्मान

हिंदी के विख्यात साहित्यकार और पहल के संपादक ज्ञानरंजन को हिंदी साहित्य में अमूल्य योगदान देने के लिए भारतीय भाषा परिषदने वर्ष 2008 के साधना सम्मान से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। साधना सम्मान के रूप में ज्ञानरंजन को कोलकाता में 18 अप्रैल को एक भव्य समारोह में 51,000 रूपए की सम्मान निधि और स्मृति चिन्ह प्रदान किया जाएगा। ज्ञानरंजन के अलावा तमिल साहित्य के लिए वेरामुत्थु, उड़िया साहित्य के लिए रामचंद्र बेहरा और पंजाबी साहित्य के लिए डा. महेन्द्र कौर गिल को भी सम्मानित किया जाएगा। सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी चारों साहित्यकारों को सम्मानित करेंगी। उल्लेखनीय है कि भारतीय भाषा परिषद एक प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था है और पिछले 35 वर्षों से भारतीय भाषा के साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में कार्यरत है। परिषद द्वारा हिंदी में मासिक पत्रिका वागार्थका प्रकाशन भी लंबे समय से किया जा रहा है। परिषद ने विभिन्न भाषाओं के चार युवा साहित्यकारों को भी युवा पुरस्कार से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। निर्मला पुतुल को संथाली भाषा के लिए, अल्पना मिश्रा को हिंदी, एस. श्रीराम को तमिल और मधुमित बावा