<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303</id><updated>2011-12-24T15:30:03.499+05:30</updated><category term='जबलपुर'/><category term='छायांकन'/><category term='विक्रम अवार्ड'/><category term='नर्मदा'/><category term='नई दुनिया'/><category term='विवेचना'/><category term='लीलाधर मंडलोई'/><category term='वागर्थ'/><category term='अजय पोहनकर'/><category term='फोटोग्राफिक सोसायटी आफ जबलपुर'/><category term='ज्ञानपीठ पुरस्कार'/><category term='अमरकांत'/><category term='नामवर सिंह'/><category term='साहित्य'/><category term='नरेश सक्सेना'/><category term='राजकुमार केसवानी'/><category term='पचमढ़ी'/><category term='रजनीकांत 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टॉकीज'/><category term='हरिशंकर परसाई'/><title type='text'>जबलपुर चौपाल</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>46</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-1169509525178261944</id><published>2011-10-11T17:51:00.012+05:30</published><updated>2011-10-11T21:09:50.749+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ज्ञानपीठ पुरस्कार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अमरकांत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='श्रीलाल शुक्ल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नामवर सिंह'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ज्ञानरंजन'/><title type='text'>साहित्य के गांव में बाजार</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-MxWz1f2hZyI/TpRVRHcTIAI/AAAAAAAAAOA/z-L5BiL9Fn4/s1600/gyanranjan-3.jpg"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5662244384055435266" src="http://2.bp.blogspot.com/-MxWz1f2hZyI/TpRVRHcTIAI/AAAAAAAAAOA/z-L5BiL9Fn4/s200/gyanranjan-3.jpg" style="cursor: hand; cursor: pointer; float: right; height: 185px; margin: 0 0 10px 10px; width: 200px;" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-weight: bold;"&gt;(अभी हाल ही में ग्रामीण विषयवस्तु के दो लेखकों-अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल को ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। 'कौन बनेगा करोड़पति' में गांव के गरीबों को भागीदारी दी जा रही है। यह अनायास नहीं है। इसके पीछे गांव पर बाजार की पकड़ और पहुंच को मजबूत बनाने का सोचा समझा अभियान है। इसी मुद्दे पर ज्ञानरंजन ने 'साहित्य के गांव में बाजार' शीर्षक से एक विश्लेषण नागपुर से प्रकाशित लोकमत में पिछले दिनों किया। उनका विश्लेषण यहां प्रस्तुत है।)&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;अ&lt;/b&gt;मरकांत और श्रीलाल शुक्ल विशुद्ध रूप से ग्रामीण पृष्ठभूमियों में प्रचुर लेखन करने वाले कथाकार नहीं हैं। यद्यपि अमरकांत ग्रामीण इलाके से ही शहर में आए, जिस तरह हिन्दी में अनेक रचनाकार आए हैं। प्रेमचंद, शिवपूजन सहाय, जगदीश चंद्र, फणीश्वरनाथ रेणु, राही मासूम रजा, मार्कंडेय, शिवमूर्ति और हरनोट आदि कथाकारों की तरह अमरकांत ग्रामीण लेखन के रचनाकार नहीं हैं। उन्हें हम प्रेमचंद की कहानी की परंपरा को अग्रसर करने वाले कहानीकार अवश्य मान सकते हैं।&lt;/div&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5662240823254434594" src="http://1.bp.blogspot.com/-Td8jfnMId7A/TpRSB2bLwyI/AAAAAAAAANc/co3JEnfCVME/s200/Amarkant17Mar1268853707_storyimage.jpg" style="cursor: hand; cursor: pointer; float: left; height: 143px; margin: 0 10px 10px 0; width: 200px;" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;अमरकांत की राह-&lt;/b&gt; 1950 अथवा आजादी के बाद इलाहाबाद, बनारस, लखनऊ, आगरा, बलिया आदि उत्तरप्रदेश के शहर इस तरह के शहर थे कि उन्हें बड़ा गांव या मंझोला शहर कहा जा सकता था। दो दशक पहले तक तो दिल्ली को भी बड़ा गांव कहते थे पढ़े लिखे लोग। आज के किसी भी मध्यमवर्गीय शहरों की तुलना में वे बेहद मंद, कछुआ चाल, कम जनसंखया वाले, उद्योगविहीन, छोटे कार्यालयों वाले, उनींदे, वनस्पतियों से घिरे, पैदल और साइकिल प्रमुख शहर थे। शहरो के ऊपर ग्रामीण अक्स था, शहरों में बोलियों का पर्याप्त प्रचलन था। अमरकांत की यही राह थी, यही जगह थी। अमरकांत में जो अद्वितीय विनोद था, वह ग्रामीण समाज और मनुष्य से आया था। उनकी कहानियों के विषयों में गांव, कस्बे और शहर की मिलीजुली अवस्था है। सब एक दूसरे को 'ओवरलैप' करते हुए अपनी कहानियों, केवल कहानियों के बल पर वे हिन्दी के थोड़े-बहुत लेखक थे।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;श्रीलाल की जगह-&lt;/b&gt;श्रीलाल शुक्ल नौकरशाह थे। निपुण, बुद्धिमान, शीन काफ दुरुस्त, उच्च सामाजिक प्रतिष्ठावान तो थे ही उनकी सामाजिक बनावट भी ऐसी ही थी। अमरकांत शुरूआती दिनों से कम्युनिस्ट थे। 'कम्युनिस्ट' कहानी लिखी थी, छोटी-मोटी नौकरी करते रहे, जीवन कठोर था, पर उनमें गिला-शिकवा कभी नहीं रहा। यह उनकी विचारधारा का आचरण था, जीवन भर यह बना रहा है। श्रीलाल शुक्ल हिन्दी में उस गुट के प्रिय रहे, जो वामपंथ विरोधी रहा आया, जिसका अस्तित्व ही वामपंथ की खिलाफत से बना। वे 'परिमल' में अमूर्त रूप से सक्रिय रहे। उनका दोस्ताना वहीं था। उन्हें समाजवादियों का लाभ मिला। पर श्रीलाल शुक्ल अपने दमखम, शराफत, हाजिरजवाबी के बाद भी और रागदरबारी जैसी चर्चित कृति के बाद भी बड़े  लेखक न&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5662241463518154594" src="http://3.bp.blogspot.com/-zFF2Zo7C6-M/TpRSnHl8z2I/AAAAAAAAAN0/XQTi4XTHoEE/s200/shrilal%2Bshukla.jpg" style="cursor: pointer; float: right; height: 200px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; margin-right: 0px; margin-top: 0px; width: 200px;" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हीं हैं। 'बड़े' शब्द पर मेरा दबाव है कि इस सही अर्थ में समझा जाए। परिमल के साथी होने के बावजूद परिमल के दिग्गजों ने उन्हें 'बड़ा' लेखक नहीं माना। परिमल के नियंता 'व्यंग्य' को उपहास से देखते थे और इसे ऊंचा दर्जा नहीं देते थे। इस पर काफी हाउस की अनेक बहसों का मैं युवा श्रोता भी इलाहाबाद में रहा हूं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;उपहास का लेखन-&lt;/b&gt;श्रीलाल शुक्ल की 'राग दरबारी' में प्रहसन, माखौल, किस्सा और हास्य का झरना फूटता है। वे मजामत के उस्ताद हैं, पर उनका सारा किया-कराया क्षणभंगूर है। अगर सूक्ष्मता से श्रीलाल जी की मीमांसा की जाए तो उनमें अर्बन लेखक की आधुनिक प्रवृत्तियां नहीं हैं। वे ओवर रेटेड लेखक हैं, परसाई जैसे श्रेष्ठ और देश के बड़े लेखक के साथ भी उन्हें खड़ा किया गया। खड़ा करने वालों का उद्देश्य केवल उन्हें खड़ा करना था, प्रगतिशील विचारधारा के परसाई को कमतर करने के लिए। श्रीलाल शुक्ल सदा जगमगाती दुनिया में रहे, जबकि अमरकांत के चारों तरफ एक गोबर से बनी कच्ची कोठरी का अंधेरा था। ढिबरियां जल रही हैं चारो तरफ और अमरकांत लिख रहे हैं। अमरकांत बड़े लेखक इसलिए भी हैं कि उन्हें कभी गिला-शिकवा नहीं रहा। उन्होंने जिस लेखकीय जीवन को और उत्तर भारतीय समाज को स्वीकार किया, उससे उन्हें गहरा प्यार था। उनकी चाल साफ-सुथरी थी। वे खुशदिल रहे और एक बड़े रचनाकार की स्थिरता और तटस्था उनमें है। अपने समकालीनों की वे गहरी इज्जत करते हैं और गुलगुले से अमरकांत में विचारों का पत्थर बिल्कुल ग्रेनाइट का है। उन्हें दूर किनार में अपने चुने हुए एकांत में रहना पसंद था, इसलिए बड़े पराभवों और राजनीतिक शेयर बाजार गिरने, उठने, बदलने के बावजूद वे अविचलित रहे। मुझे उनके चेहरे की आकृति ब्रेखत के काफी करीब लगती है। इसलिए निष्कर्ष के रूप में यह सही है कि श्रीलाल शुक्ल के अतिशबाज लेखन और अमरकांत के अंधेरों को एक जगह रख कर पुरस्कृत करना अपमानजनक भी है, और एक हद तक कारिस्तानी भी। किशन पटनायक की टिप्पणी सटीक है कि 'राग दरबारी' के लेखक को गांवों से सहानुभूति नहीं है। मेरी समझ यह है कि श्रीलालजी की गांव के जीवन से क्या शहरवासी से भी यारी नहीं है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;ज्ञानपीठ की यात्रा-&lt;/b&gt;अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल के पुरस्कार प्रसंग को और विस्तार से जानना हो तो ज्ञानपीठ की यात्रा की तरफ ध्यान देना होगा। ज्ञानपीठ की स्थापना में शोध, मीमांसा, क्लासिकी चेतना का प्रकाशन और आयोजन उसकी गतिविधि का प्रमुख हिस्सा था। 'ज्ञानोदय' में मांस मदिरा, लहसुन-प्याज का उल्लेख कहानी, कविता में आने पर उसे संपादित कर दिया जाता था। यह धर्मवीर भारती और रमेश बखशी जैसे संपादकों के जमाने में भीबचा हुआ था। फिर 2010 तक आते-आते स्त्रियों पर कुत्सित टिप्पणी भी छपने लगी। आज देखिए कि कैसे ज्ञानपीठ की यात्रा सम सामयिक बाजार की तरफ रेंग रही है। आधुनिकता और लोकप्रियता और प्रिंटआर्डर की ललक, बाजार की तरफ उन्मुख होना, उसका तर्क देने लगना ज्ञानपीठ की महत्वाकांक्षा का हिस्सा हो गया है। इसलिए ज्ञानपीठ में देश के सबसे महंगे सेल्समैन और अभिनेता अमिताभ बच्चन का प्रवेश विचारणीय है। यह न तो अकारण है और न बुद्धूपना।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;जूरी का खेल-&lt;/b&gt;ज्ञानपीठ भी हिचकते-हिचकते विश्व के ताकतवर पुरस्कारों की राह में उठ रहा है। विश्व राजनीति में उसकी कोई जगह नहीं है न विश्व बाजार में, लेकिन उसकी ललक यही है। यह भी मुमकिन है कि सही खिलवाड़ का कूट खेल न कर सकने के कारण वह अधकचरे चपेटे में आ जाए। पर यह सब भविष्य के खेल हैं। अभी मेरी समझ यह है कि ज्ञानपीठ के निर्णयों में सहजता, भोलापन और चातुर्य दोनों मिले-जुले हैं। कई बार उसके निर्णय भारतीय भाषाओं की ताकतवर प्रगतिशील परंपरा की पूरी-पूरी मुखलफत नहीं करते पर उसके चाल-चलन में एक लोकप्रिय खुराफत जरूर है। जैसे शहरयार को पुरस्कृत करना। शहरयार उर्दू के बड़े शायर नहीं हैं पर उनको पुरस्कृत करके एक प्रगतिशील मुखड़ा ज्ञानपीठ का बनता है। अंतरविरोधी चीजें इसके पहले भी हुई हैं-जब निर्मल वर्मा और गुरदयाल सिंह को ज्ञानपीठ दिया गया। यहां पर भी एक कम्युनिस्ट रचनाकार और एक कम्युनिस्ट विरोधी रचनाकार की कूटनीति स्पष्ट है। एक बात ध्यान दें कि ऐसा नामवर सिंह जैसे जूरी सदस्य के खेल से संभव है। नामवर सिंह ज्ञानपीठ के लिए एक मुफीद वजीर हैं। जैसा मैं पहले एक बार अपने एक व्याखयान में भी बांदा में कह चुका हूं कि असली खेल जूरी की नियुक्ति है। इसकी नियुक्ति के पहले ही सालोंसालयह क्रियाकलाप चलता रहता है। यही विभाजन फिर दोहराया गया-अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल के साथ। ज्ञानपीठ गुरूदयाल सिंह और अमरकांत को स्वतंत्र ज्ञानपीठ देने की बेवकूफी कभी नहीं कर सकता। यह केवल बड़े लेखकों को विभाजित और कमतर करने की तकनीक है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;साम्राज्यवादी दुनिया के बड़े और शातिर तरह से संचालित पुरस्कारों का ज्ञानपीठ का थिंकटैंक अभ्यास कर रहा है। उसके अगले कदम भारतीय समाज और राजनीति की करवटों के आधार पर होंगे। सीधा हस्तक्षेप न भी हो पर जूरी का गठन बहुत दूर तक सोच विचार की कारीगरी है। यह भी हास्यापद है कि पिछले कुछ सालों से हिन्दी के ताकतवर पुरस्कार हिन्दी में सर्वश्री राजेन्द्र यादव, अशोक बाजपेयी, कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, कृष्ण बलदेव वैद के हिस्से में ही आए हैं। इन्हें बार-बार पुरस्कार मिले। ये सब जूरी की कारस्तानियां हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;गांव की ओर बाजार-&lt;/b&gt;बाजार का, नए साम्राज्य का गांवों में प्रवेश उनको खत्म कर देने के लिए है, उन्हें लूट कर बदल देने का है। गांव बचेंगे नहीं, वे उलट जाएंगे। यह कैसे मुमकिन है भारत देश में कि शहर तो बदल जाएं, उनका कायाकल्प हो जाए, नगरीरकरण तेज बना रहे और गांव जस के तस बने रहें। बीसों साल तक अमरकांत की सुध नहीं ली गई और आज जब पुरस्कृत किया गया (कोने अतरे में जाकर) तो मैं इसे इसी पृष्ठभूमि में देख रहा हूं। इसी तरह कौन बनेगा करोड पति, में घुस-घुस कर गांव के लोगों को लाया जा रहा है और उन्हें दस-पचास लाख दिए जा रहे हैं। यह अचानक वंचित गांवों से लोगों को लाकर, उनके कठिन जीवन दृश्यों की क्लिपिंग दिखा कर, उनको मार्मिक दिखा कर यही किया जा रहा है, जो भारतीय ज्ञानपीठ ने किया है। सब तरफ गांव के उद्धार का यह खेल शुरू हो गया है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;नियंत्रण की रणनीति-&lt;/b&gt;विकास की अवधारणा में गांव कहां हैं, यह देखना एक दिलचस्प बात है। उत्तर भारत में पारंपरिक गांव के निशान तो तेजी से मिटे हैं। आने वाले समय में गांव के बिम्ब और बदलने वाले हैं। इस देश में ऐसे अनेक इलाके भी हैं, जहां बड़े किसान को जमीन का मुआवजा 5 से 15 करोड तक भी मिला है। यह रकम रंग लाएगी। यह गिनती के लोगों का प्राप्य है, पर इसका विनाश का बड़ी ग्रामीण जनसंखया पर होगा। अपराध, भुखमरी, भेद और रक्तपात का तीखा अनुभव देखने को मिलेगा। गांव में बड़ी रकम फेंकी जा रही है, जो अंततः बाजार का नियंत्रण उन्हीं इलाकों में बढ़ाएगी।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-1169509525178261944?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/1169509525178261944/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=1169509525178261944' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/1169509525178261944'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/1169509525178261944'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='साहित्य के गांव में बाजार'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-MxWz1f2hZyI/TpRVRHcTIAI/AAAAAAAAAOA/z-L5BiL9Fn4/s72-c/gyanranjan-3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-4812800461650692039</id><published>2011-08-31T11:16:00.003+05:30</published><updated>2011-08-31T11:30:15.584+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लीलाधर मंडलोई'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हरिशंकर परसाई'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विवेचना'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नरेश सक्सेना'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पहल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ज्ञानरंजन'/><title type='text'>जबलपुर में परसाई जन्मदिवस आयोजित: राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोषी, राहुल बारपुते और आलोक मेहता ने खुल कर एकतरफा शरद जोशी का महिमा मंडन किया, परसाई का नहीं-ज्ञानरंजन</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;ज&lt;/b&gt;बलपुर में 22 अगस्त को प्रसिद्ध व्यंग्यकार और विचारक हरिशंकर परसाई का जन्मदिवस ‘विवेचना’ और ‘पहल’ के संयुक्त तत्वावधान में मनाया गया। विवेचना कई वर्षों से 22 अगस्त को परसाई का जन्मदिवस विचार गोष्ठी और परसाई की सूक्तियों पर आधारित कार्टून प्रदर्शनी के माध्यम से आयोजित करती आ रही है। इस वर्ष जबलपुर में डा. विश्वनाथ त्रिपाठी, कवि नरेश सक्सेना और लीलाधर मंडलोई को आमंत्रित किया गया था। डा. विश्वनाथ त्रिपाठी अस्वस्थता के कारण जबलपुर नहीं आ सके, लेकिन नरेश सक्सेना, लीलाधर मंडलोई के साथ कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डा. अरूण कुमार ने परसाई के व्यंग्य को नए रूप में परिभाषित किया। लीलाधर मंडलोई ने कहा कि परसाई ग्रामीण व कस्बाई परिवेश के जीवंत व्यक्तित्व थे, जो परिवार का बोझ उठाना जानते थे। उनके अपने जीवन संघर्ष की छाया, उनके लेखन में झलकती है। नरेश सक्सेना ने वर्ष 1952 से अपने जबलपुर के संबंधों को याद करते हुए कहा कि परसाई जी उनको जीने की राह दिखाई। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डा. अरूण कुमार ने कहा कि लोकप्रिय किंतु सृजनात्मक साहित्य पर आलोचकों की दृष्टि नहीं पड़ती। परसाई जी की रचनाएं समाज की आंखें खोलती हैं। उनकी रचनाएं छोटी होते हुए भी सारगर्भित हैं। कार्यक्रम में कार्टूनिस्ट राजेश दुबे की परसाई के व्यंग्य और सूक्तियों पर आधारित पोस्टर प्रदर्शनी ने सोचने को मजबूर किया। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt; विचार गोष्ठी के पश्चात् नरेश सक्सेना और लीलाधर मंडलोई ने अपनी नई व पुरानी कविताओं से उपस्थित लोगों को उद्वेलित किया। &lt;b&gt;इस कार्यक्रम में पहल के संपादक और विख्यात साहित्यकार ज्ञानरंजन ने हरिशंकर परसाई पर विचारोत्तेजक लिखित वक्तव्य दिया। यह वक्तव्य यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत है:-&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सभागार में भाई नरेश सक्सेना, लीलाधर मंडलोई और आपकी मंच पर उपस्थिति, जबलपुर के वर्तमान में स्वर्गीय हरिशंकर परसाई के संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण है। देश के सुप्रसिद्ध चित्रकार और नर्मदा के मशहूर यात्री अमृतलाल वेगड़ हमारे अभिन्न श्रोता रहे हैं। यहां दमोह, सिवनी, नरसिंहपुर, कटनी और श्रीधाम से भी लोग आए हैं। नगर के गणमान्य संस्कृतिकर्मी, रचनाकार और बुद्धिजीवी भी उपस्थित हैं। दमोह के सामाजिक कार्यकर्ता, यहां परसाई जी का तैल चित्र ले कर आए हैं, जो सभागार में रखा है। परसाई जी पर आयोजन हम इसलिए नहीं करते कि यह एक स्थानीय धर्म है, परसाई का काम एक बड़े आकार का और बड़े संदेशों से भरपूर है, परसाई किचिंत स्थानीयता के चंगुल में रहे थे, पर उनका लेखन इससे मुक्त था। हम चाहते हैं कि परसाई पर बात कुछ आगे बढ़े।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;परसाई के अनेक भक्त उनके लायक नहीं थे। कई गुमनाम रूप से उनके खिलाफ भी थे, क्योंकि परसाई के व्यंग्य और उनके विचार को पचाना बहुत मुश्किल था। वह उनके भीतर ही घुसपैठ करता था और वे लाचार होते थे। समकालीनता परसाई के खिलाफ थी। परसाई रचनावली का आना बहुत महत्वपूर्ण हुआ, पर उसके अध्यापक, संपादक, परसाई के बड़े अवदान की बावत न तो ठीक से बता सके और न उनसे संबंधित बहसों को जन्म दे सके। परसाई के समकालीन दुर्भाग्यों पर मैं कई बार टिप्पणी कर चुका हूं। सातवें दशक में परिमल की विचारधारा और उसके शस्त्रों ने श्रीलाल शुक्ल का विनोदपूर्ण उपहास करके यह बता दिया था कि परसाई के लिए भी कांटे तैयार हैं। जिस समय परसाई अपने प्रारंभिक दौर में थे, उस समय बहुत कम लोगों का रूझान परसाई के प्रति था। मैं साहित्यिक संसार की बात कर रहा हूं। नामावर लोग तो दूर थे। मुक्तिबोध ने परसाई का साथ दिया, पर वह गहरा आलोचकीय साथ नहीं था। वह एक गहरी मैत्री थी और विचारों का साथ था। मध्यप्रदेश में ही आप देखें, राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोषी, राहुल बारपुते और आलोक मेहता जैसे बड़े और दिग्गज पत्रकारों-संपादकों ने खुल कर एकतरफा शरद जोशी का महिमा मंडन किया, परसाई का नहीं। एकमात्र मायाराम सुरजन, परसाई के सपोर्टर बने। इस सब के अलावा कुछ बेहद जरूरी नाम हैं, जो परसाई की मूल्यवान आलोचना में अग्रणी हैं। दो नाम मैं यहां पर लूंगा-सर्वश्री सुरेन्द्र चौधरी और विश्वनाथ त्रिपाठी का। सुरेन्द्र चौधरी एक बड़ी प्रतिभा थी, उनमें बोहमीन तत्व भी थे, संभवतः इसलिए उनको घेर लिया गया। उन्होंने परसाई के बारे में थोड़ा ही लिखा पर उनकी पहचान गहरी और से भरी-पूरी थी। मित्रों, कृपया देखें कि सुरेन्द्र चौधरी जिनकी रचनावली अभी हाल ही में आई है, ने हमारे परसाई पर अनोखी बातें क्या कहीं ? वे जब परसाई पर विचार करते थे, तो हिंदी व्यंग्य की जातीय परंपरा उनके सामने रहती थी। इसलिए उन्होंने लिखा-‘‘ व्यंग्य जातीय इच्छा की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति है।’’ परसाई को उन्होंने व्यंग्य का विचारक कहा। अप संस्कृति के स्त्रोतों पर परसाई निरंतर व्यंग्य करते हैं, अपराजित उत्साह के साथ। इसके बाद सबसे यादगार काम किया आलोचक व रचनाकार डा. विश्वनाथ त्रिपाठी ने। उन्होंने परसाई पर एक मोनोग्राफ जैसी विधा में जो लिखा है, वह परसाई पर अकेली कृति है। त्रिपाठी जी ने परसाई को देश-दृष्टि और विश्व-दृष्टि से जोड़ा, उनकी यह कृति मूल्यवान किंतु अधूरी है। अधूरी इस मामले में कि, डा. साहब के पास परसाई पर लिखने के लिए जो कुछ बकाया है, वह उनके अधूरे साक्षात्कार को एक बड़े और संपूर्ण साक्षात्कार में बदल देगा। मित्रों, परसाई पर अगला अध्याय इस देश में त्रिपाठी जी लिख सकते हैं। हमारे दुर्भाग्य से वे गहरी अस्वस्थता के कारण हमारे बीच नहीं आ सके। विश्वनाथ त्रिपाठी जिनको प्यार करते हैं, उन पर लिखते जरूर हैं। अभी-अभी उन्होंने हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे महान गद्य-शिल्पी पर अपनी ताजा कृति प्रकाषित की है। परसाई जी के प्रति उनकी जो साध है, वह पुरानी है, गहरी है। त्रिपाठी जी ने ही लिखा था कि परसाई जी की रचनाएं स्वातंत्रोत्तर भारत का चेहरा है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;श्रोताओं। मैं आपको यह बता दूं कि निमाड़ के मशहूर कला समीक्षक और निबंधकार नर्मदा प्रसाद उपाध्याय पिछले दस वर्षों से परसाई पर एक ग्रंथ की कल्पना ले कर काम कर रहे हैं और उनसे मैं जुड़ा हूं, पर वह काम विश्वनाथ जी के काम की जगह नहीं ले सकता। नए लोग भी काम करेंगे। नरेश सक्सेना और लीलाधर मंडलोई, परसाई जी के प्रियतम रहे हैं। नरेश जी ने जबलपुर में पढ़ाई की और परसाई जी का गहरा सानिध्य प्राप्त किया। लीलाधर मंडलोई जो आज न केवल एक बड़े कवि हैं, बल्कि हिंदी मीडिया के गहरे जानकार भी, वे भी जबलपुर-काल में परसाई की छाया में ही आगे बढ़े। हमारे अध्यक्ष अरूण कुमार जी परसाई पर जो कुछ बोलते हैं, वह पूरी तरह मौलिक होता है। मौलिक चीजें जीवंत और ताजा होती हैं। ये बातें हमें सीधे स्पर्श करती हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अंत में मित्रों, कहना चाहूंगा कि परसाई पर आलोचनात्मक लेखन हो, परिचर्चा हो, बहसें हों, फिल्म या धारावाहिक का निर्माण हो, रंगकर्म हो, कुछ भी करते हुए परसाई जी के आत्मकथ्य के गंभीर बिंदुओं  पर हमें ध्यान रखना चाहिए। 1997 में हरिशंकर परसाई ने एक आत्मकथ्य तैयार किया था, उसका संक्षिप्त सा हिस्सा यहां पढ़ कर, मैं अपनी बात समाप्त करूंगा, सबका स्वागत करूंगा और भविष्य में परसाई के बहाने गंभीर आयोजनों में आप सब की भागीदारी की कामना करूंगा। ‘विवेचना’ यह आयोजन वर्षों से करती आ रही है। ‘परसाई’ विवेचना के निर्माता थे। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘‘अपनी कैफियत दूं, तो हंसना-हंसाना, विनोद करना अच्छी बातें होते हुए भी, मैंने मनोरंजन के लिए कभी नहीं लिखा। मेरी रचनाएं पढ़ कर हंसी आना स्वाभाविक है। यह मेरा यथेष्ट नहीं। और चीजों की तरह मैं व्यंग्य को उपहास, मखौल न मान कर एक गंभीर चीज मानता हूं। साहित्य के मूल्य, जीवन मूल्यों से बनते हैं। वे रचनाकार के एकदम अंतस से पैदा नहीं होते। जो दावा करते हैं कि उनके अंतस से ही सब मूल्य पैदा होते हैं, वे पता नहीं किस दुनिया में रहते हैं। जीवन जैसा है, उससे बेहतर होना चाहिए। राजनीति से मुझे परहेज नहीं है। जो लेखक राजनीति से पल्ला झाड़ते हैं, वे वोट क्यों देते हैं। वोट देने से ही राजनीति शुरू होती है। बुद्धिजीवी चाहे सक्रिय राजनीति से भाग न लें, पर वह अराजनैतिक नहीं हो सकता। जो अराजनैतिक होने का दावा करते हैं, उनकी राजनीति बड़ी खतरनाक और गंदी है।’’&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-4812800461650692039?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/4812800461650692039/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=4812800461650692039' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/4812800461650692039'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/4812800461650692039'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='जबलपुर में परसाई जन्मदिवस आयोजित: राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोषी, राहुल बारपुते और आलोक मेहता ने खुल कर एकतरफा शरद जोशी का महिमा मंडन किया, परसाई का नहीं-ज्ञानरंजन'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-1753667570637282168</id><published>2011-08-19T07:22:00.002+05:30</published><updated>2011-08-19T07:50:20.481+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छायांकन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डा. जे. एस.मूर्ति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फोटोग्राफिक सोसायटी आफ जबलपुर'/><title type='text'>विश्व छायांकन दिवस के अवसर पर विशेष- डा. जे. एस. मूर्ति: पचास वर्षों की सौम्य और शांत छायांकन यात्रा</title><content type='html'>&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-MC46KAHy0Mw/Tk3C8IHF5WI/AAAAAAAAAMQ/ItSsCqJQJHA/s1600/DR.%2BJS%2BMurthy.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 160px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-MC46KAHy0Mw/Tk3C8IHF5WI/AAAAAAAAAMQ/ItSsCqJQJHA/s200/DR.%2BJS%2BMurthy.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5642380246390269282" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space:pre"&gt;	&lt;/span&gt;&lt;b&gt;डा. जे. एस. (जेम्स सुंदर) मूर्ति&lt;/b&gt; की पहचान जबलपुर ही बल्कि पूरे देश में फोटो जर्नलिज्म, नेचर और वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर के रूप में है। उन्होंने फोटो जर्नलिज्म और कलात्मक छायांकन के मध्य अद्भुत संतुलन बना कर काम किया है। यह दोनों बातें किसी एक छायाकार में काफी कम देखने में आती है। उनके द्वारा खींचे गए छायाचित्र द संडे टाइम्स,द इंडियन एक्सप्रेस, सोशल वेल्फेयर, द हिन्दु जैसे प्रतिष्ठित समाचार व पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होते रहे हैं। उनके कई छायाचित्रों को जर्मनी, कनाडा, नीदरलैंड में आयोजित अंतरराष्ट्रीय छायाचित्र प्रतियोगिताओं में स्वीकृतियां के साथ पुरस्कृत किया गया है। डा. मूर्ति जबलपुर में फोटो आंदोलन को सक्रियता देने में हर समय आगे रहे हैं। छठे दशक में उन्होंने इसके लिए सर्वप्रथम प्रयास किया और नौवे दशक में डा. मूर्ति ने फोटोग्राफिक सोसायटी आफ जबलपुर (पीएसजे) को व्यवस्थित रूप दे कर नए फोटोग्राफर को एक मंच प्रदान किया। पीएसजे की गणना आज देश में सबसे सक्रिय सोसायटी के रूप में होती है। इसके पीछे डा. मूर्ति की मेहनत और समर्पण को कोई नकार नहीं सकता।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space:pre"&gt;	&lt;/span&gt;डा. मूर्ति को वर्ष 1969 में उस समय छायांकन में सबसे बड़ी सफलता मिली, जब उनकी छाया चित्र प्रविष्टि को फोटोग्राफिक सोसायटी आफ बंगाल (पीएबी) के द्वारा आयोजित ऑल इंडिया फोटोग्राफिक सैलून में स्वीकृत किया गया। सैलून के निर्णायकों को उनका छायाचित्र में विषय और तकनीकी रूप से नई ताजगी देखने को मिली। इसके पश्चात् डा. मूर्ति की छायांकन यात्रा आज तक जारी है। इसके बाद तो डा. मूर्ति के छाया चित्र देश-विदेश में आयोजित असंख्य सैलून में स्वीकृत हो कर पुरस्कृत हुए। इनमें टी. काशीनाथ मेमोरियल अवार्ड लखनऊ, भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के फोटो डिवीजन का अवार्ड, एग्री-हार्टीकल्चरल सोसायटी आफ इंडिया (एएचएसआई) के द्वारा कोलकाता में वर्ष 2011 में आयोजित प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि का पुरस्कार महत्वपूर्ण है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space:pre"&gt;	&lt;/span&gt;ललित कला अकादमी, नई दिल्ली के द्वारा आयोजित प्रथम छाया चित्र प्रतियोगिता के अवसर पर जारी किए गए केटलाग में डा जे. एस. मूर्ति की प्रविष्टि सहित प्रोफाइल के प्रकाशन को अन्य छायाकार एक बड़ी उपलब्धि मानते हैं। इसके अतिरिक्त डा. मूर्ति की उपलब्धियों में फोटोलवर्स आफ इंडिया स्लाइड सर्किट इंदौर, होरीजन इंडिया इंटरनेशनल सर्किट लखनऊ, एसएएम इंटरनेशनल दिल्ली, और नार्थ ईस्टर्न फोटोग्राफिक एसोसिएशन (नेपा) असम द्वारा आयोजित सैलून में प्राप्त स्वीकृतियां भी हैं। उन्हें यूपी बोर्ड आफ बॉयो-डायवरसिटी, लखनऊ द्वारा ‘टाइगर’ प्रविष्टि के लिए प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space:pre"&gt;	&lt;/span&gt;छायांकन में अनवरत् पचास वर्ष डूब कर काम करने वाले डा. जे. एस. मूर्ति को वर्ष 2005 में फेडरेशन आफ इंडियन फोटोग्राफी (एफएफआईपी) ने फेलोशिप से सम्मानित किया। वर्ष 2008 में उन्हें इंडिया इंटरनेशनल फोटोग्राफिक काउंसिल (आईआईपीसी) दिल्ली द्वारा&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 0, 238); -webkit-text-decorations-in-effect: underline; "&gt;&lt;img src="http://3.bp.blogspot.com/-DywhWpRKpRM/Tk3Hsq4t26I/AAAAAAAAAMY/9m35NFAM_7g/s320/Dear.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5642385478405446562" style="float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; cursor: pointer; width: 320px; height: 250px; " /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt; प्लेटिनम एक्जीबिटर ग्रेड से सम्मानित किया। डा. मूर्ति ने कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय फोटोग्राफी सैलून में निर्णायक की भूमिका भी निभाई है। देश की सबसे पुरानी फोटोग्राफिक सोसायटी आफ इंडिया (पीएसआई) मुंबई द्वारा आयोजित आल इंडिया सैलून आफ फोटोग्राफी में निर्णायक के मनोनयन को वे एक उपलब्धि के रूप में देखते हैं। डा. मूर्ति द्वारा वर्ष 1997 में जबलपुर के भूकंप के समय खींचे गए छाया चित्र न्यूज एजेंसी प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया (पीटीआई) और यूनाइटेड न्यूज आफ इंडिया (यूएनआई) द्वारा देश व विदेश में जारी किए गए, जिन्हें व्यापक रूप से सराहना मिली।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space:pre"&gt;	&lt;/span&gt;डा. जे. एस. मूर्ति का छायांकन के साथ-साथ पत्रकारिता शिक्षा में भी विशिष्ट स्थान है। उन्हें ‘मॉस कम्युनिकेशन एंड इट्स वेरियस डाइमेंशन’ पाण्डुलिपि पर वर्ष 1989 में प्रधानमंत्री द्वारा भारतेंदु हरिश्चंद्र राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार प्रदान किया गया।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space:pre"&gt;	&lt;/span&gt;डा. मूर्ति पचास वर्ष के छायांकन जीवन में पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के फोटो लेने को अविस्मरणीय अनुभव मानते हैं। पंडित नेहरू के उतारे गए फोटो को वर्ष 1991 में उन्होंने प्रधानमंत्री राजीव गांधी को जबलपुर प्रवास के समय भेंट किया था। उन्होंने इंदिरा गांधी के एक पोट्रेट को भी राजीव गांधी को भेंट किया था। जो बाद में 1 सफदरजंग रोड स्थित इंदिरा गांधी सेक्रेटेरियट मेमोरियल में प्रदर्शित हुआ।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space:pre"&gt;	&lt;/span&gt;पत्रकारिता एवं संचार प्राध्यापक के रूप में उन्होंने मनीला-फिलीपींस, क्वालालाम्पुर, श्रीलंका सहित देश में कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सेमीनार में भाग ले कर महत्वपूर्ण शोध पत्र प्रस्तुत किए। डा. मूर्ति ने मॉस कम्युनिकेशन विषय पर एक पुस्तक लिखी, जिसकी वर्तमान में भी शिक्षकों सहित विद्यार्थियों में बहुत मांग है। वे इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी (इग्नू) में कम्युनिकेशन विषय के रूप काउंसलर के रूप में कार्य कर चुके हैं। डा. मूर्ति जबलपुर, चित्रकूट और  बीएचयू-बनारस विश्वविद्यालय में अतिथि शिक्षक के रूप में सेवाएं देते रहे हैं। डा. मूर्ति ने लगभग 10 वर्षों तक न्यूयार्क (अमेरिका) से प्रकाशित न्यू वर्ल्ड आउटलुक आर्डर के लिए कई कवर स्टोरी सहित महत्वपूर्ण रिपोर्टिंग की है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space:pre"&gt;	&lt;/span&gt;अभी हाल ही में एकेडमी आफ फाइन आटर्स (सेंट्रल गेलरी) कोलकाता में उनकी एकल छायाचित्र प्रदर्शनी ‘एनकेचिंग कोलकाता’ आयोजित की गई, जिसे दर्शकों के साथ क्रिटिक की प्रशंसा भी मिली। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space:pre"&gt;	&lt;/span&gt;डा. जे. एस. मूर्ति अब अपने कर्मक्षेत्र जबलपुर में नहीं रहते, जिसका उन्हें दुख है, लेकिन पारिवारिक परिस्थितियों ने उन्हें कोलकाता में रहने को मजबूर कर दिया है। कर्मक्षेत्र बदलने और आयु के 70 वें वर्ष में पहुंचने के बावजूद वे निरंतर सक्रिय हैं। उन्होंने फोटोग्राफी सदैव ‘शांति व एकता’ के एक सूत्र को ध्यान में रख कर की और इसमें वे सफल भी हुए।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-1753667570637282168?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/1753667570637282168/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=1753667570637282168' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/1753667570637282168'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/1753667570637282168'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2011/08/blog-post_19.html' title='विश्व छायांकन दिवस के अवसर पर विशेष- डा. जे. एस. मूर्ति: पचास वर्षों की सौम्य और शांत छायांकन यात्रा'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-MC46KAHy0Mw/Tk3C8IHF5WI/AAAAAAAAAMQ/ItSsCqJQJHA/s72-c/DR.%2BJS%2BMurthy.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-5486809536359354249</id><published>2011-07-22T15:52:00.004+05:30</published><updated>2011-07-22T16:43:48.864+05:30</updated><title type='text'>जबलपुर में कामरेड शेषनारायण राय स्मृति व्याख्यान व काव्यपाठ</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-lVmqLZAUsQg/TilYgWaClYI/AAAAAAAAAMI/LI1ownIfvvo/s1600/DSC_0017.JPG" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 213px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-lVmqLZAUsQg/TilYgWaClYI/AAAAAAAAAMI/LI1ownIfvvo/s320/DSC_0017.JPG" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5632130121797375362" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 19px; "&gt;&lt;b&gt;वि&lt;/b&gt;वेचना जबलपुर और पहल ने मिलकर जबलपुर में 17 जुलाई 2011 को&lt;b&gt; कामरेड शेषनारायण राय&lt;/b&gt; स्मृति व्याख्यान व काव्यपाठ का आयोजन किया। कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध चित्रकार&lt;b&gt; अशोक भौमिक&lt;/b&gt; का व्याख्यान और&lt;b&gt; नरेन्द्र &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 19px; "&gt;&lt;b&gt;जैन&lt;/b&gt; व &lt;b&gt;मंगलेश डबराल&lt;/b&gt; का काव्यपाठ संपन्न हुआ। कामरेड शेषनारायण राय विवेचना जबलपुर के संस्थापकों में से एक और जबलपुर शहर के प्रमुख वामपंथी नेता थे। जिस समय मुक्तिबोध और परसाई जैसे महान लेखकों &lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 19px; "&gt;की किताबें कोई प्रकाशक नहीं छाप रहा था उस समय का. शेषनारायण&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 19px; "&gt;राय ने मुक्तिबोध की किताब &lt;b&gt;कामायनी एक पुनर्विचार&lt;/b&gt; और परसाई जी की किताबें &lt;b&gt;सुनो भाई साधो &lt;/b&gt;व &lt;b&gt;बेईमानी की परत&lt;/b&gt; छापी थी। परसाई जी और का राय बहुत घनिष्ठ मित्र थे।&lt;b&gt; इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर&lt;/b&gt; एक सत्य घटना है जो का राय के साथ घटी थी। कहानी में भला आदमी कामरेड राय हैं। एक दूसरी प्रसिद्ध रचना &lt;b&gt;एक लड़की पांच दीवाने&lt;/b&gt; का राय की पुस्तक दुकान यू&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 19px; "&gt;नीवर्सल बुक डिपो के आस पास की घटना है। इस दुकान पर न केवल परसाई जी की नियमित बैठक थी वरन् यहां से उस समय के जबलपुर की साहित्यिक सांस्कृतिक राजनैतिक गतिविधियां संचालित होती थीं। इसी दुकान में बैठे बैठे मित्रों ने विवेचना का गठन किया था। उद्देश्य था गोष्ठियों के माध्यम से आम जनता को घटनाओं की सचाई बताई जाए। कामरेड राय ने एक संपन्न परिवार में जन्म लेकर भी अपना जीवन किसान&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 19px; "&gt; मजदूरों की लड़ाई लड़ते बिताया। वे जबलपुर की कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव रहे। उनकी पांचवीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में जबलपुर शहर के साहित्यिक सांस्कृतिक अभिरूचि के लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाएं उपस्थित थीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार &lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 19px; "&gt;&lt;b&gt;श्री श्याम कटारे &lt;/b&gt;ने की। कार्यक्रम स्थल को&lt;b&gt; विनय अंबर और ऋषि जेना&lt;/b&gt; ने मंगलेश व नरेन्द्र की कविताओं पर आधारित पोस्टरों से सजाया था।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 19px; "&gt;व्याख्यान का विषय था &lt;b&gt;कला, संस्कृति और आज की सांस्कृतिक संकेत&lt;/b&gt; । देश के सुविख्यात चित्रकार अशोक भौमिक ने कहा कि देश में अनेक संगठन अनेक राजनैतिक दलों से प्रभावित हैं पर आज की जरूरत है कि सभी संगठन अपने अपने पूर्वाग्रह छोड़कर सच्चे&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 19px; "&gt;&lt;img src="http://3.bp.blogspot.com/-r1REiA7LcWg/TilT3GtX4uI/AAAAAAAAAAY/lOW9diBZoZA/s200/DSC_0039.JPG" style="text-align: justify;float: left; margin-top: 0px; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; cursor: pointer; width: 200px; height: 133px; " border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5632125015162348258" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 19px; "&gt;अर्थों में गरीबों, जरूरतमंदों, आदिवासियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष करें। आज गरीबों की लड़ाई कोई नहीं लड़ रहा। उन्होंने अपना व्याख्यान चित्त प्रसाद की चित्रकला पर केन्द्रित कर अपनी बात कही। चित्त प्रसाद के चित्रों को प्रदर्शित कर उन्होंने बताया कि किस तरह एक चित्रकार संघर्षरत मजदूरों किसानों के बीच जाकर उनकी हलचलों को कलात्मक रूप से चित्रित करता है जो सदियों तक एक रिकार्ड के रूप में हमारे बीच रहेगा। चित्तप्रसाद के चित्रों में समय के साथ उनकी समझ और देश के मजदूर किसानों के बदलते हालात को आसानी से चिन्हित किया जा सकता है। चित्तप्रसाद की गहरी मानवीय दृष्टि और बारी&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 19px; "&gt;&lt;img src="http://4.bp.blogspot.com/-FM3ueSTkT_0/TilXSM9Er9I/AAAAAAAAAL4/bKvlSvNPaZc/s200/DSC_0088.JPG" style="text-align: justify;float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; cursor: pointer; width: 200px; height: 133px; " border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5632128779230162898" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 19px; "&gt;क अवलोकन बहुत प्रभावित करते हैं। लिनोकट में इतना श्रेष्ठ काम बहुत दुर्लभ है वो भी तब जब उन्होंने किसी कला विद्यालय में शिक्षा नहीं ली थी। &lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 19px; "&gt;अशोक भौमिक के व्याख्यान के बाद दूसरे चरण में सर्वप्रथम&lt;b&gt; तापसी नागराज &lt;/b&gt; ने मंगलेश डबराल की कविता &lt;i&gt;मां मुझे पहचान नहीं पाई जब मैं घर लौटा सर से पांव तक धूल से सना हुआ&lt;/i&gt; और नरेन्द्र जैन की कविता &lt;i&gt;एक दिन हमसे पूछा जाएगा हम क्या कर रहे थे&lt;/i&gt; का गायन किया। इसके बाद नरेन्द्र जैन ने काव्यपाठ किया। उन्होंने उज्जैयनी में एक पिंजारवाड़ी है और पिंजारवाड़ी में एक उज्जै&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 19px; "&gt;&lt;img src="http://3.bp.blogspot.com/-lRfqhetcODM/TilXp2Z4qGI/AAAAAAAAAMA/YkLnxKYjTtU/s200/DSC_0089.JPG" style="text-align: justify;float: left; margin-top: 0px; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; cursor: pointer; width: 200px; height: 133px; " border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5632129185493854306" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 19px; "&gt;यनी’, आसमान इतना खाली है जितनी तुम्हारी आंख’, जब कुछ भी नहीं हुआ करता आलू जरूर होता है, कवि के जाने के बाद हमने नहीं लिखी कोई कविता, ध्वस्त होती हुई दुनिया का मैं अंतिम नागरिक हुआ। &lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 19px; "&gt;नरेन्द्र जैन के बाद मंगलेश डबराल ने अपना रचना पाठ किया। उन्होंने संगतकार, यह नंबर मौजूद नहीं, नया बैंक, टार्च, पुरानी तस्वीर आदि अपनी चुनिंदा कविताएं सुनाईं। &lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(51, 51, 51); font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 13px; line-height: 19px; "&gt;कार्यक्रम के अंत में पंकज स्वामी ने आभार प्रदर्शन किया।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-5486809536359354249?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/5486809536359354249/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=5486809536359354249' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/5486809536359354249'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/5486809536359354249'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='जबलपुर में कामरेड शेषनारायण राय स्मृति व्याख्यान व काव्यपाठ'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-lVmqLZAUsQg/TilYgWaClYI/AAAAAAAAAMI/LI1ownIfvvo/s72-c/DSC_0017.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-2125004869368978733</id><published>2011-04-27T18:38:00.002+05:30</published><updated>2011-04-27T19:03:29.175+05:30</updated><title type='text'>जबलपुर के अजय चौधरी पद्मभूषण से सम्मानित</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-oWVIC3eLGck/TbgbAL32ToI/AAAAAAAAAK8/qqxaaydk-j4/s1600/padma%2Bbhushan.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 257px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-oWVIC3eLGck/TbgbAL32ToI/AAAAAAAAAK8/qqxaaydk-j4/s320/padma%2Bbhushan.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5600255826636197506" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space:pre"&gt; &lt;/span&gt;जबलपुर निवासी हिन्दुस्तान कंप्यूटर्स लिमिटेड (एचसीएल) के सह-संस्थापक अजय चौधरी को व्यवसाय और उद्योग क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने के लिए पिछले दिनों भारत की राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने पद्मभूषण से सम्मानित किया। उल्लेखनीय है कि अजय चौधरी जबलपुर नगर निगम के पूर्व आयुक्त स्वर्गीय जयकृष्ण चौधरी ‘हबीब’ के पुत्र हैं। अजय चौधरी की प्रारंभिक शिक्षा क्राइस्ट चर्च बॉयज हायर सेकेण्डरी स्कूल और जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में हुई। अजय चौधरी की इस उपलब्धि के लिए जबलपुर नगर निगम ने उनके नागरिक अभिनंदन करने की योजना बनाई है और यह समारोह जल्द ही आयोजित होगा।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space:pre"&gt; &lt;/span&gt;अजय चौधरी का जन्म 29 अगस्त, 1950 को हुआ। उन्होंने इलेक्ट्रानिक्स एवं कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि प्राप्त की और मिशिगन यूनिवर्सिटी, अमेरिका में स्कूल आफ बिजसेन एडमिनिस्ट्रेशन के एक्ज़क्यूटिव प्रोग्राम में शामिल हुए। अजय चौधरी ने तीन दशक पूर्व अपनी विस्मयकारी यात्रा इस सपने के साथ शुरू की कि भारत के पास अपना स्वयं का माइक्रोकंप्यूटर होगा। उन्होंने पांच अन्य व्यक्तियों के साथ सूचना और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में 1976 में भारत की पहली शुरूआत, एचसीएल की नींव रखी। 25,267 करोड़ रूपए के वैश्विक उद्यम बन चुके एससीएल की प्रगति में अजय चौधरी की भूमिका अहम रही है। अजय चौधरी की अगुवाई में एचसीएल इंफोसिस्ट्म, उभर रही प्रौद्योगिकियों पर अपनी जबर्दस्त पकड़ के साथ आज हार्डवेयर, सिस्ट्म-इंटीग्रेशन और अधोसंरचना-प्रबंधन-सेवा में अग्रणी पथ प्रदर्शक बन गया है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space:pre"&gt; &lt;/span&gt;अजय चौधरी के नेतृत्व में एचसीएल ने अनेक नई परियोजनाओं को पूरा किया है, जिन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। इनमें सूचना प्रौद्योगिकी के रिटेल क्षेत्र में पदार्पण द्वारा एससीएल इंफोसिस्ट्म को डिजिटल जीवनशैली की व्यापकता में शामिल करना, केन्द्राभिमुखता (कन्वर्जेस) के लिए प्रौद्योगिकी की क्षमता का निर्माण तब करना, जब सूचना-प्रौद्योगिकी संबंधी केन्द्राभिमुखता, एक नारा मात्र ही हुआ करता था, सिस्ट्म-इंटीग्रेषन के व्यापक व्यापार की शुरूआत करना, गुणवत्ता आंदोलन के जरिए कंपनी की अगुवाई करना और जनता के लिए सूचना प्रौद्योगिकी के कथन को अमल में लाना, इसके कुछ उदाहरण रहे हैं। भारत की विनिर्माण क्षमता में अत्यधिक विश्वास रखते हुए अजय चौधरी ने भारत में विनिर्माण के महत्व को आगे लाने में अनवरत रूप से कार्य किया है। &lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space:pre"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space:pre"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space:pre"&gt; &lt;/span&gt;वर्ष 2009 में अजय चौधरी को केन्द्रीय सूचना-प्रौद्योगिकी एवं संचार मंत्रालय द्वारा गठित आईटी टास्क फोर्स का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। इस समिति ने सरकार को अपनी व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत की। टास्क फोर्स में उद्योग-निकायों तथा मेट और नैसकॉम आदि सहित विभिन्न एसोसिएशनों का विचारशील नेतृत्व शामिल था।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space:pre"&gt; &lt;/span&gt;भारत के घरेलू सूचना-प्रौद्योगिकी बाजार के समर्थक के रूप में अजय चौधरी के योगदान तथा भारत में इलेक्ट्रानिक्स के क्षेत्र में उनके अनवरत प्रयासों की मान्यतास्वरूप डाटाक्वेस्ट आईटी पर्सन आफ द ईयर 2001 अवार्ड, वर्ष 2010 के लिए ईएलसीआईएनए-ईएफवाई द्वारा इलेक्ट्रानिक्स मैन आफ द ईयर, व्यूअर्स च्वाइस के लिए सीएनबीसी एशिया बिजनेस लीडर अवार्ड 2010, सीएनबीसी टीवी-18 इंडिया बिजनेस लीडर अवार्डस् 2010 के छठे संस्करण में इंडिया इनोवेटर आफ द ईयर अवार्ड आदि से सम्मानित किया गया। अजय चौधरी को देश के सूचना-प्रौद्योगिकी के उत्पादों के लिए अतुलनीय इको-प्रणाली के विकास, कंप्यूटर हार्डवेयर और साफ्टवेयर के क्षेत्र में उनके विचारपूर्ण नेतृत्व के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रूड़की द्वारा वर्ष 2010 में डाक्टरेट आफ साइंस (डी.एससी.) से भी सम्मानित किया गया।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-2125004869368978733?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/2125004869368978733/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=2125004869368978733' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/2125004869368978733'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/2125004869368978733'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='जबलपुर के अजय चौधरी पद्मभूषण से सम्मानित'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-oWVIC3eLGck/TbgbAL32ToI/AAAAAAAAAK8/qqxaaydk-j4/s72-c/padma%2Bbhushan.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-3780500746822343296</id><published>2010-09-10T18:46:00.007+05:30</published><updated>2010-09-11T11:56:40.844+05:30</updated><title type='text'>पहल और जन संस्कृति मंच की संयुक्त भागीदारी में सार्थक फिल्म कार्यशाला आयोजित</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;प&lt;/span&gt;हल और जन संस्कृति मंच की संयुक्त भागीदारी में जबलपुर में 4-5 सितंबर को दो दिवसीय &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/TIoxGaNm0XI/AAAAAAAAAKc/rR-Iawm5y0w/s1600/sanjay+Joshi.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 163px; height: 137px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/TIoxGaNm0XI/AAAAAAAAAKc/rR-Iawm5y0w/s320/sanjay+Joshi.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5515274679853961586" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;सार्थक फिल्म कार्यषाला आयोजित की गई। इस कार्यशाला में प्रतिभागियों को फिल्मों के संबंध में सैद्धांतिक व व्यवहारिक जानकारी देने के लिए दिल्ली से जन सं&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;स्कृ&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;ति मंच के फिल्म ग्रुप के संयोजक संजय जोशी और प्रसिद्ध डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकर संजय काक जबलपुर पहुंचे। कार्यशाला में फिल्म व डाक्यूमेंट्री फिल्म के प्रोफेशनल्स, मास कम्युनिकेशन के प्राध्यापक, विद्यार्थी, एनीमेशन कोर्स के विद्यार्थियों के साथ गंभीर दर्शक शामिल हुए। सार्थक फिल्म कार्यशाला का उद्घाटन डी. पी. बाजपेयी ने किया। डी. पी. बाजपेयी फिल्म उद्योग से पिछले पांच दशकों तक संबद्ध रहे हैं। उन्होंने कार्यशाला &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/TIoxjSHh3mI/AAAAAAAAAKs/KhVDewcq6No/s1600/SanjayKak.jpg"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 163px; height: 122px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/TIoxjSHh3mI/AAAAAAAAAKs/KhVDewcq6No/s320/SanjayKak.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5515275175897194082" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;का&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; उद्घाटन करते हुए कहा कि जबलपुर में यूथ फिल्म फोरम लंबे समय तक इस प्रकार की फिल्म कार्यशाला के आयोजन के लिए प्रयास करती रही, लेकिन सफल नहीं हो सकी। उन्होंने जबलपुर में पहल द्वारा इस प्रकार की कार्यशाला को आयोजित करने के लिए साधूवाद दिया और आशा व्यक्त की कि इससे जबलपुर में फिल्म आंदोलन सशक्त बनेगा।&lt;br /&gt;कार्यशाला के पहले सत्र में संजय जोशी ने सिनेमा की भाषा को विभिन्न कालजयी फिल्मों के माध्यम से समझाया। उन्होंने दूसरे सत्र में विश्व सिनेमा के संचयन में से प्रतिनिधि फिल्मों का चुनाव कर सिनेमा के विभिन्न रूपों की अभिव्यक्तियों से परिचित करवाया। दोनों सत्रों में संजय जोशी ने गीतांजलि राव की प्रिंटेड एनीमेशन, सत्यजीत रे की अपूर संसार, नार्मन मेक्लेन की द चेयरी टेल के माध्यम से फिल्म निर्देशन, फोटोग्राफी, संगीत, आर्ट डायरेक्शन, प्रापर्टी, दृश्यांकन को विश्लेषित किया। कार्यशाला में सरोकार-मुद्दों पर आधारित म्यूजिक वीडियो अमेरिका-अमेरिका और गांव छोड़व नाहीं ने प्रतिभागियों को विशेष रूप से आकर्षित किया। कुछ विदेशी डाक्यूमेंट्री फिल्म से प्रतिभागियों को भारतीय व विदेशी डाक्यूमेंट्री फिल्मों के अंतर को समझने में भी मदद मिली। संजय काक ने स्वयं की डाक्यूमेंट्री जश्ने आजादी के माध्यम से भारत में सेंसरशिप के औचित्य और तार्किकता के संबंध में जानकारी दी।&lt;br /&gt;कार्यशाला के दूसरे दिन सत्र की शुरूआत संजय काक की जश्ने आजादी के प्रदर्शन से हुई। इस फिल्म के प्रदर्शन के पश्चात् उन्होंने प्रतिभागियों से बातचीत करते हुए कहा कि भारत में राजनैतिक कारणों से सरोकार और मुद्दे आधारित डाक्यूमेंट्री फिल्मों को सेंसरशिप से गुजरना पड़ता है, जो कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात है। तीसरे सत्र में संजय जोशी ने स्वतंत्रता के पश्चात् से अभी तक निर्मित हुई कुछ महत्वपूर्ण एवं पुरस्कृत फिल्मों का प्रदर्शन करते हुए उनकी विषेषताओं पर रौशनी डाली। उन्होंने फीचर और डाक्यूमेंट्री के अंतर के संबंध में जानकारी दी। उस्ताद अलाउद्दीन खान पर केन्द्रित डाक्यूमेंट्री और गाड़ी लोहरदगा मेल प्रतिभागियों के दिल में गहराई से उतरी। कार्यशाला के अंतिम सत्र में फिल्मकार संजय काक ने अपनी चर्चित फिल्मों जश्ने आजादी और नर्मदा बचाओ आंदोलन के जरिए भारतीय डाक्यूमेंट्री निर्माण की बारीकियों पर चर्चा की।&lt;br /&gt;कार्यशाला के समापन अवसर पर पहल के संरक्षक और विख्यात साहित्यकार ज्ञानरंजन, संजय जोशी, संजय काक, कहानीकार राजेन्द्र दानी, रंगकर्मी अरूण पाण्डेय, बसंत काशीकर, राजेन्द्र चंद्रकांत राय, मनोहर बिल्लौरे, अरूण यादव और पंकज स्वामी ने प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए।&lt;br /&gt;दो दिवसीय फिल्म कार्यशाला से सभी प्रतिभागी उत्साहित हुए और उन्होंने आयोजकों से इस प्रकार की कार्यशाला को कुछ अंतराल में आयोजित करने का आग्रह किया। जन संस्कृति मंच के संजय जोशी ने कार्यशाला के सफल आयोजन के पश्चात् विश्वास व्यक्त किया कि जबलपुर में भी गोरखपुर व पटना की तर्ज पर फिल्म फेस्टीवल का आयोजन किया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-3780500746822343296?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/3780500746822343296/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=3780500746822343296' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/3780500746822343296'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/3780500746822343296'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='पहल और जन संस्कृति मंच की संयुक्त भागीदारी में सार्थक फिल्म कार्यशाला आयोजित'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/TIoxGaNm0XI/AAAAAAAAAKc/rR-Iawm5y0w/s72-c/sanjay+Joshi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-1196018166885302088</id><published>2010-06-29T19:08:00.001+05:30</published><updated>2010-06-29T19:47:52.774+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एम्पायर टॉकीज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डिलाइट टॉकीज'/><title type='text'>ब्रिटिशकलीन डिलाइट टॉकीज का अवसान</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;आ&lt;/span&gt;ज&lt;/span&gt; ही मुझे एक पान की दुकान से जानकारी मिली कि डिलाइट टॉकीज 1 जुलाई से बंद हो रही है। आज के नौजवानों के लिए डिलाइट टॉकीज बंद होने की बात कुछ खास मायने नहीं रखती है, लेकिन मेरे जैसे जबलपुर के खांटी लोगों के लिए यह एक बड़ी खबर है। डिलाइट टॉकीज का एक ऐतिहासिक महत्व है। आज के नौजवान मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखना पसंद करते हैं। उन्हें डिलाइट टॉकीज के महत्व की जानकारी भी नहीं होगी, लेकिन मुझ जैसे 70 के दशक की पैदाइश के लोगों के लिए डिलाइट टॉकीज का अपना एक अलग महत्व है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्तमान मल्टीप्लेक्स युग के पहले जबलपुर में टॉकीजों की संखया अच्छी-खासी थी। प्रसिद्ध अभिनेता प्रेमनाथ के पिता राय करतारनाथ की एम्पायर टॉकीज और डिलाइट टॉकीज ब्रिटिशकालीन जबलपुर में अंग्रेजी और हॉलीवुड सिनेमा के प्रदर्शन के मुखय केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध थे। संभवतः मध्यप्रदेश में अंग्रेजी और हॉलीवुड की फिल्मों को प्रदर्शित करने का श्रेय दोनों टॉकीजों को ही है। एम्पायर टॉकीज में स्वतंत्रता के पहले ऑपेरा शो हुआ करते थे और फिर फिल्मों का प्रदर्शन हुआ। राय करतारनाथ ने टॉकीज का अधिपत्य लेने के बाद भी टॉकीज का नाम नहीं बदला। वहीं डिलाइट टॉकीज भी स्वतंत्रता के पूर्व अस्तित्व में आ गई थी। शुरूआत में डिलाइट टॉकीज नागपुर के एक क्रिद्गिचयन मिशनरी ट्रस्ट की संपत्ति थी। इसके पश्चात्‌ जबलपुर में प्लाजा टॉकीज (बाद में जयंती टॉकीज) को संचालित करने वाली कंपनी सुप्रीम फिल्म एक्सचेंज ने डिलाइट टॉकीज का संचालन किया। जानकारों ने बताया कि गोरखपुर निवासी डा. भटनागर ने भी कुछ दिन डिलाइट टॉकीज को संचालित किया। सिविल लाइन के प्रतिष्ठित नागरिक डा. डिसिल्वा के प्रयासों से आर. पी. नायक परिवार को डिलाइट टॉकीज की संपत्ति मिली और वर्तमान में उनके परिवार के सदस्य इसके मालिक हैं। बताया गया है कि टॉकीज बंद होने के पश्चात्‌ अब यहां मार्केट के साथ-साथ बहु- मंजिला आवासीय परिसर का निर्माण होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद के दिनों में जबलपुर में हिंदी फिल्मों का प्रदर्शन करने वाले थिएटरों में भी अंग्रेजी और हॉलीवुड की फिल्में प्रदर्शित होने लगीं। दरअसल एम्पायर और डिलाइट टॉकीज क्रमशः जबलपुर के केंट और सिविल लाइन क्षेत्र में स्थित थीं और इस क्षेत्र में अभिजात्य और भद्र लोग रहा करते थे। ये लोग अंग्रेजी और हॉलीवुड की फिल्में देखना पसंद करते थे। सातवें-आठवें दशक में डिलाइट टॉकीज में अन्य भारतीय भाषाओं की फिल्में भी प्रदर्शित होने लगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे जेहन में आज भी डिलाइट टॉकीज में देखी हुईं क्लॉसिक फिल्मों की स्मृतियां अमिट हैं। मैंने ऐतिहासिक डिलाइट टॉकीज में क्लियोपेट्रा, बैनहर, लारेंस आफ अरेबिया, द डीप, टावरिंग इनफर्नो, जेम्स बांड सीरिज की लगभग सभी फिल्में, बू्रस ली इरा की एंटर द ड्रेगन, रिटर्न आफ द डे्रगन, फिस्ट आफ फ्यूरी, अफ्रीकन सफारी, हटारी, स्टार वार्स, द एम्पायर्स स्ट्राइक बैक, इंडियना जोंस, मैड मेक्स, लारेल-हार्डी, चॉर्ली चैपलिन, म्यूनिख-मांट्रियल-मास्को ओलंपिक की तीन घंटे की फिल्में देखी हैं। जबलपुर में अंग्रेजी फिल्मों के देखने के शौकिन एम्पायर के साथ डिलाइट टॉकीज में नियमित रूप से आते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे याद है कि रविवार को सुबह के शो में डिलाइट टॉकीज में क्षेत्रीय भारतीय भाषाओं की फिल्मों का प्रदर्शन भी होता था। जबलपुर के कई बंगाली, तमिल, तेलुगु, मलयाली और तो और उड़िया परिवार अपनी-अपनी भाषा की फिल्में यहां देखने आते थे। अडूर गोपाल कृष्ण की कुछेक फिल्म यहां प्रदर्शित हुईं हैं। यूथ फिल्म फोरम द्वारा आयोजित हंगेरियन फिल्म फेस्टीवल को लोग आज भी याद करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डिलाइट टॉकीज के साथ कुछ विशेषताएं भी जुड़ी हुई थीं। जैसे कि इस टॉकीज के कुछ प्रतिबद्ध दर्शक थे। इनमें से कुछ तो जबलपुर के आसपास के लोग भी थे। ऐसे प्रतिबद्ध दर्शक जब भी सिनेमा देखते थे, तो वे सिर्फ डिलाइट टॉकीज ही जाते थे। यहां फिल्म देखने वाले कई दर्शक इंटरवल में मटन का समोसा जरूर खाते थे। यदि कहा जाए तो फिल्म देखना या मटन समोसा खाना दोनों ही एक दूसरे के लिए बहाना होते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नौवें दशक की शुरूआत में डिलाइट टॉकीज भू-मंडलीकरण की चपेट में आ गया। वीडियो पॉयरेसी और हॉलीवुड की फिल्मों के घर-घर में पहुंचने से डिलाइट टॉकीज दर्शकों के लिए तरसने लगी। इसका तोड़  अंग्रेजी के साथ हिंदी और दक्षिण की अश्लील फिल्मों का प्रदर्शन कर निकाला गया। बताया जाता है कि इन फिल्मों में ब्लू फिल्मों को भी जोड़  कर लोगों को आकर्षित करने और टॉकीज के अस्तित्व बचाए रखने का प्रयास किया गया। इस प्रकार की फिल्मों के प्रदर्शन से लोग टॉकीज से ही दूर होते गए। कालांतर में तो टॉकीज में फिल्मों के मुख्य पोस्टर ही प्रवेश द्वार से गायब हो गए और अश्लील फिल्म देखने के शौकीन लोग सिर्फ फिल्मों का नाम देख कर ही टॉकीज जाने लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो डिलाइट टॉकीज की परम्परा और विरासत उसी दिन खत्म हो गई थी, जिस दिन से यहां अश्लील फिल्मों का प्रदर्शन शुरू हुआ, लेकिन 1 जुलाई को इसकी अवसान तिथि कह सकते हैं। डिलाइट टॉकीज बंद होने के बाद भी लोग इस क्षेत्र को डिलाइट ही कहा करेंगे, क्योंकि डिलाइट टॉकीज जबलपुर के लोगों की एक आदत के रूप में शामिल हो गई थी। जब मैं यह वृतांत लिखा ही रहा था, तब मेरी पत्नी ने कहा कि बाहर निकलो तो डिलाइट से माचिस ले आना। पत्नी की बात सुन कर बेटा भी बोला डिलाइट से मेरा पेन भी ले लेना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-1196018166885302088?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/1196018166885302088/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=1196018166885302088' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/1196018166885302088'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/1196018166885302088'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2010/06/blog-post_29.html' title='ब्रिटिशकलीन डिलाइट टॉकीज का अवसान'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-988277298923810521</id><published>2010-06-26T08:00:00.005+05:30</published><updated>2010-06-26T21:53:14.602+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रमोद  सोलंकी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रकाश  और ध्वनि संयोजन'/><title type='text'>बिना रौशनी और आवाज के बाबा चले गए</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/TCYipAV7d0I/AAAAAAAAAJw/ttk7MRhMvgg/s1600/Baba-1.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 127px; height: 162px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/TCYipAV7d0I/AAAAAAAAAJw/ttk7MRhMvgg/s200/Baba-1.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5487111283859486530" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;23&lt;/span&gt; जून को समाचार पत्रों में प्रकाशित शोक सूचना से जानकारी मिली कि आज बाबा सोलंकी की तेरहवीं हैं। विज्ञापन में उनके निधन की तारीख 10 जून दर्ज थी। बाबा यानी कि प्रमोद सोलंकी की पहचान जबलपुर में रौशनी और ध्वनि के इकलौते जादूगर के रूप में रही है। मुझे शोक सूचना पढ़ कर इसलिए पीढ़ा हुई कि जबलपुर शहर में किसी भी नाट्‌य, साहित्यिक, संगीत या कला संस्था ने बाबा सोलंकी को श्रद्धांजलि नहीं दी। यदि उनके निधन के पश्चात्‌ संस्थाओं द्वारा श्रद्धांजलि दी जाती तो मुझे समाचारों पत्रों में प्रकाशित समाचारों के माध्यम से जानकारी मिल जाती कि बाबा सोलंकी अब इस संसार में नहीं रहे। वैसे जबलपुर की साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्था&lt;span&gt;ओं&lt;/span&gt; द्वारा तथाकथित सम्मान और काव्य गोष्ठियों के समाचार अक्सर पढ ने मिल जाते हैं। ऐसे में विवेचना, विवेचना रंगमंडल, मराठी समाज सहित कई संस्थाओं जिनसे बाबा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े रहे हैं, द्वारा बाबा सोलंकी को श्रद्धांजलि न देना आश्चर्यजनक और दुखद है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1964 में यवतमाल से अपने पिता की डांट खा कर जबलपुर भाग आए 17 वर्ष के लड़के के बारे में किसी ने नहीं सोचा था कि भविष्य में वह जबलपुर के कला क्षेत्र के लिए एक जरूरत बन जाएगा। पि&lt;span&gt;छले&lt;/span&gt; चार दशकों से यह व्यक्ति जबलपुर में आयोजित होने वाली संगीत सभाओं, नाट्‌य प्रस्तुतियों और मंचीय कलाओं से जुड़ी हर गतिविधियों में मंच के पास कार्यक्रम की शुरूआत से ले कर अंत तक अपने के स्पर्श से मंच पर प्रकाश और ध्वनि का कुछ ऐसा ताना बाना बुन देता था कि दर्शक एवं श्रोता एक सुखद अनुभूति में खो से जाते थे। जबलपुर के कला रसिक उसे प्रमोद (बाबा) सोलंकी के नाम से जानते थे और दर्शक-श्रोता उन्हें नाम से नहीं जानते थे, वे उन्हें चेहरे से अवश्य पहचान लेते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा सोलंकी ने अपनी शिखर तक पहुंचने की कहानी मुझे वर्ष 1997 में जिस विनम्रता और सहजता से सुनाई थी, दरअसल वह उतनी आसान नहीं थी, उनकी संघर्ष गाथा। बाबा पिछले छह महीने से डायबीटिज के कारण अस्वस्थ थे। उनकी दोनों किडनियां खराब हो चुकी थीं। लगभग हर दूसरे दिन उनका डाय&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/TCYluCJL5zI/AAAAAAAAAKI/Igii24GcDgY/s1600/Baba-3.jpg"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 320px; height: 225px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/TCYluCJL5zI/AAAAAAAAAKI/Igii24GcDgY/s320/Baba-3.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5487114668777137970" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span&gt;लिसिस&lt;/span&gt; होता था। बीमार होने के पूर्व ही उन्होंने काम काज की जिम्मेदारी अपने बेटे को सौंप दी थी। जब उन्होंने सक्रिय रूप से काम करना छोड़ा, तब वे शीर्ष पर थे। उन्हें जितना सम्मान बड़े&lt;span&gt; कलाकारों&lt;/span&gt;, निर्देशकों और आम जनता से मिला, शायद उतना सम्मान और सामीप्य जबलपुर के किसी कलाकार को नहीं मिला। बाबा सोलंकी जबलपुर के कला मंच के साथ ही साथ प्रदेश के कई क्षेत्रों में प्रकाश और ध्वनि संयोजन (लाइट एंड साउंड) के पर्याय और आवश्यकता बन गए थे। यदि कहा जाए कि उन्होंने इस विधा को कला क्षेत्र में एक मान्यता दिलवाई, तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा सोलंकी ने स्कूली जीवन से प्रकाश और ध्वनि संयोजक को एक शौक के रूप में अपनाया था। उस समय वे यवतमाल में रहते थे और खाली समय में एक फिल्म थिएटर में ऑपरेटर के सहायक के रूप में काम करते थे। उनके पिता को बाबा का यह तकनीकी शौक पसंद नहीं था। पिता के जोर देने पर उन्होंने कॉलेज में कॉमर्स विषय में प्रवेश ले लिया। प्रथम वर्ष में ही फेल होने पर बाबा को पिता की डांट खानी पड़ी और वे जबलपुर रेलवे में कार्यरत अपने भाई सुधीर चौहान के पास आ गए। जबलपुर में आ कर बाबा मराठी समाज से जुड  गए और यहीं से उनका नाटकों से भी जुड़ाव हुआ। 1967 में जबलपुर में बाहर से आ कर मराठी व्यवसायिक नाटक करने वालों की संख्या अचानक बढ़ी और इनके साथ बाबा सोलंकी ने जुड  कर प्रकाश और ध्वनि संयोजन का कार्य करना शुरू किया। उस समय बाबा ने मराठी रंगमंच के बाल कुलटकर, श्रीराम लागू, नाना साहब सिरगोपीकर, दादा कोंडके (लोक नाट्‌य), शरद तलवारकर और विजया मेहता जैसे निर्देशकों के साथ काम कर प्रकाश संयोजन की बारीकियों को सीखा। इसी तरह बाबा स्थानीय मराठी नाट्‌य संस्थाओं से जुड़े और उन्होंने 1967 में स्वयं के प्रकाश और ध्वनि उपकरणों से काम करना शुरू किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा सोलंकी ने केशवराम गांवडे निर्देशित मराठी नाटक 'तू बेड़ा कुम्बार' में प्रकाश और ध्वनि संयोजन की जिम्मेदारी संभाल कर पहली बार स्वतंत्र कार्य किया। उस समय पैसों और संसाधनों की कमी को देखते हुए बाबा ने प्रकाश संयोजन के लिए स्पाट लाइट स्वयं बनाया था। इसके लिए उन्होंने एल्युमीनियम शीट का उपयोग किया। 'तू बेड़ा कुम्बार' प्रस्तुति काफी चर्चित व सफल रही और इसमें किए गए प्रकाश संयोजन से जबलपुर के नाट्‌य प्रेमी दर्शकों को भी एक नया अनुभव हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद बाबा सोलंकी ने फिर पीछे मुड़  कर नहीं देखा और वे निरंतर आगे बढ़ते गए। उन्होंने सैद्धांतिक ज्ञान न होने के बावजूद प्रत्येक नाट्‌य प्रस्तुतियों में प्रकाश संयोजन को ले कर ऐसे प्रयोग किए, जो राष्ट्रीय नाट्‌य विद्यालय के प्राध्यापकों के साथ बड़े-बड़े निर्देशकों को भी अंचभित कर देते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा सोलंकी को हिन्दी रंगमंच से परिचित करवाने का श्रेय मंचीय हास्य कलाकार डी. के. कुलकर्णी को है। सातवें दशक में नाट्‌य निर्देशक श्याम खत्री के साथ बाबा सोलंकी ने बहुत काम किया। बाबा सोलंकी ने एक पुराने अनुभव को याद करते हुए बताया था कि श्याम खत्री के साथ मिल कर उन्होंने 'पराजित' नाटक के एक दृश्य में अंधेरा रख कर और सिगरेट जला कर धुंए के प्रभाव को मंच पर आत्मा के स्वरूप में प्रगट किया था। उनका कहना था कि स्मोक मशीन न होने और इसी प्रकार अन्य उपकरणों के अभाव के चलते उन्हें प्रकाश संयोजन में कई प्रयोग करने पड़े। बाबा सोलंकी ने श्याम खत्री द्वारा निर्देशित मराठी से हिन्दी में अनुवादित 'दिया जले सारी रात' में भी प्रकाश संयोजन में प्रयोग किए। बाबा ने सातवें दशक की शुरूआत में श्याम खत्री के एक प्रसिद्ध हिन्दी नाटक 'विषपायी' में पहली बार प्रकाश संयोजन के लिए डीमर्स का उपयोग किया। इसी प्रस्तुति के संबंध में उन्होंने बताया कि प्रकाश संयोजन की बदौलत एक दृश्य में मुख्य महिला पात्र की निभाने वाली कलाकार पर क्रास का रिफ्लेक्शन प्रकाश संयोजन से उभारा गया था और इस दृश्य को दर्शकों ने बहुत सराहा था। बाद में 'विषपायी' के लगातार पच्चीस प्रदर्शन हुए, जो अपने आप में एक रिकार्ड है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्वप्रथम नाटकों में डीमर्स का उपयोग और इसके लिए प्रेरित करने के लिए बाबा सोलंकी जबलपुर पालीटेक्निक कालेज के बापू धांडे का नाम लेना भी नहीं भूलते हैं। बाबा ने बताया कि 'विषपायी' में ही नाव का दृश्य को भी प्रकाश संयोजन के माध्यम से प्रस्तुत किया गया था और यह दृश्य नाट्‌य प्रस्तुति की हाई लाइट थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्याम खत्री के जबलपुर से बाहर ट्रांसफर होने पर बाबा सोलंकी और कचनार संस्था का जुड़ाव हुआ। बाबा ने संस्था की नाट्‌य प्रस्तुति 'खून में बोई धान' और 'इतिहास चक्र' जैसे नाटक किए। इन दोनों नाट्‌य प्रस्तुतियों ने इलाहाबाद और बंबई में आयोजित अखिल भारतीय नाट्‌य प्रतियोगिताओं में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इन्हीं प्रस्तुतियों के माध्यम से बाबा को जबलपुर के बाहर भी प्रकाश और ध्वनि संयोजन कला में जौहर दिखाने को मिले। बंबई की प्रतियोगिता में 'इतिहास चक्र' की प्रस्तुति और इसके प्रकाश संयोजन से निर्णायक फिल्म अभिनेता जयराज और होमी वाडिया बहुत प्रभावित हुए और कलाकारों के साथ बाबा सोलंकी को खुशी में गले लगा लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद जबलपुर के नाट्‌य प्रेमी एवं बैंक कर्मी तरूण जागीरदार ने बाबा सोलंकी को प्रोत्साहित किया और आर्थिक सहायता भी दी। बाबा सोलंकी ने यहीं से स्वयं  के उपकरण जोड़ना भी शुरू कर दिए। जागीरदार की सहायता से बाबा ने प्रकाश संयोजन के लिए दो-दो स्पाट और डीमर खरीदे। इसी दौरान जागीरदार के मराठी नाटक 'हीरात फुल्ला परिजात' का मंचन हुआ और इसमें बाबा ने अपने बनाए गए उपकरणों के साथ आधुनिकतम उपकरणों का प्रकाश संयोजन में उपयोग किया। आधुनिक मराठी रंगमंच बाबा सोलंकी, राजेन्द्र रानाडे और रवि परांजपे के साथ काम कर चुके थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1975-77 में 'विवेचना' के माध्यम से अलखनंदन जबलपुर में हिन्दी रंगमंच को सक्रिय रखे थे। बाबा सोलंकी ने अलखनंदन के निर्देशन में गिनीपिग और वेटिंग फार गोदो का प्रकाश संयोजन किया। इन नाटकों के प्रकाश संयोजन की समीक्षकों ने भी तारीफ की। प्रसिद्ध रंगकर्मी बंशी कौल वेटिंग फार गोदो को राष्ट्रीय नाट्‌य विद्यालय में प्रस्तुत कर चुके थे। बंशी कौल ने जब भोपाल के रवीन्द्र भवन में अलखनंदन की प्रस्तुति को देखा, तो वे बाबा सोलंकी की मौलिक प्रकाश संयोजन और ध्वनि व्यवस्था से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इसकी चर्चा दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्‌य विद्यालय तक में की। बाबा ने बताया कि अलखनंदन को भारत भवन में पहुंचाने के लिए वेटिंग फार गोदो का महत्वपूर्ण योगदान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रकाश संयोजन के अतिरिक्त ध्वनि संयोजन में भी बाबा सोलंकी का जबलपुर में कोई जवाब नहीं रहा। जबलपुर में होने वाली स्तरीय संगीत सभाओं में बाबा सोलंकी और उनकी ध्वनि व्यवस्था एक आवश्यकता का रूप ले चुकी थीं। आयोजकों के साथ-साथ कई बार ऐसा भी हुआ है कि कलाकार ने पहले आयोजन स्थल में बाबा की मौजूदगी की पुष्टि की और फिर अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया। सातवें-आठवें दशक में होने वाले 'भूले-बिसरे गीतों' के श्रंखलाबद्ध कार्यक्रम की प्रकाश और ध्वनि की परिकल्पना बाबा सोलंकी की ही रहा करती थी। इस कार्यक्रम के बंद हो जाने के बाद बाबा फिर किसी आर्केस्ट्रा कार्यक्रम से नहीं जुड़े। उनका कहना था कि ध्वनि के नाम पर सिर्फ धूम धड़ाका ही रह गया था। ध्वनि संयोजन के संबंध में उन्होंने कई ऐसे मजेदार और रोचक किस्से सुनाए, यदि उनका यहां जिक्र किया जाए तो यह स्थान ही कम पड़ जाए। बाबा गायकों में किशोरी आमोनकर, जगजीत सिंह, अहमद-मोहम्मद हुसैन, पीनाज मसानी, पंकज उधास, तलत अजीज, महेन्द्र कपूर और वादकों में बिस्मिल्लाह खां, जाकिर हुसैन, के अलावा जबलपुर में सोवियत संघ के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किए गए कार्यक्रम में अपने प्रकाश और खासतौर से ध्वनि संयोजन को महत्वपूर्ण मानते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1967-68 में फिल्म गायक महेन्द्र कपूर ने उनके द्वारा किए गए ध्वनि संयोजन से सिर्फ 40 वॉट के एम्पलीफायर में गाया था। 1995 में जब सतना के एक कार्यक्रम में महेन्द्र कपूर गाने पहुंचे और यहां उन्होंने एक हजार वॉट के एम्पलीफायर सिस्ट्‌म में गाया। कार्यक्रम समाप्ति के पश्चात्‌ उन्होंने ध्वनि संयोजन की प्रशंसा की और इसके नियंत्रक को तुरंत बुलवाया। बाबा सोलंकी के सामने  देख कर उन्हें लगभग 27-28 वर्ष पुराना वाक्या याद आ गया। उन्होंने इस घटना को सबको सुनाया। महेन्द्र कपूर के दोनों कार्यक्रमों को बाबा अपने जीवन की अविस्मरणीय घटना मानते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रसिद्ध तबला वादक जाकिर हुसैन बाबा के बनाए 'साउंड मिक्सर' पर बैठ कर उनके ध्वनि संयोजन की तारीफ कर चुके थे। मशहूर शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खां से बाबा की तकरार आज तक कला रसिकों को याद है। जबलपुर में जब भी अहमद-मोहम्मद हुसैन और पीनाज मसानी अपने कार्यक्रम के सिलसिले में आए, तब-तब उन्होंने आयोजकों से बाबा सोलंकी की ध्वनि व्यवस्था और संयोजन रखने की शर्त रखी। वर्ष 1996 में गजल गायक तलत अजीज ने जबलपुर के प्रसिद्ध और अत्याधुनिक तरंग प्रेक्षागृह में रोटरी क्लब के एक कार्यक्रम में बाबा सोलंकी के ध्वनि संयोजन को वरीयता दे कर इस क्षेत्र के तकनीकी विशेषज्ञों को हतप्रभ कर दिया था। कुछ ऐसे भी कलाकार रहे हैं, जो कार्यक्रम के पहले बाबा को देख कर और उनके पास आ कर संतुष्ट होते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस संबंध में बाबा ने बताया था कि वे स्वयं गंधर्व विद्यालय से तबले में विशारद थे और इस वजह से संगीत का मर्म समझ कर वे कार्यक्रम में गायक की आवाज की पिच को कम-ज्यादा, शार्पनेस, बेस गहराई को माइक के नियंत्रण के माध्यम से दर्शकों को व श्रोताओं तक पहुंचाते थे। जिससे संगीत के आनंद की अनुभूति होती थी। बाबा ने बताया कि ध्वनि नियंत्रण और संयोजन में सभी की अच्छाई-बुराई  झेलनी पड़ती थी। गायकों-वादकों के साथ दर्शकों-श्रोताओं को भी संतुष्ट करना पड़ता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा सोलंकी मंच के अलावा गोंडवाना उत्सव में मदनमहल किले में 'लाइट एंड साउंड' का एक अद्‌भुत प्रयोग कर चुके थे। ग्रेनेडियर्स रेजीमेंट के लिए भी उन्होंने 'लाइट एंड साउंड' के माध्यम से एक युद्ध रूपक प्रस्तुत किया, जो काफी चर्चित हुआ। मंच के अलावा बाबा ने दूरदर्द्गान की तीन फिल्मों में भी प्रकाश संयोजन किया। मुक्तिबोध के जीवन पर 'तुम निर्भय जो सूर्य गगन' में उनके इस क्षेत्र में पहली बार किए गए प्रकाश संयोजन से दूरदर्शन के प्रोड्‌यूसर सत्येन्द्र प्रधान अत्यंत प्रभावित हुए थे। प्रधान की टिप्पणी थी-''लगता नहीं कि यह आदमी पहली बार इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए प्रकाश संयोजन कर रहा है।'' वर्ष 1997 में दूरदर्शन के राष्ट्रीय कार्यक्रम के लिए स्वतंत्रता पर बन रही फिल्म में बाबा के प्रकाश संयोजन की काफी तारीफ हुई थी। उनके पास उपलब्ध उपकरणों और उनसे किए गए प्रकाश संयोजन से दूरदर्द्गान के प्रोड्‌यूसर को काफी तसल्ली मिली। बाबा ने प्रसिद्ध जादूगर आनंद को उनके शो के लिए भी प्रकाश और ध्वनि की एक परिकल्पना बना कर दी थी। बाबा ने बताया था कि जादूगर आनंद के शो में लेजर इफेक्ट बहुत सामान्य सी चीज रहती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा ने बाद के दिनों में अपनी विरासत दो भतीजों सुरेश और राजू एवं बेटे मोहन को सौंप दी थी। प्रकाश और ध्वनि संयोजन से 46 वर्षों तक जुड़े रहे बाबा अपने सहयोगी दिलीप झाड़े के मिले सहयोग को कभी नहीं भुला पाए। बाबा कहना था कि बचपन से जुड़े दिलीप झाड़े के पास कोई सैद्धांतिक शिक्षा या ज्ञान नहीं है, लेकिन व्यवहारिक ज्ञान में उसका कोई सानी नहीं है। किसी भी मंच में, कितनी भी ऊंचाई पर लाइट बांधने का कार्य आज जबलपुर में दिलीप के अलावा कोई नहीं कर सकता है। दिलीप का जोखिम भरा स्वभाव ही उसकी सबसे बड़ी विशेषता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रकाश और ध्वनि संयोजन में नए लोगों की संभावना पर बाबा कहते थे कि सबसे बड़ी बात समर्पण की भावना का अभाव है। प्रकाश और ध्वनि संयोजन के लिए किसी कार्यक्रम में सबसे पहले आना पड ता है और कार्यक्रम की समाप्ति के पश्चात्‌ सबसे अंत में जाने वालों में हम ही लोग होते थे। इसी कारण से नए और सीखने वालों की कमी है। लोग सिर्फ कुर्सी पर बैठ कर आपरेटिंग करना चाहते हैं, जबकि यहां तो लाइट बांधने से खोलने और उठा कर रखने तक सब कुछ करना पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा सोलंकी प्रकाश संयोजन में किसी से प्रभावित नहीं रहे और न ही कोई उनकी प्रेरणा रहा। बाबा प्रकाश संयोजन में मौलिक कार्य करते रहे, परन्तु वे प्रकाश संयोजन में दो शैलियों कलकत्ता और बंबई को निर्धारित करते थे। बाबा के अनुसार कलकत्ता के रंगकर्मी प्रकाश उपकरणों का बहुतायत से प्रयोग करते थे और वहीं बंबई के प्रकाश संयोजक कम उपकरण में ज्यादा कार्य करते थे। बाबा स्वयं को बंबई के प्रकाश संयोजकों के करीब ज्यादा पाते थे। प्रकाश और ध्वनि संयोजन में बाबा के योगदान को देख कर प्रसिद्ध रंगकर्मी नादिरा बब्बर ने बंबई में कुछ वर्ष पूर्व एकजुट नाट्‌य समारोह में उनको सम्मानित किया था। यह समारोह बैक स्टेज में योगदान देने वालों को सम्मानित करने के लिए खासतौर से आयोजित किया गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जबलपुर के रंगकर्मियों का मानना था कि बाबा सोलंकी मराठी रंगमंचीय शैली से प्रकाश संयोजन करते थे, जिसकी अपनी कुछ बाध्यताएं थीं। इसके बावजूद सीमित संसाधनों में उनका कार्य करने का ढंग और प्रकाश प्रभाव और संयोजन अद्‌भुत था और सबसे बड़ी बात तो यह थी कि बाबा प्रकाश और ध्वनि संयोजन से एक 'मिशन' की तरह जुड़े थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-988277298923810521?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/988277298923810521/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=988277298923810521' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/988277298923810521'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/988277298923810521'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='बिना रौशनी और आवाज के बाबा चले गए'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/TCYipAV7d0I/AAAAAAAAAJw/ttk7MRhMvgg/s72-c/Baba-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-2079582134560600224</id><published>2010-05-31T08:14:00.005+05:30</published><updated>2010-05-31T18:13:44.827+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हॉकी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्पोट्‌र्स साइकोलॉजी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विक्रम अवार्ड'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वालीबाल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डा. अविनाश कौर सिद्धू'/><title type='text'>डा. अविनाश कौर सिद्धू की विशिष्ट उपलब्धि: दो खेलों में भारत का 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से स्पोट्‌र्स साइकोलॉजी में मास्टर आफ स्पोर्ट की डिग्री प्राप्त की और इसी संस्थान से उन्होंने स्पोट्‌र्स साइकोलॉजी में डॉक्टरेट भी की है। उन्होंने सन्‌ 1972 से वर्ष 2001 तक ग्वालियर के लक्ष्मीबाई नेशनल इंस्टीट्‌यूट आफ फिजिकल इंस्टीट्‌यूट यूनिवर्सिटी में अध्यापन कार्य किया है। डा. सिद्धू ने वर्ष 2001 में प्रोफेसर पद से वालियंटरी रिटायरमेंट ले लिया।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;डा. सिद्धू ने वर्ष 2001 से वर्ष 2005 तक बांग्लादेश इंस्टीट्‌यूट आफ स्पोर्ट&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;ढाका में स्पोट्‌र्स साइकोलॉजिस्ट के रूप में कार्य किया है। उन्होंने दस खेलों हॉकी&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;बॉस्केटबाल&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;बाक्ंिसग&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;फुटबाल&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;जिम्नास्टिक&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;शूटिंग&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;स्विमिंग&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;टेनिस और टै्रक एंड फील्ड में बांग्लादेश की राष्ट्रीय टीमों को सहायता प्रदान की। मेनचेस्टर कॉमनवेल्थ गेम्स 2004 में बांग्लादेश के स्वर्ण पदक जीतने वाले शूटर मोहम्मद आसिफ को डा. अविनाश सिद्धू ने मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार किया था। वर्ष 2004 के इस्लमाबाद सैफ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने वाले मोहम्मद आसिफ और शर्मीन को भी डा. सिद्धू की मनोवैज्ञानिक सहायता मिली थी।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;डा. सिद्धू वर्ष 1968 में आयोजित प्रथम एशियल महिला हॉकी चैम्पियनशिप में भारतीय टीम की कप्तान रही हैं। भारतीय टीम ने इस प्रतियोगिता में तीसरा स्थान प्राप्त किया था। इसी प्रतियोगिता के प्रदर्शन के आधार पर उन्हें &lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;ऑल स्टार एशियन इलेवन&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;' &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;में चुना गया। इसके पश्चात्‌ डा. अविनाश सिद्धू ने श्रीलंका&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;आस्ट्रेलिया&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;जापान&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;हांगकांग&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;यूगांडा&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;सिंगापुर&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;न्यूजीलैंड&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;स्पेन&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;स्कॉटलैंड के विरूद्ध खेली गई टेस्ट सीरिज में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया और इन देशों के विरूद्ध टेस्ट सीरिज में विजय दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डा. सिद्धू ने ऑकलैंड (न्यूजीलैंड)&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;बिलबाओ (स्पेन) और एडिनबर्ग (स्कॉटलैंड) में आयोजित इंटरनेशनल फेडरेशन वूमेन हॉकी एसोसिएशन के टूर्नामेंट&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;जो कि विश्व कप के समकक्ष माना जाता है&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;में भी भारतीय महिला हॉकी टीम का प्रतिनिधित्व किया।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;डा. सिद्धू ने वर्ष 1962 से वर्ष 1974 तक महाकौशल महिला हॉकी टीम का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने वर्ष 1963&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;1965 और 1966 में अंतर विश्वविद्यालयीन महिला हॉकी प्रतियोगिता में जबलपुर विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया। वर्ष 1965 में जबलपुर विश्वविद्यालय की टीम उपविजेता रही। इस टीम का नेतृत्व भी अविनाश सिद्धू ने ही किया था। डा. सिद्धू ने वर्ष 1968 में पंजाबी यूनिवर्सिटी का प्रतिनिधित्व भी किया।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;डा. अविनाश सिद्धू ने सक्रिय हॉकी से निवृत्त होने के पश्चात्‌ कई अंतरराष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिताओं में अंपायरिंग भी की है। जिसमें 10 वें एशियन गेम्स सियोल&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;द्वितीय इंदिरा गांधी इंटरनेशनल विमेन हॉकी टूर्नामेंट नई दिल्ली&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;एशियन जूनियर विमेन हाकी वर्ल्ड कप क्वालीफाइंग टूर्नामेंट&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;तृतीय इंटरनेशनल कप फार विमेन हॉकी&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;11 वें एशियन गेम्स बीजिंग (फाइनल मैच में आफिशियल)&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;चतुर्थ इंदिरा गांधी इंटरनेशनल विमेन हॉकी टूर्नामेंट जैसी प्रमुख प्रतियोगिताएं हैं। डा. सिद्धू&lt;span style=""&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;1994&lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt; हिरोशिमा गेम्स में भी अंपायर के रूप में चुनी गईं थीं।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;महिला हॉकी में डा. अविनाश सिद्धू ने भारतीय महिला हॉकी टीम की मैनेजर के रूप में भी अपनी सेवाएं दी हैं। वे &lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;1983&lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt; से &lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;1985&lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt; तक भारतीय टीम की सिलेक्टर रहीं हैं। उन्होंने भारतीय महिला हॉकी टीम के लिए स्पोट्‌र्स साइकोलॉजिस्ट के रूप में भी अपनी सेवाएं दी हैं। उनकी पहचान एक श्रेष्ठ कोच के रूप में भी है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;&lt;span style=""&gt;      &lt;/span&gt;सन्‌ &lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;1970&lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt; में डा. अविनाश सिद्धू ने भारतीय महिला वालीबाल टीम का नेतृत्व भी किया। इसके अलावा राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कई बार उन्होंने मध्यप्रदेश की टीम का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने एथलेटिक्स (ट्रैक एंड फील्ड) के अंतर्गत &lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;20&lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt; वें नेशनल गेम्स में &lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;4X100&lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt; रिले और &lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;800&lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt; मीटर दौड़ में भाग लिया और रिले में कांस्य पदक जीता। &lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;1963-64&lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt; में उन्हें जबलपुर विश्वविद्यालय का सर्वश्रेष्ठ एथलीट घोषित किया गया। &lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;1964&lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt; में नेशनल बास्केटबाल चैम्पियनशिप में मध्यप्रदेश की टीम का प्रतिनिधित्व किया। वर्ष &lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;1963&lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt; एवं &lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;1965&lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt; में डा. सिद्धू ने इंटर यूनिवर्सिटी बास्केटबाल टूर्नामेंट में जबलपुर विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया। दोनों प्रतियोगिताओं में वे टीम की कप्तान भी रहीं। वर्ष &lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;1975&lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt; में हॉकी में उत्कृष्ट और उल्लेखनीय प्रदर्शन के लिए डा. सिद्धू को मध्यप्रदेश शासन ने विक्रम अवार्ड से सम्मानित किया।&lt;/span&gt;&lt;span style=""&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style=""&gt;&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-2079582134560600224?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/2079582134560600224/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=2079582134560600224' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/2079582134560600224'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/2079582134560600224'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2010/05/blog-post_31.html' title='डा. अविनाश कौर सिद्धू की विशिष्ट उपलब्धि: दो खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/TAMlc1NkNpI/AAAAAAAAAJA/JWqcGCpXup8/s72-c/Avinash+Siddhu.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-4793153486740449404</id><published>2010-05-29T19:30:00.008+05:30</published><updated>2010-05-29T20:06:58.589+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेजर ध्यानचंद'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हॉकी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाबूलाल पाराशर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जबलपुर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पचमढ़ी'/><title type='text'>जब हॉकी के जादूगर पर ही जादू चल गया : कैसे ध्यानचंद की टीम एक गोल से हारी</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;मेजर&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; ध्यानचंद निर्विवाद रूप से हॉकी के सर्वश्रेष्ठ &lt;span&gt;सर्वकालिक&lt;/span&gt; खिलाड़ी माने जाते हैं। १९३६ के बर्लिन ओलिम्पिक में तो &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ध्यानचंद&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; के विलक्षण खेल ने हॉकी के चहेतों को असमंजस में डाल दिया था। तभी से लोगों ने उन्हें हॉकी का जादूगर कहना शुरू कर दिया। किन्तु इसके अगले ही वर्ष पचमढ़ी में सतपुड़ा क्लब ने जिस बखूबी से ध्यानचंद की &lt;span&gt;टी&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;म&lt;/span&gt; को परास्त &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;किया&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;, वह भी क&lt;/span&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/TAEh3Oy2s8I/AAAAAAAAAIo/u2mg_ca1PUM/s1600/Dhyanchand-2.jpg"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 135px; height: 149px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/TAEh3Oy2s8I/AAAAAAAAAIo/u2mg_ca1PUM/s400/Dhyanchand-2.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5476695854607152066" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/TAEhb7JLYlI/AAAAAAAAAIg/Fqa735dn5ps/s1600/Babulal+Parashar-1.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 108px; height: 134px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/TAEhb7JLYlI/AAAAAAAAAIg/Fqa735dn5ps/s400/Babulal+Parashar-1.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5476695385475605074" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;म चौंकाने वाली बात नहीं थी। गोया उस मैच में जादूगर पर ही जादू चल गया हो। &lt;span style="font-weight: bold;"&gt;जबलपुर एवं मध्यप्रदेश के वरिष्ठ क्रीड़ा समीक्षक और खेल पितामह माने जाने वाले बाबूलाल पाराशर&lt;/span&gt; ध्यानचंद &lt;span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;के&lt;/span&gt; समकालीन हॉकी खिलाड़ी रहे हैं। भारतीय &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;पुलिस&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे बाबूलाल पाराशर लम्बे समय तक मध्यप्रदेश क्रीड़ा परिषद के &lt;span&gt;सद&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;स्य&lt;/span&gt; व उपाध्यक्ष भी रहे। वे अपने जमाने के अच्छे सेंटर हॉफ माने जाते थे। बाबूलाल पाराशर का निधन 23 जुलाई 1993 को जबलपुर में हुआ। स्मरणीय है कि बाबूलाल पाराशर के नेतृत्व में ही सतपुड़ा क्लब ने ध्यानचंद की टीम पर अपूर्व विजय दर्ज की थी। इस मैच का विवरण स्वर्गीय पाराशर से बातचीत के आधार पर यहां प्रस्तुत किया गया है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;सन्‌ 1937 में बाबूलाल पाराशर की नियुक्ति पचमढ़ी में हुई थी। यह&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; एक महत्वपूर्ण मिलेट्री स्टेशन था और फिर उच दिनों तो वहां हॉकी का अच्छा खासा प्रचार था। करीब चार प्रथम श्रेणी के हॉकी मैदान थे और 6 पलटन की टीमें थीं। सबसे तगड़ी टीम इंडियन ग्रुप  थी। सतपुड़ा क्लब के नाम से जानी जाने वाली सिविलियन टीम एक ही थी। जिसमें ज्यादातर पलटन के कैंप फ्लोअर यानी भिश्ती, मोची, दर्जी आदि थे। इसके अलावा कुछ विद्यार्थी, स्वयं बाबूलाल पाराशर, एक &lt;span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;नायाब&lt;/span&gt; तहसीलदार और एक पुलिस हेड कांस्टेबल टीम में थे।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;उन दिनों पचमढ़ी में चार-चार माह के मिलेट्री आर्म्स कोर्स हुआ करते थे। जिसके अंतर्गज पलटन के अंग्रेज तथा हिन्दुस्तानी कमीशंड और नॉन कमीशंड अफसर प्रशिक्षण के लिए भेजे जाते थे। इस तरह नया कोर्स शुरू होते ही चार महीने का कार्यक्रम बन जाता था, जिसमें सब मैच लीग पद्धति के आधार पर खेले जाते थे। ध्यानचंद तब पलटन में सैनिक थे और इसी कोर्स में शामिल होने के लिए पचमढी आए थे। वे इंडियन &lt;span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;ग्रुप&lt;/span&gt; टीम की ओर से खेला करते थे। इसके पहले बाबूलाल पाराशर ने ध्यानचंद का खेल सर्वप्रथम 1931 में ऑल इंडिया रजिया सुल्तान टूर्नामेंट के दौरान कुरबाई में देखा था। इस टूर्नामेंट में भारत की मशहूर टीमें जैसे गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर (जिसमें लालशाह बुखारी, दारा जफर आदि खिलाड़ी थे), मानबदर स्टेट, जहां प्रसिद्ध ओलिम्पिक शाहबुद्दीन मसूद और मोहम्मद हुसैन थे, सुविखयात खिलाड़ी ध्यानचंद और रूप सिंह से सुसज्जित झांसी हीरोज की टीमें भाग लिया करती थीं। फाइनल में झांसी हीरोज और मानबदर &lt;span&gt;स्टेट&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; के मध्य एक संघर्षमय मुकाबला हुआ। अभी दर्शक अपनी जगह पर बैठ भी नहीं पाए थे कि ध्यानचंद ने विलक्षण फुर्ती के साथ बुली ऑफ से पहला गोल ठोंक दिया। मानबदर के जाने माने लेफ्ट इन जॉनी पिंटो मात्र एक गोल ही कर सके, जिनके बारे में ऐसा कहा जाता था कि वे रूप सिंह से भी बेहतर खिलाड़ी थे। ध्यानचंद ने इसके अलावा तीन गोल और किए। टूर्नामेंट के श्रेष्ठ खिलाड़ी को स्वर्ण पदक प्रदान किया जाता था। परन्तु कुरबाई के नवाब ने यह कह कर कि ध्यानचंद जैसे महान्‌ खिलाड़ी के लिए &lt;span&gt;एक&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; स्वर्ण पदक मामूली इनाम है, उनका सम्मान शाही खिल्लत &lt;span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;दे&lt;/span&gt; कर किया। इसके अतिरिक्त स्वर्गीय पाराशर ने ध्यानचंद का खेल भोपाल में ही 1932 और ओलिम्पिक टीम के साथ में भी देखा था।&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;बाबूलाल पाराशर ने बताया कि ध्यानचंद का अप्रतिम खेल देख कर उनके मन में भी विचार आया कि काश ध्यानचंद के विरूद्ध खेलने का मौका मिले और फिर वे कैसे स्वयं प्रदर्शन &lt;span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;कर&lt;/span&gt; पाते हैं। अंततः उन्हें 1937 में पचमढ़ी में मौका मिला। स्वर्गीय पाराशर ने बताया कि ध्यानचंद का खेल सचमुच लाजवाब होता था। उनका खेल खिलाड़ी भावना से ओतप्रोत रहता था। व्यक्तिगत प्रदर्शन का तो उनमें नामो निशान तक नहीं था। यही कारण है कि कई बार स्वयं गोल करने में सक्षम होते हुए भी वे गेंद झट आसपास के दूसरे खिलाड़ी को थमाकर गोल करवा देते थे। उनके खेल की यही खूबी थी कि वे या तो खुद गोल कर सकते थे अथवा राइट इन या लेफ्ट इन के खिलाडि यों को पास दे कर गोल करवा लेते थे। गेंद ध्यानचंद को मिली कि नहीं उनमें बिजली की सी फुर्ती आ गई। कभी यदि वे विपक्षी &lt;span&gt;खिलाडि&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; यों से घिर जाते थे, तो पीछे सेंटर हॉफ को पास देते थे या फिर ऐसे खिलाड़ियों को पास देते जो सुरक्षित स्थान पर खड़ा हो।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;बाबूलाल पाराशर के अनुसार उनकी टीम सतपुड़ा क्लब को &lt;span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;ध्यानचंद&lt;/span&gt; की टीम के विरूद्ध चार या पांच बार खेलने का अवसर आया। यद्यपि पहले मैच में बराबरी की टीम होने के बावजूद भी ध्यानचंद की टीम ने उन्हें 7-0 से हराया, तथापि एक दो मैच खेलने के बाद पाराशर की टीम ने उनके खेल का सूक्ष्मता से भली-भांति अध्ययन कर लिया और आगे के मैचों में गोलों का अंतर क्रमशः कम होने लगा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;वर्ष 1937 में नवम्बर माह के अंतिम सप्ताह में अंग्रेज उच्च &lt;span&gt;सेनाधिका&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;री&lt;/span&gt; ध्यानचंद का खेल देखने खास तौर से पचमढी आए। एक प्रदर्शन मैच होने वाला था। मैदान पर अच्छी भीड  थी। पचमढी के करीब-करीब सभी हॉकी प्रेमी नागरिक उपस्थित थे। पलटन के समर्थकों को पूरा विश्वास था कि उनकी टीम आसानी से विजय दर्ज कर लेगी, मगर उस दिन पाराशर की टीम भी बहुत उत्साह से खेली।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;'बुली ऑफ' के साथ ही सतपुड़ा क्लब के सेंटर फॉरवर्ड सल्लू ने आनन-फानन में ध्यानचंद की टीम के विरूद्ध एक गोल दाग दिया। यहां सल्लू के संबंध में बताना उचित होगा कि वह &lt;span&gt;एक&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; भिश्ती था और देखने में वह बिल्कुल हॉकी खिलाड़ी नहीं लगता था। इतना अपढ  और पिछड़ा था कि जीवन में कभी रेल भी नहीं देखी थी। सल्लू जमीन पर टिप्प मार कर विरोधी खिलाड़ी को स्टिक के ऊपर से गेंद उचकाते हुए सीधे आगे बढ ता था। इस गोल के पश्चात्‌ ध्यानचंद के खेल में तेजी आ गई। आर्मी पलटन के अफसर और जवानों में भी जोश आ गया। उन्होंने सतपुड़ा टीम को आमतौर पर और ध्यानचंद &lt;span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;की&lt;/span&gt; टीम को खासतौर पर चिल्ला-चिल्ला कर गोल करने के लिए उत्साहित करना शुरू कर दिया। पाराशर ने बताया ''उस दिन का मुझे यही याद है कि चारों तरफ बैठे दर्शकों की आवाज से मैदान गूंज उठा था। ध्यानचंद ने गोल करने की भरसक कोशिश की और गोल करने या कराने के हर संभव हुनर अपनाए, लेकिन हमने सब विफल कर दिए। दस मिनट बाद सल्लू ने फिर दूसरा गोल करके सबको आश्चर्य में डाल दिया।''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;मध्यांतर के पश्चात्‌ ध्यानंचद येन-केन प्रकारेण गोल करने के लिए आमादा हो &lt;span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;गए।&lt;/span&gt; पाराशर कहते हैं कि वैसे तो ध्यानचंद का खेल बहुत साफ-सुथरा रहता था, लेकिन उस मैच में एक-दो बार उन्होंने बाबूलाल पाराशर को गिरा दिया और बाद में सॉरी भी कहते गए, क्योंकि इस दौरान चार माह साथ-साथ रहने और खेलने के कारण दोनों अच्छी तरह से परिचित थे। बड़ी मुश्किल से ध्यानचंद अपनी टीम के लिए एकमात्र गोल बना सके। वैसे तो अंत तक गोल करने की कोशिश करते रहे, पर और गोल करने में सफल नहीं हुए। इस तरह सतपुड़ा टीम ने ध्यानचंद की टीम पर 2-1 गोल से विजय प्राप्त की। कुल मिला कर उस दिन सतपुड़ा टीम के खिलाडि यों ने बहुत बढि या प्रदर्शन किया था। हरेक खिलाड़ी ने अपना दायित्व बखूबी निभाया था। खेल के पश्चात्‌ सेनाधिकारियों ने भी सतपुड़ा टीम के सदस्यों की काफी तारीफ की। &lt;span&gt;ध्या&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;नचंद&lt;/span&gt; भी सतपुड़ा टीम से प्रभावित हुए बिना नहीं रहे। जब सल्लू ने अपनी टीम के लिए दूसरा गोल किया किया तो ध्यानचंद कहने लगे-''वाह साहब! आज तो सतपुड़ा टीम कमाल कर रही है। इस छोटी- सी जगह में इतने अच्छे खिलाड़ी कहां से भर लिए।''&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span&gt;&lt;br /&gt;बाबूलाल&lt;/span&gt; पाराशर ने बताया कि इस रोमांचकारी विजय से पचमढ़ी में हर्षोल्लासमय वातावरण निर्मित हो गया। उस दिन इस विजय की खुशी में एक विशाल जुलूस निकाला गया। आज भी &lt;span&gt;पचमढी&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; के बुजुर्ग हॉकी प्रेमी इस बात की चर्चा करते हैं कि किस तरह इस छोटे से नगर के खिलाडियों ने उस महान्‌ खिलाड़ी के खेल का अनुशरण किया और वह गौरवशाली विजय अर्जित की थी, जो नवयुवक खिलाड़ियों के लिए प्रेरणास्पद है। यहां यह स्मरणीय है कि सेंटर हॉफ बाबूलाल पाराशर का खेल काफी &lt;span&gt;प्रभा&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;वपूर्ण&lt;/span&gt; रहा। स्वयं ध्यानचंद ने उनके खेल से प्रभावित हो कर झांसी हीरोज की तरफ से बेटन कप हॉकी प्रतियोगिता (कलकत्ता) में खेलने का प्रस्ताव रखा था, किन्तु पर्याप्त अवकाश न मिलने के कारण यह संभव न हो पाया। यहां यह उल्लेखनीय है कि ध्यानचंद की मशहूर पुस्तक '&lt;span&gt;गोल&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;' के पृष्ठ 83 के द्वितीय परिच्छेद में भी इस मैच का वर्णन मिलता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255); font-weight: bold;"&gt;नीचे फोटो में हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के साथ बाबूलाल पाराशर (दाएं से दूसरे)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;a onblur="try  {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/TAEiXLzA1fI/AAAAAAAAAIw/k6VsEMfbHnE/s1600/MP+Sandesh-1.jpg"&gt;&lt;img style="display: block; margin: 0px auto 10px; text-align: center; cursor: pointer; width: 429px; height: 223px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/TAEiXLzA1fI/AAAAAAAAAIw/k6VsEMfbHnE/s400/MP+Sandesh-1.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5476696403558323698" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-4793153486740449404?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/4793153486740449404/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=4793153486740449404' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/4793153486740449404'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/4793153486740449404'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='जब हॉकी के जादूगर पर ही जादू चल गया : कैसे ध्यानचंद की टीम एक गोल से हारी'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/TAEh3Oy2s8I/AAAAAAAAAIo/u2mg_ca1PUM/s72-c/Dhyanchand-2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-224715786241688716</id><published>2010-04-27T09:46:00.004+05:30</published><updated>2010-04-27T10:00:57.489+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जबलपुर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><title type='text'>जबलपुर : सृजन, विचार और संगठन की त्रिवेणी</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;ज&lt;/span&gt;बलपुर&lt;/span&gt; की साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत शानदार है। जबलपुर स्वाद, उन्मुक्तता और मोहब्बत में बनारस के करीब है। जबलपुर के बारे में कहा जाता है कि यहां काम करने की स्वतंत्रता भी है और भटकने और चहलकदमी करने की सुविधा भी। जबलपुर की खयाति सृजन, विचार और संगठन के लिए जानी-पहचानी जाती है। भारतेंदु जबलपुर अक्सर आते थे। महावीर प्रसाद द्विवेदी यहां १६ वर्ष तक रहे और उन्होंने अपने अद्‌भुत 'आलाप' में जबलपुर के संबंध में दिलचस्प संकेत दिए हैं। मुक्तिबोध की अनेक लंबी यात्राएं और उनका लंबे समय तक यहां रहने से एक नए दौर की शुरूआत हुई। ज्ञानरंजन ने १६ वें पहल सम्मान के अवसर पर दिए गए वक्तव्य में भाषा के जानकार और प्रसिद्ध विद्वान नागेश्वरलाल के हवाले से कहा था कि जबलपुर में सबसे अच्छी खड़ी बोली और सुनी जाती है।&lt;br /&gt;मान्यताओं के अनुसार जबलपुर में साहित्यिक परम्पराओं की शुरूआत कलचुरि काल से प्रारंभ होती हैं। भारतेंदु युग के ठाकुर जगमोहन सिंह श्रृंगार रस के कवि और गद्य लेखक के रूप में प्रसिद्ध रहे हैं। उनका जिक्र रामचंद्र श्ुाक्ल ने भी किया है। सन्‌ १९०० के पश्चात्‌ जबलपुर में कई साहित्यिक संगठन बने और कवि गोष्ठियां आयोजित करने की शुरूआत हुई, जो आज भी जारी हैं। उस समय के कवियों में लक्ष्मी प्रसाद पाठक, विनायक राव, जगन्नाथ प्रसाद मिश्र, बाबूलाल शुक्ल, सुखराम चौबे, छक्कूलाल बाजपेयी का नाम उल्लेखनीय है। जबलपुर साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रकाशन में भी अग्रणी रहा है। काव्य सुधा निधि के संपादक रघुवर प्रसाद द्विवेदी ने छंद काव्य को व्यवस्थित रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।&lt;br /&gt;कामता प्रसाद गुरू और गंगा प्रसाद अग्निहोत्री ने जबलपुर में खड़ी हिन्दी में काव्य की नई धारा को विकसित करने में सफल रहे। सन्‌ १९१७ में जबलपुर में हिन्दी साहित्य सम्मलेन के आयोजन से हिन्दी को मातृभाषा के रूप में स्थापित करने में बहुत सहायता मिली। इसके पश्चात्‌ जबलपुर के साहित्यकारों ने राष्ट्रप्रेम, प्रकृति और छायावाद के विविध आयामों के साथ रचनाकर्म किया। चौथे व पांचवे दशक में सुभद्रा कुमारी चौहान, रामनुजलाल श्रीवास्तव, केशव प्रसाद पाठक, नर्मदा प्रसाद खरे और भवानी प्रसाद तिवारी ने कविता में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। सुभद्रा कुमारी चौहान की वीर रस की 'झांसी की रानी' को आज भी चाव से सुना जाता है। केशव प्रसाद पाठक ने उमर खय्याम की रूबाइत का अनुवाद कर प्रसिद्ध हो गए। केशव प्रसाद पाठक का अनुवाद तो बच्चन, मैथिलीशरण गुप्त और पंत से भी बेहतर माना गया है। रामानुज लाल श्रीवास्तव ने हिन्दी में छायावादी गीत और उर्दू में 'ऊंट' नाम से व्यंग्य लिखा। उन्होंने प्रेमा प्रकाशन के माध्यम से जबलपुर में साहित्यिक वातावरण के निर्माण में अमूल्य योगदान दिया। 'प्रेमा' की अपने समय में साहित्यिक पत्रिकाओं में बड ी प्रतिष्ठा रही है। 'प्रेमा' के माध्यम से अनेक प्रतिभाएं उभरीं, जिनमें नर्मदा प्रसाद खरे महत्वपूर्ण थे। भवानी प्रसाद तिवारी साहित्कार होने के साथ-साथ राजनैतिक कार्यकर्ता भी थे। स्वतंत्रता आंदोलन में जेल यात्रा में उन्होंने गीतांजलि का अनुवाद किया। भवानी प्रसाद तिवारी द्वारा किए गए गीतांजलि के अनुवाद में जो सरलता, सहजता व सरसता थी, वह उन्हें दूसरे अनुवादों से अलग पहचान देती है।&lt;br /&gt;पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन व विकास के साथ जबलपुर में ऊषा देवी मित्रा, देवीदयाल चतुर्वेदी 'मस्त', इंद्र बहादुर खरे, रामेश्वर शुक्ल अंचल जैसे साहित्यकार भी उभरे। रामेश्वर प्रसाद गुरू और भवानी प्रसाद तिवारी के संपादन में प्रकाशित 'प्रहरी' व 'वसुधा' से गद्य व व्यंग्य लेखन को नया आयाम मिला। प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने उपर्युक्त पत्रिकाओं से शुरूआत कर शिखर में पहुंचे।&lt;br /&gt;    सातवें दशक के में ज्ञानरंजन ने 'पहल' का प्रकाशन शुरू किया। 'पहल' से जबलपुर को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान मिली। पहल ने कालांतर में देश और भूमंडल को छूआ। 'पहल' की यात्रा स्थानीयता से से भूमंडल यानी विश्वदृष्टि की यात्रा रही। 'पहल' के पाकिस्तानी साहित्यकारों और अफ्रीकी कविताओं पर केन्द्रित अंक काफी चर्चित रहे।&lt;br /&gt;जबलपुर के निवासी कवि सोमदत्त ने अपनी प्रयोगधर्मिता के कारण राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने गए। वर्तमान में मलय की गिनती समकालीन श्रेष्ठ कवियों में होती है। अभी हाल ही में लीलाधर मंडलोई ने देश के श्रेष्ठ ११ कवियों की रचनाओं के संग्रह का संपादन किया है, जिसमें  उन्होंने मलय को भी शामिल किया है। इसे तार सप्तक के पश्चात महत्वपूर्ण माना गया है। राजेन्द्र दानी, अशोक शुक्ल जैसे रचनाकार समकालीन कहानी में महत्वपूर्ण स्तम्भ हैं। अमृतलाल बेगड़ ने चित्रकला के साथ नर्मदा के सौंदर्य को लेखन के माध्यम से प्रतिष्ठित कर स्वयं भी प्रतिष्ठा अर्जित की है। इस कार्य के लिए साहित्य अकादमी ने भी उन्हें सम्मानित किया है।&lt;br /&gt;    जबलपुर में साहित्य आंदोलन समय के साथ कभी तेजी से तो कभी विलंबित गति से चलता रहा है, लेकिन ठहराव नहीं आया। विभिन्न संस्थाओं ने समय-समय पर छोटे-बडे आयोजनों के माध्यम से जबलपुर की सांस्कृतिक चेतना को जाग्रत बना कर रखा है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-224715786241688716?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/224715786241688716/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=224715786241688716' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/224715786241688716'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/224715786241688716'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2010/04/blog-post_27.html' title='जबलपुर : सृजन, विचार और संगठन की त्रिवेणी'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-1643971975279543436</id><published>2010-04-01T20:35:00.006+05:30</published><updated>2010-04-02T16:46:50.337+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रजनीकांत यादव'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नर्मदा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ज्ञानरंजन'/><title type='text'>साहित्यकार ज्ञानरंजन द्वारा छायाकार रजनीकांत के लिए कुछ शब्द</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रजनीकांत यादव&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; 37 वर्षों से फोटोग्राफी से जुड़े हुए हैं। वे मानते हैं कि कोई भी वि&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;धा व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं होती। &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रजनीकांत&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; यादव पिछले 16 वर्षों से आदिवासी और ग्रामी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;ण भारत की फोटोग्राफी कर रहे हैं। जब वे इन क्षेत्रों में फोटोग्राफी करने गए, तब उन्हें इस बात का आभास हुआ कि निर्धन&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;औ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;र मूलभूत &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सुविधाओं से वंचित लोग कितनी भयावह जिंदगी जी रहे हैं। आदिवासियों और ग्रामीणों की स्थिति को देख कर रजनी&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;कांत यादव के कुछ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; मिथक भी टूटे। उन्होंने&lt;/span&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S7XIsbMZBFI/AAAAAAAAAH0/ti5KDoh3kC0/s1600/RJ.jpg"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 177px; height: 165px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S7XIsbMZBFI/AAAAAAAAAH0/ti5KDoh3kC0/s400/RJ.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5455487189168751698" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; उसी समय तय कर लिया कि वे अपने छायाचित्रों के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; माध्यम से आदिवासियों और ग्रामीणों की वास्तविक समस्याओं को जन-साधारण के सामने&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; ला कर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समाधान करने का प्रयास करेंगे। इसी मुहिम में कैमरे के साथ कलम भी उन&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;की &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;अभिव्यक्ति का   माध्यम कब बन गई, यह रजनीकांत यादव को भी याद नहीं। रजनीकांत यादव ने मेघा पा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;टकर के नर्मदा बचाओं आंदोलन में कैमरे के साथ सार्थक भूमिका निभाते हुए खयाति अर्जित की है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;रजनीकांत यादव ने नर्मदा चित्र प्रदर्शनी के माध्यम &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;से&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; नर्मदा घाटी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; की उस अविकृत रूप की एक झलक प्रस्तुत की है 'जो था, जो है और जो नहीं रहेगा'। उन्होंने नर्मदा का गद्‌गद्‌ गुणगान या लच्छेदार भाषा में लिखा गया चित्रित वृतांत प्रस्तुत नहीं किया है। उनके छायाचित्र तो उस डूबती और खत्म होती दुनिया के छवि चित्र हैं, जो हमें जीवन सहज और इस धरती पर सबसे अनुकूल जीवन का गुणसूत्र समझाती है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt; &lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;    &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;फोटो फीचर-&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रजनीकांत यादव के फोटो फीचर द &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;हिंदु, टाइ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;म्स&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; आफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, एशियन एज, हिंदुस्तान टाइम्स, जनसत्ता, &lt;/span&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S7XJqad8veI/AAAAAAAAAH8/eaB460fGrPo/s1600/RJN-1+.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 244px; height: 371px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S7XJqad8veI/AAAAAAAAAH8/eaB460fGrPo/s400/RJN-1+.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5455488254125850082" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;दैनिक भास्कर, नवभारत, मिड-डे, बासुमति, आजकल, जन्मभूमि, अमृत बाजार पत्रिका, डाउन टू अर्थ, द इकोलॉजिस्ट, ह्‌यूमन &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;स्पेस, &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सेंचुरी एशिया, संडे, इंडिया टुडे, एकलव्य पब्लिकेशन, पहल और कादम्बिनी जैसे समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित हो कर खूब सराहे गए हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;एकल प्रदर्शनी-&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;उनकी एकल प्रदर्शनी इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, सी. एस. इ., गांधी पीस फाउंडेशन (&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;नई दिल्ली), बिरला एकेडमी आफ आट्‌र्स (कोलकाता), बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री आफ सोसायटी, नेशन सेंटर फार परफार्मिंग आट्‌र्स-एनसीपीए, टाटा इंस्टीट्‌यूट आफ फार सोशल साइंस-टीआईएसएस (मुंब&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;ई&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;), म्यूजियम आफ मेनका&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;इंड-आईजीआरएमएस, रवीन्द्र भवन (भोपाल) में आयोजित हो चुकी है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;चयन-&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;छत्तीसगढ़ शासन द्वारा प्रदेश की स्थापना की प्रथम वर्षगांठ के&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; अवसर पर रा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;यपुर में रजनीकांत यादव की आदिवासी संस्कृति पर आधारित फोटो प्रदर्शनी आयोजित। छत्तीसगढ  शासन के कला एवं संस्कृति विभाग ने उनके छायाचित्रों स्थाई वीथिका में संजोकर रखा है। फोर्ड फाउंडेशन द्वारा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt; प्रायोजित घुमंतू प्रदर्शनी ''मोबाइल एक्जीबिशन-ब्लैक एंड वाइट-ए कलेक्शन आफ रिप्रेजेन्टेटिव पिक्चर्स आफ 40 लेंस मेन एंड वूमेन फार्म अराउंड द ग्लोब'' में छायाचित्र चय&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;नित।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;सम्मान-&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;फेडरेशन आफ इंडियन फोटोग्राफी द्वारा सम्मानित, मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह द्वारा सर्वश्रेष्ठ छा&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);"&gt;याकार सम्मान से अलंकृत और कई राष्ट्रीय प्रदर्शनी में निर्णायक के रूप में सम्मिलित।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;font-family:georgia;" &gt;रजनीकांत के लिए कुछ शब्द&lt;/span&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S7XKOlUDw5I/AAAAAAAAAIE/G1cngyNaZo0/s1600/RJN-2.jpg"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 690px; height: 187px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S7XKOlUDw5I/AAAAAAAAAIE/G1cngyNaZo0/s400/RJN-2.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5455488875512447890" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;रजनीकांत को हम सब मुकम्मल नहीं जानते। उनकी काया को जानते भी हों, उनकी आत्मा को नहीं जानते। मैं भी उनको आधा-अधूरा जानता हूं, पर मैं उनके प्रति हमेशा उत्सुक और जागरूक रहा हूं। जब वे शहर के मध्य अपने स्टूडियो में बैठते और काम करते थे, तब मैं उनके पास जाता था। फिर हम लोग अपनी-अपनी दुनिया में खो गए और मिलना बाधित हो गया। रजनीकांत बेहद संकोची, आत्मजयी, अन्तर्मुखी और अपनी मार्केटिंग एवं अपनी सेल्समेनशिप से निरंतर बचने वाले जीव हैं। उनके जीवन और उनकी कार्यप्रणाली में गांधीवादी झलक है, वे पुरानी साधना पद्धति से काम करते हैं, पर मानवतावादी और आधुनिक संवेदनाओं से भरपूर व्यक्ति हैं। उन्हें सम्पूर्ण और वास्तविक रूप में जानना कठिन है, पर वे काम करते हुए भीतरी उमंग, श्रम और लक्ष्य से सदा भरे रहते हैं। यह तो जाहिर सच्चाई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नर्मदा घाटी अपने विशद रूप में इन दिनों काफी चर्चित है। उस पर अध्ययन करने वाली एजेंसियों, फिल्म निर्माण करने वाले उत्साहि&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S7XPQteILTI/AAAAAAAAAIM/FGSuJyYGX88/s1600/RJN-3.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 325px; height: 232px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S7XPQteILTI/AAAAAAAAAIM/FGSuJyYGX88/s400/RJN-3.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5455494409620041010" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;यों&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;, यायावरों, लेखकों, राजनैतिक, सामाजिक आंदोलनकारियों और उद्योग धंधों की, नई पूंजी की गहरी नजर पड़ रही है। कुछ ही साल पहले हरसूद का बडा इलाका डूब गया, जैसे टेहरी डूब गई। इस बडे अंचल पर लूट के भावी खतरे मंडरा रहे हैं। प्राकृतिक संपदा का जहां भी भंडार होगा, वहां  छद्‌म विकास के खतरे मंडराएंगे ही। सभ्यताएं उथल-पुथल में होंगी, पर्यावरण अशांत होगा और नर्मदा का जल ही नहीं, उसकी गोद में जो जीवन है, वह भी क्षतिग्रस्त होगा। मुझे इसका खतरा दिख रहा है, वह भले ही दूर हों। जिसे आज रेड कोरिडोर कहा जाता है और जो देश के सर्वाधिक अशांत इलाके हैं, अनेक राज्यों का जीवन, जिसकी चपेट में है, वे आदिवासी बहुल्य अंचल हैं। इस देश का सर्वोच्च खनन लकडी, बिजली, औषधि और शिल्प जिन इलाकों से आ रहा है, वहीं सर्वाधिक रक्तपात, हिंसा और युद्ध है। इसलिए नर्मदा घाटी का विपुल जीवन भ&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;ले&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; आपको रसिक, सुंदर, श्रद्धालु, शांत और समृद्ध दिख रहा हो, उस पर विकास के गिद्ध मंडरा रहे हैं। गरीबी, भोलेपन और सुंदरता को यह सेलेब्रट करने का समय नहीं है। हिंसा के अंखुए कभी भी फूट सकते हैं। ज्वालामुखी जो अभी ठंडा है, कभी भी गरम हो सकता है। नर्मदा घाटी के प्रति हमारा नया आचरण एक जिम्मेदार और चिंता प्रमुख नागरिक का होना चाहिए। जहां तक मैं जानता हूं रजनीकांत की स्टडी, उनका डेटा उपक्रम, उनकी यात्राएं और कैमरा वर्क हमारी सबसे खरी और उज्जवल सच्चाई को बोलता है। उनकी किताबें जब खंडों में प्रकाशित होंगी, तब लोग सच्चाई से अवगत होंगे। जिन वंचितों की त्वचा पर आंसू, रक्त, धूल, पसीना और हंसी चिपकी हुई है, वहां रजनीकांत का कैमरा भी उपस्थित है, पहुंचा हुआ है। यह आपको उनकी प्रदर्शनी भी बतलाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह जो हमारी तत्कालिक दुनिया है, उसमें कब पापुलर कल्चर ने सेंध लगा दी, यह हमें भी पता नहीं चला। संभवतः भू-मण्डलीकरण के दौर में ऐसा हुआ है। बाजार संगीत और शोर के कारण यह हुआ है और इसलिए कि सिनेमा, मीडिया की चमक ने भी इस मीना बाजार को समर्थन दिया है। मुझे याद है, वह दौर हाल ही का जब अखबार ब्लैक एंड व्हाइट से रंगीनी की तरफ पलटे थे, तो एक हल्की सी मुठभेड़ विचारों की हुई थी, पर फिर सब कुछ परास्त हो गया। हम उन लोगों को तो जानने लगते हैं, जो मीडिया में प्रतिदिन आते है, जाते हैं, रमते हैं, बोलते हैं, पर हर शहर के खंडहरों में कुछ खोए हुए लोग बचे हैं, जिन्हें हम स्वमेव नहीं पा लेते, उन्हें खोजना पड़ता है। अब हीरों के खोजी लोग दुर्लभ है, गायब हैं, इसलिए हीरों की तलाश भी खत्म हो गई है। जबलपुर में भी अलग-अलग विधाओं में ऐसे लोग बहुतेरे होंगे, जैसे हमारे रजनीकांत हैं। देश-विदेश में उनका काम सराहा गया, प्रदर्शित हुआ, पर जबलपुर में जहां तक मुझे ज्ञात है, रजनीकांत की यह संभवतः पहली नुमाइश है। हम भी यह काम बहुत विलंब से कर सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस तरह राहुल सांस्कृत्यायन ने एशिया के दुर्गम भूखंडों की यात्राएं की हैं और उन यात्राओं को अभिव्यक्त भी किया है, उसी तरह अपने अन्वेषण, अपनी जानकारियों और अपनी जनसेवा से भरे ज्ञान को अर्जित करने के लिए रजनीकांत ने भी अपनी जिंदगी को दांव पर लगा दिया। नर्मदा घाटी में अपनी घुमक्कडी से अपने घुटने ध्वस्त कर लिए और हृदय की धौंकनी को इतना थका डाला कि कुशल डाक्टर और अस्पताल ही उन्हें बचा सके। अब वे काफी स्वस्थ हुए है, अपनी कार्यशैली भी बदली है और टेबल पर अधिक बैठ रहे हैं, बरसों के संग्रहण को लिपिबद्ध कर रहे हैं।&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S7XQCNUHwUI/AAAAAAAAAIU/crMT1WsWvXc/s1600/RJN-4.jpg"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 327px; height: 400px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S7XQCNUHwUI/AAAAAAAAAIU/crMT1WsWvXc/s400/RJN-4.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5455495259981594946" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा व्यक्ति जो प्रामाणिक जीवन से स्पंदित दस्तावेजों और विचारों को एक बड़ी पोटली में एकट्ठा कर चुका है और जो उनको लिपिबद्ध कर रहा है और साथ में कैमरे की आंख को ले कर नदियों के मुहानों, जंगल की खोई पगडंडियों, सात-आठ से अधिक राज्यों के बीहड , आदिवासी अंचलों में घूमता रहता आया हो, उनका एक हिस्सा ही हो गया हो, उस रजनीकांत को हम-तुम कितना जानते हैं, हमारे नागरिक, हमारे सामाजिक, हमारे जबलपुरिया और हमारे मॉल-मल्टीप्लेक्स, मल्टीप्लेक्स चिल्लाने वाले विकास के नाम पर गलत राहों पर दौड ने वाले लोगों और इसी शहर के दर्प भरे, प्रतिद्वंदिता से भरे अखबार कितना जानते हैं। उनके पन्ने अपराधिक और राजनैतिक डायरियों से भरे रहते हैं। उनके पन्ने लोकल ही लोकल हैं। पर फिर भी अनेक पन्ने शहर के अंधेरे में ही रहते हैं। दिनोंदिन यह अंधेरा बढ  रहा है। जबकि शहरों की सड कों पर उजाला बढ  गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मित्रों यह सब कड़वा मैं जो कह रहा हूं, रजनीकांत की यह सब शिकायतें नहीं हैं। वे तो तल्लीन है, रोज अपनी दुनिया में, अपने काम में। अगर मुझे एक शब्द में, एक वाक्य में रजनीकांत को संबोधित करना हो तो मैं कहूंगा-आइसबर्ग, आइसबर्ग। तीन हिस्सा डूबा हुआ, बस एक हिस्सा पानी में। अर्थात्‌ रजनीकांत एक आइसबर्ग। तैरता हुआ, घूमता हुआ। जो थोडा-बहुत नजर आता है, वह टिप आफ द आइसबर्ग है। अधिकांश लोग रजनीकांत को फोटोग्राफर कहते हैं। वे हैं भी, पर उनके कैमरे में जो लेंस है, उससे बडा और बेहतर लेंस उनकी प्रगतिशील क्रांतिकारी जीवन दृष्टि में है। वे घुमंतू हैं, अन्वेषक हैं, पुरातात्विक है और विनाश, पतनोन्मुखता, क्षय के खिलाफ सभ्यता की मूलगामी सच्चाईयों को बचाने वाले हैं। उनकी सौंदर्यवादी नजर रस सम्प्रदाय, धर्मांधता और मध्ययुगीन पिछडेपन को तोड  कर आगे बढ ती है। एक नर्मदा और उसके इर्द-गिर्द के जीवन को हम सर्व साधरण लोग देखते हैं। एक को यायावर वेगड  देखते हैं, एक को पंचायतें, सरकारें, मठाधीश, योजनाकार देखते हैं, एक को रजनीकांत देखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रजनीकांत की वाणी, उनकी शारीरिक भाषा, उनका कैमरा, उनकी लेखनी परिवर्तन दर्द और जीवन-मृत्यु को देखती है। इसलिए उनकी रचनाएं, उनके दस्तावेज, उनके फोटोग्राफ अधिक समकालीन और संवेदनाओं के पास हैं। उन्होंने ध्यानस्थ हो कर काम किया, वे शोर मचाते नहीं चले, उन्होंने अपनी कृतियां बाजार में नहीं बेंची। वे काल को लांघते हुए, भविष्य के संग्रहालयों और आगे की दुनिया के लिए काम कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका एक परिचय यह भी है कि वे उस जबलपुर के बड़े और कम उम्र में ही विदा हो गए महान फोटोग्राफर शशिन के भाई हैं। जो मृत्यु के बाद कई दशक तक चुपचाप अपने फोटोग्राफ के साथ छपते रहे। देश ही देश में। उन्होंने परसाई और मुक्तिबोध को अमरचित्र कथा का हिस्सा बनाया। एक अच्छा चित्र क्या होता है, यह आप जैसे फोटोग्राफरों को बताने की जरूरत नहीं है। एक अच्छा पोट्रेट सम्पूर्ण आत्मा का उजाला होता है, वह प्यासों के लिए कुंओं से निकाला गया, बालटी भर जल होता है। वह आजीवन धधकता रहता है। रजनीकांत ऐसे ही छायाचित्रों के फोटोग्राफर हैं। उनकी नदियां और उनके आदिवासी धरती के प्राणतत्व हैं, जिसको छत्तीसगढ  का एक पुलिस अधिकारी और देश के गृह मंत्री खदेड -खदेड  कर हिंद महासागर में डुबो देना चाहते हैं। रजनीकांत की कार्यकारी मैत्री देश की उन विभूतियों और महापुरूषों से है, जो जन संग्राम में लगे हैं। जो तालाब बना रहे हैं, जो विस्थापन के दर्द की दवा बनाते हैं, जो उखडे और बियावन लोगों के बीच काम कर रहे हैं, जो स्कूल, प्राथमिक चिकित्सा और कुटीर की रक्षा कर रहे हैं। स्वयं रजनीकांत ने इन्हीं लोगों के बीच और देश के आधे दर्जन से अधिक राज्यों में घूम-घूम कर काम किया है और टूटे पुलों, टूटी नाव, उजाड  बंजारों, भुखमरों की मुस्कानों के बीच वे कई बार खो गए हैं, गुम गए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रजनीकांत से पहली बार 67-68 में कहीं मेरे एक छात्र जयंतीलाल पटेल ने मुलाकात कराई थी। यह छात्र एक दुर्लभ प्राणी था, ऐसा कि उसे हम लोग बापू कहने लगे थे। बापू-याने गांधी। आज वह जयंती गुजरात के एक सखत इलाके में फंसा हुआ, जीवन-मृत्यु की लड़ाई लड  रहा है। सफलता उसे छू नहीं गई है। हमेशा खुश रहता है और पक्का ईडियट है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक प्रसंग और है। जो न मैं भूला और न रजनीकांत। दिल्ली में रजनीकांत की प्रदर्शनी एक विश्वसनीय और सम्मानित केन्द्र इंडिया इंटरनेशनल में थी। संभवतः 8-10 साल पहले। मैं दिल्ली में था, उन दिनों। लम्बे समय के लिए। इस प्रदर्शनी से देश के अनेक उज्जवल कीर्तिमान समाज वैज्ञानिक और पुरस्कृत सेवाभावी लोग जुडे थे। मुझे उसमें पहुंचना था। मेरी प्रतीक्षा थी वहां, वहां सुख और संतोष की संभावना थी, पर मैं भटक गया, वहां नहीं पहुंच सका। मेरे और रजनीकांत के बीच एक गहरा खेद आज तक बना है। और मैं उसकी क्षतिपूर्ति आजीवन करना चाहता हूं। रजनीकांत के काम में मुझे वहीं तरंग मिलती है, जो मुझे अपने काम में मिलती थी। और पीछे पड -पड  के एक बार उनसे 'पहल' में लिखवाया भी था। मुख पृष्ठ पर उनका एक दुर्लभ फोटोग्राफ भी दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकास की अवधारणाओं पर हमारा देश बंटा हुआ है। बुनियादी तौर पर हम जिस ढांचे को निर्मित कर रहे हैं, वह हमारे देश में मिस फिट है। जिसके कारण असंखय समस्याएं पैदा हो रहीं हैं। हमारे वास्तविक सुर मंद पड़ गए हैं। हम इमारतों, बाजारों, मशीनों के विप्लव, हाईटेक जिंदगी को विकास मानते हैं। यह तेजी-मंदी की धारणा विनाशकारी है। जिस तरह से संसार के महान्‌ आदिवासियों, जन जातियों को मौत के कंसों ने निगल लिया है, हम उसके खिलाफ हैं। हम अल्पसंख्यक भी हों, पर हम उसके खिलाफ हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रजनीकांत ने इसी खिलाफत को सच्चाई और सौंदर्य में बदला है। वास्तविक सौंदर्य हमारी नैसर्गिकता में है। रजनीकांत का कैमरा, रजनीकांत की कलम विकास के असहमत मार्गों पर चल रही है। उन्हें हमारा सलाम।&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(204, 0, 0);"&gt;(प्रसिद्ध साहित्यकार ज्ञानरंजन ने यह वक्तव्य पिछले दिनों जबलपुर में प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान में आयोजित रजनीकांत यादव की नर्मदा घाटी संस्कृति : छायाचित्र प्रदर्शनी एवं व्याख्यान के अवसर पर दिया था।)&lt;/span&gt;   &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-1643971975279543436?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/1643971975279543436/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=1643971975279543436' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/1643971975279543436'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/1643971975279543436'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='साहित्यकार ज्ञानरंजन द्वारा छायाकार रजनीकांत के लिए कुछ शब्द'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S7XIsbMZBFI/AAAAAAAAAH0/ti5KDoh3kC0/s72-c/RJ.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-2264412313905439273</id><published>2010-03-21T20:22:00.007+05:30</published><updated>2010-03-22T19:29:46.089+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रगतिशील लेखक संघ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजेश जोशी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजकुमार केसवानी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वीरेन डंगवाल'/><title type='text'>जबलपुर में कविता पोस्टरों की प्रदर्शनी, काव्य पाठ और कला व्याख्यान  पर केन्द्रित दो दिवसीय 'दृश्य और श्रव्य' कार्यक्रम आयोजित</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S6Y1QaTQ6gI/AAAAAAAAAHU/O_CTUoO_UWE/s1600-h/DSC_0191.JPG"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 400px; height: 267px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S6Y1QaTQ6gI/AAAAAAAAAHU/O_CTUoO_UWE/s400/DSC_0191.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5451102955032865282" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S6Y0cs2QJII/AAAAAAAAAHM/8DztZnv3ijI/s1600-h/DSC_0194.JPG"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 400px; height: 267px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S6Y0cs2QJII/AAAAAAAAAHM/8DztZnv3ijI/s400/DSC_0194.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5451102066658256002" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;प्र&lt;/span&gt;गतिशील लेखक संघ, विवेचना, विवेचना रंगमंडल और सुर-पराग के तत्वावधान में पिछले दिनों (१३-१४ मार्च को) जबलपुर में दो दिव&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;सीय&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; 'दृश्य और श्रव्य' कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में पिछले दो दशक के हिंदी के श्रेष्ठ कवियों राजेश जोशी, वीरेन डंगवाल और राजकुमार केसवानी का काव्य पाठ, कविताओं की पोस्टर कला कृतियों की नुमाइश और विखयात विश्वविखयात चित्रकार एवं कथाकार अशोक भौमिक का व्याख्यान हुआ। दो दिवसीय दृश्य और श्रव्य कार्यक्रम का आयोजन इस मायने में महत्वपूर्ण रहा कि इसमें जबलपुर के साहित्यकारों, लेखकों, चित्रकारों, रंगकर्मियों के साथ आम लोगों खासतौर से महिलाओं की बड़ी संखया में सहभागिता रही। दो दिन तक जबलपुर के साहित्य और कला प्रेमियों ने अपनी शाम स्थानीय रानी दुर्गावती संग्रहालय की कला वीथिका में विचारोत्तेजक कविता पाठ सुनने के साथ कविताओं की पोस्टर कला कृतियां देखने में गुजारी। अशोक भौमिक द्वारा 'समकालीन भारतीय चित्रकला में जनवादी प्रवृत्तियां' विषय पर पावर पाइंट प्रस्तुतिकरण के साथ दिया गया व्याख्यान कला प्रेमियों के साथ-साथ कला से वास्ता न रखने वाले आम लोगों के लिए भी &lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;अविस्मरणीय&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; अनुभव रहा। इस पूरे आयोजन पर एक आम व्यक्ति ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की-''महसूस हो रहा है कि जैसा सातवां दशक लौट आया हो।''&lt;br /&gt;दो दिवसीय दृश्य और श्रव्य कार्यक्रम के अंतर्गत कविता पोस्टरों की प्रदर्शनी का उद्‌घाटन प्रखयात लेखक-चित्रकार अमृत लाल बेगड़ ने एक स्केच बना कर किया। उन्होंने कविता पोस्टरों की प्रदर्शनी को देख कर कहा कि कला व साहित्य को आम लोगों से जुड ना होगा। उन्होंने इस अवसर पर टिप्पणी की कि लग रहा है कि आज कुआं प्यासे के &lt;span&gt;&lt;span&gt;पास&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; स्वयं चल कर आ गया। प्रदर्शनी के उद्‌घाटन के समय कवि राजेश जोशी और राजकुमार केसवानी ने भी युवा चित्रकार विनय अंबर सुप्रिया अंबर और अन्य नवोदित चित्रकारों के कविता पोस्टरों को सराहा। प्रदर्शनी में मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, वीरेन डंगवाल और राजकुमार केसवानी की कविताओं पर आधारित पोस्टर प्रदर्शित किए गए।&lt;br /&gt;कार्यक्रम के पहले दिन शाम को सुर-पराग के युवा गायकों ने राजेश जोशी, एकांत श्रीवास्तव और सुखचैन मिस्त्री की कविताओं की संगीतमयी प्रस्तुति दी। इसके पश्चात्‌ राजेश जोशी, वीरेन डंगवाल और राजकुमार केसवानी ने कला वीथिका में उपस्थित सैकड़ों लोगों के समक्ष काव्य पाठ किया। काव्य पाठ की शुरूआत वीरेन डंगवाल ने निराला को समर्पित 'उजले दिन' कविता पाठ से की। इसके पश्चात्‌ उन्होंने हड्डी-खोपडी खतरा निशान, हमारा समाज, दुष्चक्र में सृष्टा, हमारी नींद, कुछ नई कसमें, मानवीयकरण, क्या कीजिए, दिखाओ अपनी दो चोटियों वाली तस्वीर लोरी बेकर जैसी कविताओं को सुना कर लोगों को अभिभूत कर दिया। उनके बाद राजकुमार केसवानी ने शेर और चूहा कविता श्रृंखला की कविताओं से शुरूआत की। लोगों ने राजकुमार केसवानी की कौन है यह कुबलई खान को खूब पसंद किया। इसके राजकुमार केसवानी ने मैं कविता नहीं लिखता, मुन्ने भाई रांग साइट, मेरा खुदा, उस गली में, घर, छत्री वाले, डकार, मैं चांद ले लेता हूं &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S6d07rt8RVI/AAAAAAAAAHk/cTuB3rAiuI0/s1600-h/DSC_0236.JPG"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 400px; height: 267px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S6d07rt8RVI/AAAAAAAAAHk/cTuB3rAiuI0/s400/DSC_0236.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5451454442651796818" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;और एक वादा कविताओं का पाठ भी किया। काव्य पाठ का समापन राजेश जोशी ने अपनी कुछ चुनिंदा कविताओं से किया। उनकी मैं झुकता हूं, हमारे समय के बच्चे, उसकी गृहस्थी, पीठ की खुजली, बेटी की विदाई, यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, मकान मालिक परेशान है, मैं उड  जाऊंगा, मारे जाएंगे और इत्यादि शीर्षक से पढ़ी गई कविताओं से सभागार में बैठे लोग इतने प्रभावित हुए कि लोगों ने कार्यक्रम के दूसरे दिन पुनः राजेश जोशी के काव्य पाठ आयोजि&lt;span&gt;&lt;span&gt;त&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; करने का अनुरोध किया, लेकिन पूर्व निर्धारित व्याखयान कार्यक्रम के कारण राजेश जोशी का काव्य पाठ न हो सका। तीनों कवियों द्वारा प्रस्तुत की गई समकालीन श्रेष्ठ आधुनिक कविताओं ने लोगों को भीतर तक झकझोर दिया।राजेश जोशी, वीरेन डंगवाल और राजकुमार केशवानी ने भी कविता पाठ के पश्चात माना कि जबलपुर में कविता सुनने को जितने लोग आए हैं, उतनी भीड़ पिछले दस वर्षों में उन्होंने काव्य पाठ के दौरान नहीं देखी।&lt;br /&gt;कार्यक्रम के समापन दिवस पर अ&lt;span&gt;शोक&lt;/span&gt; भौमिक ने समकालीन भारतीय चित्रकला में जनवादी प्रवृत्तियां विषय पर व्याख्यान दिया। अशोक भौमि&lt;span&gt;क&lt;/span&gt; भारतीय चित्रकला में एक जा&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S6d2DjjpHsI/AAAAAAAAAHs/8fcU-V98DZQ/s1600-h/DSC_0272.JPG"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 400px; height: 267px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S6d2DjjpHsI/AAAAAAAAAHs/8fcU-V98DZQ/s400/DSC_0272.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5451455677411696322" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span&gt;ना&lt;/span&gt;-पहचाना नाम है। अशोक भौमिक  लोकधर्मी  चित्रकार के रूप में भाऊ समर्थ के बाद का (उस परपंरा में) सबसे समर्थ और सार्थक नाम है। उन्होंने अपने व्याख्यान में भारत के चार जनवादी चित्रकारों चित्तप्रसाद, जेनुल &lt;span&gt;आबेदीन&lt;/span&gt;, सोमनाथ होर और कमरूल हसन पर विशेष रूप से टिप्पणी की। अशोक भौमिक द्वारा बड़े स्क्रीन पर पावर पाइंट पर दी गई प्रस्तुति जबलपुर के चित्रकारों के लिए एक नया अनुभव रही। उनके व्याख्यान की एक विशेषता यह भी रही कि चित्रकला से अनभिज्ञ लोगों ने भी खूब मजा लेते हुए समय-समय पर भारतीय चित्रकला में हुए बदलाव को समझा। अशोक भौमिक प्रगतिशील कविताओं पर आधारित पोस्टरों के लिए कार्य शिविरों का आयोजन पिछले दो दशकों से करते आ रहे हैं और आज भी इस उद्देश्य के लिए समर्पित हैं। इसी समर्पण भावना से उन्होंने जबलपुर में नवोदित चित्रकारों और कला विद्यार्थियों को एक दिन की वर्कशाप में महत्वपूर्ण बातें बताईं। दो दिवसीय दृश्य-श्रव्य कार्यक्रम में प्रसिद्ध कथाकार व पहल के संपादक ज्ञानरंजन, कवि मलय, प्रो. हनुमान प्रसाद वर्मा, चित्रकार सुरेश श्रीवास्तव, हरि श्रीवास्तव, कामता सागर, छायाकार रजनीकांत यादव रंगकर्मी अरूण पाण्डेय सहित अनेक साहित्यकार, चित्रकार, रंगकर्मी उपस्थित रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-2264412313905439273?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/2264412313905439273/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=2264412313905439273' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/2264412313905439273'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/2264412313905439273'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='जबलपुर में कविता पोस्टरों की प्रदर्शनी, काव्य पाठ और कला व्याख्यान  पर केन्द्रित दो दिवसीय &apos;दृश्य और श्रव्य&apos; कार्यक्रम आयोजित'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S6Y1QaTQ6gI/AAAAAAAAAHU/O_CTUoO_UWE/s72-c/DSC_0191.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-3543685459565684697</id><published>2010-01-23T22:53:00.004+05:30</published><updated>2010-01-23T23:06:54.092+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रंगकर्म'/><title type='text'>विवेचना रंगमण्डल राष्ट्रीय नाट्य समारोह-2010: उत्कृष्ट रंगकर्म को दर्शकों का समर्थन</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S1sxwujUQuI/AAAAAAAAAHE/p-ubNHIeZss/s1600-h/vivechna.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 0pt 10px 10px; float: right; cursor: pointer; width: 400px; height: 252px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S1sxwujUQuI/AAAAAAAAAHE/p-ubNHIeZss/s400/vivechna.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5429988488924906210" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जबलपुर की विवेचना रंगमण्डल ने पिछले दिनों सात दिवसीय ‘रंग परसाई-2010 राष्ट्रीय नाट्य समारोह’ का आयोजन जबलपुर के मानस भवन में किया। यह नाट्य समारोह रंगकर्मी संजय खन्ना को समर्पित था। विवेचना की स्थापना वर्ष 1961 में हुई थी और संस्था ने 1975 से नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्शन से अपनी रंग यात्रा की शुरूआत की, जो आज तक जारी है। देश में विवेचना रंगमण्डल की पहचान एक सक्रिय सरोकार से जुड़ी हुई रंगकर्म संस्था के रूप में है। विवेचना रंगमण्डल पिछले कुछ वर्षों से नए निर्देशकों की नाट्य प्रस्तुतियों को राष्ट्रीय समारोह में भी मौका दे रही है। इस बार के नाट्य समारोह में भी जबलपुर में आयोजित अंतर महाविद्यालयीन नाट्य प्रतियोगिता की तीन श्रेष्ठ नाट्य प्रस्तुतियों को मौका दिया गया, ताकि दर्शकों को नया रंगकर्म देखने का अवसर मिल सके। इस प्रयास को रंगकर्मियों के साथ-साथ दर्शकों ने भी सराहा। इस बार के नाट्य समारोह की एक खास बात यह भी रही कि दर्शकों को सात दिन में नौ नाटक देखने को मिले। समारोह की शुरूआत और अंत गंभीर और विचारोत्तेजक नाटकों से हुआ एवं अन्य दिन हास्य नाटकों के साथ नौटंकी भी देखने को मिली।&lt;br /&gt; नाट्य समारोह के पहले दिन अंतर महाविद्यालयीन नाट्य प्रतियोगिता की श्रेष्ठ तीन प्रस्तुतियों खराशें, गिरहें और अगरबत्ती का मंचन हुआ। इन तीनों प्रस्तुतियों का निर्देशन क्रमशः रजनीश यादव, संतोष राजपूत और आशीष पाठक ने किया। तीनों निर्देशक रंगकर्म में लम्बे समय से सक्रिय हैं, लेकिन निर्देशक के रूप में भी उन्होंने अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है। विशेषकर आशीष पाठक ने लगभग तीन-चार वर्षों में नाट्य लेखक के साथ निर्देशक के रूप में नए प्रयोगों के कारण पहचाने जा रहे हैं। खासतौर से उनके सोमनाथ, पापकार्न और रेड फ्राक नाटक के जहां भी मंचन हुए, वहां के दर्शकों ने विषयवस्तु, प्रस्तुति और कल्पनाशीलता के कारण नाटकों को काफी पसंद किया है। इस राष्ट्रीय नाट्य समारोह में भी रेड फ्राक का मंचन हुआ और नाट्य प्रस्तुति से प्रभावित हुए।&lt;br /&gt; नाट्य समारोह के पहले दिन के नाटक खराशें-देश के बंटवारे के पश्चात् की परिस्थितियों, गिरहें-समाज के विभिन्न वर्गों में महिलाओं की स्थिति और अगरबत्ती-फूलन देवी से सुर्खियों में आए बेहमई हत्याकांड के भूगोल पर रची गई काल्पनिक कथा की प्रस्तुति थीं। ‘अगरबत्ती’ नाटक का मूल तत्व हत्याकांड में मारे गए पुरूषों की विधवाओं का अगरबत्ती के कारखाने में काम करते हुए इस दुर्लभ सत्य तक पहंुचना कि ‘‘पापी नातेदार भी हो तो पापी ही होता है’’ था। नाटक के अंत में एक विधवा द्वारा अपने पति की राख अगरबत्ती के मसाले में मिला देना, ताकि वो जले और भी ज्यादा तिल-तिल कर सदियों तक अगरबत्ती की तरह रोज थोड़ा-थोड़ा।&lt;br /&gt; समारोह के दूसरे, तीसरे व चैथे दिन मियां की जूती मियां का सर, चन्दू की चाची और बस इतना ख्वाब है का मंचन हुआ। तीनों नाटक हास्यप्रधान थे। ‘मियां की जूती मियां का सर’ को अभिनव रंगमण्डल, उज्जैन ने शरद शर्मा के निर्देशन में प्रस्तुत किया। मूलतः मौलियर के नाटक को कामोदियादत आर्ते के तत्वों का समावेश कर प्रस्तुत किया गया। नट सम्राट, नई दिल्ली ने ‘चन्दू की चाची’ को श्याम कुमार निर्देशन में प्रस्तुत किया गया। इस नाटक के मूल लेखक ब्रेण्ड थामस हैं। भोपाल की त्रिकर्षि ने श्रीकांत आप्टे लिखित ‘बस इतना ख्वाब है’ को के. जी. त्रिवेदी के निर्देशन में प्रस्तुत किया। तीनों नाटकों की विषयवस्तु परिस्थितिजन्य हास्य की थी, लेकिन ‘बस इतना ख्वाब है’ में हास्य के साथ व्यंग्य की तीखी धार ने दर्शकों को सोचने को मजबूर किया। नाटक में साठ वर्ष के एक ऐसे बूढ़े की चाहत की कहानी है, जो छोटे-छोटे ख्वाबों को दबाते हुए स्वयं दबते-दबते खत्म हो जाता है। आम मध्यमवर्गीय परिवार की विषयवस्तु जबलपुर के रंगप्रेमियों को बहुत भाई।&lt;br /&gt; नाट्य समारोह में विनोद रस्तोगी नाट्य संस्थान, इलाहाबाद ने ‘तोता-मैना’ को नौटंकी शैली में प्रस्तुत किया। अभिलाष नारायण के निर्देशन में प्रस्तुत किए गए नाटक में गांव की सीधी-सादी कहानी को ठेठ नौटंकी वाले संगीत के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। नाट्य प्रस्तुति इस मायने में महत्वपूर्ण थी कि इसमें नौटंकी को बचाने का ईमानदार प्रयास था।&lt;br /&gt; लेखक एवं निर्देशक आशीष पाठक का ‘रेड फ्राक’ नाट्य समारोह की सबसे सशक्त प्रस्तुति कही जा सकती है। समागम रंगमण्डल, जबलपुर की इस प्रस्तुति में दोहरे मापदंडों पर कठोर प्रहार किए गए हैं। विनय शर्मा द्वारा अभिनीत एकपत्रीय वाले इस नाट्य प्रस्तुति में सिद्धांत, आदर्श, विचार, दर्शन, गहन मंथन को एक सूत्र में पिरोकर प्रस्तुत किया गया है। नाटक में लेखक-निर्देशक दर्शकों को संदेश देना चाहता है कि मनुष्य के जीवन में सिद्धांतों का पालन किसी आम पाखंड के कर्मकांड की तरह प्रतीत होने लगता है। यह स्थिति वैसी ही है, जैसे कि आप तमाम उम्र सांप-सीढ़ी के खेल की तरह सिद्धांतों की सीढ़ी चढ़ कर, कष्ट भोगते हुए तप कर लाल हुए और अंत में निन्यान्वे के सांप के काटने से विषाक्त और नीले पड़ गए। इसी लाल से नीले हो जाने की मनोवृत्ति का ट्रांसफार्मेशन ही रेड फ्राक है। लेखक-निर्देशक आशीष पाठक के लोकप्रिय और 40 से ज्यादा बार मंचित हो चुके नाटक ‘पापकार्न’ की तुलना में ‘रेड फ्राक’ ज्यादा विचारोत्तेजक और व्यापक फलक वाला नाटक है। विनय शर्मा ने भी ‘रेड फ्राक’ में भी अपनी अभिनय क्षमता का विस्तार किया है।&lt;br /&gt; नाट्य समारोह की अंतिम प्रस्तुति भूमिका, भोपाल ने ‘गदल’ के माध्यम से की। रांगेय राघव लिखित कहानी का नाट्य रूपांतरण और निर्देशन गोपाल दुबे ने किया। ‘गदल’ में राजस्थान के एक छोटे से गांव और ग्रामीण समाज में महिलाओं की स्थिति को गहराई से प्रस्तुत किया गया।  दरअसल गदल का अर्थ है-पानी का ऐसा बहाव, जिसे कोई रोक नहीं सका। नाटक की मुख्य पात्र गदल भी पानी के ऐसे बहाव की तरह है, जिसे कोई रोक नहीं सका और अंत में वह तमाम विरोधों के बीच अपने उद्देश्यों को प्राप्त करती है। लगभग एक घंटे की अवधि वाले इस नाटक में निर्देशक ने राजस्थान की संस्कृति और रीति-रिवाजों को सफलता से सम्प्रेषित किया। ‘गदल’ को भी जबलपुर के दर्शकों ने विषयवस्तु और प्रस्तुति के कारण सराहा।&lt;br /&gt; विवेचना रंगमण्डल ने राष्ट्रीय नाट्य समारोह के आयोजन से इस मिथक को भी तोड़ा कि  नाटकों को दर्शक देखने नहीं आते। नाट्य समारोह के सातों दिन प्रेक्षागृह में दर्शकों की भीड़ जुटी और उन्होंने टिकट खरीद कर उत्कृष्ट रंगकर्म को समर्थन और सहयोग भी दिया। अलबत्ता समारोह में मेजबान विवेचना रंगमण्डल के नाटक न होने की कमी दर्शकों को खली, आखिरकार विवेचना रंगमण्डल की पहचान उसके मंचित नाटकों से ही है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-3543685459565684697?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/3543685459565684697/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=3543685459565684697' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/3543685459565684697'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/3543685459565684697'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2010/01/2010.html' title='विवेचना रंगमण्डल राष्ट्रीय नाट्य समारोह-2010: उत्कृष्ट रंगकर्म को दर्शकों का समर्थन'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/S1sxwujUQuI/AAAAAAAAAHE/p-ubNHIeZss/s72-c/vivechna.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-1560171249128418697</id><published>2009-07-24T18:59:00.005+05:30</published><updated>2009-07-25T19:26:48.138+05:30</updated><title type='text'>ब्लॉगर विकास परिहार का सड़क दुर्घटना में निधन</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/Smm6OIN85MI/AAAAAAAAAF0/uhr5MqTL1ys/s1600-h/Vikas+Parihar.JPG"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 0pt 10px 10px; float: right; cursor: pointer; width: 220px; height: 165px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/Smm6OIN85MI/AAAAAAAAAF0/uhr5MqTL1ys/s320/Vikas+Parihar.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5362021583248221378" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;"नहीं हो सका पत्थर मैं बावज़ूद चौतरफा दबावों के,&lt;br /&gt;इसीलिये&lt;/span&gt; &lt;span style="font-weight: bold;"&gt; इस तथाकथित विकास-युग में पीछे खड़ा हूं।"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;विकास परिहार के ब्लॉग &lt;a href="http://www.swasamvad.blogspot.com/"&gt;'स्वसंवाद'&lt;/a&gt; खोलते हुए उसकी तस्वीर के साथ उपर्युक्त पंक्ति भी पथरा गई है। विकास का 18 जुलाई को भोपाल के नजदीक मिसरौद में एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया। उसके साथ जबलपुर निवासी भास्कर टीवी में कार्यरत संकल्प शुक्ला भी था। दोनों को बचाया नहीं जा सका। जबलपुर में दुर्घटना की जानकारी मिलते ही दोनों को जानने॑-पहचानने वाले सभी लोग दुखी हो गए।&lt;span style="display: block;" id="formatbar_Buttons"&gt;&lt;span class="" style="display: block;" id="formatbar_JustifyFull" title="Justify Full" onmouseover="ButtonHoverOn(this);" onmouseout="ButtonHoverOff(this);" onmouseup="" onmousedown="CheckFormatting(event);FormatbarButton('richeditorframe', this, 13);ButtonMouseDown(this);"&gt;&lt;img src="http://www.blogger.com/img/blank.gif" alt="Justify Full" class="gl_align_full" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;विकास मूलत: जबलपुर के रहने वाले नहीं थे, लेकिन उसने काफी कम समय में अपनी विशिष्ट पहचान बना ली थी। उसने कुछ समय नेवी में भी नौकरी की थी। साहित्य और पत्रकारिता का कीड़ा, उसे जबलपुर ले आया। अपनी संवेदनशीलता, ज्ञानशीलता और निडरता के कारण वह जल्दी लोकप्रिय हो गया। विकास ने पत्रकारिता कोर्स करते हुए कालेज प्रबंधन की गड़बड़ियों का खुलासा कर निडरतापूर्वक विरोध दर्ज कराया। पत्रकारिता का कोर्स पूर्ण करने के पश्चात उसने जबलपुर के सांध्य दैनिक यश भारत से शुरूआत की। कुछ ही समय बाद विकास ने नई दुनिया ज्वाइन कर लिया। नई दुनिया में प्रविष्ट होने के लिए उसने काफी जद्दोजहद की थी। यह बात मुझे नई दुनिया के   तत्कालीन संपादक राजीव मित्तल ने उस बताई, जब मैंने उन्हें विकास के आकस्मिक निधन की खबर दी। राजीव मित्तल वर्तमान में मेरठ से प्रकाशित हिंदुस्तान के स्थानीय संपादक हैं। उन्होंने कहा कि विकास परिहार जैसे लोग आज के युग में बिरले ही होते हैं। राजीव मित्तल ने माना कि विकास में एक अच्छे पत्रकार के साथ उत्कृष्ट साहित्यकार होने के पूरे गुण थे। वह संभावनापूर्ण कवि था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकास ने एफएम रेडियो के शुरू होते ही नई दुनिया को छोड़ एस एफएम ज्वाइन कर लिया। दरअसल वह महत्वाकांक्षी और बैचेन नवयुवक था। राजगढ़ के राघौगढ़ के रहने वाले विकास के लिए जबलपुर मंजिल नहीं थी। वह शिखरों को छूना चाहता था। रेडियो में भी उसने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। जब-जब विकास को मौका मिला, उसने ठेठ फिल्मी संगीत के बीच में कविता और साहित्य के लिए गुंजाइश निकाली। शिखरों को छूने के लिए उसने एस एफएम की नौकरी को भी जल्द छोड़ कर दिल्ली का रूख किया। मंदी के दौर में उसे दिल्ली में ठौर ठिकाना नहीं मिला। उसके ब्लॉग स्वसंवाद, इस हम्माम में सब......! और World of Words से उसकी रचनाधर्मिता की जानकारी समय-समय पर मिलती रहती थी। एक दिन उसके एसएमएस से जानकारी मिली कि वह भोपाल आ गया है और पीएससी की परीक्षा की तैयारी कर रहा है। इस वर्ष उसने पीएससी की प्रारंभिक परीक्षा पास कर ली थी और मुख्य परीक्षा की तैयारी कर रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकास परिहार को जबलपुर में जितने लोग भी पहचानते थे, उन सभी के लिए उसके अलग-अलग रूप थे। किसी के लिए वह पत्रकार था, तो किसी के लिए रेडियो जाकी, तो किसी के लिए एक्स नेवी मेन, तो किसी के लिए ब्लागर, तो किसी के लिए कवि, तो किसी के लिए टेक्नीशियन। उसके रूप तो अलग थे, लेकिन सबके लिए उसका एक रूप था दोस्ती और आत्मीयता का। विकास ने मेरी जितनी भी ब्लाग यात्रा है, उसमें तकनीकी रूप से भरपूर मदद की। महज 27-28  वर्ष की आयु होने के बावजूद उसमें साहित्य और कला की समझ काफी थी। प्रसिद्ध साहित्यकार और पहल के संपादक ज्ञानरंजन के पास उसने किताब पढ़ने के शौक के कारण जाना शुरू किया था। ज्ञानरंजन भी उसकी पाठ-पठन की आदत के कारण पसंद करते थे। मुझे याद है कि ज्ञानरंजन ने लगभग 6 महीने पहले विकास के संदर्भ में कहा था कि इस दशक में इतना पढ़ने-लिखने वाला व्यक्ति नहीं देखा। ज्ञानरंजन भी विकास को धीमे-धीमे आगे बढ़ने की सलाह देते थे, लेकिन किसी को आभास नहीं था कि वह इतनी तेजी से चलेगा कि इस दुनिया को छोड़ कर ही चला जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकास को जबलपुर के सभी ब्लॉगरों की ओर से श्रद्धांजलि।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-1560171249128418697?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/1560171249128418697/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=1560171249128418697' title='21 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/1560171249128418697'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/1560171249128418697'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='ब्लॉगर विकास परिहार का सड़क दुर्घटना में निधन'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/Smm6OIN85MI/AAAAAAAAAF0/uhr5MqTL1ys/s72-c/Vikas+Parihar.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>21</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-7769595712871675951</id><published>2009-05-03T20:00:00.003+05:30</published><updated>2009-05-03T23:40:53.677+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अजय पोहनकर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जबलपुर'/><title type='text'>आन गांव के सिद्ध पंडित अजय पोहनकर</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/Sf3c0qbljLI/AAAAAAAAAFk/XhVcY1Cb-lY/s1600-h/colour.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5331660331177839794" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 240px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/Sf3c0qbljLI/AAAAAAAAAFk/XhVcY1Cb-lY/s320/colour.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;पि&lt;/strong&gt;छले&lt;/span&gt; दिनों &lt;a href="http://radioandmusic.com/"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;रेडियो एंड म्यूजिक डाट काम&lt;/span&gt; &lt;/a&gt;में किराना घराने के गायक पंडित अजय पोहनकर का एक इंटरव्यू पढ़ने को मिला। इस इंटरव्यू को पढ़ते हुए मैं अतीत में चला गया। आम भारतीयों की तरह मैं भी नास्टलाजिक हूं। मुझे पंडित अजय पोहनकर और उके परिवार से जुड़ी बातें याद आने लगीं। प्रयास करने के बाद मुझे पंडित अजय पोहनकर का मोबाइल नंबर मिला और उनसे बात करने को स्वयं को रोक नहीं सका। जब मैंने उनको फोन लगाया, तब वे मुंबई के ट्रैफिक में फंसे हुए थे। जब उन्हें यह जानकारी मिली कि मैं जबलपुर से बात कर रहा हूं, तो वे भावुक हो गए और उन्होंने कहा कि वे दूसरे दिन स्वयं मुझसे बात करेंगे। बहुत से लोगों और जबलपुर के लोगों को ही यह जानकारी नहीं है कि अजय पोहनकर जबलपुर के रहने वाले हैं। &lt;strong&gt;उनके लिए "घर का जोगी जोगड़ा, आन गांव के सिद्ध" कहावत सटीक बैठती है।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;दूसरे दिन निश्चित समय पर मेरी उनसे बातचीत हुई। संक्षिप्त बातचीत में पंडित अजय पोहनकर ने सबसे पहले कहा-‘‘मुझे जबलपुर और मध्यप्रदेश ने तो भुला दिया।’’ पंडित जी ने कहा कि वे मध्यप्रदेश और खासतौर से मध्यप्रदेश के लिए बहुत कुछ करना चाहते हैं, लेकिन कोई इसके लिए पहल तो करे। मैंने उन्हें लगभग 10-12 वर्ष वर्ष जबलपुर में हुई संगीत सभा और बातचीत का जिक्र किया, तो उन्होंने कहा कि वह कार्यक्रम जबलपुर के सीनियर एडवोकेट और अब सुप्रीम कोर्ट के वकील विवेक तन्खा की पहल पर आयोजित हुआ था। पंडित अजय पोहनकर ने कहा कि वे जबलपुर और मध्यप्रदेश के नए गायकों को मार्गदर्शन देना चाहते हैं और गुरूकुल परम्परा को आगे बढ़ाना चाहते हैं। इसके लिए यदि उन्हें जमीन मिल जाए तो वे एक संगीत अकादमी की स्थापना करेंगे, जहां वे नए गायकों को ख्याल, ठुमरी और परफार्मेंस टेक्निक की शिक्षा देने चाहेंगे। पंडित अजय पोहनकर ने बातचीत में इस बात पर दुख व्यक्त किया कि उनके 50 वर्ष के संगीत योगदान को मध्यप्रदेश सरकार ने याद नहीं रखा है और न ही कालिदास सम्मान के काबिल समझा। पंडित जी को इस बात का भी दुख है कि महाराष्ट्र व मध्यप्रदेश सरकार ने अभी तक पद्मश्री या पद्म भूषण सम्मान के लिए उनके नाम की अनुशंसा नहीं की, जबकि ऐसे सम्मान उनको 20-25 वर्ष पूर्व ही मिल जाने चाहिए थे। पंडित अजय पोहनकर ने कहा कि मध्यप्रदेश के छोटे शहर सतना में उनके शिष्य रमाकांत त्रिपाठी और विनोद मिश्रा ने कुछ दिन पूर्व ही एक अच्छा कार्यक्रम आयोजित कर उनको गाने का मौका दिया, लेकिन बड़े शहरों में ऐसे आयोजन क्यों नहीं होते ?&lt;br /&gt;पंडित जी बात करने के पश्चात् मुझे पुरानी बातें याद आने लगीं। बात शायद वर्ष 1977 की है। उस समय हम लोग जबलपुर के राइट टाउन मोहल्ले में रहते थे। उस समय मैं मोंटेसरी स्कूल में पढ़ा करता था। यह हिंदी माध्यम स्कूल जबलपुर ही क्या मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध होमसाइंस कालेज के परिसर में स्थित है। उस हिंदी माध्यम स्कूल की उस समय इतनी ख्याति थी कि उसमें प्रवेश के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती थी। इस स्कूल के अधिकांश विद्यार्थी माडल स्कूल में प्रवेश पाते थे। उस समय आठवीं और ग्यारहवीं की 25 की मेरिट लिस्ट में माडल स्कूल के विद्यार्थियों की संख्या लगभग 15 से 17 के बीच में रहती थी। इन्हीं दो स्कूलों के पढ़े विद्यार्थी आज आईएएस, डाक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, संगीतज्ञ के रूप में नाम कमा रहे हैं। मैं रोज स्कूल प्रभात पुल से जाया करता था। प्रभात पुल के रास्ते में काफी प्रबुद्ध परिवारों के मकान थे। उनमें कुछ या उनके परिवार के लोग तो अभी भी रह रहे हैं। इन्हीं लोगों में से एक डा. सुशीला पोहनकर का घर प्रभात पुल के किनारे था। मुझे उनके घर में डा. सुशीला पोहनकर के नाम से लगी नेमप्लेट से ही यह जानकारी मिली कि इस घर में कोई पोहनकर परिवार रहता है।&lt;br /&gt;उस समय मैं डा. सुशीला पोहनकर या पंडित अजय पोहनकर की शख्सियत से परिचित नहीं था, लेकिन मांटेसरी स्कूल में पांचवी कक्षा में पहुंचने के वक्त यह जानने लगा कि डा. सुशीला पोहनकर होम साइंस में संगीत की शिक्षा देती हैं। बाद के दिनों में अपनी मां से मुझे जानकारी मिली कि डा. सुशीला पोहनकर एक अच्छी गायिका भी हैं। मांटेसरी स्कूल में ही पढ़ते समय होमसाइंस कालेज के कार्यक्रमों में डा. सुशीला पोहनकर के निर्देशन में संगीत के एक-दो कार्यक्रम देखने और सुनने को भी मिले। इससे मेरी बाल बुद्धि को अहसास हुआ कि वे संगीत की अच्छी जानकार हैं। कुछ दिनों के पश्चात् एक दिन मैंने देखा कि जिस मकान में पोहनकर परिवार रहता है, वहां उनकी नेमप्लेट नहीं थी। मेरी एक मौसी होम साइंस में पढ़ाती थीं और उनके पोहनकर परिवार से घनिष्ठ संबंध थे। उन्हीं से मुझे और मेरी मां को इस बात को जानकारी मिली कि पोहनकर परिवार बंबई शिफ्ट हो गया है और उन्होंने अपना मकान बेच दिया है।&lt;br /&gt;इसके बाद पोहनकर परिवार के संबंध में कुछ सुनने को नहीं मिला। लगभग 10-12 वर्ष पहले पंडित अजय पोहनकर एक कार्यक्रम के लिए जबलपुर आए। जैसा कि पहले जिक्र किया गया है कि यह कार्यक्रम जबलपुर के प्रसिद्ध एडवोकेट विवेक तन्खा ने आयोजित किया था। उस समय मैं दैनिक देशबन्धु एक साप्ताहिक सांस्कृतिक कालम ‘संस्कृति’ लिखा करता था। इसी कालम के लिए मैंने तब पंडित अजय पोहनकर एक इंटरव्यू लिया। इतने वर्षों में लोग यह भूल चुके थे कि पंडित अजय पोहनकर का जबलपुर से कोई संबंध है। जैक्सन होटल में पंडित अजय पोहनकर से लंबी बातचीत हुई। उन्होंने उस बातचीत में कहा था कि वे कव्वाली सुनना पसंद करते हैं और कभी मौका मिला तो वे कव्वाली गाएंगे।&lt;br /&gt;हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में पंडित अजय पोहनकर एक सम्मानीय नाम है। किराना घराने का प्रतिनिधित्व करने वाले पंडित अजय पोहनकर ने संभवत: एकमात्र ऐसे गायक हैं, जिन्होंने महान गायकों उस्ताद आमीर खान, पंडित भीमसेन जोशी, पंडित जसराज, उस्ताद नजाकत अली सलामुद्दीन, पंडित निखिल बैनर्जी.....जैसे संगीतज्ञों की छत्र-छाया में आगे बढ़े हैं।&lt;br /&gt;अजय पोहनकर ने सिर्फ आठ वर्ष की आयु में नागपुर की एक संगीत सभा में सार्वजनिक रूप से अपना गायन प्रस्तुत किया था। इस संगीत सभा में उनके नाम की सिफारिश किसी और ने नहीं बल्कि उस्ताद आमिर खान ने की थी। अजय पोहनकर के पिताजी जबलपुर में वकालत करते थे और समाज में उनकी काफी प्रतिष्ठा थी। धनाढ्य व्यक्ति होने के बावजूद संगीत में उनकी काफी रूचि भी थी। उन दिनों अमीर परिवारों में गाने को हेय दृष्टि से देखा जाता था। मां-बाप को चिंता सताती रहती थी कि यदि बच्चा गाना गाने लगेगा, तो जायदाद की देखभाल कौन करेगा ? अजय पोहनकर के साथ ऐसा नहीं था। उनकी मां डा. सुशीला पोहनकर किराना घराने की थी और उन्होंने अपने बेटे को संगीत का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया था।&lt;br /&gt;अजय पोहनकर के पिता की संगीत में रूचि और मां का संगीत शिक्षक होने का फायदा यह था कि उनके घर में उस समय के तमाम बड़े संगीतज्ञों का आना-जाना लगा रहता था। उस्ताद आमिर खान जब भी जबलपुर आते थे, तो वे पोहनकर परिवार के घर में ही रूकते थे। सिर्फ आमिर खान ही नहीं बल्कि उस समय के वे सभी संगीतज्ञ, जो जबलपुर आते थ, उनके घर में जरूर जाते थे। इससे पोहनकर परिवार का घर जबलपुर में संगीत गतिविधियों का मुख्य केन्द्र बन गया। आज लोग किसी भी स्थान में हवाई जहाज से आते हैं और दूसरी उड़ान से चले जाते हैं, लेकिन उन दिनों संगीतज्ञ तीन-चार दिन और कभी-कभी एक सप्ताह तक रूका करते थे। कई बार जबलपुर के आसपास संगीत सभा के आयोजन के दौरान भी प्रसिद्ध संगीतज्ञ समय निकाल कर जबलपुर आते और पोहनकर परिवार से मिलने जाते। इस प्रकार अजय पोहनकर का कई महान् संगीतज्ञों से परिचय हुआ। डा. सुशीला पोहनकर ने भी अपने बेटे को प्रोत्साहित किया कि वे महान् संगीतज्ञों की बातों को गंभीरतापूर्वक सुनें और जीवन में उनका पालन करें।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;डा. सुशीला पोहनकर भी एक अच्छी गायिका थीं, लेकिन उन्होंने गायन को कभी भी पेशेवर रूप में नहीं अपनाया। इसका कारण उस समय एक अकेली महिला का बाहर जा कर गाने को अच्छा नहीं माना जाता था और न ही इसके लिए उनको प्रोत्साहित किया जाता था। अजय पोहनकर के दादा जी ने अपनी बहु को इस बात की स्वीकृति अवश्य दे दी कि वे अपने बेटे यानी कि अजय के माध्यम से अपनी इच्छा को पूरी कर सकती हैं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;पंडित जसराज का भी पोहनकर परिवार से गहरा नाता था और वे डा. सुशीला पोहनकर को अपनी बहिन मानते थे। इस रिश्ते के कारण अजय पोहनकर को पंडित जसराज का सानिध्य मिला। अजय पोहनकर को किशोरवय में महान् संगीतज्ञों से मिलने, उनका गायन सुनने और अन्य बातों को सीखने का मौका मिला और इसका उन्होंने पूरा आनंद भी उठाया। संगीतमय माहौल ने अजय को गायन में आगे बढ़ने में पूरी सहायता की। अजय ने संगीत की मूल बातें ही नहीं सीखी, बल्कि यह भी सीखा कि संगीतकारों के साथ बैठ कर क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।&lt;br /&gt;पंडित अजय पोहनकर ने नागपुर की संगीत सभा की सफलता के पश्चात् उस्ताद नजाकत अली सलामुद्दीन, फिल्म अभिनेता गोविंदा की मां प्रसिद्ध ठुमरी गायिका निर्मला देवी और पंडित निखिल बैनर्जी के सानिध्य में शुरूआत की। इसके पश्चात् दस वर्ष की आयु में उस्ताद आमिर खान की सिफारिश पर उन्हें बंबई आमंत्रित किया गया। सन् 1959 में जब अजय पोहनकर 11-12 वर्ष के थे, तब सवाई गंधर्व समारोह में गायन के लिए उन्हें पंडित भीमसेन जोशी ने आमंत्रित किया। 12 दिन तक चलने वाले कलकत्ता समारोह में भी उन्हें अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने का मौका मिला। इस समारोह में गायकों को अपना गायन कौशल पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, उस्ताद हाफीज अली खान साहब (उस्ताद अमजद अली खान के पिता) जैसे संगीतज्ञों के समक्ष प्रस्तुत करना पड़ता था। इन तमाम संगीत सभाओं में अजय पोहनकर को खूब प्रशंसा मिली। बेगम अख्तर ने जबलपुर के प्रवास के दौरान उनकी कंपोज की गई ठुमरी को अच्छे से प्रस्तुत करने पर अजय पोहनकर को प्यार और प्रोत्साहन की दृष्टि से कुछ रूपए दिए। बेगम अख्तर ने अजय पोहनकर से कहा कि वे भविष्य में भी उनकी कंपोज की गई रचनाओं को गा सकते हैं।&lt;span class=""&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="304" height="226" class="BLOG_video_class" id="BLOG_video-64bf2f893170f12a" classid="clsid:D27CDB6E-AE6D-11cf-96B8-444553540000" codebase="http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/get_player"&gt;&lt;param name="bgcolor" 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CURSOR: hand; HEIGHT: 234px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/SfMToSiiddI/AAAAAAAAAFM/ZV_nA0EB-9g/s320/gr-1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्र&lt;/strong&gt;सिद्ध साहित्यकार और पहल के संपादक &lt;strong&gt;ज्ञानरंजन&lt;/strong&gt; ने कहा है कि प्राय: पुरस्कृत और सम्मानित लोग आत्मकथन की तरफ जाते हैं, परन्तु मेरे लिए भारतीय भाषा परिषद का सम्मान एक दर्पण की तरह है, जिसमें मैं खुद को और अपने अतीत को निहारता हूं। मत-मतांतर के साथ पत्रकारी किस्म के विवाद व अवसर के बाद विलक्षणता की ऐसी घड़ी चल रही है, जिसमें एक घातक हिंसा पैदा हो चुकी है। उन्होंने कहा कि साहित्य व राजनीति के बीच किसी भी तरह का फर्क गायब हो चुका है। ज्ञानरंजन कहते हैं कि उनकी सोच यह है कि हमें अपने समस्त सांस्कृतिक उपक्रमों व उसके प्रबंधन पर बाजार के रिवाज से हट कर नए सिरे से विचार कर एक नया सांस्कृतिक आंदोलन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें अपने पुरस्कारों की प्रक्रिया को खोल देना चाहिए और उसकी राजनीति व गोपनीयता को भंग कर देना चाहिए। ज्ञानरंजन ने कहा-‘‘मैंने जो कुछ भी कहा है, वह मेरी तथा मेरी कहानियों की ही आवाज है।"&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध साहित्यकार और पहल के संपादक ज्ञानरंजन को पिछले दिनों कोलकाता में हिंदी साहित्य में अमूल्य योगदान देने के लिए &lt;strong&gt;&lt;a href="http://bharatiyabhashaparishad.com/"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;भारतीय भाषा परिषद &lt;/span&gt;&lt;/a&gt;ने वर्ष 2008 के साधना सम्मान&lt;/strong&gt; से सम्मानित किया। ज्ञानरंजन सहित &lt;strong&gt;डा. महिंदर कौर गिल (पंजाबी), आर. वैरामुत्थु (तमिल) और रामचंद्र बेहरा (उड़िया) &lt;/strong&gt;को भी साधना सम्मान से सम्मानित किया गया। युवा साहित्यकारों में &lt;strong&gt;हिंदी के लिए डा. अल्पना मिश्रा, निर्मला पुतुल (संथाली), मधुमीत बावा (पंजाबी) और एस. श्रीराम (तमिल) &lt;/strong&gt;को अपनी-अपनी भाषा के साहित्य में योगदान देने के लिए युवा साहित्कार सम्मान से अलंकृत किया गया। उड़िया के साहित्यकार &lt;strong&gt;रमाकांत रथ&lt;/strong&gt; ने साहित्यकारों को सम्मानित किया। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रमाकांत रथ&lt;/strong&gt; ने इस अवसर पर कहा कि साहित्य में जूनियर व सीनियर नहीं होता। साहित्य एक परम्परा है, जो निरंतर गतिशील रहती है। साहित्यकार को अपने आप को स्टेनोग्राफर से ज्यादा नहीं समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान करते हैं। भाषा मानवीय संस्कृति को जोड़ती है। कुछेक भारतीय भाषाओं को क्लासिकल भाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए। भारतीय भाषाओं को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;तमिल के सम्मानित कवि &lt;strong&gt;वैरामुत्थु&lt;/strong&gt; ने कहा कि जब जीवन के प्रति ललक खत्म हो जाए व पृथ्वी विस्मित करने लगे कविता वहीं समाप्त हो जाती है। उड़िया साहित्यकार डा. रामचंद्र बेहरा ने कहा कि रचनात्मक लेखन आत्म अभिव्यक्ति का माध्यम है। लेखक की रचना में जीवन के उनके अनुभवों और दृष्टि की झलक दिखती है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;युवा साहित्कार &lt;strong&gt;डा. अल्पना मिश्रा&lt;/strong&gt; ने कहा कि साहित्य में समय और समाज को अभिव्यक्त करना चाहिए। स्त्री को आलू छीलने से ले कर चिप्स तक की पीड़ा को समझने की जरूरत है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संथाली साहित्यकार निर्मला पुतुल&lt;/strong&gt; ने कहा-‘‘मुझे जो सम्मान मिला है, वह संथाल समुदाय का सम्मान है। संथाली साहित्य में गीतों की प्रमुखता है। इसके बोल बड़े कीमती हैं। लोक कंठों और परम्पराओं में संथाली साहित्य सुरक्षति है। दुर्भाग्य है कि कुछ साहित्यकारों ने संथाली क्रांतिकारियों को लुच्चा कहने में भी संकोच नहीं किया है। कुछ भद्र जन संथाली भाषा को संविधान की आठवीं सूची में जगह मिलने से भयभीत हैं।’’&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;समापन भाषण देते हुए रामकुमार मुखोपाध्याय ने कहा कि साहित्य हमारे लिए आवश्यक है। साहित्य अतीत व वर्तमान को जोड़ता है। कार्यक्रम का संचालन भारतीय भाषा परिषद की कुसुम खेमानी ने किया। स्वागत भाषण संस्था के निदेशक डा. विजय बहादुर सिंह ने दिया।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-3691744926504710695?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/3691744926504710695/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=3691744926504710695' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/3691744926504710695'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/3691744926504710695'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2009/04/blog-post_25.html' title='ज्ञानंरजन ने कहा-पारदर्शी हो साहित्यिक पुरस्कारों की प्रक्रिया'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/SfMToSiiddI/AAAAAAAAAFM/ZV_nA0EB-9g/s72-c/gr-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-6476671868488898595</id><published>2009-04-21T19:48:00.005+05:30</published><updated>2009-04-21T23:32:17.283+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रंगकर्म'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बादल सरकार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नाटक'/><title type='text'>प्रतिरोध को थिएटर का माध्यम बनाने वाले रंगकर्मी बादल सरकार</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/Se4Fr8cAnRI/AAAAAAAAAFE/pSI0gW0J-R8/s1600-h/badal.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5327201661741997330" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 69px; CURSOR: hand; HEIGHT: 78px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/Se4Fr8cAnRI/AAAAAAAAAFE/pSI0gW0J-R8/s320/badal.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;बादल &lt;/strong&gt;सरकार का नाम देश में नाटक का पर्याय है। कलकत्ता में जन्में बादल सरकार ने कई वर्ष इंजीनियर के रूप में काम किया। विदेश से रंगकर्म का डिप्लोमा लेने के पश्चात् उन्होंने रंग जगत में प्रवेश किया। उनके अभिनव तरीके ने रंगमंच में उनकी अलग पहचान विकसित की और बादल सरकार रंग जगत का एक शीर्ष नाम बन गया। बादल दा ने गत 15 जुलाई को जीवन के 83 वर्ष पूर्ण किए हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;बादल सरकार से प्रेरित हो कर देश के सैकड़ों रंगकर्मी सड़कों पर नाटक करने उतरे और प्रतिरोध के लिए थिएटर को माध्यम बनाया। थिएटर आडोटोरियम और उसके तमाम तामझाम को छोड़ कर ‘सुधीन्द्र नाथ सरकार’ ने जब थिएटर को जनता से सीधे संवाद करने का माध्यम बना कर नुक्कड़ नाटक की अपनी शैली विकसित की, तो रंग जगत में एक तूफान सा आ गया। सन् 1970 के आसपास उन्होंने थिएटर आडोटोरियम से नुक्कड़ की यात्रा शुरू की। उस समय बांगला थिएटर जगत में शंभू मित्र, तृप्ति मित्र और उत्पल दत्त के नाम शीर्ष पर थे।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;बादल सरकार बताते हैं- ‘‘मैंने अपना काम कविताओं से शुरू किया। सन् 1956 में मैंने अपना पहला नाटक साल्यूशन एक्स लिखा। फिर सन् 1956 में बारो पिशीमा आया। अभी हाल ही में उनकी दो पुस्तकें &lt;em&gt;पुरोनो कुशुन्डी&lt;/em&gt; और &lt;em&gt;प्रोबोशेर हिज्जीबिज्जी&lt;/em&gt; आई हैं, जिनमें उनके नाटकों, अनुभवों और विदेश यात्राओं का विवरण है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;सन् 1961 में उनका तीसरा नाटक राम श्याम जोदू आया जो एक विदेशी कहानी पर आधारित था। इस नाटक की सफलता ने उन्हें एक अलग किस्म के थिएटर का जनक बनाया, जिसे भारत में थर्ड थिएटर और साइको फिजिकल थिएटर (मनो-शारीरिक रंगमंच) के नामों से जाना गया। सन् 1963 में उन्होंने दो नाटकों का निर्देशन किया। ये नाटक थे-&lt;em&gt;एवम् इंद्रजीत&lt;/em&gt; और &lt;em&gt;वल्लभपुर की रूपकथा&lt;/em&gt; । इन नाटकों के साथ ही बादल सरकार का नाम हर रंगकर्मी की जुबान पर छा गया। इसके बाद उनके नाटक लगातार आते रहे। कवि कहानी (1964), बाकी इतिहास (1965), तीसरी शताब्दी (1966), यदि फिर एक बार (1966), पगला घोड़ा (1967), अंत नहीं (1970), सगीना मेहता (1970), अबू हसन (1971), मिछिल-जुलूस (1974) आदि। &lt;em&gt;बाकी इतिहास&lt;/em&gt; ने जहां उन्हें महान नाटककार बनाया, वहीं &lt;em&gt;पगला घोड़ा&lt;/em&gt; और &lt;em&gt;सारी रात&lt;/em&gt; बहुत ही पसंदीदा नाटक बने।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;बादल सरकार ने अपने साथियों के साथ ‘परिक्रमा’ कार्यक्रम के साथ बंगाल के अनेक जिलों में गांव-गांव जा कर नाटक किए और बंगाल के ग्रामीण जनों से सीधा रंगसम्पर्क बनाया। नादिया, 24 परगना आदि जिलों में भी गांव-गांव घूम कर बादल सरकार ने रंगकर्म का संदेश दे कर अभिजात्य नाट्य जगत को चुनौती दी। उनके नाटकों में कलाकारों और दर्शकों के बीच कोई फर्क नहीं होता है। बादल सरकार ने आंगन, छत, नुक्कड़ और गांवों में नाटकों को पहुंचा कर नाटक को व्यापक बनाया।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;‘‘मेरे नाटक संदेश मेरा संदेश देते हैं। परन्तु मैं महसूस करता हूं कि इन नाटकों को यदि मैं आज लिखता तो इनका फार्म और नेरेशन दूसरा होता। जिस पथ पर मैं अब तक चला और जो नवाचार मैंने भारतीय रंगमंच में किया, उस पर मुझे आज भी विश्वास है।’’&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;बादल सरकार आज भी सक्रिय हैं, यद्यपि बीमारी के कारण वे घूम-फिर नहीं पाते हैं। आजकल वे अपनी आत्मकथा का तीसरा भाग लिख रहे हैं। बादल दा कहते हैं-‘‘मैं अब भी लिख रहा हूं, हालांकि लोगों ने मुझे अकेला छोड़ दिया है और आज मुझे किसी चीज की कोई इच्छा भी नहीं है।’’&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;वे आजकल निपट एकांत में जी रहे हैं। न कोई आता है और न कोई जाता है। इस महान नाटककार को जिसने वैकल्पिक रंगमंच को जन्म दिया, उसे उसके लेखन की रायल्टी भी नहीं मिलती। प्रकाशक पिछले एक दशक से उनकी उपेक्षा कर रहे हैं। उनके स्वयं के विद्यार्थी नाटकों का मंचन करते हैं और उन्हें सूचित करना भी जरूरी नहीं समझते।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;बादल सरकार को सांस की तकलीफ है और पैरों में डली दो राड के कारण बाहर जाने में वे असमर्थ हैं। पर वे असहाय और निराश नहीं हैं, यद्यपि आर्थिक और भावनात्मक रूप से वे बहुत कष्ट में हैं। उनकी आत्मकथा बहुत कुछ कहती है। उनके अनुभवों का संसार बहुत बड़ा है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;बादल सरकार बताते हैं कि उन्होंने थिएटर अपने परिवार वालों के साथ मिल कर शुरू किया। घर से साड़ी-कपडे ले जा कर उसी से स्टेज बना कर पूरी लगन से नाटक तैयार करते थे। उन्होंने कई बार नाटकों में महिला पात्र का काम किया, हालांकि उनके माता-पिता को यह बिल्कुल पसंद नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;वर्तमान में बादल सरकार केवल लिख रहे हैं। उनके साथ एक युवा सहायक है। उनके समकालीन शंभू मित्र को भी अंतिम समय में एक होटल में रहना पड़ा था। लोगों का यह याद रखना होगा कि नुक्कड़ नाटक के उनके मुहावरे को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय तक में सम्मान मिला। बादल दा को इस बात का मलाल है कि उनके काम को एक उत्पाद के रूप में बेचा जा रहा है। बीमारी के साथ-साथ वे बादल सरकार को भुलाए जाने के विरूद्ध भी लड़ाई लड़ रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;बादल सरकार का रंगकर्म व्यवस्था के विरूद्ध उद्घोष है। उनके फार्म की आसानी और ऊर्जा हर युवा को आकर्षित करती है, इसलिए बादल सरकार के नाटक पूरे देश में हर नाट्य दल द्वारा बार-बार खेले गए। बादल दा के नाटक समाज में अत्याचार और बिखरती समाज व्यवस्था के विरूद्ध तीखा प्रतिरोध करते हैं। समाज और राजनीति की विद्रूपताओं पर उनके नाटक गहरी चोट करते हैं। इस कारण से बादल सरकार के नाटक और वे स्वयं भी देश के रंगकर्मियों के चहेते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;रंग जगत बादल दा के स्वस्थ और सुखी जीवन का आकांक्षी है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बादल सरकार के प्रसिद्ध नाटक-&lt;/strong&gt;एवम् इंद्रजीत, अंत नहीं, बासी खबर, बाकी इतिहास, पगला घोड़ा, स्पार्टाकस, प्रस्ताव, जुलूस, भोमा, साल्यूशन एक्स, बारोपिशीमा, सारी रात, बड़ी बुआ जी, कवि कहानी।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;(इस आलेख के लेखक हिमांशु राय हैं। वे मासिक इप्टा वार्ता के संपादक हैं। उनका ब्लाग &lt;a href="http://iptavartahindi.blogspot.com/"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;इप्टावार्ता हिंदी &lt;/span&gt;&lt;/a&gt;हाल ही में शुरू हुआ है। )&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-6476671868488898595?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/6476671868488898595/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=6476671868488898595' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/6476671868488898595'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/6476671868488898595'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2009/04/blog-post_21.html' title='प्रतिरोध को थिएटर का माध्यम बनाने वाले रंगकर्मी बादल सरकार'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/Se4Fr8cAnRI/AAAAAAAAAFE/pSI0gW0J-R8/s72-c/badal.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-3811142112843883210</id><published>2009-04-19T23:15:00.001+05:30</published><updated>2009-04-21T16:46:05.044+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रंगकर्म'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नाटक'/><title type='text'>इप्टावार्ता हिंदी की शुरूआत</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;आज से जबलपुर की भारतीय जन नाट्य संघ (इंडियन पीपुल्स थिएटर &lt;span class=""&gt;एसोसिएशन&lt;/span&gt;-इप्टा) की प्रतिनिधि संस्था विवेचना के महासचिव हिमांशु राय ने &lt;a href="http://iptavartahindi.blogspot.com/"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;इप्टावार्ता हिंदी&lt;/span&gt; &lt;/a&gt;के माध्यम से एक नया ब्लाग शुरू किया है। इस ब्लाग में इप्टा वार्ता की सामग्री भी नाट्य प्रेमी और रंगमंच में रूचि रखने वाले लोग पढ़ सकेंगे। हिमांशु राय का ब्लाग जगत में स्वागत है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-3811142112843883210?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/3811142112843883210/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=3811142112843883210' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/3811142112843883210'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/3811142112843883210'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2009/04/blog-post_19.html' title='इप्टावार्ता हिंदी की शुरूआत'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-8383286371774041910</id><published>2009-04-16T18:53:00.001+05:30</published><updated>2009-04-16T19:55:59.190+05:30</updated><title type='text'>टैगोर गार्डन के मायने</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/SeczyhRe4kI/AAAAAAAAAE8/hSgiKIOlKn8/s1600-h/garden.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5325282027407073858" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 213px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/SeczyhRe4kI/AAAAAAAAAE8/hSgiKIOlKn8/s320/garden.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;जबलपुर में बड़े शहरों की तरह आम लोगों के लिए पार्क या उद्यानों की कमी हर समय महसूस होती रहती है। नगर निगम के भंवरताल और नेहरू उद्यान जैसे एक-दो पार्क जरूर हैं, लेकिन अव्यवस्थाओं के कारण यहां आम लोग आने से बिचकते हैं। ले-देकर केंटोमेंट बोर्ड का टैगोर उद्यान ही सुबह-शाम लोगों के लिए घूमने के लिए बचता है। साफ-सफाई और झूलों, फिसलनी, मेरी गो-राउंड के कारण टैगोर उद्यान बच्चों के साथ बुजुर्गों को सबसे अधिक आकर्षित करता है। मुझे याद है कि हम लोग बचपन में टैगोर उद्यान को किंग्स गार्डन के नाम से पहचानते थे। बाद के दिनों परम्परानुसार अंग्रेजों द्वारा स्थापित किए गए पार्कों, रेलवे स्टेशनों और हास्पिटलों का नामकरण भारतीय नामों से किया गया, इसलिए किंग्स गार्डन भी रवीन्द्रनाथ टैगोर उद्यान हो गया। लोगबाग इसे अब इसे टैगोर गार्डन ही कहना पसंद करते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;टैगोर गार्डन में सुबह घूमने वालों के लिए प्रवेश नि:शुल्क रखा गया है। दिन और शाम को यहां आने वालों को एक या दो रूपए प्रवेश शुल्क के रूप में देना पड़ते हैं। 12 वर्ष तक के बच्चों के लिए प्रवेश मुफ्त है। मैं सप्ताह के सातों दिन सुबह के समय टैगोर गार्डन में घूमने जाता हूं। अब टैगोर गार्डन नियमित रूप से जाना एक आदत बन गई है। सुबह घूमने वालों में बहुत से महिलाएं या पुरूष भी मेरी तरह यहां आदतन आने लगे हैं। इनमें से कई सदर क्षेत्र में स्थित स्कूलों में बच्चों को छोड़ने आते हैं और लगे हाथ टैगोर गार्डन के भी चक्कर लगा लेते हैं। मैं एक बात तो बताना भूल ही गया कि टैगोर गार्डन में दो वॉकिंग ट्रैक हैं। बड़ा 550 मीटर का दूसरा छोटा जिसमें मैं आज तक नहीं चला। लोग अपनी सुविधानुसार दोनों ट्रैकों में से एक में चलते हैं। कुछ लोग बारी-बारी से पहले बड़े ट्रैक में और फिर छोटे ट्रैक में या पहले छोटे ट्रैक में और बाद में बड़े ट्रैक में चलते हैं। अधिकांश घूमने वाले लोग एक-दूसरे को नाम से नहीं पहचानते, लेकिन लंबे समय से घूमने के कारण चेहरों से पहचान हो गई है और कभी-कभार हैलो, गुड मॉर्निंग या ओम नमो नारायण से औपचारिकताएं भी हो जाती है। घूमने वालों का उद्देश्य वजन कम करना या मोटापा घटाना है, लेकिन इसमें कुछ ही लोग सफल दिखते हैं। दो-तीन वर्षों के घूमने के बावजूद कम लोगों में फर्क नजर आया और वे इससे चिंतित भी हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;दरअसल ‘ओम नमो नारायण’ का उदघोष एक रिटायर्ड डिप्टी कलेक्टर का है। मुझे ऐसा लगता है कि जब उन्होंने टैगोर गार्डन में सुबह घूमना शुरू किया, तब भीड़-भाड़ में उनको नोटिस में नहीं लिया गया। तब उन्होंने आमतौर पर गार्डन में बाएं से दाएं घूमने के नियम के सिद्धांत के स्थान पर दाएं से बाएं घूमना शुरू किया और घूमने वाले युवाओं से ले कर बूढ़ों तक का ध्यान ‘ओम नमो नारायण’ के उदघोष से करने लगे। कुछ लोगों ने उनको रिस्पांस दिया तो कुछ ने उन्हें देख कर राह बदलना उचित समझा। मजा तो उस समय आता है, जब रिटायर्ड डिप्टी कलेक्टर एअर फोर्स और सेना में ऊंचे पदों पर पदस्थ अपने बेटों के साथ गार्डन में मॉर्निंग वाक करने आते हैं और उनको देख कर लोग जोर-जोर से ‘ओम नमो नारायण-ओम नमो नारायण’ का उद्घोष करते हैं और बेटों की शर्म में वे ऐसे लोगों से बचना चाहते हैं। बेटे भी समझ नहीं पाते कि उनके पिता जी को देख कर सभी लोग ‘ओम नमो नारायण-ओम नमो नारायण’ का उदघोष क्यों कर रहे हैं ?&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;टैगोर गार्डन में घूमने वालों ने अपनी-अपनी पसंद के विषय वालों के झुंड या समूह बना लिए हैं। इन समूहों में घूमने वाले लोग प्रापर्टी, पुरानी-नई कार बेचने, शेयर मार्केट, ट्रक के धंधे, देश-विदेश के टूर और उसमें भिजवाने की बात करते हैं। गार्डन में कभी-कभार प्रापर्टी की डील भी होने की खबर मैंने सुनी है। कुछ डाक्टर भी घूमने आते हैं। उनसे लोग पहचान भिड़ा कर गार्डन में ही फ्री में सलाह लेना चाहते हैं या क्लीनिक में जल्दी देखने का जुगाड़ करना चाहते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;पुरूषों के साथ महिलाएं भी समूह में घूमना पसंद करती हैं। पुरूषों की तुलना में महिलाएं धर्म या जातिगत आधार पर घूमना पसंद करती हैं। पहनावा तो आधुनिक है, लेकिन विचार अभी तक संकुचित हैं। कई बार महिलाओं की बात तो वही सास-बहू या जिठानी-देवरानी के पुराने झगड़े ही उनकी बातचीत के विषय रहते हैं। कुछ सीधा पल्ला लिए अधेड़ व बुजुर्ग महिलाओं को काफी समय से देख हूं, वे गार्डन के बीच में चबूतरों में रामदेव से प्रेरणा ले कर योग व आसन कर सुबह के समय का सदुपयोग कर रही हैं। गार्डन में पेड़ों के नीचे आसन लगा कर और बेंचों पर बैठ कर कुछ पुरूष कपालभाती, अलोम-विलोम की क्रिया करते भी दिखते हैं। उनकी क्रियाओं को देख कर कई बार मन में लगता है कि ये लोग वाकई में इन्हें सही ढंग से कर पा रहे हैं कि नहीं। मन में शंका होने पर मैंने रोज मिलने वाले एक व्यक्ति से इस संबंध में पूछा तो वे भी शंका में पड़ गए। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;गार्डन में सुबह साउंड बाक्स के माध्यम से भजन की धारा भी प्रवाहित होती रहती है। भजनों को सुनने के समय महसूस होता है कि क्या गार्डन में सिर्फ हिंदु ही घूमने आते हैं, क्योंकि सभी भजन हिंदु धर्म से संबंधित रहते हैं। वैसे उनमें आध्यात्मिक भाव रहता है, इसलिए उन्हें सर्वग्राह्य माना जा सकता है। गार्डन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की एक शाखा भी लगती है। शाखा में पहले ज्यादा संख्या दिखती थी, लेकिन अब काफी कम लोग इसमें आते हैं। ये लोग चुपचाप अपनी नियमित कार्यक्रम के साथ एक-डेढ़ घंटे गार्डन में रहते हैं। कभी-कभी बच्चों के लिए कबड्डी और मनोरंजक खेलों का आयोजन कर आरएसएस वाले उन्हें आकर्षित करने का प्रयास भी करते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;गार्डन में बिजनेस या आध्यात्मिक प्रमोशन के तहत् योग व स्वास्थ्य शिविर भी आयोजित किए जाते हैं। इन शिविरों की खास बात यह देखी गई है कि इनमें पांच-सात दिन तक भाग लेने के पश्चात् लोग दूसरों को इस प्रकार योग व स्वास्थ्य की सलाह देने लगते हैं, जैसे उनकी विषय में विशेषज्ञता हो। कुछ दिन पहले ही देश और विदेश में आध्यात्म की अलख जगाने वाले एक अंतरराष्ट्रीय संगठन ने टैगोर गार्डन में एक योग-स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया। शिविर के प्रतिभागियों को संबोधित करने के लिए डीजल जनरेटर की व्यवस्था की गई, जिससे कि शिविर में शामिल होने वालों के साथ-साथ गार्डन में घूमने वाले भी लाउड स्पीकर में बहिन जी का प्रवचन सुन सकें। गार्डन में प्रविष्ट होते ही लोगों को डीजल जनरेटर के धुएं से रूबरू होना पड़ा। शिविर में उस दिन पर्यावरण संरक्षण पर लोगों को जन-जाग्रत किया जा रहा था। शिविर की व्यवस्था संभालने वाले एक भ्राता से जब जनरेटर के धुएं और प्रदूषण की ओर ध्यान दिलाया गया, तब उन्होंने मासूमियत से उत्तर दिया -"आप लोग बात तो सही कर रहे हैं, लेकिन मैं क्या कर सकता हूं ?" सप्ताह भर तक चलने वाले शिविर की बातें मैंने भी घूमते हुए ध्यान से सुनी। बातों का निचोड़ था- योग,स्वास्थ्य, आध्यात्म और देशभक्ति। शिविर के बीच में रोज मनोज कुमार की फिल्म के देशभक्ति गीत भी सुनवाए गए और लोगों ने ताली बजा कर उनको पूरी तन्मयता के साथ गाया भी। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;गार्डन में लगे हुए झूलों, फिसलनी और मेरी गो-राउंड में बच्चे तो नहीं खेल पाते, अलबत्ता किशोर विशेषकर महिलाएं उन पर अधिक समय तक काबिज रहती हैं। बेचारे बच्चे काफी समय तक इंतजार करते हैं कि झूले कब खाली हों और वे कुछ समय तक उनमें झूल सकें। बच्चे एक या दो बार झूलते हैं कि बड़े लोग आ कर उन्हें उतार देते हैं। फिसलनियों में किशोर दौड़ कर चढ़ने की अजमाइश करते नजर आ जाते हैं। गार्डन जब खाली होने लगता है, तब मैंने कई बार देखा है कि कुछ बूढ़े महिला और पुरूष झूलों में बैठ कर झूलते हैं। उनको देख कर मुझे प्रेमचंद की एक कहानी में उल्लेखित इस वाक्य की याद आ जाती है कि बुढ़ापा बचपन का पुनरागमन होता है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;सुबह 9.00 बजे के पश्चात् गार्डन में टिकट लगना शुरू हो जाती है। 9 बजे से शाम के समय तक धुधंलके तक युवा लड़के-लड़कियों का यहां जमघट लग जाता है। गार्डन में रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर का एक अध्ययन केन्द्र भी है। इस अध्ययन केन्द्र की स्थापना का उद्देश्य विद्यार्थियों को गार्डन के सुरम्य वातावरण में अध्ययन की सुविधा प्रदान करना है। अध्ययन केन्द्र का विद्यार्थी कितना लाभ उठा रहे हैं, इसकी मुझे जानकारी नहीं, लेकिन गार्डन के सामने की सड़क से निकलने पर यह जरूर दिख जाता है कि युवा जोड़े पेड़ो और झाड़ियों के झुरमुटे में अपना समय कैसे काट रहे हैं। सुबह घूमने पर पेड़ों के बीच में चिप्स के पैकेट व कोल्ड ड्रिंक्स की खाली बोतलें इस बात की गवाह होती हैं कि यहां समय बिताने वाले युवा जोड़े पूरे इंतजाम के साथ आते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;शाम के समय लोग सपरिवार बच्चों के साथ यहां घूमने आते हैं। बच्चों के मनोरंजनार्थ गार्डन में दो ट्रेनों की व्यवस्था केंटोमेंट बोर्ड द्वारा की गई है। एक-दो वर्ष पूर्व तक गार्डन में प्रत्येक माह के पहले रविवार की शाम को सेना का बैंड दो घंटे का कार्यक्रम प्रस्तुत करता था। बारिश में व्यवधान आने के बाद यह कार्यक्रम ही बंद हो गया। इस पर किसी का ध्यान नहीं गया। न ही केंटोमेंट बोर्ड का और न ही मीडिया का। इसका लाभ सुरा प्रेमी निश्चित रूप से उठा रहे हैं। सुबह घूमने वालों को कई बार शराब और सोडे की खाली बोतलें यह बताने के लिए काफी है कि गार्डन में यह सब भी होता है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;गार्डन के बंद होने का समय रात्रि 9.00 बजे नियत किया गया है। यह 9.00 बजे आम लोगों के लिए बंद हो जाता है, लेकिन मुझे लगता है कि जिन्हें इसके अंदर जाना है, वे ऊंची दीवारों और कांटा लगी ग्रिल को भी लांघ कर यहां पहुंच जाते हैं और उन कामों में लग जाते हैं, जिसके लिए उन्होंने इतनी मेहनत की है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-8383286371774041910?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/8383286371774041910/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=8383286371774041910' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/8383286371774041910'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/8383286371774041910'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2009/04/blog-post_16.html' title='टैगोर गार्डन के मायने'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/SeczyhRe4kI/AAAAAAAAAE8/hSgiKIOlKn8/s72-c/garden.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-713832299833549616</id><published>2009-04-10T17:42:00.000+05:30</published><updated>2009-04-10T19:15:20.406+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दर्शनील सफारी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आमिर खान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रिजल्ट'/><title type='text'>तारे जमीं पर और आमिर खान का भला हो!</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/Sd9JYrjAP-I/AAAAAAAAAE0/i6H20UDEngI/s1600-h/A&amp;amp;D.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5323053972930445282" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 127px; CURSOR: hand; HEIGHT: 97px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/Sd9JYrjAP-I/AAAAAAAAAE0/i6H20UDEngI/s320/A%26D.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;भारतीय समाज में हिंदी फिल्मों का कितना व्यापक प्रभाव है, इसकी बानगी पिछले दिनों उस समय देखने को मिली, जब बच्चों के स्कूल के रिजल्ट आए। भला हो आमिर खान का और उनकी फिल्म ‘तारे जमीं पर’ का कि उनकी फिल्म से प्रभावित हो कर अभिभावकों ने खराब रिजल्ट लाने के बावजूद बच्चों को न तो डांटा और न ही पीटा। एक ओर वे अभिभावक थे, जो कि बच्चों के अच्छे रिजल्ट से गौरवान्वित थे, तो वहीं कुछ ऐसे अभिभावक भी मिले जो गर्वपूर्वक बता रहे थे कि उनका बेटा परीक्षा में कुछ लिख कर नहीं आया। बिल्कुल ‘तारे जमीं पर’ के ईशान अवस्थी की तरह। ऐसे अभिभावकों को अपने बच्चे में ईशान अवस्थी की भूमिका निभाने वाले दर्शनील सफारी की छवि उभर रही थी।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;अमीर लेकिन कम पढ़े-लिखे एक अभिभावक ने तो भौंएं ऊपर करते हुए कहा - ‘‘बेटे ने तो कापियों में सिर्फ आड़ी-टेढ़ी लाइनें ही खींच दीं, अपने आमिर खान की फिल्म जैसे। मेडम भी आश्चर्य कर रहीं थीं कि फिल्म की तरह कैसे हो गया।’’ यहां अभिभावक के साथ स्कूल की टीचर भी हतप्रभ थीं। मैंने पूछा कि बच्चे की रिजल्ट पर क्या प्रतिक्रिया थी ? अभिभावक ने गर्व से कहा-‘‘वह कह रहा था कि बिल्कुल ‘तारे पर जमीं’ जैसा हो गया न पापा।’’ &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;मुझे लगा कि काश हमारे बचपन में आमिर खान और ‘तारे जमीं पर’ दोनों ही होते तो रिजल्ट खासतौर से 30 अप्रैल के दिन धुकधुकी न होती। 27-28 अप्रैल से ही भगवान को सुमरने लगते थे। रिजल्ट अच्छा आने पर भी यहां-वहां घूम कर समय काटते हुए घर पहुंचते थे कि जितनी देर हो जाए उतना ही भला। घर पहुंच कर ‘‘किस-किस में कम नंबर आए हैं। गणित में तो तुम कमजोर हो ही।’’ जैसी बातें सुनने को तो मिलेंगी ही और हो सकता है एक-आध चांटा भी पड़ जाए। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;सातवीं कक्षा तक तो पिता जी की डांट और पिटाई का डर बना रहा, लेकिन रिजल्ट के कुछ दिन बाद ही उनका निधन हो गया। आठवीं कक्षा में नाना के घर आ गए। पढ़ाई-लिखाई क्या हो रही है, इसकी चिंता सबको थी, लेकिन पुराने परफार्मेंस के आधार पर सब लोग चिंतित थे। परीक्षा देते-देते दादा जी की तबियत बिगड़ गई और सबको लगा कि उनकी मृत्यु कभी भी हो सकती है। पोतों से मिलना उनकी अंतिम इच्छा थी। दूसरे कस्बे में जब उनसे मिलने के लिए हम लोग जिस दिन गए तो उसके अगले ही दिन विज्ञान का पर्चा था। परीक्षा की बात करने पर कहा गया-‘‘जाना तो पड़ेगा, देखा जाएगा।’’ दादा जी से अंतिम बार मिल कर दूसरी सुबह मुझे अकेले ही ट्रेन में बैठा दिया गया। तब मैं अपनी विज्ञान की एक पुस्तक के साथ था। रास्ते में कुछ लोगों को आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले अकेले लड़के को देख कर शक हुआ। उन्हें मैंने पूरा वृतांत सुनाया कि दादा जी मिल कर लौट रहा हूं न कि घर से भाग रहा हूं। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;नाना के घर वापस आ कर ट्रेन में जितनी देर विज्ञान पढ़ सका, उस आधार पर परीक्षा दे आया। घर वाले तो अच्छे नंबर, क्या पास होने तक की आशा में नहीं थे। मुझे याद है कि उस वर्ष आठवीं की बोर्ड परीक्षा का रिजल्ट मई की 15 तारीख को आया था। नाना जी ने डीएससी आफिस में फोन कर आठवीं कक्षा के रिजल्ट की पूछताछ की और एक कागज में नंबर लिखने लगे। सामने बैठ कर मैं उनके चेहरे के भावों को पढ़ने की कोशिश कर रहा था। कुछ ही क्षणों में उन्होंने फोन रख कर मुझे बधाई देते हुए कहा कि तुमने 78 प्रतिशत अंक पाए हैं। जब मैंने अच्छे नंबर पाए, उस समय मेरे पिताजी मेरे साथ न थे और न ही कोई पूछने वाला था कि मैंने किस-किस विषय पर कितने नंबर पाए और नंबर कम क्यों हैं, लेकिन जब मैं कागजों में नंबर देख रहा था, तब मुझे लग रहा था कि पिताजी का आशीर्वाद और नसीहतें जरूर मेरे साथ हैं।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-713832299833549616?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/713832299833549616/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=713832299833549616' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/713832299833549616'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/713832299833549616'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2009/04/blog-post_10.html' title='तारे जमीं पर और आमिर खान का भला हो!'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/Sd9JYrjAP-I/AAAAAAAAAE0/i6H20UDEngI/s72-c/A%26D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-6371229062066182666</id><published>2009-04-09T20:26:00.000+05:30</published><updated>2009-04-09T21:42:19.118+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वागार्थ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साधना सम्मान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारतीय भाषा परिषद'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ज्ञानरंजन'/><title type='text'>विख्यात साहित्यकार ज्ञानरंजन को भारतीय भाषा परिषद का प्रतिष्ठित साधना सम्मान</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;हिंदी के विख्यात साहित्यकार और पहल के संपादक &lt;strong&gt;&lt;a href="http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/"&gt;ज्ञानरंजन&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt; को हिंदी साहित्य में अमूल्य योगदान देने के लिए &lt;a href="http://bharatiyabhashaparishad.com/"&gt;&lt;strong&gt;भारतीय भाषा परिषद&lt;/strong&gt; &lt;/a&gt;ने वर्ष 2008 के साधना सम्मान से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। साधना सम्मान के रूप में ज्ञानरंजन को कोलकाता में 18 अप्रैल को एक भव्य समारोह में 51,000 रूपए की सम्मान निधि और स्मृति चिन्ह प्रदान किया जाएगा। ज्ञानरंजन के अलावा तमिल साहित्य के लिए &lt;strong&gt;वेरामुत्थु&lt;/strong&gt;, उड़िया साहित्य के लिए &lt;strong&gt;रामचंद्र बेहरा&lt;/strong&gt; और पंजाबी साहित्य के लिए &lt;strong&gt;डा. महेन्द्र कौर गिल&lt;/strong&gt; को भी सम्मानित किया जाएगा। &lt;strong&gt;सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी&lt;/strong&gt; चारों साहित्यकारों को सम्मानित करेंगी। उल्लेखनीय है कि भारतीय भाषा परिषद एक प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था है और पिछले 35 वर्षों से भारतीय भाषा के साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में कार्यरत है। परिषद द्वारा हिंदी में मासिक &lt;span class=""&gt;पत्रिका &lt;/span&gt;&lt;a href="http://bharatiyabhashaparishad.com/"&gt;&lt;strong&gt;वागार्थ&lt;/strong&gt; &lt;/a&gt;का प्रकाशन भी लंबे समय से किया जा रहा है। परिषद ने विभिन्न भाषाओं के चार युवा साहित्यकारों को भी युवा पुरस्कार से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। &lt;strong&gt;निर्मला पुतुल&lt;/strong&gt; को संथाली भाषा के लिए&lt;strong&gt;, अल्पना मिश्रा&lt;/strong&gt; को हिंदी&lt;strong&gt;, एस. श्रीराम&lt;/strong&gt; को तमिल और &lt;strong&gt;मधुमित बावा&lt;/strong&gt; को पंजाबी भाषा के साहित्य में योगदान देने के लिए युवा पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-6371229062066182666?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/6371229062066182666/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=6371229062066182666' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/6371229062066182666'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/6371229062066182666'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='विख्यात साहित्यकार ज्ञानरंजन को भारतीय भाषा परिषद का प्रतिष्ठित साधना सम्मान'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-9167680415487739243</id><published>2008-12-09T08:51:00.000+05:30</published><updated>2008-12-09T08:52:32.019+05:30</updated><title type='text'>विचारोत्तेजक प्रस्तुतियों के कारण याद रखा जाएगा विवेचना नाट्य समारोह</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;जबलपुर में विवेचना 15 वां राष्ट्रीय नाट्य समारोह छह नाटकों के मंचन के साथ ही कुछ समकालीन सवालों के साथ समाप्त हो गया। इस बार के नाट्य समारोह में मुंबई की अरण्य ने शक्कर के पांच दाने व इलहाम, नई दिल्ली की अस्मिता ने अनसुनी व आपरेशन थ्री स्टार और भोपाल के नट बुंदेले ने चारपाई और विवेचना ने सूपना का सपना नाटक की प्रस्तुति की। पिछले 15 वर्षों में विवेचना का प्रत्येक नाट्य समारोह किसी न किसी विशेषता के कारण पहचाना जाता रहा है। कभी संगीतमयी प्रस्तुति के कारण, तो कभी महिला संबंधी मुद्दों के कारण और कभी मुंबई के हास्य नाटकों के मंचन के कारण। इस बार के नाट्य समारोह में गंभीर, दुखद और समकालीन विषयों पर आधारित नाटकों के मंचन से इसे विचारोत्तेजक प्रस्तुतियों के कारण याद रखा जाएगा।&lt;br /&gt;नाट्य समारोह के छह नाटकों को देखने दर्शक तो खूब आए, लेकिन कुछ प्रस्तुतियां ऐसी रहीं जो उन्हें प्रभावित नहीं कर पाईं। इसका सबसे बड़ा कारण नाटकों के दार्शनिक विषय थे। इनमें मुंबई की अरण्य रंग संस्था के शक्कर के पांच दाने और इलहाम जैसे नाटक थे। इन प्रस्तुतियों को देख कर महसूस हुआ कि दर्शकों को यदि रंगमंच से जोड़ना है, तो उनकी पसंद को भी ध्यान में रखा जाए। इस संदर्भ में अरण्य के निर्देशक मानव कौल का कहना था कि वे दर्शकों की चिंता नहीं करते हैं। यह भी सच्चाई है कि वे चिंता नहीं करेंगे तो उनकी प्रस्तुतियों से धीरे- धीरे दर्शक दूर होते जाएंगे। वैसे मानव कौल की दोनों प्रस्तुतियों शक्कर के पांच दाने और इलहाम में विषय का दोहराव भी दिखा। उनके विषय व दर्शन जटिल थे, इसलिए दर्शक उसे समझ नहीं पाए। इस संबंध में विवेचना के आयोजकों का कहना है कि वे रिपोर्ट के आधार पर रंग संस्थाओं को नाट्य प्रस्तुति के कारण आमंत्रित करते हैं। कुछ प्रस्तुतियां महानगरों के दर्शकों को प्रभावित करती हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि वे जबलपुर जैसे शहर के नाट्य प्रेमियों को भी पसंद आए।&lt;br /&gt;नई दिल्ली की अस्मिता और उसके निर्देशक अरविंद गौड़ की जबलपुर के रंगमंच दर्शकों में प्रतिष्ठा है। इसी प्रतिष्ठा के कारण उन्हें यहां बार-बार आमंत्रित किया जाता है। विवेचना नाट्य समारोह में वे छठी बार आमंत्रित किए गए। उनके नाटक अपने समकालीन संदर्भ और बेहतर प्रस्तुतियों के कारण हर समय पसंद किए जाते हैं और उन्हें लंबे समय तक याद भी किया जाता है। इस बार के नाट्य समारोह में सामाजिक व राजनैतिक विषयों पर आधारित उनकी दोनों प्रस्तुतियों अनसुनी और आपरेशन थ्री स्टार ने दर्शकों को गहराई तक प्रभावित किया। नाटकों की समाप्ति के पश्चात् अरविंद गौड़ ने दर्शकों से सीधा संवाद कर प्रस्तुतियों के संदेश को सम्प्रेषित करने का प्रयास किया। इससे दर्शक काफी हद तक संतुष्ट भी हुए।&lt;br /&gt;भोपाल के नट बुंदेले ने अलखनंदन के निर्देशन में चारपाई को प्रस्तुत किया। इस प्रस्तुति की भी दर्शकों में मिली-जुली प्रतिक्रिया रही। शक्कर के पांच दाने और इलहाम की दार्शनिकता के पश्चात् चारपाई में संयुक्त परिवार की संवादहीनता और आम भारतीय निम्नवर्गीय परिवार की समस्या ने दर्शकों को उद्वेलित तो किया, लेकिन मनोरंजन तत्व की कमी से वह व्यथित भी हुआ।&lt;br /&gt;नाट्य समारोह की अंतिम नाट्य प्रस्तुति मेजबान विवेचना की सूपना का सपना रही। शाहिद अनवर लिखित इस नाटक को बसंत काशीकर ने निर्देशित किया। गंभीर विषय में मनोरंजन के तत्वों (लोक नाट्य) को शामिल कर उन्होंने दर्शकों को बांधने का पूरा प्रयास किया। यहां उन्हें ध्यान देना होगा कि उनकी सीमा जबलपुर नहीं है, बल्कि यहां से बाहर जब वे अपनी प्रस्तुति को ले कर बाहर जाएंगे, तब उसका विश्लेषण दर्शक अपने स्तर से करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-9167680415487739243?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/9167680415487739243/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=9167680415487739243' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/9167680415487739243'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/9167680415487739243'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='विचारोत्तेजक प्रस्तुतियों के कारण याद रखा जाएगा विवेचना नाट्य समारोह'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-1272247556680966748</id><published>2008-12-09T08:22:00.000+05:30</published><updated>2008-12-09T08:49:50.250+05:30</updated><title type='text'>जबलपुर की पहचान ‘पहल’ को 35 वर्षों के पश्चात् बंद करने का निर्णय</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/ST3h0dlqEvI/AAAAAAAAADo/4vg1qnmNe-M/s1600-h/d1219681.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5277622629760111346" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 292px; CURSOR: hand; HEIGHT: 270px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/ST3h0dlqEvI/AAAAAAAAADo/4vg1qnmNe-M/s320/d1219681.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;हिंदी साहित्य जगत की अनिवार्य पत्रिका के रूप में मान्य पहल को उसके संपादक ज्ञानरंजन ने 35 वर्ष के लगातार प्रकाशन के पश्चात् बंद करने का निर्णय लिया है। पहल का 90 वां अंक इसका आखिरी अंक होगा। पहल जबलपुर की एक पहचान भी थी। पूरे देश में लोग भेड़ाघाट के साथ जबलपुर को पहल के कारण भी पहचानते थे। जबलपुर जैसे मध्यम शहर से पहल जैसी अंतरराष्ट्रीय पत्रिका निकली और इसने विश्व स्तर को प्राप्त किया। ज्ञानरंजन ने पहल को किसी आर्थिक दबाव या रचनात्मक संकट के कारण बंद नहीं किया है, बल्कि उनका कहना है&lt;strong&gt;-‘‘पत्रिका का ग्राफ निरंतर बढ़ना चाहिए। वह यदि सुन्दर होने के पश्चात् भी यदि रूका हुआ है तो ऐसे समय निर्णायक मोड़ भी जरूरी है।’’&lt;/strong&gt; उन्होंने स्पष्ट करते हुए कहा कि यथास्थिति को तोड़ना आवश्यक हो गया है। नई कल्पना, नया स्वप्न, तकनीक, आर्थिक परिदृश्य, साहित्य, भाषा के समग्र परिवर्तन को देखते हुए इस प्रकार का निर्णय लेना जरूरी हो गया था। वे कहते हैं कि इस अंधेरे समय में न्यू राइटिंग को पहचानना जरूरी हो गया है, लेकिन ऐसा नहीं करना भी बेईमानी होगी। ज्ञानरंजन कहते हैं कि विकास की चुनौती और शीर्ष पर पहल को बंद करने का निर्णय एक दुखद सच्चाई है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार का निर्णय लेना भी एक कठिन कार्य है।&lt;br /&gt;ज्ञानरंजन की बातचीत में आत्म स्वीकारोक्ति थी कि थकान से व्यक्ति क्रांतिकारी नहीं रह पाता है। वे पिछले पांच-छह महीने से इस पर विचार कर रहे थे। ज्ञानरंजन अब खाली समय में देश के महत्वपूर्ण युवा लेखकों को मार्गदर्शन देंगे और स्वयं के लेखन पर ध्यान केंद्रित करेंगे। साहित्य प्रेमियों को यह याद होगा कि उन्होंने अपने शिखर में ही कहानी लिखना बंद किया और इसी प्रकार पहल सम्मान को भी उन्होंने चरमोत्कर्ष पर बंद करने का निर्णय लिया।&lt;br /&gt;ज्ञानरंजन के वर्षों के साथी और प्रसिद्ध कवि मलय की पहल को बंद करने पर टिप्पणी थी&lt;strong&gt;-‘‘दुश्मन भी होंगे तो वे पहल को बंद होने पर पश्चाताप करेंगे और दुख व्यक्त करेंगे।’’&lt;/strong&gt; मलय ने कहा कि यह सब जानते हैं कि ज्ञानरंजन के लिए पहल ही सब कुछ है, लेकिन यह हम लोग की मजबूरी है कि हम उनके निर्णय को बदल नहीं सकते। उन्होंने कहा कि पहल को निकालने के लिए देश भर के साहित्यकारों और बड़े प्रकाशन समूहों ने आगे आ कर अपने प्रस्ताव दिए हैं, लेकिन पहल निकले तो ज्ञानरंजन ही निकालें।&lt;br /&gt;पहल का प्रकाशन 1973 में शुरू हुआ था। पहल के प्रकाशन के कुछ समय पश्चात् ही देश में आपात्काल लागू हो गया, लेकिन सेंसरशिप, हस्तक्षेप और दमन से संघर्ष करने के बावजूद पहल बंद नहीं हुई और सतत् निकलती रही। उल्लेखनीय है कि उस समय कई साहित्यिक पत्रिकाएं बंद हो गईं थीं।&lt;br /&gt;हिंदी साहित्य के आठवें दशक के जितने भी महत्वपूर्ण लेखक हैं, वे पहल के गलियारे से ही आए हैं। इनमें राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, वीरेन्द्र डंगवाल, लीलाधर जगूड़ी, ज्ञानेन्द्रपति जैसे साहित्यकार महत्वपूर्ण हैं। 35 वर्षों में पहल में हिंदी, भारतीय भाषाओं और विश्व साहित्य के लगभग 40 हजार से अधिक पृष्ठ प्रकाशित हुए हैं। जर्मन, रूसी, चीनी, अंग्रेजी, फ्रेंच और स्पेनिश भाषाओं का श्रेष्ठतम साहित्य पहल में ही उपलब्ध है। पहल के पंजाबी, मराठी, उर्दू, कश्मीरी साहित्य के प्रतिनिधि विशेषांक साहित्य प्रेमियों को आज तक याद हैं और लोग इन्हें आज भी खोजते हैं। शीर्ष आलोचक रामविलास शर्मा से ले कर आज की बिल्कुल युवा पीढ़ी का कोई भी ऐसा महत्वपूर्ण लेखक नहीं है, जो पहल में नहीं छपा। इसका प्रसार देश-देशांतर तक था। पूरे देश में पहल से एक बड़ा परिवार बन गया था। जर्मनी में विश्वविद्यालयों में पहल को सीडी फार्म में रखा गया है।&lt;br /&gt;ज्ञानरंजन के पहल बंद करने के निर्णय से पूरे देश के साहित्यिक क्षेत्र में सन्नाटा खिंच गया और दुख की लहर फैल गई। जनमत यह है कि पहल निरंतर निकलते रहे। देश भर से लोगों खासतौर से युवा लेखक ज्ञानरंजन को फोन कर निर्णय बदलने के लिए कह रहे हैं। लोग चाहते हैं कि पहल अर्धवार्षिक या वार्षिक रूप में निकले। प्रसिद्ध कवि अशोक वाजपेयी ने अपने एक कालम में लिखा है-ज्ञानरंजन की गणना निश्चय ही इस दौरान हिंदी के श्रेष्ठ और प्रेरक संपादकों की जाएगी। सच तो यह है कि नहीं पता कि भारत की किस और भाषा में पहल जैसी प्रतिबद्ध और प्रभावशाली पत्रकिा निकलती है। इसलिए उसका समापन न सिर्फ हिंदी परिदृश्य, बल्कि समूचे भारतीय परिदृश्य को विपन्न करेगा। ज्ञानरंजन को भी यह आपत्ति नहीं है कि कोई अन्य साहित्यकार पहल निकाले। वे कहते हैं कि विचार-विमर्श कर भविष्य में कोई निर्णय लेंगे। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-1272247556680966748?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/1272247556680966748/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=1272247556680966748' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/1272247556680966748'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/1272247556680966748'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2008/12/35.html' title='जबलपुर की पहचान ‘पहल’ को 35 वर्षों के पश्चात् बंद करने का निर्णय'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/ST3h0dlqEvI/AAAAAAAAADo/4vg1qnmNe-M/s72-c/d1219681.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-8937585689865562515</id><published>2008-08-28T08:28:00.000+05:30</published><updated>2008-08-28T09:14:36.870+05:30</updated><title type='text'>व्यंग्य को विधा नहीं स्पिरिट मानते थे हरिशंकर परसाई</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/SLYWEj4K8pI/AAAAAAAAADQ/QzLXKmqEqEw/s1600-h/harishanker_parsai_web[1].jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5239399484098278034" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/SLYWEj4K8pI/AAAAAAAAADQ/QzLXKmqEqEw/s320/harishanker_parsai_web%5B1%5D.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;(22 अगस्त को प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई का जन्मदिवस था। इस दिन जबलपुर की संस्थाओं विवेचना, प्रगतिशील लेखक संघ, कहानी मंच और साहित्य सहचर ने परसाई को याद किया। एक कार्यक्रम में कवि मलय और कहानीकार राजेन्द्र दानी ने परसाई और उनके रचनाकर्म को विश्लेषित किया। राजेन्द्र दानी ने इस अवसर पर एक लिखित वक्तव्य दिया। यह वक्तव्य आज के संदर्भ काफी महत्वपूर्ण &lt;span class=""&gt;है। राजेन्द्र दानी के इस&lt;br /&gt;वक्तव्य को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।&lt;/span&gt;) &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;आज स्वर्गीय हरिशंकर &lt;span class=""&gt;परसाई&lt;/span&gt; को इस उपलक्ष्य में याद करने का अर्थ बेहद व्यापक है और अत्यधिक प्रासंगिक भी। परसाई जी अपने समय में जिन व्यापक मानव मूल्यों की पक्षधरता के लिए संघर्ष करते रहे, इस दौर में उनका जितना विघटन देखने मिल रहा है, संभवत: इसके पहले नहीं था। इस अभूतपूर्व समय में उनके रचनाकर्म की प्रासंगिकता को जिस अर्थ में लिया जाना चाहिए, उसका दायित्व निर्वहन हमारे समय के साहित्य अध्येता नहीं कर रहे हैं। यह एक बड़े अफसोस की बात है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;यह इसलिए कि उनके अपने संघर्षों को लेकर उनके अपने विश्वास थे। जो उनके अपने जीवन के आगे बढ़ते-बढ़ते दृढ़ से दृढ़तर होते चले गए। इन विश्वासों को उन्होंने न केवल अपनी रचनाशीलता से, बल्कि समय-समय पर अपने उदबोधनों में भी प्रकट किया। जिससे उनकी विचारधारा का भी संज्ञान होता है और संघर्षों के प्रति उनकी दृढ़ता का भी।&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;"सितम-ए-राह पर रखते चलो सरों के चिराग&lt;br /&gt;जब तलक कि सितम की सियाह रात चले।"&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;जिन रचनाकारों की या किसी प्रबुद्ध नागरिक की यदि इस घटाटोप समय में संवेदना और विवेक खंडित नहीं हैं तो वह अच्छी तरह जानता है कि इस सियाह रात का अभी अंत नहीं हुआ है। अपनी दुनिया को पाने के लिए मीलों दूर जाना है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;परसाई जी इस राह पर आजीवन चलते रहे। किशोरावस्था से ही उनके जीवन में दुखों ने अपना घेरा इस तरह बनाया कि वे लंबे समय तक उससे लड़ते रहे। संभवतः आयु की उस सक्रांति के वक्त ही उनके अंदर एक बड़े रचनाकार ने जन्म लिया होगा। उनकी प्रारंभिक रचनाओं के प्रति जो विचार स्वयं उन्होंने प्रकट किए थे, उससे जाहिर होता है कि वे बेहद आत्मकेन्द्रित थीं और निजी दुखों का उदघाटन करतीं थी। अन्ततः निजी दुखों पर किस सीमा तक लिखा जा सकता है ? आयु और अनुभवों के साथ दृष्टि और विचार का परिमार्जन ही आखिरकार एक दायित्वबोध से लैस रचनाकार को पूर्णतः प्रदान करता है। वे जीवनानुभवों को अपना ईश्वर मानते थे। और इस ईश्वर के सहारे वे स्वयं के दुखों से मुक्त हो सके, अपनी संवेदना को व्यापक विस्तार दे सके। यह अवसर उनकी स्मृति को किसी पर्व की तरह मनाने के लिए नहीं है, बल्कि उनकी रचनात्मकता को समझने और उसके पुनर्पाठ के लिए है। हमारे समय की आलोचना और मीमांसा उससे अक्सर कतराती रही है। उसका यह सदा विश्वास रहा है कि एक गंभीर लेखक लोकप्रिय नहीं हो सकता। इस रूढ़ी के विरूद्ध परसाई जी का लेखन लोगों को हमेशा आकर्षित करता रहा, उनकी लोकप्रियता में कभी कमी नहीं आई।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;यह शोध का विषय हो सकता है कि परसाई जी ने जीवन के अनुसंधान में किस तरह ऍसी भाषा अर्जित की होगी, जिसकी सम्प्रेषणीयता ने उन्हें सर्वग्राही बनाया और चरम लोकप्रियता दिलाई। अपनी आत्ममुक्तता के बाद उन्होंने कहा था कि-" मैंने जीवन की विसंगतियों को बहुत करीब से देखा। अन्याय, पाखंड, छल, दोमुहापन, अवसरवाद, असामंजस्य आदि जीवन की वे विसंगतियां जिससे अधिसंख्य लोग दुखी हैं। मैंने अपने अनुभवों का दायरा बढ़ाया। अनुभव बेकार होता है यदि उसका अर्थ न खोजा जाए और तार्किक निष्कर्ष न निकाला जाए। यह कठिन कर्म है। पर इसके बिना अनुभव केवल घटना रह जाता है-वह रचनात्मक चेतना का अंग नहीं बन पाता। कठिन कर्म मैंने इसलिए कहा कि दुनिया की हालत पर चेतनावान व्यक्ति दुखी होता है।&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;इसके बाद वे कबीर को उदधृत करते हैं-&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सुखिया सब संसार है खावै और सोवै,&lt;br /&gt;दुखिया दास कबीर है, जागै और रोवै।&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;कबीर की इन पंक्तियों की सोद्देश्यता के जीने का साहस तब भी बहुत कम लोगों में था, जब परसाई जी जीवित थे। वे दुखों के साथ ताजिंदगी कबीर की इन पंक्तियों में निहित जागरण के लिए सक्रिय रहे। उनका रचनाकर्म इस बात का ठोस साक्ष्य है कि रोजमर्रा की छोटी-सी-छोटी घटना में निहित अर्थों को उन्होंने जिस सरलतम शिल्प से व्यक्त किया, वह अभूतपूर्व है। घटनाओं को सामयिक-राजनैतिक परिस्थितियों से जोड़ कर उनके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को जिस तरह विश्लेषित किया, वह हमारी सृजनात्मक परम्परा में बहुत विरल है। "ठिठुरता हुआ गणतंत्र" और "वैष्णव की फिसलन जैसे उनके व्यंग्य इसके सटीक उदाहरण हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;व्यंग्य, जिसे विधा माने या स्पिरिट को लेकर हमारी भारतीय मनीषा में लम्बे समय तक बहसें चलती रहीं और उनका अंत आज तक नहीं हुआ है, आज तक मतभेद उभर कर कभी भी सामने आ जाते हैं। पर परसाई जी का मानना था कि सही व्यंग्य व्यापक जीवन परिवेश को समझने से आता है, व्यापक सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक परिवेश की विसंगति, मिथ्याचार, असामंजस्य, अन्याय आदि की तह में जाना, कारणों का विश्लेषण करना, उन्हें सही परिप्रेक्ष्य में देखना-इससे सही व्यंग्य बनता है। जरूरी नहीं कि व्यंग्य में हंसी आए। यदि व्यंग्य चेतना को झकझोर देता है, विद्रूप को खड़ा कर देता है, आत्मसाक्षात्कार कराता है, सोचने को बाध्य करता है, व्यवस्था की सड़ांध को इंगित करता है और सबसे महत्वपूर्ण बात, यदि वह परिवर्तन के लिए प्रेरित करता है, तो वह सफल व्यंग्य है। जितना विस्तृत परिवेश होगा, जितनी गहरी विसंगति होगी और जितना तिलमिया देने वाली अभिव्यक्ति होगी, व्यंग्य उतना सार्थक होगा।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि परसाई जी व्यंग्य को एक स्पिरिट मानते थे, विधा नहीं। वे कहते थे- व्यंग्य विधा नहीं है- जैसे कहानी, नाटक और उपन्यास। व्यंग्य का कोई निश्चित स्ट्रक्चर नहीं है। वह निबंध, कहानी, नाटक-सब विधाओं में लिखा जाता है। व्यंग्य लेखक को यह शिकायत नहीं होना चाहिए कि विश्वविद्यालय व्यंग्य को विधा क्यों मानते। उन्हें संतोष करना चाहिए व्यंग्य का दायरा इतना विस्तृत है कि वह सब विधाओं को ओढ़ लेता है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;परसाई जी ने इसी सार्थक समझ और विश्वास के साथ अपना रचनाकर्म किया। उन्होंने लगभग सारी विधाओं में लिखा।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;हमारे देश के स्वातंत्रोत्तर काल के इस सबसे बड़े व्यंग्यकार के हम सब सहचर रहे। यह हमारे लिए गौरव का विषय है। परसाई जी सिर्फ हमारे शहर जबलपुर के लिए नहीं बल्कि इस देश के लिए गौरव रहे।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;यहां यह छोटी सी टिप्पणी उनके साहित्यिक अवदान को समझने लेने या उसे विश्लेषित कर लेने के लिए नहीं है, बल्कि उनकी जयंती के इस अवसर पर उन्हें शिद्दत से याद करने और उनके व्यक्तित्व और उनकी सृजनात्मकता से अनुप्रेरित होने के लिए है। मैं उनको प्रणाम करता हूं, उनकी सृजनात्मकता को प्रणाम करता हूं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-8937585689865562515?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/8937585689865562515/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=8937585689865562515' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/8937585689865562515'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/8937585689865562515'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2008/08/blog-post_27.html' title='व्यंग्य को विधा नहीं स्पिरिट मानते थे हरिशंकर परसाई'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/SLYWEj4K8pI/AAAAAAAAADQ/QzLXKmqEqEw/s72-c/harishanker_parsai_web%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-9010653676937968667</id><published>2008-08-01T22:45:00.000+05:30</published><updated>2008-08-01T23:03:38.830+05:30</updated><title type='text'>चंद सिक्कों की खातिर.......जान जोखिम में डाल दिन भर नर्मदा के घाट पर घूमते हैं मासूम</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/SJNHH59RH2I/AAAAAAAAADI/Hf_OruV3rLI/s1600-h/DSC00151.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5229601793449729890" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/SJNHH59RH2I/AAAAAAAAADI/Hf_OruV3rLI/s320/DSC00151.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/SJNGKe-22XI/AAAAAAAAADA/hYahu6rP7cw/s1600-h/DSC00148.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5229600738236619122" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/SJNGKe-22XI/AAAAAAAAADA/hYahu6rP7cw/s320/DSC00148.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;# नितिन पटेल&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;वह उम्र जिसमें बच्चे मां-बाप की अंगुली थामकर चलना सीखते हैं, उस उम्र में कुछ मासूम चंद सिक्कों की खातिर दिन भर जबलपुर के तिलवाराघाट की खाक छानते रहते हैं। तिलवाराघाट नर्मदा नदी के एक प्रसिद्ध घाट के रूप में पहचाना जाता है। अपनी जान जोखिम में डालकर ये बच्चे रस्सी में चुम्बक बांधकर उन सिक्कों की तलाश में अपना बचपन गंवा रहे हैं, जिन्हें श्रद्धालु आस्था में घाट में फेकते हैं। मासूमों को इस उम्र में कमाई के लिए भेज देने वाले अभिभावकों के साथ लगता है प्रशासन और पुलिस को भी कोई सरोकार नहीं है। बच्चे स्वयं बताते हैं कि आज तक उन्हें इस कार्य करने से किसी ने नहीं रोका। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कभी-कभी कुछ नहीं मिलता&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;तिलवाराघाट के पास ही रहने वाले 8 वर्षीय प्रकाश बर्मन, 7 वर्षीय सागर, संदीप, सन्नी और अन्य बच्चों ने बताया कि अब उन्हें यह काम अच्छा लगने लगा है। उन्होंने बताया कि कभी-कभी तो उन्हें कुछ सिक्के मिल जाते हैं, जबकि कभी-कभी एक भी सिक्का नहीं मिलता। कुछ बच्चों ने बताया कि वे अपनी खुशी से आते हैं, जबकि कुछ ने बताया कि उनके माता-पिता उन्हें यहां भेजते हैं। बच्चों का बचपन किस हद तक खत्म हो चुका है, इसकी बानगी तब सामने आई, जब बातचीत के दौरान बच्चों ने कहा- "भइया हम जाएं क्या ?"&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कौन छीन रहा बचपन ?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;आसपास के संभ्रांत नागरिकों के साथ बुद्धिजीवियों ने स्वीकारा कि इन मासूमों का बचपन चंद सिक्कों की खातिर खत्म हो रहा है, लेकिन उनका कहना कि इन मासूमों से बचपन छीनने में अभिभावकों के साथ-साथ कहीं न कहीं प्रशासन भी जिम्मेवार है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;# (नितिन पटेल दैनिक भास्कर जबलपुर में रिपोर्टर हैं)&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-9010653676937968667?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/9010653676937968667/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=9010653676937968667' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/9010653676937968667'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/9010653676937968667'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='चंद सिक्कों की खातिर.......जान जोखिम में डाल दिन भर नर्मदा के घाट पर घूमते हैं मासूम'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/SJNHH59RH2I/AAAAAAAAADI/Hf_OruV3rLI/s72-c/DSC00151.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-6726139140713273481</id><published>2008-04-23T22:27:00.000+05:30</published><updated>2008-04-23T22:30:16.513+05:30</updated><title type='text'>21 वीं सदी में नया समाजवाद</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;जबलपुर में दिनों प्रो. रवि सिन्हा ने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थानीय इकाई के तत्वावधान में आयोजित 21 वीं सदी में नया समाजवाद विषय पर व्याख्यान दिया। प्रो. सिन्हा ने अमेरिका से फिजिक्स विषय में डॉक्टरेट की है और काफी वर्षों तक उन्होंने वहां अध्यापन कार्य भी किया है। उनकी ख्याति विज्ञान के विभिन्न सिद्धांतों और तथ्यों को व्याख्यानों के माध्यम से सरलता से समझाने के लिए रही है। रवि सिन्हा कई वर्षों से समाजवाद और उसके प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं। उनकी समाजवाद विषयक व्याख्यान श्रंखला भी बहुत प्रसिद्ध हुई है। इसी श्रंखला के तहत् वे जबलपुर आए।&lt;br /&gt;रवि सिन्हा के वक्तव्य में समाजवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए इस सदी में समाजवाद के संदर्भ और भविष्य को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि कार्ल मार्क्स को आज फिर से पढ़ने की जरुरत है और उन्हें 21 वीं सदी के अनुकूल ही पढ़ना चाहिए। समाज में जो मनुष्य उपलब्ध है, उसके आधार पर ही समाजवाद का निर्माण किया जा सकता है। रवि सिन्हा ने बिल्कुल स्पष्ट कर दिया कि 20 वीं सदी का समाजवाद भविष्य के समाजवाद का मॉडल नहीं हो सकता।&lt;br /&gt;रवि सिन्हा ने कहा कि समाजवाद का विषय पुराना है, लेकिन संदर्भ नया व कठिन है। उन्होंने कहा कि दलों और नेताओं में विचारों की अस्पष्टता के कारण समाजवाद विघटित हुआ है। इसके लिए उन्होंने आत्मगत शक्तियों को जिम्मेदार ठहराया। प्रो. सिन्हा ने कहा कि क्रांतियां-राजशाही, सामंतवाद और औपनिवेशवाद में हुईं हैं। क्रांति होने के निश्चित कारण थे। जहां क्रांतियां हुईं, वहां समाजवाद बनाना मुश्किल था और जहां नहीं हुईं वहां समाजवाद बनाना आसान था। उन्होंने कहा कि 20 वीं सदी का समाजवाद पिछड़े समाजों में हुआ। इसे प्रो. सिन्हा ने आपातकालीन समाजवाद बताया। उन्होंने कहा कि पूंजीवाद ही अंतिम व्यवस्था नहीं है। उन्होंने आशा जताई कि सफलताओं और असफलताओं की सीख से नया मॉडल विकसित होगा। रवि सिन्हा ने अलबत्ता नए मॉडल की अवधारणा या स्वरुप का कोई खाका नहीं खींचा।&lt;br /&gt;रवि सिन्हा के व्याख्यान के समय जबलपुर के कई बुद्धिजीवी, सांस्कृतिककर्मी, विद्यार्थी और एक्टिविस्ट उपस्थित थे। इनमें से कई व्याख्यान के पूर्व इस आशंका से ग्रस्त थे कि रवि सिन्हा अमेरिका में कई सालों से रह रहे हैं, इसलिए वे समाजवाद और साम्यवाद के खिलाफ बोलेंगे। व्याख्यान के पश्चात् उनकी आशंकाएं निर्मूल रहीं। वैसे कुछ लोग उनके विचारों से सहमत तो, कुछ असहमत दिखे। विद्यार्थी और युवाओं के लिए उनका व्याख्यान सुनना एक अनुभव की तरह रहा, क्योंकि ऐसे लोगों के लिए समाजवाद गुजरे जमाने की बात की तरह था। रवि सिन्हा के उदगार के पश्चात् निश्चित ही इस वर्ग को यह विश्वास अवश्य हुआ है कि भू-मंडलीकरण में भी समाजवाद प्रासंगिक रहेगा।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-6726139140713273481?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/6726139140713273481/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=6726139140713273481' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/6726139140713273481'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/6726139140713273481'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2008/04/21.html' title='21 वीं सदी में नया समाजवाद'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-1337314250050860883</id><published>2008-04-07T21:52:00.000+05:30</published><updated>2008-04-07T21:58:26.438+05:30</updated><title type='text'>मौत का कुआं न बने स्वीमिंग पूल</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/R_pLJBQIBmI/AAAAAAAAAC4/PQuA9OF_qEA/s1600-h/scan.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5186540539197523554" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/R_pLJBQIBmI/AAAAAAAAAC4/PQuA9OF_qEA/s320/scan.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;जबलपुर में बिजली बोर्ड के इंजीनियर अभिषेक जैन और उनकी पत्नी श्रीमती रीना जैन को 2 अप्रैल 2007 का दिन भुलाए नहीं भूलता है। इस दिन उनके लाड़ले आशय की मध्यप्रदेश राज्य विद्युत मण्डल के स्वीमिंग पूल में डूबने से मृत्यु हो गई थी। इस वर्ष 2 अप्रैल को आशय की स्मृति में अभिषेक और रीना जैन ने स्थानीय समाचार पत्रों में एक जनहित में विज्ञापन जारी किया। इस विज्ञापन का उद्देश्य उन अभिभावकों को सतर्क करना है, जिनके बच्चे स्वीमिंग पूल में तैरने जाते हैं। जैन दंपति ने विज्ञापन में अभिभावकों को आगाह किया कि वे बच्चों को स्वीमिंग पूल में जाने से पूर्व स्पोटर्स अथॉरिटी आफ इंडिया से प्रशिक्षित तैराकी कोच, प्रशिक्षित मेडिकल अटैण्डेंट एवं प्राथमिक चिकित्सा सुविधा, सुरक्षा व्यवस्थाएं जैसे लाइफबॉय, लाइफ जैकेट, श्वसन उपकरण, आक्सीजन सिलेंडर, जीवन रक्षक निर्देश चार्ट तथा उपयुक्त संचार एवं प्रकाश व्यवस्था जैसी तथ्यों की पुष्टि आवश्यक रुप से कर लें।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;जैन दंपति कहती है कि सुरक्षा के अभाव में सुविधाएं भी जानलेवा बन जाती हैं। दिल्ली पुलिस हर वर्ष स्वीमिंग पूलों में अपनाई जाने वाली सुरक्षा को ले कर पोस्टर अभियान चलाती है। दिल्ली पुलिस की तर्ज पर जबलपुर में भी इंजीनियर अभिषेक जैन और उनके मित्र पोस्टर अभियान चला रहे हैं। स्वीमिंग पूलों और स्कूलों में लगाए गए पोस्टरों में स्वीमिंग पूल में अपनाई जाने वाली सुरक्षा की जानकारी दी गई है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अभिषेक-रीना जैन कहते हैं- "आशय का विछोह हमारे लिए आजीवन त्रासदी है। गत एक वर्ष से हमने पुलिस, प्रशासन एवं जन प्रतिनिधियों से स्वीमिंग पूल में सुरक्षा मानकों को लागू करने की गुहार की है। हम न तो किसी के खिलाफ बदले की कार्रवाई चाहते हैं, न कोई मुआवजा। जो हमने खोया है, उसकी कोई क्षतिपूर्ति संभव नहीं है। हम चाहते हैं कि ऐसी त्रासदी किसी और माता-पिता को न भोगनी पड़े। हमारा सभी से अनुरोध है कि स्वीमिंग पूल बच्चों के लिए मौत का कुआं न बने, यह सुनिश्चित करने का प्रयास करें।"&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;जैन दंपति के जन-जागरण के पश्चात् भी जबलपुर के स्वीमिंग पूलों में सुरक्षा के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए और न ही निर्धारित मानक के अनुसार व्यवस्था की गई। स्वीमिंग पूलों में प्रशिक्षित तैराकी कोच, लाइफ जैकेट, रिसरेक्टर पम्प, आक्सीजन सिलेंडर, लाइफबॉय आदि का अभाव है। कोई यह तक देखने वाला नहीं है कि पानी में खतरनाक क्लोरिन की मात्रा कितनी है। सब कुछ भगवान भरोसे चल रहा है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पानी में क्लोरिन खतरनाक-&lt;/strong&gt; स्वीमिंग पूल के पानी में क्लोरिन अधिक होने पर आंखों में जलन, फेफड़ों में सूजन, विशेष परिस्थितियों में श्वसन तंत्र में रुकावट और अर्द्धमूर्छा की स्थिति बनती है। महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने वर्ष 2006 में मुंबई के 32 स्वीमिंग पूल के सेंपल लिए थे। उनमें से 27 में क्लोरिन की मात्रा निर्धारित मापदंड से ज्यादा पाई गई। कुछ प्रकरणों में यह मात्रा 8 से 10 गुना तक ज्यादा पाई गई। चौंकाने वाली बात यह है कि ब्यूरो आफ इंडियन स्टैंडर्ड ने स्वीमिंग पूल के पानी के मानक स्तर के लिए 1993 में आईएस-3328 कोड जारी किया। 90 प्रतिशत से अधिक स्वीमिंग पूल संचालकों को इस कोड की जानकारी नहीं है। इसी तरह बहुत से लोगों को इस बात की जानकारी नहीं है कि स्वीमिंग पूल में कम से कम प्रति व्यक्ति 20 वर्ग फुट पूल एरिया होना चाहिए। स्वीमिंग पूल में लाइटिंग, टेलीफोन, हॉस्पिटल और एम्बुलेंस के फोन नंबर होना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लायसेंस की अनिवार्यता जरुरी-&lt;/strong&gt; मध्यप्रदेश में अभी तक स्वीमिंग पूल चलाने के लिए लायसेंस की अनिवार्यता लागू नहीं की गई है। दिल्ली पुलिस ने वर्ष 2004 से स्वीमिंग पूल संचालकों के लिए लायसेंस अनिवार्य कर दिया है। लायसेंस के लिए महानगर पालिका को स्पोटर्स अथॉरिटी के द्वारा प्रमाणित तैराकी प्रशिक्षक, पानी की गुणवत्ता रिपोर्ट एवं सुरक्षा उपकरणों की उपलब्धता का प्रमाण पत्र देना पड़ता है। लायसेंस अनिवार्य होने के बाद दुर्घटना में काफी कमी आई है। इसी तरह जयपुर में भी स्वीमिंग पूल में के लिए लायसेंस जरुरी किया गया है। स्वीमिंग पूल निर्माण के लिए मॉडल बिल्डिंग कोड में मानक निर्धारित किए गए हैं। इसके बावजूद अधिकांश नगर निगम एवं राज्य सरकार इसकी अनदेखी कर रही हैं। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-1337314250050860883?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/1337314250050860883/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=1337314250050860883' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/1337314250050860883'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/1337314250050860883'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2008/04/blog-post_07.html' title='मौत का कुआं न बने स्वीमिंग पूल'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/R_pLJBQIBmI/AAAAAAAAAC4/PQuA9OF_qEA/s72-c/scan.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-8691673365267574089</id><published>2008-04-06T20:51:00.000+05:30</published><updated>2008-04-06T20:59:46.798+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाजार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वागर्थ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पहल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ज्ञानरंजन'/><title type='text'>ज्ञानरंजन कहानी क्यों नहीं लिखते ?</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/R_jsJhQIBlI/AAAAAAAAACw/H9O23tTzX2A/s1600-h/scan0001.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5186154619206108754" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" 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के यथार्थ यानी उसके चतुर्दिक यथार्थ के चक्रव्यूह में प्रवेश कर सकें तो यह उनका एक मूल्यवान कदम होगा एवं बड़ी सफलता होगी। यह तभी संभव है, जब हमारे अपनी विधा को केवल डिफेंड करने की शैली न अपनाई जाए। इससे पाठकों, साहित्य रसिकों, कहानीकारों और कहानी के आंदोलनकर्ताओं की समृद्धि हो सकेगी। लेकिन इस सच्चाई के बावजूद कि विधाओं में उपद्रव और विखंडन हो रहा है ऐसा हो नहीं पाता,क्योंकि अखबारों ने समकालीन राजनीति के तहलकों, अत्यधिक चमकती तकनीक ने हमें इतना डांवाडोल कर दिया है कि हम कहानी को अपने नए यथार्थ से जोड़ नहीं पा रहे हैं। यह वेल्डिंग या नवनिर्माण आसान नहीं है। लगभग 50 साल की जबरदस्त बाजार की धधक, धुएं और कोहराम के बाद &lt;strong&gt;महान कथाकार सारामागो ने 'केव'&lt;/strong&gt; उपन्यास लिख कर बाजार की ताकत, उसकी समझ और भूमंडल के षड़यंत्र पर गहरा आक्रमण किया है। अब इसकी भरपूर चर्चा है, क्योंकि सृजनात्मक साहित्य की दुनिया में बाजार की फैन्टेसी का पेंच प्रभावी तौर पर सारागामो ने तोड़ दिया है।&lt;br /&gt;ज्ञानरंजन ने कहा कि इस प्रकार नए जमाने के रचनाकारों के लिए यथार्थ और रचना प्रक्रिया का प्रदर्शन किया है। कहानी का अर्थ भारत जैसे विकासशील, अर्ध विकसित अथवा पिछड़े देशों के समाजों में अभी मरा नहीं है, बल्कि स्पंदित और जीवित है। इसको मूर्छित होने से बचाने का काम नए कहानीकारों का है। तभी उनकी विधा बचेगी अथवा नहीं। एक लेखक को मानना होगा कि उसका काम केवल लिख डालना नहीं है। उन्हें अपनी मेधा को एक दार्शनिक या वैज्ञानिक या चिंतक के साथ बहुआयामी बनाना है। भारतीय भाषाओं में अवशिष्ट रुप में कहानी अभी भी वह कर दिखाती है, जो उपन्यास नहीं दिखा पा रहा है। लेकिन उपन्यास का जबड़ा बहुत बड़ा है, जैसा पश्चिम ने प्रमाणित कर दिया है। ज्ञानरंजन नए कहानीकारों से कहते हैं कि कहानी लिखे ही लिखे मत जाओ, उसका बंकर भी बनाओ।&lt;br /&gt;ज्ञानरंजन नव कथाकारों से कहते हैं- "बाजार एक बतकही नहीं है, वह विशाल जबड़ा है। इस कड़वाहट को पी लेने से लाभ ही है कि शायद हमारे कहानीकार उतने कलावंत नहीं है, उतने सचेत नहीं है, जितना अनिवार्य है। कहानी हमें हंसते-हंसते, तृप्ति देते, आस्वाद से छलते हुए इतना चिंताग्रस्त कर देती है कि क्या कहा जाए। आखिर हम एकत्र होते ही किस लिए हैं। यह हंसी-खुशी कितनी मारक है, कितनी हिंसक है, अर्थवान है। कहानी में यह संभव है।"&lt;br /&gt;दुनिया में कहानी की स्थिति के संदर्भ में ज्ञानरंजन कहते हैं- "तथाकथित शिष्ट दुनिया में या जहां पूंजी की नोक पर सभ्यताएं तांडव कर रही हैं, वहां उनकी भाषाओं में कहानी मर चुकी है। अफ्रीकी देशों, दक्षिणी अमेरिका, कुछ छोटे नामालूम से देशों कहीं-कहीं एशिया और भारत में (पाकिस्तान भी) कहानी का अस्तित्व बना हुआ है। और वह बाजार से टकरा रही है, बाजार में प्रवेश कर रही है और बाजार द्वारा फेंकी जा रही है। बाजार वह जगह है जहां स्वागत किया जाता है, अंगीकृत किया जाता है, सजाया जाता है, बेचा जाता है और फालतू भी कर दिया जाता है।"&lt;br /&gt;ज्ञानरंजन कहते हैं कि उन्हें कहानी के सौंदर्यशास्त्र की बनिस्बत कहानी के बाहरी समाज में दो चीजें अधिक सता रही है। एक तो कहानी का साहित्य भी बने रहना और दूसरा कहानी का बाजार में स्पेस। वे कहते हैं कि समकालीनता और बाजार का गहरा रिश्ता है। दुनिया की किसी भी भाषा की तुलना में हिन्दी में समकालीनता का जोर सबसे अधिक है साहित्य में। परम्परा और भविष्य की बात तो हम कभी-कभी कर लेते हैं। कहानी की रचना में कहानी के पठन पाठन में में हम यूज एण्ड थ्रो के काफी नजदीक रेंग रहे हैं। अब सवाल यह है कि हमारे कहानीकार समझदारी और अपनी सर्वोत्तम सृजनात्मक के साथ इन सबसे मुठभेड़ नहीं कर सकते तो न तो वे समकालीन ही रह सकते हैं और न चर्चित और लोकप्रिय। ऐसा न कर सकने के कारण उनकी कहानी की अवधि भी 6 महीने रह जाएगी। बाजार उनसे डिमांड करेगा नव्यतम की और परिवर्तित ढांचे की। और क्या आप इस तरह लगातार दौड़ते रह सकते हैं। आपका मिजाज, आपकी रचना, आपका तापमान, आपकी बुनावट इस तरह की नहीं है। फिर क्यों उसकी तरफ आकर्षित होते हैं। जो बाजार हमारा विरोधी है, हमारा साथ नहीं देता, हमारे लिए जहां जगह नहीं है, उसका विकल्प खोजने का काम भी हमारी सर्वोच्च चिंता है।&lt;br /&gt;ज्ञानरंजन बाजार की तरफ रचनाकारों के आकर्षण और विवशता के संबंध में कहते हैं कि इसका प्रमुख कारण रचनाकारों को पिछड़ने का डर लगता है। तटस्थ और क्रूर, स्तृतिविहीन समय में समकालीनता बचाती है और हमें लगातार उपस्थित रखती है। यद्यपि समकालीनता के लिए बाजारु विकल्प कम हैं। कुछ साहित्यिक परिशिष्ट अखबारों के, एक-दो साप्ताहिक, जिसमें साहित्यिक अभिव्यक्ति लगभग हाशिए पर है। भारत की किसी भी भाषा की तुलना में समकालीनता हिन्दी में सबसे अधिक है। समकालीनता का एक प्रतिफल और हो गया है कि हिन्दी कहानी भी अब गीत की तरह मंच पर है। मंच माने कहानी के गुटीय अड्डे। अब हिन्दी समाज में 3-4 कहानी की पत्रिकाएं हैं बस। उसमें भी आधी कहानी है, आधा विमर्श। विमर्श भी आप देखें की स्त्री विमर्श, मीडिया विमर्श और दलित विमर्श। समकालीन बाजार में ये टाप थ्री विमर्श हैं, बल्कि केन्द्रीय विमर्श बन गए हैं। साहित्य में राजनीति की कार्बन कापी हो रही है। अभी-अभी कविता के भविष्य पर भी आलोचना ने चिंता प्रगट की है। कहानी की पत्रिकाओं से ही कहानी विमर्श गायब हो गया है। बस कहानी की छुटपुट रिपोर्ट बची है। देश के किसी भी शापिंग आर्केड में साहित्य कला की कोई जगह नहीं है। अफसोस और खेद और कोसने के साथ हम दिन भर अपनी बतकही करते हैं। अपने आचरण को साहित्य की शर्तों पर मोड़ने की कोशिश नहीं करते। बाजार को असहाय झांकते रहते हैं। बाजारों में कुछ अंग्रेजी की जगहें हैं। अंग्रेजी में भी समकालीन किताबें और बेस्ट सेलर हैं। अमेरिका और इंग्लैंड के सबसे शानदार साहित्यिक प्रकाशक धूल चाट रहे हैं। नया बाजार बढ़ रहा है।&lt;br /&gt;ज्ञानरंजन कहते हैं कि उन्होंने अपने वक्तव्य में एक जगह साहित्यपन या साहित्यिकता का उपयोग किया है। बाजार और समकालीनता के बीच ज्ञानरंजन इसे आज भी एक जरुरी मुद्दा मानते हैं। वे कहते हैं कि साहित्य हमारा कवच है। यह हमारी अस्मिता की रक्षा करता है। हमें इस दिशा की तरफ ध्यान देना चाहिए। जिसे बाजार की तरफ जाना हो पापुलर व्यवसायी और खपत वाली कहानी लिखनी हो वे अवश्य लिखें। यह उनका चुनाव है। यह एक जरुरी रास्ता भी है पर जो साहित्य कला जीवन का रसायन बनाना चाहें और भाषा की मौलिक समृद्धि उन्हें भी अपनी जद्दोजहद कायम करनी चाहिए। कहानी, नई कहानियां, उर्दू कहानी, सारिका के अलावा हिन्दी की अन्य शानदार पत्रिकाओं में कहानी को एक विशिष्ट दर्जा था। चाहे वह कल्पना हो, लहर हो, परिमल गुट की पत्रिकाएं हों या प्रगतिशील गुट की। श्रीपतराय, श्यामू सन्यासी, उपेन्द्रनाथ अश्क, धर्मवीर भारती, भैरवप्रसाद गुप्त, मोहन राकेश, बलवंत सिंह, रामनारायण शुक्ल कहानी संपादन के ये सर्वाधिक सम्मानीय नाम हैं। इनके संपादन में निकलने वाली कहानी पत्रिकाओं के प्रिंट आर्डर हजारों में थे, लेकिन कहानी बाजार के चंगुल से स्वतंत्र थी। उन्होंने कहानी की टोटल रक्षा की। ज्ञानरंजन कहते हैं कि इस भव्य परंपरा को तोड़ने या उससे विचलित होने, विरत होने की जरुरत क्यों हुई ? उसे समृद्ध क्यों नहीं किया गया। पता नहीं किन घड़ियों में यह खंडन हुआ, यह अध्ययन का विषय है। जिस तरह समय की राजनीति करवट लेती है, उसी तरह साहित्य की दुनिया में करवटें नहीं बदली जातीं। साहित्य में अगर हमने मांग-आपूर्ति का नियम लागू कर दिया तो यह एक प्रकार की व्यापार प्रणाली होगी।&lt;br /&gt;ज्ञानरंजन कहते हैं- "बाजार के बारे में मेरा नजरिया नकारात्मक नहीं है। बाजार इतनी बुरी जगह नहीं है। गृहस्थों के लिए, जनगण के लिए वह जरुरी ही नहीं जीवित रहने का एक मजबूत आधार है। वह लोकप्रिय कारीगारी के लिए हमारी भूख प्यास के लिए भी एक स्थल है। पर एक रचनाकार के लिए उसमें बहुत अधिक जरुरी चीजें उपलब्ध नहीं हैं। एक साहित्यकार को उसमें प्रवेश की अनिवार्यता नहीं है। हम पानी में जाते हैं, पानी में तैरते हैं, उससे लड़ते हैं। हम बाजार में जाते हैं, बाजार से लड़ते हैं। लेखक की दुनिया अलग है। वह निर्माता है, खोजी है, विचारक है, वह भविष्य और अपने समय में धंसता है, वह बेपरवाह है। जिस दिन हम अपना इनोसेंस खो देते हैं, उस दिन हम एक होशियार आथर हो जाते हैं। अमानवीयकरण का सुराख बनने लगता है। हमारा सृजनात्मक वार्तालाप ही बदल जाता है।&lt;br /&gt;ज्ञानरंजन कहते हैं कि उन्हें संपादक होने के नाते हर पल चेतना और जागरण की जरुरत पड़ती है। इसका कोई अंत नहीं है। वे अपने साहित्य समाज से ही सीखते चलते हैं। कहानी के लिए यह अदभुत समय है। परिपक्व और समृद्ध समाजों में कहानी पदच्युत हो चुकी है। लेकिन यहां भारतीय समाज में हर चीज पिघल रही है। भाषाएं प्रतिभाओं की धनी हैं। यथार्थ तार-तार और विखंडित हो रहा है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ज्ञानरंजन ने अपने वक्तव्य को समाप्त करते हुए सबसे महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा- " मुझसे यह सवाल पूछा जा सकता है कि आप इतना जान समझ रहे हैं तो लिखते क्यों नहीं कहानी ? इसका जवाब है कि मैं नहीं लिख सकता। लिख सकता हूं पर वह महज ज्ञानवान क्रिया हो्गी जिसका कोई अर्थ नहीं। जानना और सूचित होना पर्याप्त नहीं है। लिखते जाना भी पर्याप्त नहीं है। छपते जाना भी पर्याप्त नहीं है। नए मुहावरे को जन्म देना, त्रासदी के मध्य डूबना-उतरना और लगभग अकेले पड़ जाना, आवेग, धीरज और श्रम और ताजगी और कम उम्र इसके लिए जरुरी है। और भी बहुतेरी चीजें जरुरी हैं। पचासों साल बीत जाने और अनन्य लफड़ों में विचरने वाले बूढ़े अपने समाज में कोई बड़ी भूमिका अदा नहीं कर सकते।"&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc6600;"&gt;(ज्ञानरंजन जी का पूरा वक्तव्य वागर्थ के नए अंक में प्रकाशित होगा)&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-8691673365267574089?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/8691673365267574089/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=8691673365267574089' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/8691673365267574089'/><link rel='self' 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पहला तो देशबन्धु के क्राइम बीट के रिपोर्टर ने अपनी ड्यूटी निभाते हुए जबलपुर की एक महिला डॉन चित्रा के निधन की खबर को लिखा है। उसकी जैसी समझ थी, उसने खबर को लिखा और समाचार पत्र में उसे प्रस्तुत किया गया। दूसरा क्या महिला डॉन के निधन को इतनी जगह देनी चाहिए ? देशबन्धु जैसे सरोकार वाले समाचार पत्र में किसी महिला डॉन के निधन और उसके कार्यों की अतिरंजित प्रस्तुति, यह सोचने को मजबूर करती है कि इसी समाचार पत्र को ग्रामीण पत्रकारिता के लिए एक बार नहीं, बल्कि कई बार स्टेट्समेन अवार्ड जैसे पुरस्कार मिल चुके हैं।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;देशबन्धु में 'और दहाड़ हो गई शांत' शीर्षक से प्रकाशित समाचार का सार यह है कि जबलपुर की महिला डॉन चित्रा का बीमारी से निधन हो गया। वह पुलिस के लिए चुनौती थी और उसके निधन से सिंहनी जैसी दहाड़ भी शांत हो गई। उसने महिला होते हुए शहर में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। अवैध महुआ से शराब बनाने वाली चित्रा ने पुलिस को नाकों चने चबाने विवश कर दिया था। बेधड़क कच्ची शराब का कारोबार करने वाली चित्रा पुलिस के लिए हमेशा सिरदर्द बनी रही और उसने पुलिस का डट कर मुकाबला किया। निधन की खबर सुन कर उसके घर में स्थानीय लोग व व्यापारियों का तांता लग गया।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;देशबन्धु में प्रकाशित समाचार से यह बोध होता है कि जैसे चित्रा नाम की महिला डॉन महिलाओं के लिए एक आदर्श थी। उसने शायद लीक से हट कर कोई काम किया हो। जैसे स्वतंत्रता के पूर्व अंग्रेजों से डट कर मुकाबला किया जाता था, वैसे ही उसने पुलिस से मुकाबला किया। &lt;strong&gt;मुद्दा यह है कि समाज में किसी भले आदमी या स्वतंत्रता सेनानी के निधन के समाचार को क्या इतना स्थान मिलता है, जितना महिला डॉन चित्रा के निधन को स्थान मिला ? क्या नेक या अच्छे काम करने वाले के लिए समाचार पत्र में जगह नहीं बची ? लगता है कि टेलीविजन चैनलों की तरह यहां भी टीआरपी का चक्कर है या प्रिंट मीडिया में काम करने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया से प्रभावित हो कर आपराधिक दुनिया को महिमा मंडित करने लगे हैं। &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;दरअसल देशबन्धु कभी भी मध्यप्रदेश या छत्तीसगढ़ में बिक्री के मामले में नंबर वन नहीं रहा, लेकिन समाचारों की दृष्टि से उसे हर समय गंभीरता से लिया जाता रहा है। देशबन्धु ने सामाजिक सरोकारों को प्राथमिकता देते हुए खबरों का प्रस्तुतिकरण किया है। मुझे याद है कि लगभग 12-13 वर्ष पूर्व भोपाल के अग्रणी समाचार पत्र के संपादक ने कहा था कि यदि समाचार पढ़ना है, तो जबलपुर में देशबन्धु से बेहतर कोई समाचार पत्र नहीं है। 90 की शुरुआत में जब रमेश अग्रवाल समूह ने जबलपुर से नव-भास्कर निकाला, तब गिरीश अग्रवाल ने स्वीकारा था कि देशबन्धु का पेज मेकअप और ले-आउट सबसे अच्छा है। इस दृष्टि से देखें तो उपर्युक्त टिप्पणियां यह सिद्ध करती हैं कि देशबन्धु एक उत्कृष्ट स्तर के समाचार पत्र के रुप में मान्य था।&lt;br /&gt;जबलपुर में देशबन्धु और युगधर्म पत्रकारिता के स्कूल माने जाते थे। दोनों समाचार पत्रों के संपादक स्वर्गीय मायाराम सुरजन (देशबन्धु) और भगवतीधर वाजपेयी (युगधर्म) जबलपुर की पत्रकारिता के पितृ के रुप में मान्य थे। देशबन्धु में कार्यरत कई पत्रकार वर्तमान में प्रदेश व देश के प्रमुख समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर रहे हैं, इसकी सिर्फ एक वजह उनका देशबन्धु में कार्य करना रहा है। देशबन्धु रायपुर के संपादक ललित सुरजन को तो एक समय भारत के सबसे उदीयमान संपादक तक माना गया था। देशबन्धु जबलपुर में कार्य कर चुके राजेश पाण्डेय और राजेश उपाध्याय क्रमशः वर्तमान में नई दुनिया इंदौर और दैनिक भास्कर भोपाल जैसे संस्करणों के संपादक हैं।&lt;br /&gt;7 अप्रैल से देशबन्धु का दिल्ली संस्करण शुरु हो रहा है। हो सकता है इससे वह राष्ट्रीय समाचार पत्रों में गिने जाने लगे, लेकिन इस प्रकार के समाचार उसकी प्रतिष्ठा को ही धूमिल करेंगे। हम सब जानते हैं कि देशबन्धु की एक उत्कृष्ट परंपरा रही है और क्षेत्रीय स्तर पर उसे एक मिसाल के रुप में देखा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8182272878998931303-8786755814785589054?l=jabalpur-chaupal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/feeds/8786755814785589054/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8182272878998931303&amp;postID=8786755814785589054' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/8786755814785589054'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8182272878998931303/posts/default/8786755814785589054'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jabalpur-chaupal.blogspot.com/2008/04/blog-post_03.html' title='महिला डॉन का निधन और दैनिक देशबन्धु के सरोकार'/><author><name>मलय</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_cN_V9Y0DF00/R_TyXRQIBjI/AAAAAAAAACg/xcsSx36dy88/s72-c/+deshbandhu.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8182272878998931303.post-6237518060041852352</id><published>2008-04-02T00:03:00.000+05:30</published><updated>2008-04-02T00:07:00.279+05:30</updated><title type='text'>चारदीवारी में बूढ़े</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;आज 1 अप्रैल को मेरे मां के चाचा जी अर्थात मेरे नाना जी का 94 वां जन्मदिन है। वे हम लोगों के घर से लगभग 10-12 किलोमीटर दूर रहते हैं। हम लोग उनसे और नानी से किसी खास मौकों पर ही मिल पाते हैं। हम लोगों के जन्मदिन पर उनकी बधाई एक महीने पहले आ जाती है। उन्होंने यह गुण अपने दो बड़े भाईयों से सीखा है। उनके बड़े भाईयों का निधन हो चुका है। सभी भाई अंग्रेजों के समय के थे, इसलिए उनमें समय की पाबंदी और अनुशासन कूट-कूट कर भरा है। नाना और नानी की इतनी आयु हो जाने के बाद भी वे किसी पर निर्भर नहीं हैं। अपना दैनिक कार्य स्वयं ही निबटाते हैं। उन लोगों को देख कर जीवन जीने की कला सीखी जा सकती है। इसके लिए रविशंकर जी की आर्ट आफ लिविंग की जरुरत नहीं है। दोनों की स्मरणशक्ति लाजवाब है। इसका कारण सादा जीवन, समय पर सोना-समय पर उठना और नियमित जीवनशैली है। उनका एक बेटा और तीन बेटियां हैं और वे सब जबलपुर से बाहर ही हैं। समय-समय पर उनका आना होता रहता है और नाना-नानी भी उनसे मिलने जाते हैं, लेकिन अधिक आयु के कारण अब यह ज्यादा संभव नहीं है। उन लोगों का स्वस्थ रहने का सहज तरीका है। आज भी वे सोलर कुकर में खाना बनाते हैं। उनका घर और बगीचा हम सभी के लिए एक प्रेरणा है।&lt;br /&gt;नाना जी ने अपना जन्मदिन दोस्तों के साथ मनाया। दिन भर में हम लोगों के अलावा कुल जमा आठ लोग ही उनके घर बधाई देने पहुंचे, लेकिन इसका आनंद उन्होंने खूब उठाया। इसका कारण उनकी सकारात्मक सोच है। जन्मदिन के दिन ही साल में एक बार इतने अधिक लोग उनके घर पहुंचते हैं, बाकी 364 दिन उनके घर में लगभग अकेले ही कटते हैं। बेटे और बहु द्वारा भेजा गया ग्रीटिंग कार्ड उनकी खुशी को द्विगुणित कर रहा था। बधाई देने आए लोगों को उन्होंने ग्रीटिंग कार्ड दिखा कर अपनी खुशी सभी के साथ बांटी। हम लोग शाम के समय उनके यहां बधाई देने वाले शायद अंतिम थे। विदा होते समय हम लोगों को वापस आते समय अच्छा नहीं लग रहा था, क्योंकि नाना-नानी वापस फिर अपनी दुनिया में चले जाएंगे। जहां वे फिर अगले वर्ष का इंतजार करेंगे कि जन्मदिन आए और कुछ लोग उनसे इसी बहाने मिलने आएं और वे उनसे अपनी कुछ खुशियां बांत सकें। उनके घर से आने के बाद उन बुजुर्गों पर एक कविता लिखने का मन आया है, जो बिल्कुल अकेले रह रहे हैं। यह कविता आप लोगों के साथ बांट रहा हूं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;घर की चारदीवारी में कट जाते हैं बूढ़ों के दिन&lt;br /&gt;चारदीवारी में कब होती है सुबह और शाम&lt;br /&gt;बूढ़े नहीं जानना चाहते हैं इसे&lt;br /&gt;उन्हें डर लगता है अंशुमान-विभांशु के प्रकाश से&lt;br /&gt;इससे ही होती सुबह और शाम&lt;br /&gt;सुबह की रौशनी उत्साह भरती है, तिमिर अवसाद&lt;br /&gt;बूढ़े परेशान हैं उत्साह-अवसाद के चक्र से&lt;br /&gt;इसलिए वे चारदीवारी में कैद हैं।&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;चारदीवारी में बूढ़ों की स्मृतियों में कैद हैं जीवन के रंग-विरंग&lt;br /&gt;जिन्हें बांट देना चाहिए&lt;br /&gt;चार सोपानों में&lt;br /&gt;चौथे सोपान में जी रहे हैं बूढ़े&lt;br /&gt;चारदीवारी में देख रहे हैं जीवन के अक्स&lt;br /&gt;चारदीवारी के उधड़ रहे प्लास्टर की तरह रही है जिंदगी उनकी।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;चारदीवारी से शुरु हुआ था जीवन का संघर्ष&lt;br /&gt;बड़ी जतन से रौंपे थे पौधे&lt;br /&gt;जीवन की खुशियां वे पौंधों में देखते&lt;br /&gt;सबको अपने कर्म करने को कहते&lt;br /&gt;चारदीवारी को था अपनी नींव पर बड़ा गर्व&lt;br /&gt;इसमें उन्हें पता नहीं कि कब पौधे पेड़ बन गए&lt;br /&gt;पेड़ों की जड़ें चारदीवारी की नींव तक पहुंच गईं।&lt;br /&gt;जड़ों ने चारदीवारी को हिला दिया&lt;br /&gt
