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ज्ञानरंजन की पहल फिर निकलेगी

ज्ञानरंजन ने पहल का प्रकाशन पुन: करने की घोषणा 20 जुलाई को पहल के ब्लाग से की। http://pahal2012.wordpress.com में ज्ञानरंजन की घोषणा यहां ज्यों की त्यों प्रस्तुत है-

मित्रों,

‘पहल’ को स्थगित हुए लगभग तीन वर्ष हो रहे हैं. पैंतीस वर्ष की यात्रा के बाद बहुतेरी कठिनाइयों के कारण ‘पहल’ का प्रकाशन अकस्मात बंद हो गया था. इसकी प्रतिक्रिया विविध थी. कुछ स्तब्ध थे और कुछ निर्णय से सहमत थे. कुछ लोग ख़ुश भी थे और कुछ ने इसे विवादास्पद बनाने का प्रयास भी किया.
‘पहल’ के साथ पूरे देश में, विभिन भाषाओं के रचनाकारों का एक बड़ा समूह भी तैयार हुआ था और उन्होने हर प्रकार से इस पत्रिका को अपनाया. इसके बावजूद ‘पहल’ को निरंतर, उसके प्रकाशित रूप में जारी करते रहने का औचित्य कम हो रहा था. उसको बदलना, उसमे नयी सांस्कृतिक, साहित्यिक बहसों को शामिल करना और नयी रचनावली की खोज करना ज़रूरी हो गया था. उसकी वैचारिक रीढ़ को भी मज़बूत करना आवश्यक था और नयी स्वीकृतियों के साथ हमे गहरी मुठभेड़ भी करनी थी.
कुछ लोगों की इछा थी कि ‘पहल’ निकले पर यह इतना सरल नहीं था और न है. अनगिनत पत्रिकाएं निकल रही हैं  और उनमे से कुछ ही हैं जो अपनी सृजनात्मक भूमिका का निर्वाह कर रही हैं. अधिकांश उस बेचैनी पर निगाह नहीं रखतीं जो घनघोर सांस्कृतिक विभिन्नता और पतनशीलता के कारण हमारी नई दुनिया में बढ़ती जा रही है. फलस्वरूप, हमारी राह कठिन है.
हम ‘पहल’ को फिर से प्रकाश में लाने के लिये एक नया ढांचा बना रहे हैं, कार्य विभाजन कर रहे हैं, सामूहिकता को प्रोत्साहित कर रहे हैं और साहित्य के अलावा कलाओं के दूसरे संसार में भी प्रवेश करने का प्रयास कर रहे हैं. यह चुनौतीपूर्ण है और अकेले दम का नहीं है. इसमे स्वप्न और विचार की ठोस पहल और और एक बड़े साथी-संसार की ज़रूरत है.
‘पहल’ के बारे में हम अपने इस ब्लाग पर संवाद करते रहेंगे और सुझावों का स्वागत करेंगे. ‘पहल’ को नये सिरे प्रकाशित होने में अभी समय लगेगा. ‘पहल; की इस पारी में मेरे साथ संपादन सहयोग के लिये कवि, कथाकार, विख्यात पत्रकार, और स्तंभ लेखक राजकुमार केसवानी जुड़ रहे हैं. हम मिलकर ‘पहल’ की एक ताज़ादम और सृजनात्मक दुनिया बनाने का प्रयास करेंगे.
आगामी बातें भी होती रहेंगी.
ज्ञानरंजन

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