शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

जबलपुर की हॉकी और ओलंपिक का 88 वर्ष पुराना है रिश्ता


पश्चि‍म मध्य रेल जबलपुर की महिला हॉकी ख‍िलाड़ी सुनीता लाकड़ा को रियो ओलंपिक में भाग लेने वाली की भारत की महिला हॉकी टीम में शामिल करने से हॉकी जगत में खुशी की लहर फैल गई है। जबलपुर और ओलंपिक का रिश्ता फिर एक बार जुड़ने जा रहा है। जबलपुर देश का सबसे पुराना हॉकी का गढ़ रहा है। जबलपुर में हॉकी को परिचित करवाने का श्रेय ब्रिटिश ऑर्मी है। 19 वीं शताब्दी के अंत में ब्रिटिश ऑर्मी ने हॉकी से स्थानीय नागरिकों को परिचित करवाने के पश्चात् भारतीय व एंग्लो-इंडियन समाज ने हॉकी खेलने की शुरूआत की। ओल्ड राबर्टसन कॉलेज के तत्कालीन प्राचार्य सर हेनरी शार्प ने 1894 में हॉकी को व्यवस्थि‍त रूप दिया। सन् 1900 में दो क्लब बनाए गए। सिटी स्पोर्ट्स व केंटोमेंट स्पोर्ट्स हॉकी क्लब के पश्चात् 20 वीं श्ताब्दी की शुरूआत के पहले दशक में पुलिस विभाग ने हॉकी को अपनाया। उस समय जबलपुर में ऑर्मी की दो प्रसिद्ध बटॉलियन 33 पंजाबीस् व फर्स्ट ब्राम्हण का डेरा जबलपुर में था और इनका नेतृत्व मेजर फेल्ट एवं सूबेदार बाले तिवारी कर रहे थे। याद रहे कि बाले तिवारी हॉकी के जादूगर ध्यानचंद के गुरू थे। ध्यानचंद के अनुज रूप सिंह का जन्म सन् 1909 में जबलपुर में ही हुआ था। उस समय नन्हें ध्यानचंद जबलपुर में पदस्थ अपने पिता जी के साथ फर्स्ट ब्राम्हण बटॉलियन की बैरक में रहते थे। 
जबलपुर की ब्रिटिश रेजीमेंट चेशायरने राष्ट्रीय हॉकी जगत में उस समय जबलपुर का नाम गौरवान्वि‍त किया, जब इस टीम ने बंबई में लगातार सन् 1910, 1911 व 1912 में आगा खां हाकी टूर्नामेंट जीता। उन्हीं की तरह जबलपुर के देशी क्लबों ने भी लखनऊ के प्रसिद्ध रामलाल हॉकी कप को सन् 1915 व 17 में जीता। तब तक जबलपुर के देशी हॉकी क्लब भोपाल के प्रसि‍द्ध ओबेदुल्ला एवं इंतीदार हॉकी टूर्नामेंट में अपना डंका बजा चुके थे। जबलपुर के सदर निवासी इब्राहिम व राबर्टसन कॉलेज के नुरूल लतीफ में हॉकी का ऐसा कौशल था कि वे सन् 1920 में ऑल इंडिया की किसी भी टीम में खेल सकते थे। एंग्लो इंडियन ख‍िलाड़‍ियों से सजी जीआईपी रेलवे भी इसी समय उभर कर सामने आई और इस टीम ने सन् 1921, 1922, 1925 एवं 1926 में आगा खां टूर्नामेंट के साथ सन् 1923 में ग्वालियर गोल्ड कप टूर्नामेंट  को पहली बार भाग लेते हुए जीता। उस समय जबलपुर के क्लब डीआईजी पुलिस, सिटी व केंटोंमेंट स्पोर्ट्स भारत के नामी व प्रथम श्रेणी के क्लबों में शामिल किए जाते थे। इस समय को जबलपुर की हॉकी का स्वर्ण‍िम युग कहा जा सकता है।
जेईएए ने सन् 1907 में स्कूलों में हॉकी की शुरूआत करवाई। स्कूलों में अंजुमन, सीएमएस, मॉडल, क्राइस्ट चर्च, सेंट अलॉश‍ियस, एपी नर्बदा हॉकी नर्सरी में रूप में पहचानी गई।
सन् 1928 हॉकी के लिए श‍िखर वर्ष के लिए जाना गया, जब रेक्स नॉरिस और मोरिस रॉक ने भारतीय हॉकी टीम का ओलंपिक में प्रतिनिधि‍त्व किया। इस भारतीय टीम में एम्सटर्डम में पहली बार हॉकी में ओलंपिक का स्वर्ण पदक जीता। इसके पश्चात् जबलपुर के कई हॉकी खि‍लाड़‍ियों ने व‍िभ‍िन्न ओलंप‍िक खेलों में भागीदारी की। इनमें सुलवान सन् 1932, कॉनराय 1948 इंग्लैंड ओलंपिक, पीस ब्रदर्स 1960 ओलंपिक और आस्ट्रेलियन हॉकी कोच मर्व एड्म्स भी जबलपुरियन रहे हैं।
जबलपुर के नेमीचंद्र अग्रवाल, एस. एन. शुक्ला, एस. के. नायडू व बी. के. सेठ ने अंतरराष्ट्रीय अम्पायर्स के रूप में ख्याति अर्जित की। जबलपुर के चारों अम्पायर्स ने बैंकाक, तेहरान व 1980 के एशि‍यन गेम्स में अम्पायरिंग की।
जबलपुर में महिला हॉकी को उस समय गति व लो‍कप्रियता मिली, जब सन् 1936 में नागपुर में सीपी एन्ड बरार लेडि‍स हॉकी एसोसिएशन का गठन किया गया। शुरूआत में महिला हॉकी में एंग्लो इंडियन व पारसी समाज की महिलाओं ने हॉकी में रूचि दिखाई और इन्हें इंटरनेशनल नॉरिस व रॉक ने प्रश‍िक्ष‍ित किया। सन् 1945 में जबलपुर का पहला महिला हॉकी क्लब जुबली क्लब बनाया गया और इसने जल्द प्रस‍िद्ध‍ि बिखेरना शुरू कर दी। जबलपुर की स्मि‍थ सिस्टर्स व नॉरिस सिस्टर्स ने नागपुर के क्लब से  खेलते हुए उस समय मध्यप्रदेश को नेश्नल चार बार विजेता बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दो बहिनों की जोड़ी  को भारत की पहली महिला टीम में शामिल किया गया, जिसने 1953 में इंग्लैड का दौरा किया था। इसी टीम ने सन् 1956 में आस्ट्रेलिया का दौरा भी किया। सन् 1961 में जबलपुर विश्वविद्यालय में महिला हॉकी ख‍िलाड़‍ियों की संख्या को देख कर महाकौशल महिला हॉकी एसोसिएशन का गठन किया गया। महाकौशल हॉकी एसोसिएशन की टीम ने सन् 1962 में अंतरविश्वविद्यालय टूर्नामेंट में पंजाब के साथ फाइनल मैच खेला।
जबलपुर की महिला हॉकी खि‍लाड़‍ियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस‍िद्ध‍ि पाई, उनमें चारू पंड‍ित, सरोज गुजराल, सिथ‍िंया फर्नांडीज, अविनाश सिद्धू (भारत की कप्तान रहीं), गीता राय, कमलेश नागरथ, आशा परांजपे, मंजीत सिद्धू और मधु यादव प्रमुख हैं। अविनाश सिद्धू ने भारतीय हॉकी टीम के कोच, मैनेजर, रैफरी की भूमिका भी निभाई। संभवत: वे भारत की एकमात्र महिला ख‍िलाड़ी रहीं हैं, जिन्होंने दो खेल हॉकी व वालीबाल में भारतीय टीम का प्रतिनिध‍ित्व किया। अविनाश सिद्धू बांग्लादेश शूट‍िंग टीम की खेल मनोवैज्ञानिक भी रहीं और उनके प्रयास से बांग्लादेश ने सैफ खेलों में मेडल जीतने में सफलता पाई।

                                                                                                 
                        


गुरुवार, 9 मई 2013

डा. संदीप जैन कैमराडिरी फोटोग्राफी काम्पीटिशन में अवार्ड आफ एक्सीलेंस से सम्मानित

लाइन्स आफ विजडम
राजीव सभरवाल डा. जैन को पुरस्कृत करते हुए
बलपुर के सुप्रसिद्ध र्इएनटी चिकित्सक  डा. संदीप जैन को आर्इसीआर्इसीआर्इ बैंक http://www.cameraderie.co.in द्धारा आयोजित कैमराडिरी फोटोग्राफी काम्पीटिशन-2013 में अम्योचर (शौकिया) श्रेणी में उनकी फोटो प्रविष्टि लाइन्स आफ विजडम के लिए जूरी च्वाइस अवार्ड से सम्मानित किया गया है। पिछले दिनों मुंबर्इ में आयोजित एक भव्य समारोह में आर्इसीआर्इसीआर्इ बैंक की प्रबंध संचालक व सीर्इओ चंदा कोचर, एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर राजीव सभरवाल और के. रामकुमार ने डा. संदीप जैन को सिल्वर अवार्ड आफ एक्सीलेंस से सम्मानित किया। डा. संदीप जैन वेस्टर्न जोन में विजेता रहे और पुरस्कृत होने वाले छायाकारों में वे मध्यप्रदेश से एकमात्र छायाकार थे। डा. जैन की प्रविष्टि को जूरी ने 16 सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि में भी चयनित किया।

अवार्ड
कैमराडिरी फोटोग्राफी काम्पीटिशन में देश भर से 8700 छायाकारों ने भाग लिया था और इसमें कुल 11,000 से ज्यादा फोटो प्रविष्टियां प्राप्त हुर्इ थीं। प्रतियोगिता में भाग लेने वाले छायाकारों को अपनी प्रविष्टि आन-लाइन प्रेषित करनी थी। प्रतियोगिता के निर्णायक ओग्लिवी एंड मेथर (ओएंडएम) एडवरटाइजिंग एजेंसी साउथ एशिया के एक्जीक्यूटिव चेयरमेन व क्रिएटिव डायरेक्टर पीयूष पांडे, स्मार्ट फोटोग्राफी के टेक्नीकल एडीटर रोहिंटन मेहता, लोनली प्लेनट के संपादक वर्द्धन कोंडविकार, प्रसिद्ध फैशन फोटोग्राफर रफीक सैयद, प्रसिद्ध इंडस्ट्रियल फोटोग्राफर हरि महीधर और आर्इसीआर्इसीआर्इ बैंक के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर के. रामकुमार थे। प्रतियोगिता में निर्णायकों के निर्णय के अतिरिक्त आन-लाइन वोटिंग से प्रतियोगिता का समग्र परिणाम निकाला गया।



मंगलवार, 19 मार्च 2013

विवेचना रंगमंडल राष्ट्रीय नाट्‌य समारोह: विविधताओं से भरा हुआ रंग परसार्इ-2013



बलपुर की विवेचना रंगमंडल ने पिछले दिनों पांच दिवसीय रंग परसार्इ-2013 राष्ट्रीय नाट्‌य समारोह का आयोजन स्थानीय प्रेक्षागृह शहीद स्मारक में किया। इस बार का नाट्‌य समारोह प्रसिद्ध साहित्यकार, शिक्षाविद, पत्रकार और पूर्व मेयर रामेश्वर प्रसाद गुरू को समर्पित था। विवेचना की स्थापना वर्ष 1961 में हुर्इ थी और संस्था ने 1975 से नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्शन से अपनी रंग यात्रा की शुरूआत की, जो आज तक जारी है। देश में विवेचना रंगमंडल की पहचान एक सक्रिय सरोकार से जुड़ी हुर्इ रंगकर्म संस्था के रूप में है। विवेचना प्रत्येक वर्ष नाट्‌य समारोह में नए निर्देशकों को मौका दे रही है। इस बार के नाट्‌य समारोह में भी नए नाट्‌य निर्देशक को मौका दिया गया। इस प्रयास को रंगकर्मियों के साथ-साथ दर्शकों ने भी सराहा। नाट्‌य समारेाह में मध्यप्रदेश नाट्‌य स्कूल के निदेशक संजय उपाध्याय को रंगकर्म में उल्लेखनीय योगदान देने के लिए 21 हजार रूपए की राशि भेंट कर सम्मानित किया गया।

पांच दिवसीय नाट्‌य समारोह में निर्माण कला मंच पटना ने संजय उपाध्याय के निर्देशन में कंपनी उस्ताद, अलंकार थिएटर ग्रुप चंडीगढ़ ने चक्रेश कुमार के निर्देशन में थाट, आल्टरनेटिव लिंविंग थिएटर कोलकाता ने प्रोबीर गुहा के निर्देशन में विषादकाल, देवांचलतम रंगमंडल लखनऊ ने संगम बहुगुणा के निर्देशन में दामाद-एक खोज और मेजबान विवेचना रंगमंडल ने प्रगति-विवेक पाण्डेय के निर्देशन में मोहन राकेश लिखित आधे-अधूरे को प्रस्तुत किया।

नाट्‌य समारोह में मंचित किए गए सभी नाटक विविध विषयवस्तु और प्रस्तुतियों की दृष्टि से दर्शकों को आकर्षित करने में सफल रहे। कंपनी उस्ताद संगीत और स्वतंत्रता संग्राम के अंतर्संबंधों के कारण, तो थाट वर्तमान के युवाओं व उनकी विचारधारा को ले कर दर्शकों को उद्वेलित कर गया। वहीं विषादकाल अपने फार्म के कारण और कलाकारों के अभिनय से जबलपुर के दर्शकों के दिल में गहरार्इ से उतरा। दामाद-एक खोज टिपीकल हास्य नाटक था, जो कि गंभीर प्रस्तुतियों के बीच रिलेक्स होने के लिए सफल रहा। मेजबान विवेचना रंगमंडल की प्रस्तुति आधे-अधूरे को नाटय समारोह की सबसे सफल प्रस्तुति के रूप में देखा गया। मोहन राकेश का यह नाटक लगभग पांच दशक बीत जाने के पश्चात भी अपनी विषयवस्तु के कारण सम-सामयिक है। आधे-अधूरे की प्रस्तुति में कलाकार और निर्देशक दोनों रूप में प्रगति व विवेक पाण्डेय सफल रहे और उन्होंने नाटय प्रेमियों की भरपूर प्रशंसा बटोरी।

इस नाट्‌य समारोह के माध्यम से विवेचना रंगमंडल ने दर्शकों के लिए एक नया प्रयोग भी किया। प्रयोग के रूप में दर्शकों को टिकट पहले से उपलब्ध करवा दी गर्इ और उनके अनुरोध किया गया कि वे समारोह स्थल में अपनी इच्छा व क्षमतानुसार सहयोग राशि  को एक डिब्बे में डाल दें। इस प्रक्रिया को दर्शकों का अच्छा प्रतिसाद मिला और उन्होंने उत्साह से सहयोग राशि देने में कोर्इ हीला-हव्वाली नहीं की। विवेचना रंगमंडल के निदेशक अरूण पाण्डेय इसे दर्शकों की परिपक्वता के रूप में देखते हैं। संजय उपाध्याय के साथ-साथ समारोह में शामिल हुए सभी नाट्‌य निर्देशकों ने दर्शकों की इस बात के लिए सराहना की कि जबलपुर का दर्शक अच्छा रंगकर्म देखने के साथ टिकट खरीद कर नाटक देखने वाले दर्शकों के रूप में देश में सबसे आगे है।

विवेचना रंगमंडल ने रंग परसार्इ-2013 के माध्यम से देश के हिंदी भाषी क्षेत्रों में आयोजित होने वाले नाटय समारोह में अपना एक विशिष्ट स्थान बना लिया है। हिंदी के साथ अन्य भाषार्इ राज्यों के रंग निर्देशकों की इच्छा है कि अपनी प्रस्तुतियों के साथ भविष्य के नाट्‌य समारोह में शामिल हों।


रविवार, 24 फ़रवरी 2013

पीवी राजगोपाल को अन्ना हजारे से अलग, स्वयं का अस्तित्व बनाए रखने की सलाह


केरल में जन्मे गांधीवादी कार्यकर्ता पीवी राजगोपाल गांधी शांति प्रतिष्ठान के उपाध्यक्ष और एकता परिषद के प्रमुख हैं . एकता परिषद की स्थापना वर्ष १९९१ में की गई थी . राजगोपाल ने वर्धा स्थित सेवाग्राम से कृषि का अध्ययन करने के बाद ७० के दशक में चंबल के डाकुओं के समर्पण और पुनर्वास में सक्रिय भूमिका निभाई . कथकली का नृत्य का प्रशिक्षण ले चुके राजगोपाल की पत्नी कनाडा मूल की जिल कार हैरिस हैं. जिल कार हेरिस भारत भ्रमण के साथ साथ सहकारिता , आदिवासी उत्पीडन और जल -जंगल - ज़मीन से जुड़े मामलों के अध्यन के लिए आईं थी . पी वी राजगोपाल के साथ इन क्षेत्रों में काम करते उन्हें लगा कि राजगोपाल अपने आंदोलन के प्रति तन मन से ईमानदार हैं , तभी उन्होंने राजगोपाल की जीवन संगिनी बनने का फैसला किया और तभी से वे उतनी ही ईमानदारी से राजगोपाल के हर कदम पर उनके साथ रहती हैं. 
राजगोपाल के मुताबिक एकता परिषद एक अहिंसक सामाजिक आंदोलन है, जो राष्ट्रीय स्तर पर गरीब और भूमिहीन लोगों के लिए भूमि अधिकारों की मांग कर रहा है। भूमि सुधार वन अधिकारों की मांग को ले कर राजगोपाल ने २००७ में भी ग्वालियर से दिल्ली तक २५ हजार लोगों के साथ यात्रा की थी . तब केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय भूमि आयोग का गठन किया . इसके प्रमुख खुद प्रधानमंत्री थे, लेकिन सरकार निष्क्रिय ही बनी रही। इसी निष्क्रियता और दुराग्रह के खिलाफ राजगोपाल के साथ हजारों भूमिहीन फिर से जनसत्याग्रह पर ३ अक्टूबर २०१२ को ग्वालियर से निकले . यह मार्च जब आगरा पह्नुचने को था तभी केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश आगरा पहुंच गए और पीवी राजगोपाल से पैदल मार्च को समाप्त करने का आग्रह किया. श्री रमेश ने हजारों आदिवासी पदयात्रियों को भरोसा दिलाया कि यदि वर्तमान मंत्रालय में मैं ६ माह रह पाया तो उनकी सभी मांगों का न्याय संगत निराकरण कर दूंगा. उनके इस वायदे का अभी तक कोई परिणाम सामने नहीं आया है. आदिवासी अपने को एक बार फिर ठगा सा महसूस कर रहे हैं लेकिन श्री राजगोपाल के रहते उनका यह जनसत्याग्रह अनुशासन और संयम का पर्याय बन गया। इस अनुशासन और संयम के पीछे राजगोपाल का ऐसे ही मार्च निकालने का लंबा अनुभव है। वे वर्ष २००७ के पहले करीब दस राज्य स्तरीय पदयात्राएं निकाल चुके हैं. श्री राजगोपाल पिछले दिनों जबलपुर आये. उन्होंने अपने आंदोलन के बारे में श्रोताओं से विस्तार से चर्चा की और अपनी चिंता से अवगत कराया.

प्राकृतिक संसाधनों का स्थानांतरण जल, जंगल और जमीन का स्थानांतरण हो रहा है . गांव से शहर की ओर पलायन, इससे शहर में भी स्थिति नारकीय हो गई. आम आदमी के लिए कोई सुविधा नहीं है. गांव से पलायन के कारण किसान आत्महत्या करने लगे हैं और इसकी संख्या निरंतर बढ़ रही है . इससे हिंसा भी बढ़ी और नक्सलवाद का फैलाव हुआ. विकास पर पुनर्विचार होना चाहिए. ग्रामीण भारत में अपराधीकरण का फैलाव हुआ . आदिवासियों और जमीन देने वालों को प्रताड़ित किया जा रहा है। खनन करने वाले जमीन हथिया कर लाभ कमा रहे हैं। हिंसा को बढ़ाने वाले विकास पर चिंतन करने की जरूरत है। सरकारी कर्मियों में संवेदनहीनता आम बात हो गई है . पहले ऐसी प्रवृत्ति छोटे कर्मियों या तहसीलदार तक थी, अब कलेक्टर या आईएएस में यह बात देखने को मिल रही है.

आईएएस जनसुनवाई का नाटक कर रहे हैं और नियंत्रण भी कर रहे हैं। इन लोगों का मुख्य उद्देश्य बड़ी व मल्टीनेशनल कंपियों को जमीन दिलवाना भर रह गया है। गांधी जी के स्वावलंबन की अवधारणा के स्थान पर परावलंबन की भावना विकसित हो रही है. सरकार की योजनाओं जैसे वृद्धावस्था पेंशन, नरेगा, विकलांग पेंशन जैसी योजना से आम आदमी कामचोर होता जा रहा है.

पीवी राजगोपाल ने इन विसंगतियों या प्रक्रिया से लड़ने के लिए अहिंसात्मक तरीके से जूझने की बात की. उन्होंने कहा कि गरीबों की ताकत, नव जवानों की ताकत, अहिंसक ताकत, सहभागिता की ताकत को इस्तेमाल करने की सलाह दी. पीवी राजगोपाल ने महत्वपूर्ण बात यह कही कि " चुप्पी और हिंसा के बीच खड़े हो कर अहिंसक विरोध करें."

पीवी राजगोपाल ने संबोधन के पश्चात प्रश्नोत्तर कार्यक्रम में स्पष्ट किया कि वे अन्ना हजारे के आंदोलन में किसी मतभेद के कारण नहीं, बल्कि पदयात्रा में व्यस्त होने के शामिल नहीं हुए. उन्होंने यह अवश्य कहा कि अन्ना और अरविंद केजरीवाल का आंदोलन की असफलता का मुख्य कारण उसमें शामिल मध्यम वर्ग का टिकाऊपन न होना था. पीवी राजगोपाल ने कहा कि मध्यम वर्ग की आंधी जरूरी और आवश्यक है, लेकिन उसका टिकाऊपन भी जरूरी है. आंदोलन में आदिवासियों, शोषित, महिलाओं को शामिल किया जाएगा, जो आंदोलन को टिकाऊ बनाएंगे.

कार्यक्रम में आमतौर पर पीवी राजगोपाल को यह सलाह दी गई कि वे अन्ना और केजरीवाल के आंदोलन से अपने को अलग रखें एवं स्वयं और संस्था का अस्तित्व बना कर आगे का रास्ता तय करें. पीवी राजगोपाल के लंबे समय से सहयोगी संतोष भारती ने भी उन्हें स्वयं का अस्तित्व अलग रख कर चलने की सलाह दी और अन्ना के साथ किसी भी प्रकार का गठजोड़ न करने की अपील की.

बुधवार, 29 अगस्त 2012

जे. सी. जोशी पंचम शब्द साधक साहित्य सम्मान एवं पाखी महोत्सव-2012: ज्ञानरंजन ने कहा- यह पुरस्कार राजपथ से जनपथ की तरफ जाने जैसा है

(प्रसिद्ध कहानीकार और पहल के संपादक ज्ञानरंजन को 25 अगस्त को जबलपुर में जे. सी. जोशी पंचम शब्द साधक साहित्य सम्मान एवं पाखी महोत्सव-2012 में शब्द साधक शिखर सम्मान से सम्मानित किया। समारोह में मुख्य अतिथि प्रसिद्ध कथाकार शेखर जोशी ने ज्ञानरंजन को 51 हजार रूपए की सम्मान राशि भेंट की। समारोह की अध्यक्षता नर्मदा यायावर, लेखक व कलाकार अमृतलाल बेगड़ ने की। इस अवसर पर ज्ञानरंजन ने अपने चिरपरिचित अंदाज में वक्तव्य दिया। उनका वक्तव्य यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत है) :-

माननीय अध्यक्ष नर्मदा के अविराम यात्री-सर्जक श्री बेगड़ जी, शेखर भाई, अपूर्व जोशी और मंचासीन आयोजक रचनाकार साथियों

    सभागार में बाहर से आए मेरे अनेक मित्र, कथाकार, कवि, कार्यकर्त्ता और स्थानीय नागरिक जीवन के नए-पुराने साथी बैठे हैं। प्यार करने वाले लोग हैं, तरह-तरह के जीवन साथी हैं, कुछ पुराने विद्यार्थी भी हैं। समझिए कि एक छोटा सा तारामंडल ही है। यह पहला सम्मान अथवा पुरस्कार है, जो मेरे गृह नगर में दिया गया, अन्यथा बाकी सभी दूर जगहों में ही दिए गए। इसी शहर में 50 वर्ष का मेरा जीवन बिखर गया है, जिसमें शानदार लोग रहते आए थे। इसलिए मैं किंचित भावुक और आवेगमय रहूं, तो क्षमा करेंगे। इस अवसर पर हम खुशी मनाने के साथ कुछ बेबाक भी रहें, तो बेहतर क्योंकि प्रसन्नताओं के साथ कुछ अफसोस और विषाद भी चिपके हुए हैं-जीवन का यह परम्परावादी विषय भी है कि उजालों के साथ छायाएं भी चलती हैं।

    मित्रों, अभी तक संसार के असंखयक सम्मानों, पुरस्कारों के अवसर पर बहुतेरे वक्तव्य दिए जा चुके हैं। ये वक्तव्य विचित्र, अद्वितीय और अविस्मरणीय हैं और गद्य तथा विचार के बहुमूल्य दस्तावेज भी। इस समुद्र में मेरी भी एक बूंद गिरती है, विलीन भी हो जाएगी। यह एक सुसंस्कृत ढर्रा है, जो मनुष्य जाति के बढ ते हुए नर्क को ढंग देता है। यह शिखर सम्मान, अभी तक मुझसे पर्याप्त वरिष्ठों और शीर्षस्थों को दिया जा चुका है। वरिष्ठों के अलावा चार समकालीन महापुरुषों को, जो हिन्दी की सांस्कृतिक सत्ता और सम्पदा के बड़े उदाहरण हैं। मेरे साथ आते ही यह सम्मान आयु में थोड़ा नीचे खिसक गया है, धारा बदल गई है, वह सामाजिक, सांस्कृतिक सत्ता से कुछ मुक्त हुआ है, भिन्न पंक्ति में बदल गया है, इसके तेवर में तब्दीली भी हुई है। यह शिखर सम्मान मुख्य धारा से अन्तर्धारा की तरफ खिसका है। एक वाक्य में कहना हो तो कहूंगा कि वह राजपथ से जनपथ की तरफ चला है। यह नियोजकों की विचार सरणि है, विवेक मार्ग है या नीति कहा नहीं जा सकता, पर केवल मेरे लिए नहीं, हिन्दी के प्रतिरोधी समाज के लिए यह सुखद है।
    मेरी अपनी जिंदगी, धातु, कोटि और उसके सामाजिक दर्शन में इतना जरूर दिखता रहता है कि मृत्यु के आसपास भारतीय बड़े माने जाने वालों की दुनिया में एक हड़बड़ी होना शुरू हो जाती है। उन पर किताबें आने लगती हैं, उन्हें पुरस्कृत किया जाने लगता है, उनकी अस्वस्थता का प्रसार सहानुभूति के साथ होता है, उन पर यांत्रिक संस्मरण लिखे जाने लगते हैं, उनके प्रति भक्ति, भावुकता और अंधत्व जागृत होने लगता है, उनके एकांत का अपहरण होने लगता है, चिंदी-चिंदी स्वाहा होने लगती है। उनके साक्षात्कारों में 'अनंत' जैसी दार्शनिकता का सवाल जवाब उत्पन्न होता है। इस प्रकार का जीवन व्यवहार और कुछ नहीं विदाई देने की टिपिकल भारतीय शैली है। चुपचाप जाने नहीं देंगे। जैसा जीवन रहा है, वैसी मृत्यु होने नहीं देंगे। प्रायः लोग सम्मानजनक अवसरों पर वृद्ध होने तक एक दार्शनिक भाषा आविष्कृत करते हैं। मेरी चिंता है कि क्या भारतीय समाज में शानदार विदाई संभव है ? जब किसी को पुरस्कृत सम्मानित किया जाता है, तो उम्मीद की जाती है कि वह कुछ विरल करेगा, पर मेरे लिए जीवन ने ऐसा कुछ छोड़ा नहीं है। वास्तव में, मैं यह चाहता था कि जिंदगी मेरा पीछा छोड़े। मेरी दुनिया तो उसी दिन खत्म हो रही थी, जिस दिन सड कों से पोस्ट बॉक्स गायब होने लगे थे। मेरी आवारगी का केंचुल बदल रहा था। मुझे चौराहे, अड्डे, मचान सुकून पसंद हैं और यह जबलपुर जहां मेरे जीवन के अंतिम लोग रहते हैं। आवारगी में अन्य बातों के साथ-साथ यह एक बुनियादी विचार निहित है रहता है कि निठल्लेपन के फल, श्रम के फलों से कम मूल्यवान नहीं हैं। उसकी आंखें खुली रहती हैं, उसके कान तैयार रहते हैं, वह किसी नितांत भिन्न चीज को खोलता रहता है, जो भीड  कभी नहीं देख सकती। यह मुझे वाल्टर बेंजामिन ने बताया। मैं मानता था कि जीवन से हम चीजों को सीधे उठा सकते हैं।

    साथियों, पिछली सदी के शुरूआत में एक आदमी बिना नागा धूप या बर्फ की परवाह किए बिना हर रोज वियना की सड कों पर टहलता दिखाई देता था-यह आदमी बिथोवेन था, जिसने अपनी घुमक्कड़ी के बीच अपनी शानदार स्वर लहरियों का कम्पोजिशन किया। आज कोई इस शैली, इस मार्ग का अनुसरण नहीं करता-पर मेरे लिए अब भी यह मूल्यवान है।

    तरह-तरह की बातें उमड़ रही हैं। लिखने की दुनिया के साथी याद आ रहे हैं। लिखने का मतलब है, अपने को अतिरेक में दिखाना। इसलिए लिखते समय जितना भी अकेलापन हो, वह काफी अकेलापन नहीं है, कितनी ही खामोशी हो वह पर्याप्त खामोशी नहीं है, कितनी ही रात हो वह काफी रात नहीं है। लिखते समय सारा समय ही बहुत कम है, क्योंकि सड कें अंतहीन लंबी हैं और रास्ते से कभी भी भटका जा सकता है। शुक्र है कि मैं भटका नहीं, पर बहुत से लोग मानते हैं कि कहानी से 'पहल' की तरफ जाना मेरा भटकाव ही है। इसके लिए- अपने डिफेंस के लिए मैं आपके सामने मोहम्मद इकबाल का एक शेर पढ ता हूं, जो मैंने 40 वर्ष पहले अपने कहानी संग्रह 'सपना नहीं' के प्रारंभ में दिया था-

                न बचा बचा के तू रख इसे
                    तिरा आईना है वो आईना
                कि शिकस्त हो तो अजीजतर
                    है निगाहे आईना साज  में

    मैं अपनी वास्तविक बात अपने साथी, आज के मुख्य अतिथि शेखर जोशी से शुरू करूंगा। इलाहाबाद में वे मेरे पड़ोसी थे। उनके और मेरे कई समान मित्र थे। उनकी कहानी 'कोसी का घटवार' पढ  कर मैं निर्जन में चला जाता था, मेरा दिल डूबता था- श्रम, दायित्व और एकांत का एक अपरिचित अनुभव मुझे मिला। आप एक दुर्लभ कथाकार हैं। इन्हें मैं अपने कई हीरो में एक मानता था, एक गुरुदत्त थे। मेरे पड़ोस में शेखर जी के अलावा कुछ और युग प्रवर्तक लोग थे। नरेश मेहता, उपेन्द्र नाथ अश्क, सरस्वती शरण कैफ, भैरव प्रसाद गुप्त, दूधनाथ सिंह और नीलाभ और भारती भंडार के सुप्रसिद्ध बैठकबाज वाचस्पति पाठक, जिन्होंने जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त, इलाचंद्र जोशी, निराला-हिन्दी की महान विभूतियों की किताबें छापीं।

    दरअसल मैं बताना चाहता हूं कि मैं किस तरह बन रहा था, मैं किस तरह की मोहब्बत और सोहबत में गढा जा रहा था। यह एक अत्यंत अमूर्त कहानी है। मैं प्रतिभा का नक्षत्र नहीं था, समूह समाज का एक बुनने वाला कीड़ा था। इस कीड़े को भद्र समाज ने थोड़ा-थोड़ा संशकित हो कर स्वीकार किया। अन्यथा नामवर सिंह, विष्णु प्रभाकर, श्रीलाल शुक्ल और राजेन्द्र यादव के साथ मेरी पंक्ति बैठती नहीं। मैं एक भिन्न पंक्ति का लेखक हूं। अगर बहुत सारी पंक्तियां इस दुनिया में या किताब के एक पृष्ठ पर जरूरी हैं, तो मैं किसी भी पंक्ति में रखा जा सकता हूं।

    बहुतों के साथ हुआ होगा, पर मेरे साथ भी यह हुआ कि चालीस से अधिक प्रतिनिधि संकलनों में, पाठ्‌य पुस्तकों और फिल्म निर्माणों में मेरी कहानी 'पिता', 'फेंस के इधर और उधर', 'अमरूद का पेड़' संकलित की गई। ये नरम लड़ाईयों, मामूली तौर पर परिवर्तनगामी और सुशील पीड़ा या बैचेनी की कहानियां हैं। ये कुशल हैं, मार्मिक हैं, तब्दीली का बुनियादी संकेत करती हैं, पर हमारे सभ्यता विमर्श को हल्के से छूती हैं। यह सब बड़े समाज को प्रिय है। लेकिन बहिर्गमन, छलांग, सम्बन्ध, अनुभव, घंटा नहीं संग्रहीत की गई, जो बुनियादी हैं, कुचलती हैं स्तब्ध करती हैं, हमारे सांस्कृतिक समूह को अवाक्‌ करती हैं। तीन दशक बाद भी इन कहानियों का मुहावरा और जबरदस्त हो कर एक राक्षस की तरह जीवित है। कायर समाज इसके बगल हो कर गुजरता है। इन कहानियों में एक अनिवार्य हिंसा और अश्लीलता है। पुराने मानकों और नीतिशास्त्र के मुताबिक ये कहानियां तंग करने वाली हैं। जब ये कहानियां छप कर आती थीं, तो मेरी मां पत्रिकाओं को तकिए के नीचे छिपा देती थीं। कितनी मासूम थीं मेरी मां। ये कहानियां इसलिए जीवित हैं कि हिन्दुस्तान अपने मिजाज में भीतर से बदला नहीं है। मैनरिज्म और शिल्प को छोड  दें, तो कमीनापन बैलोस बढा है।

    बेगड़ जी, शेखर जी, जोशी जी और भाई प्रेम भारद्वाज आज तक मैंने किसी को वास्तविक धन्यवाद नहीं दिया और मैं डिमेंशिया से पीड़ित नहीं हूं, इसलिए इस शिखर के बहाने अपने बनाने वालों, गढ ने वालों को याद करना चाहता हूं।

    धीरेन्द्र वर्मा, रामकुमार वर्मा, डा. रघुवंश, पं. उदय नारायण तिवारी और धर्मवीर भारती जैसे लोग मेरे अध्यापक थे। गार्डन सी रोडारमल, एग्नेश्का सोनी, अरविंद कृष्ण मेहरोत्रा, गिरधर राठी, विष्णु खरे और सुभाष मुखोपाध्याय जैसे मेरी कहानी के अनुवादक रहे। डा. इन्द्रनाथ मदान, उपेन्द्र नाथ अश्क, नेमिचंद्र जैन, नामवर सिंह, सुरेन्द्र चौधरी, विश्वनाथ त्रिपाठी, नागेश्वर लाल, परमानंद श्रीवास्तव, शिवकुमार मिश्र, सुवास कुमार और शंभुनाथ मेरे आलोचक हुए, मुझ पर लिखा। विभिन्न पुरस्कारों की घोषित जूरी में सर्वश्री नामवर सिंह, शानी, सोमदत्त, मैत्रेयी पुष्पा, विनोद कुमार शुक्ल, सत्यप्रकाश, हरिनारायण व्यास, ममता कालिया और नरेश सक्सेना जैसे निर्णायक रहे। मेरे संपादकों की दुनिया उल्लेखनीय है। प्रेमचंद के ज्येष्ठ और कनिष्ठ पुत्र श्रीपत राय और अमृत राय, शैलेष मटियानी, मार्कण्डेय, अशोक बाजपेयी, रमेश बक्षी, धर्मवीर भारती, भैरव प्रसाद गुप्त, चन्द्रभूषण तिवारी मेरे स्मरणीय संपादक थे। धर्मवीर भारती ने मेरी पांच कहानियां छापीं। भारती जी मेरे गुरू भी थे, पर इलाहाबाद में हमारी उनसे तलवार खिंची रहती थी। वे परिमलियन और मैं प्रगतिशील। पर वे लम्बे पत्रों के द्वारा गहरा दबाव बनाते और मैं उनके लिए लिखता। मार्कण्डेय ने 'कथा' में मेरी 'घंटा' कहानी छापी। इस कहानी के लिए उन्होंने मेरा इतना पीछा किया कि सुबह चार बजे उनकी नींद टूट जाती थी और मैं कहानी में जुट जाता। भीष्म साहनी ने मेरी 'संबंध' छापी और कहा कि प्यार और कठोरता का यह अद्‌भुत घर है। कमलेश्वर ने 'फेंस के इधर और उधर' तथा 'पिता' छापी। फेंस के इधर और उधर में एक पंक्ति को तितर-बितर करके उन्होंने कहानी को संवार दिया। 'अनुभव' चन्द्रभूषण तिवारी ने वाम में छापी और भैरव जी ने 'दिवास्वप्नी' छापने से पहले मुझसे बहस की-क्या ऐसा जीवन संसार है कहीं ? मैंने कहा हां है। अगर स्वप्न है तो दिवास्वप्नी भी है-यथार्थ और स्वप्न में गहरा सरगम है। और भैरव जी ने कहानी के उस अपरिचित संसार को स्वीकार किया। मित्रों, भैरव जी को हिन्दी कहानी का सबसे गुरुतर संपादक माना जाता था।

    मैं 'पाखी' के युवा संपादक को और आपको यह सूचना ताजा करना चाहता हूं कि देश के प्रथम आपात्‌काल में 'पहल' पर गहरे आक्रमण किए गए और 'पहल' ने उसका सामना किया। अखबारों के कुछ मशहूर संपादक, स्तंभकार और पत्रकारों ने 'पहल' का जी खोल कर समर्थन किया। टाइम्स ऑफ इंडिया के एक केबिन से पहल पर आक्रमण होता था और दूसरे केबिन से उसका समर्थन। मशहूर पत्रकार मायाराम सुरजन, राहुल बारपुते, कमलेश्वर, राजेन्द्र माथुर, एन. के. सिंह ने अपने स्तंभों और अग्रलेखों में पहल की भूमिका की सराहना की। यह वह समय था, जब देश के अखबार सन्नाटे में थे। मेरा आग्रह है कि नए संपादक सत्य का अन्वेषण करें। सच्चाई की कानाफूसी नहीं होती।

    संपादकों की यह शानदार परम्परा थी। आज कोई संपादक यह नहीं कह सकता कि उसके पूर्वज कुछ दे कर नहीं गए। पर आज के अधिकांश उस मार्ग पर चलना नहीं चाहते। वे भक्त चाहते हैं, उपकृतों का संसार चाहते हैं, लिटरेरी क्लबों का जायका चाहते हैं-हिन्दी की दुनिया कितनी बड़ी, कितनी दूर तक है और कितनी नामालूम पट्टियों तक फैली है, उसकी खोज निरंतर जरूरी है। इस प्रकार इस स्मृति में, मैं अपने अध्यापकों, आलोचकों और पाठकों के प्रति कृतज्ञता प्रकट कर रहा हूं। धन्यवाद दे रहा हूं।

    मुझे निर्जन जगहें पसंद थीं, पर वहां भी अपराधी और पालीथिन पहुंच चुके हैं। सवाल यह है कि क्या एक सक्रिय व्यक्ति को निर्जन में जाने का हक नहीं है ? लेकिन दुर्भाग्य से इस भवसागर में परिंदे ही फंसते हैं। यह जलसा एक झोंके की तरह आया है। मैं लगभग सो रहा था, जीवन संग्राम से बिछुड  गया था कि पाखी और इंडिपेंडेंट मीडिया ने जगाया और कहा कि सुबह हुई है आपको याद किया जा रहा है।

    अंत में मित्रों, मेरा जबलपुर जिसमें मैं रहता हूं उसकी मूल आत्मा भूमंडल के खिलाफ है-वह स्थूल रूप से खिलाफत करता नहीं दिखता पर अपनी जीवन भाषा में अपनी ही मौज में रहता है। कॉफी हाउस से निकल कर जिस पुराने शहर और बस्तियों से होता हुआ घर वापस लौटता हूं, वह कभी दमिश्क का बाजार होता है, कभी ताशकंद का कोना और कभी 'उसने कहा था' की गलियां और कभी बनारस की झलक। यहां 1940-50 के गाने सुनाते हुए रेडियो होते हैं। मैंने सारे कामों को अंजाम दे कर, सारे सौदे बंद करने के बाद, दिल्ली से संबंध विच्छेद करते हुए कुछ फिल्मों, कुछ संगीत और कुछ अमर किताबों, जिसमें मेरे पिता की गालिब भी शामिल है और कुछ शानदार दोस्तों के सहारे इस दुनिया को छोड़ा था, पर बीच-बीच में शनि चमक उठता है और मेरी बुनियादी आवारगी पर विराम लगाता है। मैंने पच्चीस दिन तक इस घोषित सम्मान की चिट्ठी को बच्चों, धर्मपत्नी से छिपाया पर टेलीफोनों में खुसर-पुसर से संदेह पैदा हो गए। क्या मैं वापस आ रहा हूं ? नहीं ! काशीनाथ, रवीन्द्र कालिया और दूधनाथ सिंह, मैं आपको आश्वस्त करता हूं कि मैं वापस नहीं आ रहा हूं। मैं वापस नहीं आ सकता।

    आयोजकों, देश भर के लेखक साथियों, जबलपुर के यारों और आदरणीय भद्रजनों को हार्दिक अभिवादन।

   

   

रविवार, 29 जुलाई 2012

पहल : संवाद – 2


मित्रों,
आप लोगों की निरंतर आती हुई शुभकामनाओं, अपूर्व उत्साह और सहकारी बनने की अभिव्यक्तियों ने हमें हैरानी की हद तक ख़ुश और तैयार किया है. कई बार यह होता है कि जहां हम नहीं हैं वहां भी हमारी सोच और कर्म की छाया पहंच चुकी होती है.
‘पहल’ के प्रसंग में भी यही हुआ. हम पहली बार इस माध्यम का उपयोग कर रहे हैं. जिन्हें उम्मीद थी या प्रतीक्षा में थे, हमारे पुराने और बिल्कुल नये साथी, वे अपनी प्रतिक्रियाओं से ‘पहल’ के भविष्य का एक स्पष्ट संकेत तो दे ही रहे हैं. वस्तुत: प्रेरणाएं सो नहीं गई थीं, हमीं निद्रा में चले गए थे. हमे जगाने के लिए धन्यवाद.
मित्रों, जब हम आपसे प्रत्यक्षत: मुखातिब नहीं हों तब भी, यकीन जानिये, हम दिन-रात प्रारंभिक तैयारियों में लगे हैं. क्रमश: उदबोधन की भाषा की ज़रूरत कमतर होगी और हम ठोस सूचनाओं और कामकाजी अभियान की तरफ बढ़ेंगे. आपसे आग्रह है कि बधाई की जगह अब हमें अपने आवासीय पत्ते, टेलीफोन नम्बर जैसी जानकारियां, हमारे ईमेल – gyanranjanpahal@gmail.com  और rkpahal2@gmail.com  पर हमें भेज दें.
आप ‘पहल’ की बिक्री, प्रसार, उसकी रचनात्मकता और उसके आर्थिक उपायों के बारे में जो भी बता सकें, हमे अवश्य बतायें. अपने भौगोलिक क्षेत्रों में, ‘पहल’ की प्रतियां किस संख्या में और कैसे पहुंचायेंगे, यह ख़बर दें. आपकी निजी सदस्यता तो ज़रूरी है ही. पहल की एक प्रति का मूल्य 50 रुपये और सालाना 200 रुपये होगा.
इस बाज़ार मूल्य से ऊपर हम ‘पहल’ को कीमती बनाने के लिये प्रतिबद्ध हैं. हमारा प्रयास होगा कि आपके साथ मिलकर हम अपने समय की नाड़ी, तापमान और मुहावरे की तरफ बढ़ते हुए ज़रूरी भाषा की खोज कर सकें.
शेष अगली बार.
आपके
ज्ञानरंजन
राजकुमार केसवानी

पहल में सरकारी विज्ञापन नहीं छपेंगे

हिंदी साहित्य जगत की अनिवार्य पत्रिका के रूप में मान्य पहल को विख्यात साहित्यकार, संपादक और कहानीकार ज्ञानरंजन ने पुन: निकालने का निश्चय किया है। उन्होंने तीन वर्ष पहल का प्रकाशन स्थगित कर दिया था। पहल का प्रकाशन बंद करते समय ज्ञानरंजन की टिप्पणी थी कि उन्होंने पहल को किसी आर्थिक दबाव या रचनात्मक संकट के कारण बंद नहीं किया है, बल्कि उनका कहना था-‘‘पत्रिका का ग्राफ निरंतर बढ़ना चाहिए। वह यदि सुन्दर होने के पश्चात् भी यदि रूका हुआ है तो ऐसे समय निर्णायक मोड़ भी जरूरी है।’’ उन्होंने उस समय स्पष्ट किया था कि यथास्थिति को तोड़ना आवश्यक हो गया है। नई कल्पना, नया स्वप्न, तकनीक, आर्थिक परिदृश्य, साहित्य, भाषा के समग्र परिवर्तन को देखते हुए इस प्रकार का निर्णय लेना जरूरी हो गया था। ज्ञानरंजन ने तब कहा था कि इस अंधेरे समय में न्यू राइटिंग को पहचानना जरूरी हो गया है, लेकिन ऐसा नहीं करना भी बेईमानी होगी। ज्ञानरंजन कहते हैं कि विकास की चुनौती और शीर्ष पर पहल को बंद करने का निर्णय एक दुखद सच्चाई है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार का निर्णय लेना भी एक कठिन कार्य है।

ज्ञानरंजन ने पहल के पुनर्प्रकाशन की घोषणा pahal2012.wordpress.com ब्लाग के माध्यम से की। शुरुआती तौर पर पाठकों से संवाद होगा। ब्लाग में दो पहल संवाद जारी हो चुके हैं। अब पहल के प्रकाशन में प्रसिद्ध पत्रकार राजकुमार केशवानी भी सहयोग करेंगे। जबलपुर में ज्ञानरंजन ने बातचीत में कहा कि पहल में सरकारी विज्ञापन बिलकुल नहीं छापे जाएंगे। तीन माह तक जमीनी काम किया जाएगा और फिर पत्रिका का प्रकाशन होगा। पत्रिका के प्रकाशन तक ब्लाग के माध्यम से पाठकों से संवाद होगा। पहल को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए वेबसाइट का भी उपयोग होगा। 
ज्ञानरंजन को पहल के संबंध में प्रतिक्रियाएं देने के लिए इन ईमेलों पर सम्पर्क किया जा सकता है-  gyanranjanpahal@gmail.com, rkpahal2@gmail.com