रविवार, 26 फरवरी 2012

रंग कर्मियों के जत्थे उदास हैं



(रंगकर्मी, निर्देशक और कवि अलखनंदन का पिछले दिनों भोपाल में निधन हो गया। उनके संबंध में विख्यात साहित्यकार ज्ञानरंजन ने एक महत्वपूर्ण संस्मरण आलेख लिखा है। यह आलेख नागपुर से प्रकाशित लोकमत में 26 फरवरी को प्रकाशित हुआ है।)

रंगकर्मी, निर्देशक और कवि अलखनंदन ने चार दशकों तक निरंतर रंगकर्म करते हुए अनेक बेजोड़ नाटकों की प्रस्तुतियाँ देश भर में की हैं। उन्हें संगीत नाटक अकादमी का सर्वोच्च सम्मान भी मिला जो इसी वर्ष मार्च में दिल्ली में दिया जाना था, पर मृत्यु ने इसे संभव नहीं होने दिया। इसी 12 फरवरी को मात्र 64 वर्ष की उम्र में, भोपाल में उनका निधन हुआ। देश और मध्यप्रदेश में इस निधन से रंग कर्मियों को गहरा आघात लगा है। उनके अपने रंग-मंडल के अनगिनत सदस्य और पूरा वक्ती कार्यकर्त्ता गहरे शोक में हैं। भोपाल के भारत-भवन से बाहर स्वतंत्र रूप से नाटकों का मंचन करना और श्रमजीवी तरीके से 'नट बुंदेले' नाम की रंग संस्था को राष्ट्रीय पहचान देना एक ऐसा चुनौतीपूर्ण काम था जिसे अलखनंदन ने बखूबी संगठित और संपादित किया। जबकि अपार साधनों के बावजूद भारत-भवन अपना रंगमंडल नहीं चला पाया। हम सभी जानते हैं कि हिन्दी में मौलिक नाटकों की लम्बी कमी, साधनों का अभाव, और घटते दर्शकों की परिस्थितियों के कारण निरंतर रंग-कर्म करना अब मुश्किलों भरा काम है। इसलिये अलखनंदन जैसे सक्रिय रंगकर्मी की मौत एक बड़ा सांस्कृतिक आघात है।


अलखनंदन मजबूत काठी के स्वस्थ और सकारात्मक व्यक्ति थे। शरीर पुखता और कसरती था। किशोर अवस्था से ही भारतीय भाषाओं के साहित्य और खासतौर पर लोक-नाट्‌य की पढ़ाई करने लगे थे। वे उदार वामपंथी थे, आत्महत्या के विरुद्ध थे, लेकिन आजीवन कठोर परिश्रम और रंगकर्म की लगातार रात-दिन जागती दिनचर्याओं और मुठभेड़ों ने उन्हें पता ही नहीं चला, धीरे-धीरे तोड़  दिया। उनके फेंफड़े तबाह हुए और चौबीस घंटों की आक्सीजन उन्हें लग गई। उन्हें 'फाइब्रोसिस ऑफ लंग्स' की बीमारी थी। उपचार बहुत हुआ पर चारागर हार गये। अलखनंदन 1948 में बिहार के लड़ाकू जिला भोजपुर में पैदा हुए और फरवरी 2012 में उनका निधन हुआ। बिहार से विस्थापित होकर वे छत्तीसगढ, सरगुजा और बुंदेलखण्ड के इलाकों में बार-बार जाते रहे। इन इलाकों से उनका गहरा लगाव और प्रेम था। उनकी समूची बुनावट में जो मिश्रण था वह इसी घुमंतू आचरण का परिणाम था। वे भोजपुरी बोलना कभी नहीं भूले, जबकि उनका अंतिम लेण्डस्केप बुंदेलखण्ड ही बना। जबलपुर आकर वे स्थिर हुए और प्राण प्रण से काम करना शुरू हुआ। उनकी काया में जो भाषा तैर रही थी वह संघर्षशील हिन्दी पट्टियों में ही तैयार हुई थी। अलखनंदन कुंभकार के चाक की तरह अविराम अपने जीवन को चलाते रहे। उन्होंने नाटक किये भी और लिखे भी।
भोजपुर से जबलपुर
मेरी अलखनंदन से मुलाकातें 1970 के आसपास शुरू हुईं। मुझे इलाहाबाद से आये 10 वर्ष हो चुके थे और जबलपुर शहर की आत्मा को हमने पकड़ लिया था। यही वह समय था जब अलख में नाटकों का कीड़ा पैदा हुआ। उसने आरंभिक दिनों में नौटंकी, रामलीलाएं खूब देखीं और आधुनिक नाटकों की तरफ उसका रुझान बढ ने लगा था। वह चौबीस घंटा बेचैन प्राणी था और नींद में भी संवाद बोलते-बोलते उठ बैठता था। वह सतपुला (जबलपुर का एक अंचल जहां से आर्डिनेंस फेक्ट्री इस्टेट द्याुरू होती थी और जहां श्रमिकों के क्वार्टर्स भी थे) से शहर के मध्य तक हांफता हुआ, मिलन की उतावलियों के साथ, युवकों की तरह कभी सायकिल से कभी पैदल आता जाता था। बीच में कभी घमापुर में कहानीकार राजेन्द्र दानी से भी बैठक करता था। उसकी आवारगी सोद्देश थी। शामों का वार्तालाप, मित्र मिलन, कार्य-योजनाएं, देर रात तक नाटकों का पाठ, रिहर्सल आदि होते रहते थे। उस समय तक नई पीढ़ी पर हरिशंकर परसाई का जादू चढ़ ने लगा था। विनोद कुमार शुक्ल और नरेश सक्सेना को शहर छोड़ कर गये हुए लगभग एक दशक हो रहा था। मुक्तिबोध की मृत्यु हो चुकी थी, लेकिन उनके सृजन का साया शहर पर जबरदस्त रूप से मंडरा रहा था। परसाई की उपस्थिति और मुक्तिबोध की अनुपस्थिति ने छात्रों, अध्यापकों, लेखकों, पत्रकारों और रंग-कर्मियों को उत्तेजित किया हुआ था। भोजपुर के बाद एक नया अलखनंदन जबलपुर में पैदा हो रहा था। तीस साल वह जबलपुर में रहा और तीस साल भोपाल में। शुरूआत उसकी जबलपुर में हुई और अंत भोपाल में। राजधानी में, सर्वसाधारण से जुड़े रंग-कर्म और लोकप्रिय रंगमंच की वजह से वह नाटक के संसार का सिरमौर बना और मुखयमंत्री, संस्कृति मंत्री को भी उसका गुणगान करना पड़ा। जबकि उसकी शवयात्रा में अभिनेता, राजनैतिक-सांस्कृतिक कार्यकर्त्ता, लेखक, दर्शक, स्तंभकार और हिन्दी-उर्दू की दुनिया के बहुत से लोग शामिल थे।
कारंत का साथ
मेरी मुलाकातें उससे सातवें-आठवें दशक में खूब हुईं और जल्दी ही हम एक दूसरे के साथी हो गये। उसके भीतर मुझे अपना आवारापन नज़र आता था। इलाहाबाद से उखड़  जाने के बाद मैं जबलपुर में अपने ठिकाने बना रहा था। उन दिनों जबलपुर बहुत ही खूबसूरत और शानदार था, सांस्कृतिक रूप से खूब सम्पन्न। इसी वजह से मैं एक आंशिक कम्यूनिस्ट बन सका। हमने मिल-जुलकर विवेचना जैसी रंग-संस्था का निर्माण किया, जिसने अब अपनी कीर्ति के 50 वर्ष पूरे कर लिये हैं। इसी समय अलखनंदन एक पक्का युवक हुआ और उसने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ  के लोक-नाट्‌यों, लोक-संगीत का गहरा अध्ययन कर लिया था, जिस वजह से बाद में वह अपने रंगमंच पर काव्यात्मक-बिंबों की रचना और लोकतत्वों का पनराविष्कार और नवाचार के लिये चर्चित हो सका। इसी आधारभूमि की वजह से अलखनंदन को भारत-भवन में रहते हुए कारंत जैसे विश्वविख्यात निर्देशक का न केवल साथ मिला बल्कि उनके माहिर रंग-संगीत का अनुभव भी मिला। विदित हो कि भारत-भवन के रंगमंडल में अलखनंदन आठ सालों तक ब. व. कारंत के सहायक निर्देशक रहे। कारंत के बाद अलख सर्वोच्च निर्देशक पद पर जाने के लिये पूरी योग्यता रखने बावजूद उससे इसलिये वंचित रहे कि उन दिनों के एक जाने-माने संस्कृति-जार ने ऐसी संभावना से उन्हें वंचित कर दिया।

जबलपुरिया शुरुआत
सातवें दशक के अंतिम दौर में जबलपुर की अपनी रक्षा-मंत्रालय की अच्छी खासी नौकरी छोड़ कर पूरा वक्ती रंग कर्म करने की बात अलख मुझसे हमेशा करते थे। मैं उन्हें रोकता था पर वे नहीं माने। उन्होंने चुपचाप अंतिम निर्णय कर लिया। अलखनंदन एक बेचैन, मेहनती और जिद्दी आदमी था। निर्णय में उसकी भावुकता नहीं थी, मेरे रोकने में जरूर थी। कुछ ही दिनों पहले जबलपुर में पंकज स्वामी को एक साक्षात्कार देते हुए, अलख ने कहा था कि अगर मुझे 250 वर्ष का जीवन मिले तो उतने ही समय तक रंग कर्म करते हुए थकूंगा नहीं। इसलिये उसने नौकरी छोड़  दी और आजाद हो गया। वह बिल्कुल निडर था और लक्ष्यभेद के लिये तत्पर था। बाद में उसने भोपाल के एक बड़े उर्दू शायर फज्ल ताविश के नाटक 'डरा हुआ आदमी' की शानदार यादगार प्रस्तुति की और जबलपुर में भी 'विवेचना' ने इसका मंचन किया।
जहां तक मुझे याद आता है अलखनंदन की जबलपुरिया शुरूआत एक नुक्कड़ नाटक से हुई - 'जैसे हम लोग'। इसे हिन्दी के कथाकार शशांक ने लिखा था। शशांक तब मनोविज्ञान के छात्र थे और उन्हें इस नाटक को समय पर लिख देने के लिये मैंने एक कमरे में बंद कर दिया था। एक स्थानीय रंग-संस्था 'कचनार' के लिये अलख ने मशहूर नाटकों, 'रंग गंधर्व' और 'तीन अपाहिज' का निर्देशन किया। विवेचना के साथ उन्होंने 'दुलारी बाई', 'बकरी', 'इकतारे की आँख', 'बहुत बड़ा सवाल', और 'वेटिंग फॉर द गोडो' जैसे बड़े नाटक किये और इन नाटकों ने खूब धूम मचाई। इसी दौरान अलख ने धमतरी, रायपुर, बिलासपुर और बाद में अम्बिकापुर, रायगढ  में ऐसी कार्यशालाएं कीं जिनसे स्थानीय रंगकर्मी उभर कर आ सके। आज भी वे नाटक के जीते-जागते केन्द्र बने हुए हैं। यह 1975 से 1980 का समय था।
राष्ट्रीय पहचान
अलख के जीवन का दूसरा दौर उसकी राष्ट्रीय पहचान का है, जिसमें वह जबलपुर से भोपाल प्रवास पर गया और प्रमुखतः वहीं रह गया। उस समय भारत-भवन में रंगमंडल का ताना-बाना बुना जा रहा था और अलख उसके संस्थापकों, निर्माताओं में एक प्रमुख व्यक्ति था। उसने लगभग आठ वर्ष तो देश के विख्यात और महान रंगशिल्पी ब. व. कारंत के साथ ही काम किया। कुल 16 वर्ष अलखनंदन भारत भवन में रहा। उसने 'आधे अधूरे', 'क्लर्क की मौत', 'आगरा बाज़ार', 'शस्त्र संतान', 'चंदा बेड़नी', 'ताम्र पत्र', 'जगर मगर अंधेर नगर' और 'चारपाई' जैसे सफल नाटकों की प्रस्तुति की। मोहन राकेश, रामेश्वर प्रेम, हबीब तनवीर, त्रिपुरारी शर्मा और मणि मधुकर के नाटकों के अलावा उसने स्वयं के भी नाटक किये। उसका एक खास काम यह था कि उसने बच्चों के लिये 10 से अधिक नाटकों की परिकल्पना की और उनका मंचन किया, करवाया। एशिया कविता समारोह में उसने श्रीकांत वर्मा के 'मगध' की नाट्‌य प्रस्तुति की थी, जिसे खूब सराहना मिली। उसने बेंगलुरू में उर्दू थियेटर की स्थापना की और २० साल तक देश के बड़े नाट्‌य समारोहों में यादगार प्रस्तुतियाँ भी उसके खाते में हैं।

नट बुंदेले का अवदान
भारत भवन से मुक्त होने से पहले ही उसने एक नाटक टुकड़ी 'नट बुंदेले' की स्थापना कर ली थी, जिसमें वह शेष जीवन काम करता रहा। यही उसका मौलिक दस्ता था। वह लगातार कविताएं लिख रहा था। उसके दो-तीन संग्रह आये, पहला कविता संग्रह 2003 में आया था, जिसका नाम 'घर नहीं पहुँच पाता' था। वह अपने नाटकों में कविताओं का प्रयोग अक्सर करता था। उसके एक नाटक में मुक्तिबोध की एक कविता का पाठ मैंने भी किया था।

अलखनंदन ने जब 'ताम्र पत्र', नट बुंदेले के बैनर पर किया तब वह रंग भाषा में एक सृजनात्मक मुठभेड  करने की क्षमता पैदा कर चुका था। उसका कद इतना बड़ा हुआ कि उसके एक नाटक 'महानिर्वाण' में खुद ब. व. कारंत ने एक अभिनेता की हैसियत से काम किया। यह 1994-95 की घटना है। भोपाल गैस त्रासदी पर उसके नाटक 'बांझ घाटी' के समय विख्यात अभिनेत्री विभा मिश्रा से उसका गहरा विवाद भी हुआ। उसने अरुण पांडे, सीताराम सोनी, राजेन्द्र कामले, गौरीशंकर यादव, अजय घोष, आलोक चटर्जी, तपन बेनर्जी, इरफान सौरभ और रंजना भट्ट जैसे बड़े अभिनेता थियेटर की दुनिया को दिये और बसंत काशीकर जैसे युवा रंग निर्देशक को गहरी प्रेरणाएं।
अलखनंदन को शिखर सम्मान, संगीत नाटक अकादमी का शीर्ष राष्ट्रीय सम्मान, हबीब तनवीर सम्मान, स्पंदन पुरस्कार और नरसी सम्मान आदि अनेक सम्मान मिले। पर उसका वास्तविक सम्मान रंग जनों के भीतर था। कहते हैं कि वह भोपाल शहर में होने वाला, भरसक, हर नाटक देखता था। भारत भवन में उसके लिये एक कुर्सी सदैव खाली रहती थी। वह नाटक देखता और चुपचाप लौट जाता था। वह तत्काल प्रतिक्रिया नहीं देता था। जिस दिन यह कुर्सी खाली रह जाती थी, इसका मतलब होता था कि अलखनंदन भोपाल में नहीं है। अब यह कुर्सी सदैव खाली रहेगी।

सोमवार, 20 फरवरी 2012

विवेचना रंगमण्डल राष्ट्रीय नाट्‌य समारोह-2012 : उत्कृष्ट रंगकर्म को दर्शकों का समर्थन


बलपुर की विवेचना रंगमण्डल ने पिछले दिनों पांच दिवसीय 'रंग परसाई-2012 राष्ट्रीय नाट्‌य समारोह' का आयोजन 'शहीद स्मारक' में किया। यह नाट्‌य समारोह प्रसिद्ध कवि और गीतकार पंडित भवानी प्रसाद तिवारी को समर्पित था। विवेचना की स्थापना वर्ष 1961 में हुई थी और संस्था ने 1975 से नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्शन से अपनी रंग यात्रा की शुरूआत की, जो आज तक जारी है। देश में विवेचना रंगमण्डल की पहचान एक सक्रिय सरोकार से जुड़ी हुई रंगकर्म संस्था के रूप में है। विवेचना रंगमण्डल पिछले कुछ वर्षों से नए निर्देशकों की नाट्‌य प्रस्तुतियों को राष्ट्रीय समारोह में भी मौका दे रही है। इस बार के नाट्‌य समारोह में भी नए नाट्‌य निर्देशकों को मौका दिया गया। इस प्रयास को रंगकर्मियों के साथ-साथ दर्शकों ने भी सराहा। इस बार के नाट्‌य समारोह की एक खास बात यह भी रही कि दर्शकों को पांच दिन में छह नाटक देखने को मिले। समारोह की शुरूआत हास्य नाटक से हुई और अंत गंभीर और विचारोत्तेजक नाटक से हुआ। नाट्‌य समारोह की एक विशेषता यह भी रही कि इसमें हरिशंकर परसाई, मुक्तिबोध, बादल सरकार और राही मासूम रजा लिखित नाटकों को प्रस्तुत किया गया। नाट्‌य समारोह में एक नाट्‌य प्रस्तुति ऐसी भी रही, जिसे कलाकारों ने बिना स्क्रिप्ट के प्रस्तुत किया। कुल मिला कर कहें तो जबलपुर के दर्शकों को पांचों दिन अलग-अलग रंगों के नाटक देखने को मिले और उन्होंने इसका भरपूर आनंद लिया। नाट्‌य समारोह के समापन पर भोपाल के रंगकर्मी जावेद जैदी को विवेचना रंगमण्डल ने प्रतीक चिन्ह और ग्यारह हजार रूपए की राशि भेंट कर सम्मानित किया।
नाट्‌य समारोह के पहले दिन विवेचना रंगमण्डल ने प्रगति-विवेक पाण्डे के निर्देशन में बादल सरकार लिखित वल्लभपुर की रूप कथा को प्रस्तुत किया। वल्लभपुर की रूप कथा बादल सरकार का सिचुएशनल कॉमेडी नाटक है। इस नाटक को बादल सरकार ने सन्‌ 1963 में लिखा था। इसका प्रथम मंचन बादल सरकार द्वारा स्थापित संस्था 'शताब्दी' ने 28 नवम्बर 1970 में किया था। तब से इस नाटक को देश भर की कई रंग संस्थाएं प्रस्तुत कर चुकी हैं। वैसे वल्लभपुर की रूप कथा अंग्रेजी फिल्म 'यू आर नोएंजल्स' पर आधारित नाटक है। विवेचना रंग मण्डल ने नाट्‌य समारोह के माध्यम से इस नाटक को पहली बार प्रस्तुत कर के दर्शकों को काफी प्रभावित किया। सिचुएशनल कॉमेडी के कारण दर्शकों ने नाटक का भरपूर मजा लिया। बिना मध्यांतर के लंबा नाटक होने बावजूद दर्शक कहीं भी उकताए नहीं। नाटक के एक निर्देशक विवेक पाण्डे ने मुख्य पात्र भूपति की भूमिका भी निभाई। उन्होंने सफल अभिनय के साथ एक जटिल विषय वाले नाटक की प्रभावी प्रस्तुति कर दोहरी सफलता अर्जित की। नाटक में सभी कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया, लेकिन रवीन्द्र मुर्हार ने संजीव की भूमिका निभा कर दर्शकों का दिल जीत लिया।
समारोह के दूसरे दिन दो नाट्‌य प्रस्तुतियां हुईं। द फेक्ट आर्ट एन्ड कल्चर सोसायटी, बेगुसराय ने गजानन माधव मुक्तिबोध लिखित 'समझौता' और मंच मुम्बई ने 'हम बिहार से चुनाव लड़ रहे हैं' को प्रस्तुत किया। हम बिहार से चुनाव लड़ रहे हैं हरिशंकर परसाई का सशक्त व्यंग्य है और इसे विजय कुमार मंच पर उतने ही प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करते हैं, इसलिए जबलपुर में लगभग एक-डेढ़  वर्ष के अंतराल में इस नाटक के मंचन होते रहते हैं। विजय कुमार ने एकल अभिनय से परसाई के व्यंग्य को और धारदार बना दिया है, जिसे जबलपुर के दर्शक खासा पसंद करते हैं। दूसरी नाट्‌य प्रस्तुति समझौता भी एकल अभिनय पर आधारित थी। यह नाटक विचारोत्तेजक है, जिसमें दुनिया को सर्कस के रूप में प्रस्तुत किया गया है। कहानी का नायक नौकरी की तलाश में एक दफ्तर से दूसरे के बीच भागते रहने की पीड़ा नाटक का धरातल है। समझौता एक ऐसे नौजवान की कहानी है, जो मौजूदा हालात के सामने असहाय और मजबूर है। नाट्‌य प्रस्तुति उस समय चरमोत्कर्ष पर पहुंच जाती है, जब दुनिया में सफलता के लिए इंसान स्वयं को जानवरों के रूप में ढालने को तैयार हो जाता है। वैश्वीकरण की अंधी दौड  के समय में 'समझौता' जीवन की कड़वी सच्चाईयों को उजागर करने का सफल प्रयास है। पूरे नाटक में मानवेन्द्र त्रिपाठी ने फिजीकल थिएटर को एक पाठ्‌य पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया है। नाटक में संगीत और प्रकाश परिकल्पना ने विषय के सम्प्रेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नाटक के निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन प्रस्तुति के माध्यम से अपनी बात कहने में पूर्णतः सफल रहे।
समारोह के तीसरे दिन दस्तक, मुम्बई ने दास्तान गोई की प्रस्तुति दी। दास्तान गोई का लेखन व निर्देशन महमूद फारूखी ने किया है। जबलपुर में दास्तान गोई को राणा प्रताप सेंगर, शेख उस्मान और राजेन्द्र कुमार ने प्रस्तुत कर महमूद फारूखी और दानिश हुसैन की याद को ताजा कर दिया। इससे पहले फारूखी और हुसैन दास्तान गोई को प्रस्तुत कर चुके हैं। समारोह में दास्तान गोई की पारम्परिक दास्ताने अमीर हमजा के दो मुख्य किरदारों अमीर हमजा और उसके दोस्त अमर अय्यार की कहानी के साथ-साथ समकालीन डा. विनायक सेन की संघर्ष गाथा को दास्तान गोई के रूप में प्रस्तुत कर एक नया प्रयोग किया गया, जिसे दर्शकों का समर्थन भी मिला।
समारोह के चौथे दिन मुम्बई की रंग संस्था सारंग ने 'लैट्‌स अनपैक!' की प्रस्तुति दी। यह नाटक दर्शकों के लिए बिल्कुल नया अनुभव रहा। बिना स्क्रिप्ट के नाटक में छह पात्र 15 दिनों के लिए दुनिया से पूरी तरह अलग हो कर साथ रहते हैं। इस दौरान उनके पास एक अखबार, टेलीविजन, जिम, बगीचा और साथ में रखने के लिए कुछ निजी समान के अलावा कुछ नहीं रहता है। छहों पात्र पहेलीनुमा-विचित्र कामों में फंस जाते हैं, कुछ अजीब से खेल खेलते हैं और जटिल चर्चाएं करते हैं। इस सब में वे मजबूर हो जाते हैं अपने भीतर को झांकने के लिए और अपने परिप्रेक्ष्य पर सवाल उठाने के लिए और अपनी सहज प्रवृत्ति से रूबरू होने के लिए। नाटक का संदेश ही है कि हम अपने को अनपैक कर लें या जैसे हैं वैसे ही रहें बिना किसी आवरण के। इस नाटक की खासियत है कि इसका हर मंचन अपने आप में मौलिक है। छह पात्रों के बातों से दर्शक स्वयं को आत्मसात्‌ कर लेता है। हिंग्लिश होने के बावजूद नाटक में पात्रों की बातचीत का दर्शक आनंद लेते हैं और स्वयं को भी एक पात्र समझने लगते हैं। यही बात इस नाटक की सफलता का एक महत्वपूर्ण पहलु है।
नाट्‌य समारोह की अंतिम प्रस्तुति के रूप में संभावना भोपाल ने 'टोपी शुक्ला' का मंचन किया। टोपी शुक्ला राही मासूम रजा के उपन्यास का नाट्‌य रूपांतरण है। कहानी भारत की आजादी के कुछ पहले की है और आजादी के बाद के भारत के नौजवानों के सपनों और ख्वाहिशों को दर्शाती है। जिंदा रहने के लिए लोग समझौता करते हैं और जो समझौता नहीं कर पाता है, वह आत्महत्या कर लेता है। राही मासूम रजा के अनुसार यह कहानी 'समय' की है, इस कहानी का हीरो 'समय' है, समय के अलावा कोई इस लायक नहीं है कि उसे कहानी बनाया जाए। यह नाटक अवसाद से शुरू हो कर अवसाद पर खत्म होता है। नाटक में प्रसिद्ध रंगकर्मी अलखनंदन के बेटे अंशपायन सिन्हा 'अंशु' ने टोपी शुक्ला के मुख्य पात्र की भूमिका निभाई। नाटक के दूसरे दिन अंशपायन सिन्हा को अपने पिता अलखनंदन के निधन की खबर जबलपुर में ही मिली। टोपी शुक्ला की विषयवस्तु अवश्य आजादी के समय की है, लेकिन इसमें उठाए गए साम्प्रदायिकता के सवाल आज भी सम-सामयिक हैं और लोगों को उद्वेलित कर रहे हैं। साम्प्रदायिकता जैसे नाजुक विषय को निर्देशक जावेद जैदी और उनके कलाकारों ने बहुत संजीगदी से प्रस्तुत किया।
विवेचना रंगमण्डल ने राष्ट्रीय नाट्‌य समारोह के आयोजन से इस मिथक को भी तोड़ा कि नाटकों को दर्शक देखने नहीं आते। नाट्‌य समारोह के पांचों दिन प्रेक्षागृह में दर्शकों की भीड़  जुटी और उन्होंने टिकट खरीद कर उत्कृष्ट रंगकर्म को समर्थन और सहयोग भी दिया।

मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

साहित्य के गांव में बाजार


(अभी हाल ही में ग्रामीण विषयवस्तु के दो लेखकों-अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल को ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। 'कौन बनेगा करोड़पति' में गांव के गरीबों को भागीदारी दी जा रही है। यह अनायास नहीं है। इसके पीछे गांव पर बाजार की पकड़ और पहुंच को मजबूत बनाने का सोचा समझा अभियान है। इसी मुद्दे पर ज्ञानरंजन ने 'साहित्य के गांव में बाजार' शीर्षक से एक विश्लेषण नागपुर से प्रकाशित लोकमत में पिछले दिनों किया। उनका विश्लेषण यहां प्रस्तुत है।)

मरकांत और श्रीलाल शुक्ल विशुद्ध रूप से ग्रामीण पृष्ठभूमियों में प्रचुर लेखन करने वाले कथाकार नहीं हैं। यद्यपि अमरकांत ग्रामीण इलाके से ही शहर में आए, जिस तरह हिन्दी में अनेक रचनाकार आए हैं। प्रेमचंद, शिवपूजन सहाय, जगदीश चंद्र, फणीश्वरनाथ रेणु, राही मासूम रजा, मार्कंडेय, शिवमूर्ति और हरनोट आदि कथाकारों की तरह अमरकांत ग्रामीण लेखन के रचनाकार नहीं हैं। उन्हें हम प्रेमचंद की कहानी की परंपरा को अग्रसर करने वाले कहानीकार अवश्य मान सकते हैं।

अमरकांत की राह- 1950 अथवा आजादी के बाद इलाहाबाद, बनारस, लखनऊ, आगरा, बलिया आदि उत्तरप्रदेश के शहर इस तरह के शहर थे कि उन्हें बड़ा गांव या मंझोला शहर कहा जा सकता था। दो दशक पहले तक तो दिल्ली को भी बड़ा गांव कहते थे पढ़े लिखे लोग। आज के किसी भी मध्यमवर्गीय शहरों की तुलना में वे बेहद मंद, कछुआ चाल, कम जनसंखया वाले, उद्योगविहीन, छोटे कार्यालयों वाले, उनींदे, वनस्पतियों से घिरे, पैदल और साइकिल प्रमुख शहर थे। शहरो के ऊपर ग्रामीण अक्स था, शहरों में बोलियों का पर्याप्त प्रचलन था। अमरकांत की यही राह थी, यही जगह थी। अमरकांत में जो अद्वितीय विनोद था, वह ग्रामीण समाज और मनुष्य से आया था। उनकी कहानियों के विषयों में गांव, कस्बे और शहर की मिलीजुली अवस्था है। सब एक दूसरे को 'ओवरलैप' करते हुए अपनी कहानियों, केवल कहानियों के बल पर वे हिन्दी के थोड़े-बहुत लेखक थे।
श्रीलाल की जगह-श्रीलाल शुक्ल नौकरशाह थे। निपुण, बुद्धिमान, शीन काफ दुरुस्त, उच्च सामाजिक प्रतिष्ठावान तो थे ही उनकी सामाजिक बनावट भी ऐसी ही थी। अमरकांत शुरूआती दिनों से कम्युनिस्ट थे। 'कम्युनिस्ट' कहानी लिखी थी, छोटी-मोटी नौकरी करते रहे, जीवन कठोर था, पर उनमें गिला-शिकवा कभी नहीं रहा। यह उनकी विचारधारा का आचरण था, जीवन भर यह बना रहा है। श्रीलाल शुक्ल हिन्दी में उस गुट के प्रिय रहे, जो वामपंथ विरोधी रहा आया, जिसका अस्तित्व ही वामपंथ की खिलाफत से बना। वे 'परिमल' में अमूर्त रूप से सक्रिय रहे। उनका दोस्ताना वहीं था। उन्हें समाजवादियों का लाभ मिला। पर श्रीलाल शुक्ल अपने दमखम, शराफत, हाजिरजवाबी के बाद भी और रागदरबारी जैसी चर्चित कृति के बाद भी बड़े लेखक न
हीं हैं। 'बड़े' शब्द पर मेरा दबाव है कि इस सही अर्थ में समझा जाए। परिमल के साथी होने के बावजूद परिमल के दिग्गजों ने उन्हें 'बड़ा' लेखक नहीं माना। परिमल के नियंता 'व्यंग्य' को उपहास से देखते थे और इसे ऊंचा दर्जा नहीं देते थे। इस पर काफी हाउस की अनेक बहसों का मैं युवा श्रोता भी इलाहाबाद में रहा हूं।
उपहास का लेखन-श्रीलाल शुक्ल की 'राग दरबारी' में प्रहसन, माखौल, किस्सा और हास्य का झरना फूटता है। वे मजामत के उस्ताद हैं, पर उनका सारा किया-कराया क्षणभंगूर है। अगर सूक्ष्मता से श्रीलाल जी की मीमांसा की जाए तो उनमें अर्बन लेखक की आधुनिक प्रवृत्तियां नहीं हैं। वे ओवर रेटेड लेखक हैं, परसाई जैसे श्रेष्ठ और देश के बड़े लेखक के साथ भी उन्हें खड़ा किया गया। खड़ा करने वालों का उद्देश्य केवल उन्हें खड़ा करना था, प्रगतिशील विचारधारा के परसाई को कमतर करने के लिए। श्रीलाल शुक्ल सदा जगमगाती दुनिया में रहे, जबकि अमरकांत के चारों तरफ एक गोबर से बनी कच्ची कोठरी का अंधेरा था। ढिबरियां जल रही हैं चारो तरफ और अमरकांत लिख रहे हैं। अमरकांत बड़े लेखक इसलिए भी हैं कि उन्हें कभी गिला-शिकवा नहीं रहा। उन्होंने जिस लेखकीय जीवन को और उत्तर भारतीय समाज को स्वीकार किया, उससे उन्हें गहरा प्यार था। उनकी चाल साफ-सुथरी थी। वे खुशदिल रहे और एक बड़े रचनाकार की स्थिरता और तटस्था उनमें है। अपने समकालीनों की वे गहरी इज्जत करते हैं और गुलगुले से अमरकांत में विचारों का पत्थर बिल्कुल ग्रेनाइट का है। उन्हें दूर किनार में अपने चुने हुए एकांत में रहना पसंद था, इसलिए बड़े पराभवों और राजनीतिक शेयर बाजार गिरने, उठने, बदलने के बावजूद वे अविचलित रहे। मुझे उनके चेहरे की आकृति ब्रेखत के काफी करीब लगती है। इसलिए निष्कर्ष के रूप में यह सही है कि श्रीलाल शुक्ल के अतिशबाज लेखन और अमरकांत के अंधेरों को एक जगह रख कर पुरस्कृत करना अपमानजनक भी है, और एक हद तक कारिस्तानी भी। किशन पटनायक की टिप्पणी सटीक है कि 'राग दरबारी' के लेखक को गांवों से सहानुभूति नहीं है। मेरी समझ यह है कि श्रीलालजी की गांव के जीवन से क्या शहरवासी से भी यारी नहीं है। 
ज्ञानपीठ की यात्रा-अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल के पुरस्कार प्रसंग को और विस्तार से जानना हो तो ज्ञानपीठ की यात्रा की तरफ ध्यान देना होगा। ज्ञानपीठ की स्थापना में शोध, मीमांसा, क्लासिकी चेतना का प्रकाशन और आयोजन उसकी गतिविधि का प्रमुख हिस्सा था। 'ज्ञानोदय' में मांस मदिरा, लहसुन-प्याज का उल्लेख कहानी, कविता में आने पर उसे संपादित कर दिया जाता था। यह धर्मवीर भारती और रमेश बखशी जैसे संपादकों के जमाने में भीबचा हुआ था। फिर 2010 तक आते-आते स्त्रियों पर कुत्सित टिप्पणी भी छपने लगी। आज देखिए कि कैसे ज्ञानपीठ की यात्रा सम सामयिक बाजार की तरफ रेंग रही है। आधुनिकता और लोकप्रियता और प्रिंटआर्डर की ललक, बाजार की तरफ उन्मुख होना, उसका तर्क देने लगना ज्ञानपीठ की महत्वाकांक्षा का हिस्सा हो गया है। इसलिए ज्ञानपीठ में देश के सबसे महंगे सेल्समैन और अभिनेता अमिताभ बच्चन का प्रवेश विचारणीय है। यह न तो अकारण है और न बुद्धूपना।
जूरी का खेल-ज्ञानपीठ भी हिचकते-हिचकते विश्व के ताकतवर पुरस्कारों की राह में उठ रहा है। विश्व राजनीति में उसकी कोई जगह नहीं है न विश्व बाजार में, लेकिन उसकी ललक यही है। यह भी मुमकिन है कि सही खिलवाड़ का कूट खेल न कर सकने के कारण वह अधकचरे चपेटे में आ जाए। पर यह सब भविष्य के खेल हैं। अभी मेरी समझ यह है कि ज्ञानपीठ के निर्णयों में सहजता, भोलापन और चातुर्य दोनों मिले-जुले हैं। कई बार उसके निर्णय भारतीय भाषाओं की ताकतवर प्रगतिशील परंपरा की पूरी-पूरी मुखलफत नहीं करते पर उसके चाल-चलन में एक लोकप्रिय खुराफत जरूर है। जैसे शहरयार को पुरस्कृत करना। शहरयार उर्दू के बड़े शायर नहीं हैं पर उनको पुरस्कृत करके एक प्रगतिशील मुखड़ा ज्ञानपीठ का बनता है। अंतरविरोधी चीजें इसके पहले भी हुई हैं-जब निर्मल वर्मा और गुरदयाल सिंह को ज्ञानपीठ दिया गया। यहां पर भी एक कम्युनिस्ट रचनाकार और एक कम्युनिस्ट विरोधी रचनाकार की कूटनीति स्पष्ट है। एक बात ध्यान दें कि ऐसा नामवर सिंह जैसे जूरी सदस्य के खेल से संभव है। नामवर सिंह ज्ञानपीठ के लिए एक मुफीद वजीर हैं। जैसा मैं पहले एक बार अपने एक व्याखयान में भी बांदा में कह चुका हूं कि असली खेल जूरी की नियुक्ति है। इसकी नियुक्ति के पहले ही सालोंसालयह क्रियाकलाप चलता रहता है। यही विभाजन फिर दोहराया गया-अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल के साथ। ज्ञानपीठ गुरूदयाल सिंह और अमरकांत को स्वतंत्र ज्ञानपीठ देने की बेवकूफी कभी नहीं कर सकता। यह केवल बड़े लेखकों को विभाजित और कमतर करने की तकनीक है।
साम्राज्यवादी दुनिया के बड़े और शातिर तरह से संचालित पुरस्कारों का ज्ञानपीठ का थिंकटैंक अभ्यास कर रहा है। उसके अगले कदम भारतीय समाज और राजनीति की करवटों के आधार पर होंगे। सीधा हस्तक्षेप न भी हो पर जूरी का गठन बहुत दूर तक सोच विचार की कारीगरी है। यह भी हास्यापद है कि पिछले कुछ सालों से हिन्दी के ताकतवर पुरस्कार हिन्दी में सर्वश्री राजेन्द्र यादव, अशोक बाजपेयी, कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, कृष्ण बलदेव वैद के हिस्से में ही आए हैं। इन्हें बार-बार पुरस्कार मिले। ये सब जूरी की कारस्तानियां हैं।
गांव की ओर बाजार-बाजार का, नए साम्राज्य का गांवों में प्रवेश उनको खत्म कर देने के लिए है, उन्हें लूट कर बदल देने का है। गांव बचेंगे नहीं, वे उलट जाएंगे। यह कैसे मुमकिन है भारत देश में कि शहर तो बदल जाएं, उनका कायाकल्प हो जाए, नगरीरकरण तेज बना रहे और गांव जस के तस बने रहें। बीसों साल तक अमरकांत की सुध नहीं ली गई और आज जब पुरस्कृत किया गया (कोने अतरे में जाकर) तो मैं इसे इसी पृष्ठभूमि में देख रहा हूं। इसी तरह कौन बनेगा करोड पति, में घुस-घुस कर गांव के लोगों को लाया जा रहा है और उन्हें दस-पचास लाख दिए जा रहे हैं। यह अचानक वंचित गांवों से लोगों को लाकर, उनके कठिन जीवन दृश्यों की क्लिपिंग दिखा कर, उनको मार्मिक दिखा कर यही किया जा रहा है, जो भारतीय ज्ञानपीठ ने किया है। सब तरफ गांव के उद्धार का यह खेल शुरू हो गया है।
नियंत्रण की रणनीति-विकास की अवधारणा में गांव कहां हैं, यह देखना एक दिलचस्प बात है। उत्तर भारत में पारंपरिक गांव के निशान तो तेजी से मिटे हैं। आने वाले समय में गांव के बिम्ब और बदलने वाले हैं। इस देश में ऐसे अनेक इलाके भी हैं, जहां बड़े किसान को जमीन का मुआवजा 5 से 15 करोड तक भी मिला है। यह रकम रंग लाएगी। यह गिनती के लोगों का प्राप्य है, पर इसका विनाश का बड़ी ग्रामीण जनसंखया पर होगा। अपराध, भुखमरी, भेद और रक्तपात का तीखा अनुभव देखने को मिलेगा। गांव में बड़ी रकम फेंकी जा रही है, जो अंततः बाजार का नियंत्रण उन्हीं इलाकों में बढ़ाएगी।

बुधवार, 31 अगस्त 2011

जबलपुर में परसाई जन्मदिवस आयोजित: राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोषी, राहुल बारपुते और आलोक मेहता ने खुल कर एकतरफा शरद जोशी का महिमा मंडन किया, परसाई का नहीं-ज्ञानरंजन

बलपुर में 22 अगस्त को प्रसिद्ध व्यंग्यकार और विचारक हरिशंकर परसाई का जन्मदिवस ‘विवेचना’ और ‘पहल’ के संयुक्त तत्वावधान में मनाया गया। विवेचना कई वर्षों से 22 अगस्त को परसाई का जन्मदिवस विचार गोष्ठी और परसाई की सूक्तियों पर आधारित कार्टून प्रदर्शनी के माध्यम से आयोजित करती आ रही है। इस वर्ष जबलपुर में डा. विश्वनाथ त्रिपाठी, कवि नरेश सक्सेना और लीलाधर मंडलोई को आमंत्रित किया गया था। डा. विश्वनाथ त्रिपाठी अस्वस्थता के कारण जबलपुर नहीं आ सके, लेकिन नरेश सक्सेना, लीलाधर मंडलोई के साथ कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डा. अरूण कुमार ने परसाई के व्यंग्य को नए रूप में परिभाषित किया। लीलाधर मंडलोई ने कहा कि परसाई ग्रामीण व कस्बाई परिवेश के जीवंत व्यक्तित्व थे, जो परिवार का बोझ उठाना जानते थे। उनके अपने जीवन संघर्ष की छाया, उनके लेखन में झलकती है। नरेश सक्सेना ने वर्ष 1952 से अपने जबलपुर के संबंधों को याद करते हुए कहा कि परसाई जी उनको जीने की राह दिखाई। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डा. अरूण कुमार ने कहा कि लोकप्रिय किंतु सृजनात्मक साहित्य पर आलोचकों की दृष्टि नहीं पड़ती। परसाई जी की रचनाएं समाज की आंखें खोलती हैं। उनकी रचनाएं छोटी होते हुए भी सारगर्भित हैं। कार्यक्रम में कार्टूनिस्ट राजेश दुबे की परसाई के व्यंग्य और सूक्तियों पर आधारित पोस्टर प्रदर्शनी ने सोचने को मजबूर किया।

विचार गोष्ठी के पश्चात् नरेश सक्सेना और लीलाधर मंडलोई ने अपनी नई व पुरानी कविताओं से उपस्थित लोगों को उद्वेलित किया। इस कार्यक्रम में पहल के संपादक और विख्यात साहित्यकार ज्ञानरंजन ने हरिशंकर परसाई पर विचारोत्तेजक लिखित वक्तव्य दिया। यह वक्तव्य यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत है:-

सभागार में भाई नरेश सक्सेना, लीलाधर मंडलोई और आपकी मंच पर उपस्थिति, जबलपुर के वर्तमान में स्वर्गीय हरिशंकर परसाई के संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण है। देश के सुप्रसिद्ध चित्रकार और नर्मदा के मशहूर यात्री अमृतलाल वेगड़ हमारे अभिन्न श्रोता रहे हैं। यहां दमोह, सिवनी, नरसिंहपुर, कटनी और श्रीधाम से भी लोग आए हैं। नगर के गणमान्य संस्कृतिकर्मी, रचनाकार और बुद्धिजीवी भी उपस्थित हैं। दमोह के सामाजिक कार्यकर्ता, यहां परसाई जी का तैल चित्र ले कर आए हैं, जो सभागार में रखा है। परसाई जी पर आयोजन हम इसलिए नहीं करते कि यह एक स्थानीय धर्म है, परसाई का काम एक बड़े आकार का और बड़े संदेशों से भरपूर है, परसाई किचिंत स्थानीयता के चंगुल में रहे थे, पर उनका लेखन इससे मुक्त था। हम चाहते हैं कि परसाई पर बात कुछ आगे बढ़े।

परसाई के अनेक भक्त उनके लायक नहीं थे। कई गुमनाम रूप से उनके खिलाफ भी थे, क्योंकि परसाई के व्यंग्य और उनके विचार को पचाना बहुत मुश्किल था। वह उनके भीतर ही घुसपैठ करता था और वे लाचार होते थे। समकालीनता परसाई के खिलाफ थी। परसाई रचनावली का आना बहुत महत्वपूर्ण हुआ, पर उसके अध्यापक, संपादक, परसाई के बड़े अवदान की बावत न तो ठीक से बता सके और न उनसे संबंधित बहसों को जन्म दे सके। परसाई के समकालीन दुर्भाग्यों पर मैं कई बार टिप्पणी कर चुका हूं। सातवें दशक में परिमल की विचारधारा और उसके शस्त्रों ने श्रीलाल शुक्ल का विनोदपूर्ण उपहास करके यह बता दिया था कि परसाई के लिए भी कांटे तैयार हैं। जिस समय परसाई अपने प्रारंभिक दौर में थे, उस समय बहुत कम लोगों का रूझान परसाई के प्रति था। मैं साहित्यिक संसार की बात कर रहा हूं। नामावर लोग तो दूर थे। मुक्तिबोध ने परसाई का साथ दिया, पर वह गहरा आलोचकीय साथ नहीं था। वह एक गहरी मैत्री थी और विचारों का साथ था। मध्यप्रदेश में ही आप देखें, राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोषी, राहुल बारपुते और आलोक मेहता जैसे बड़े और दिग्गज पत्रकारों-संपादकों ने खुल कर एकतरफा शरद जोशी का महिमा मंडन किया, परसाई का नहीं। एकमात्र मायाराम सुरजन, परसाई के सपोर्टर बने। इस सब के अलावा कुछ बेहद जरूरी नाम हैं, जो परसाई की मूल्यवान आलोचना में अग्रणी हैं। दो नाम मैं यहां पर लूंगा-सर्वश्री सुरेन्द्र चौधरी और विश्वनाथ त्रिपाठी का। सुरेन्द्र चौधरी एक बड़ी प्रतिभा थी, उनमें बोहमीन तत्व भी थे, संभवतः इसलिए उनको घेर लिया गया। उन्होंने परसाई के बारे में थोड़ा ही लिखा पर उनकी पहचान गहरी और से भरी-पूरी थी। मित्रों, कृपया देखें कि सुरेन्द्र चौधरी जिनकी रचनावली अभी हाल ही में आई है, ने हमारे परसाई पर अनोखी बातें क्या कहीं ? वे जब परसाई पर विचार करते थे, तो हिंदी व्यंग्य की जातीय परंपरा उनके सामने रहती थी। इसलिए उन्होंने लिखा-‘‘ व्यंग्य जातीय इच्छा की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति है।’’ परसाई को उन्होंने व्यंग्य का विचारक कहा। अप संस्कृति के स्त्रोतों पर परसाई निरंतर व्यंग्य करते हैं, अपराजित उत्साह के साथ। इसके बाद सबसे यादगार काम किया आलोचक व रचनाकार डा. विश्वनाथ त्रिपाठी ने। उन्होंने परसाई पर एक मोनोग्राफ जैसी विधा में जो लिखा है, वह परसाई पर अकेली कृति है। त्रिपाठी जी ने परसाई को देश-दृष्टि और विश्व-दृष्टि से जोड़ा, उनकी यह कृति मूल्यवान किंतु अधूरी है। अधूरी इस मामले में कि, डा. साहब के पास परसाई पर लिखने के लिए जो कुछ बकाया है, वह उनके अधूरे साक्षात्कार को एक बड़े और संपूर्ण साक्षात्कार में बदल देगा। मित्रों, परसाई पर अगला अध्याय इस देश में त्रिपाठी जी लिख सकते हैं। हमारे दुर्भाग्य से वे गहरी अस्वस्थता के कारण हमारे बीच नहीं आ सके। विश्वनाथ त्रिपाठी जिनको प्यार करते हैं, उन पर लिखते जरूर हैं। अभी-अभी उन्होंने हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे महान गद्य-शिल्पी पर अपनी ताजा कृति प्रकाषित की है। परसाई जी के प्रति उनकी जो साध है, वह पुरानी है, गहरी है। त्रिपाठी जी ने ही लिखा था कि परसाई जी की रचनाएं स्वातंत्रोत्तर भारत का चेहरा है।

श्रोताओं। मैं आपको यह बता दूं कि निमाड़ के मशहूर कला समीक्षक और निबंधकार नर्मदा प्रसाद उपाध्याय पिछले दस वर्षों से परसाई पर एक ग्रंथ की कल्पना ले कर काम कर रहे हैं और उनसे मैं जुड़ा हूं, पर वह काम विश्वनाथ जी के काम की जगह नहीं ले सकता। नए लोग भी काम करेंगे। नरेश सक्सेना और लीलाधर मंडलोई, परसाई जी के प्रियतम रहे हैं। नरेश जी ने जबलपुर में पढ़ाई की और परसाई जी का गहरा सानिध्य प्राप्त किया। लीलाधर मंडलोई जो आज न केवल एक बड़े कवि हैं, बल्कि हिंदी मीडिया के गहरे जानकार भी, वे भी जबलपुर-काल में परसाई की छाया में ही आगे बढ़े। हमारे अध्यक्ष अरूण कुमार जी परसाई पर जो कुछ बोलते हैं, वह पूरी तरह मौलिक होता है। मौलिक चीजें जीवंत और ताजा होती हैं। ये बातें हमें सीधे स्पर्श करती हैं।

अंत में मित्रों, कहना चाहूंगा कि परसाई पर आलोचनात्मक लेखन हो, परिचर्चा हो, बहसें हों, फिल्म या धारावाहिक का निर्माण हो, रंगकर्म हो, कुछ भी करते हुए परसाई जी के आत्मकथ्य के गंभीर बिंदुओं पर हमें ध्यान रखना चाहिए। 1997 में हरिशंकर परसाई ने एक आत्मकथ्य तैयार किया था, उसका संक्षिप्त सा हिस्सा यहां पढ़ कर, मैं अपनी बात समाप्त करूंगा, सबका स्वागत करूंगा और भविष्य में परसाई के बहाने गंभीर आयोजनों में आप सब की भागीदारी की कामना करूंगा। ‘विवेचना’ यह आयोजन वर्षों से करती आ रही है। ‘परसाई’ विवेचना के निर्माता थे।

‘‘अपनी कैफियत दूं, तो हंसना-हंसाना, विनोद करना अच्छी बातें होते हुए भी, मैंने मनोरंजन के लिए कभी नहीं लिखा। मेरी रचनाएं पढ़ कर हंसी आना स्वाभाविक है। यह मेरा यथेष्ट नहीं। और चीजों की तरह मैं व्यंग्य को उपहास, मखौल न मान कर एक गंभीर चीज मानता हूं। साहित्य के मूल्य, जीवन मूल्यों से बनते हैं। वे रचनाकार के एकदम अंतस से पैदा नहीं होते। जो दावा करते हैं कि उनके अंतस से ही सब मूल्य पैदा होते हैं, वे पता नहीं किस दुनिया में रहते हैं। जीवन जैसा है, उससे बेहतर होना चाहिए। राजनीति से मुझे परहेज नहीं है। जो लेखक राजनीति से पल्ला झाड़ते हैं, वे वोट क्यों देते हैं। वोट देने से ही राजनीति शुरू होती है। बुद्धिजीवी चाहे सक्रिय राजनीति से भाग न लें, पर वह अराजनैतिक नहीं हो सकता। जो अराजनैतिक होने का दावा करते हैं, उनकी राजनीति बड़ी खतरनाक और गंदी है।’’

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

विश्व छायांकन दिवस के अवसर पर विशेष- डा. जे. एस. मूर्ति: पचास वर्षों की सौम्य और शांत छायांकन यात्रा



डा. जे. एस. (जेम्स सुंदर) मूर्ति की पहचान जबलपुर ही बल्कि पूरे देश में फोटो जर्नलिज्म, नेचर और वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर के रूप में है। उन्होंने फोटो जर्नलिज्म और कलात्मक छायांकन के मध्य अद्भुत संतुलन बना कर काम किया है। यह दोनों बातें किसी एक छायाकार में काफी कम देखने में आती है। उनके द्वारा खींचे गए छायाचित्र द संडे टाइम्स,द इंडियन एक्सप्रेस, सोशल वेल्फेयर, द हिन्दु जैसे प्रतिष्ठित समाचार व पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होते रहे हैं। उनके कई छायाचित्रों को जर्मनी, कनाडा, नीदरलैंड में आयोजित अंतरराष्ट्रीय छायाचित्र प्रतियोगिताओं में स्वीकृतियां के साथ पुरस्कृत किया गया है। डा. मूर्ति जबलपुर में फोटो आंदोलन को सक्रियता देने में हर समय आगे रहे हैं। छठे दशक में उन्होंने इसके लिए सर्वप्रथम प्रयास किया और नौवे दशक में डा. मूर्ति ने फोटोग्राफिक सोसायटी आफ जबलपुर (पीएसजे) को व्यवस्थित रूप दे कर नए फोटोग्राफर को एक मंच प्रदान किया। पीएसजे की गणना आज देश में सबसे सक्रिय सोसायटी के रूप में होती है। इसके पीछे डा. मूर्ति की मेहनत और समर्पण को कोई नकार नहीं सकता।
डा. मूर्ति को वर्ष 1969 में उस समय छायांकन में सबसे बड़ी सफलता मिली, जब उनकी छाया चित्र प्रविष्टि को फोटोग्राफिक सोसायटी आफ बंगाल (पीएबी) के द्वारा आयोजित ऑल इंडिया फोटोग्राफिक सैलून में स्वीकृत किया गया। सैलून के निर्णायकों को उनका छायाचित्र में विषय और तकनीकी रूप से नई ताजगी देखने को मिली। इसके पश्चात् डा. मूर्ति की छायांकन यात्रा आज तक जारी है। इसके बाद तो डा. मूर्ति के छाया चित्र देश-विदेश में आयोजित असंख्य सैलून में स्वीकृत हो कर पुरस्कृत हुए। इनमें टी. काशीनाथ मेमोरियल अवार्ड लखनऊ, भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के फोटो डिवीजन का अवार्ड, एग्री-हार्टीकल्चरल सोसायटी आफ इंडिया (एएचएसआई) के द्वारा कोलकाता में वर्ष 2011 में आयोजित प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि का पुरस्कार महत्वपूर्ण है।
ललित कला अकादमी, नई दिल्ली के द्वारा आयोजित प्रथम छाया चित्र प्रतियोगिता के अवसर पर जारी किए गए केटलाग में डा जे. एस. मूर्ति की प्रविष्टि सहित प्रोफाइल के प्रकाशन को अन्य छायाकार एक बड़ी उपलब्धि मानते हैं। इसके अतिरिक्त डा. मूर्ति की उपलब्धियों में फोटोलवर्स आफ इंडिया स्लाइड सर्किट इंदौर, होरीजन इंडिया इंटरनेशनल सर्किट लखनऊ, एसएएम इंटरनेशनल दिल्ली, और नार्थ ईस्टर्न फोटोग्राफिक एसोसिएशन (नेपा) असम द्वारा आयोजित सैलून में प्राप्त स्वीकृतियां भी हैं। उन्हें यूपी बोर्ड आफ बॉयो-डायवरसिटी, लखनऊ द्वारा ‘टाइगर’ प्रविष्टि के लिए प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया।
छायांकन में अनवरत् पचास वर्ष डूब कर काम करने वाले डा. जे. एस. मूर्ति को वर्ष 2005 में फेडरेशन आफ इंडियन फोटोग्राफी (एफएफआईपी) ने फेलोशिप से सम्मानित किया। वर्ष 2008 में उन्हें इंडिया इंटरनेशनल फोटोग्राफिक काउंसिल (आईआईपीसी) दिल्ली द्वारा
प्लेटिनम एक्जीबिटर ग्रेड से सम्मानित किया। डा. मूर्ति ने कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय फोटोग्राफी सैलून में निर्णायक की भूमिका भी निभाई है। देश की सबसे पुरानी फोटोग्राफिक सोसायटी आफ इंडिया (पीएसआई) मुंबई द्वारा आयोजित आल इंडिया सैलून आफ फोटोग्राफी में निर्णायक के मनोनयन को वे एक उपलब्धि के रूप में देखते हैं। डा. मूर्ति द्वारा वर्ष 1997 में जबलपुर के भूकंप के समय खींचे गए छाया चित्र न्यूज एजेंसी प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया (पीटीआई) और यूनाइटेड न्यूज आफ इंडिया (यूएनआई) द्वारा देश व विदेश में जारी किए गए, जिन्हें व्यापक रूप से सराहना मिली।
डा. जे. एस. मूर्ति का छायांकन के साथ-साथ पत्रकारिता शिक्षा में भी विशिष्ट स्थान है। उन्हें ‘मॉस कम्युनिकेशन एंड इट्स वेरियस डाइमेंशन’ पाण्डुलिपि पर वर्ष 1989 में प्रधानमंत्री द्वारा भारतेंदु हरिश्चंद्र राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार प्रदान किया गया।
डा. मूर्ति पचास वर्ष के छायांकन जीवन में पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के फोटो लेने को अविस्मरणीय अनुभव मानते हैं। पंडित नेहरू के उतारे गए फोटो को वर्ष 1991 में उन्होंने प्रधानमंत्री राजीव गांधी को जबलपुर प्रवास के समय भेंट किया था। उन्होंने इंदिरा गांधी के एक पोट्रेट को भी राजीव गांधी को भेंट किया था। जो बाद में 1 सफदरजंग रोड स्थित इंदिरा गांधी सेक्रेटेरियट मेमोरियल में प्रदर्शित हुआ।
पत्रकारिता एवं संचार प्राध्यापक के रूप में उन्होंने मनीला-फिलीपींस, क्वालालाम्पुर, श्रीलंका सहित देश में कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सेमीनार में भाग ले कर महत्वपूर्ण शोध पत्र प्रस्तुत किए। डा. मूर्ति ने मॉस कम्युनिकेशन विषय पर एक पुस्तक लिखी, जिसकी वर्तमान में भी शिक्षकों सहित विद्यार्थियों में बहुत मांग है। वे इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी (इग्नू) में कम्युनिकेशन विषय के रूप काउंसलर के रूप में कार्य कर चुके हैं। डा. मूर्ति जबलपुर, चित्रकूट और बीएचयू-बनारस विश्वविद्यालय में अतिथि शिक्षक के रूप में सेवाएं देते रहे हैं। डा. मूर्ति ने लगभग 10 वर्षों तक न्यूयार्क (अमेरिका) से प्रकाशित न्यू वर्ल्ड आउटलुक आर्डर के लिए कई कवर स्टोरी सहित महत्वपूर्ण रिपोर्टिंग की है।
अभी हाल ही में एकेडमी आफ फाइन आटर्स (सेंट्रल गेलरी) कोलकाता में उनकी एकल छायाचित्र प्रदर्शनी ‘एनकेचिंग कोलकाता’ आयोजित की गई, जिसे दर्शकों के साथ क्रिटिक की प्रशंसा भी मिली।
डा. जे. एस. मूर्ति अब अपने कर्मक्षेत्र जबलपुर में नहीं रहते, जिसका उन्हें दुख है, लेकिन पारिवारिक परिस्थितियों ने उन्हें कोलकाता में रहने को मजबूर कर दिया है। कर्मक्षेत्र बदलने और आयु के 70 वें वर्ष में पहुंचने के बावजूद वे निरंतर सक्रिय हैं। उन्होंने फोटोग्राफी सदैव ‘शांति व एकता’ के एक सूत्र को ध्यान में रख कर की और इसमें वे सफल भी हुए।

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

जबलपुर में कामरेड शेषनारायण राय स्मृति व्याख्यान व काव्यपाठ


विवेचना जबलपुर और पहल ने मिलकर जबलपुर में 17 जुलाई 2011 को कामरेड शेषनारायण राय स्मृति व्याख्यान व काव्यपाठ का आयोजन किया। कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक का व्याख्यान और नरेन्द्र जैनमंगलेश डबराल का काव्यपाठ संपन्न हुआ। कामरेड शेषनारायण राय विवेचना जबलपुर के संस्थापकों में से एक और जबलपुर शहर के प्रमुख वामपंथी नेता थे। जिस समय मुक्तिबोध और परसाई जैसे महान लेखकों की किताबें कोई प्रकाशक नहीं छाप रहा था उस समय का. शेषनारायणराय ने मुक्तिबोध की किताब कामायनी एक पुनर्विचार और परसाई जी की किताबें सुनो भाई साधो बेईमानी की परत छापी थी। परसाई जी और का राय बहुत घनिष्ठ मित्र थे। इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर एक सत्य घटना है जो का राय के साथ घटी थी। कहानी में भला आदमी कामरेड राय हैं। एक दूसरी प्रसिद्ध रचना एक लड़की पांच दीवाने का राय की पुस्तक दुकान यूनीवर्सल बुक डिपो के आस पास की घटना है। इस दुकान पर न केवल परसाई जी की नियमित बैठक थी वरन् यहां से उस समय के जबलपुर की साहित्यिक सांस्कृतिक राजनैतिक गतिविधियां संचालित होती थीं। इसी दुकान में बैठे बैठे मित्रों ने विवेचना का गठन किया था। उद्देश्य था गोष्ठियों के माध्यम से आम जनता को घटनाओं की सचाई बताई जाए। कामरेड राय ने एक संपन्न परिवार में जन्म लेकर भी अपना जीवन किसान मजदूरों की लड़ाई लड़ते बिताया। वे जबलपुर की कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव रहे। उनकी पांचवीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में जबलपुर शहर के साहित्यिक सांस्कृतिक अभिरूचि के लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाएं उपस्थित थीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार श्री श्याम कटारे ने की। कार्यक्रम स्थल को विनय अंबर और ऋषि जेना ने मंगलेश व नरेन्द्र की कविताओं पर आधारित पोस्टरों से सजाया था।
व्याख्यान का विषय था कला, संस्कृति और आज की सांस्कृतिक संकेत । देश के सुविख्यात चित्रकार अशोक भौमिक ने कहा कि देश में अनेक संगठन अनेक राजनैतिक दलों से प्रभावित हैं पर आज की जरूरत है कि सभी संगठन अपने अपने पूर्वाग्रह छोड़कर सच्चे
अर्थों में गरीबों, जरूरतमंदों, आदिवासियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष करें। आज गरीबों की लड़ाई कोई नहीं लड़ रहा। उन्होंने अपना व्याख्यान चित्त प्रसाद की चित्रकला पर केन्द्रित कर अपनी बात कही। चित्त प्रसाद के चित्रों को प्रदर्शित कर उन्होंने बताया कि किस तरह एक चित्रकार संघर्षरत मजदूरों किसानों के बीच जाकर उनकी हलचलों को कलात्मक रूप से चित्रित करता है जो सदियों तक एक रिकार्ड के रूप में हमारे बीच रहेगा। चित्तप्रसाद के चित्रों में समय के साथ उनकी समझ और देश के मजदूर किसानों के बदलते हालात को आसानी से चिन्हित किया जा सकता है। चित्तप्रसाद की गहरी मानवीय दृष्टि और बारीक अवलोकन बहुत प्रभावित करते हैं। लिनोकट में इतना श्रेष्ठ काम बहुत दुर्लभ है वो भी तब जब उन्होंने किसी कला विद्यालय में शिक्षा नहीं ली थी। अशोक भौमिक के व्याख्यान के बाद दूसरे चरण में सर्वप्रथम तापसी नागराज ने मंगलेश डबराल की कविता मां मुझे पहचान नहीं पाई जब मैं घर लौटा सर से पांव तक धूल से सना हुआ और नरेन्द्र जैन की कविता एक दिन हमसे पूछा जाएगा हम क्या कर रहे थे का गायन किया। इसके बाद नरेन्द्र जैन ने काव्यपाठ किया। उन्होंने उज्जैयनी में एक पिंजारवाड़ी है और पिंजारवाड़ी में एक उज्जैयनी’, आसमान इतना खाली है जितनी तुम्हारी आंख’, जब कुछ भी नहीं हुआ करता आलू जरूर होता है, कवि के जाने के बाद हमने नहीं लिखी कोई कविता, ध्वस्त होती हुई दुनिया का मैं अंतिम नागरिक हुआ। नरेन्द्र जैन के बाद मंगलेश डबराल ने अपना रचना पाठ किया। उन्होंने संगतकार, यह नंबर मौजूद नहीं, नया बैंक, टार्च, पुरानी तस्वीर आदि अपनी चुनिंदा कविताएं सुनाईं। कार्यक्रम के अंत में पंकज स्वामी ने आभार प्रदर्शन किया।

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

जबलपुर के अजय चौधरी पद्मभूषण से सम्मानित


जबलपुर निवासी हिन्दुस्तान कंप्यूटर्स लिमिटेड (एचसीएल) के सह-संस्थापक अजय चौधरी को व्यवसाय और उद्योग क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने के लिए पिछले दिनों भारत की राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने पद्मभूषण से सम्मानित किया। उल्लेखनीय है कि अजय चौधरी जबलपुर नगर निगम के पूर्व आयुक्त स्वर्गीय जयकृष्ण चौधरी ‘हबीब’ के पुत्र हैं। अजय चौधरी की प्रारंभिक शिक्षा क्राइस्ट चर्च बॉयज हायर सेकेण्डरी स्कूल और जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में हुई। अजय चौधरी की इस उपलब्धि के लिए जबलपुर नगर निगम ने उनके नागरिक अभिनंदन करने की योजना बनाई है और यह समारोह जल्द ही आयोजित होगा।


अजय चौधरी का जन्म 29 अगस्त, 1950 को हुआ। उन्होंने इलेक्ट्रानिक्स एवं कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि प्राप्त की और मिशिगन यूनिवर्सिटी, अमेरिका में स्कूल आफ बिजसेन एडमिनिस्ट्रेशन के एक्ज़क्यूटिव प्रोग्राम में शामिल हुए। अजय चौधरी ने तीन दशक पूर्व अपनी विस्मयकारी यात्रा इस सपने के साथ शुरू की कि भारत के पास अपना स्वयं का माइक्रोकंप्यूटर होगा। उन्होंने पांच अन्य व्यक्तियों के साथ सूचना और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में 1976 में भारत की पहली शुरूआत, एचसीएल की नींव रखी। 25,267 करोड़ रूपए के वैश्विक उद्यम बन चुके एससीएल की प्रगति में अजय चौधरी की भूमिका अहम रही है। अजय चौधरी की अगुवाई में एचसीएल इंफोसिस्ट्म, उभर रही प्रौद्योगिकियों पर अपनी जबर्दस्त पकड़ के साथ आज हार्डवेयर, सिस्ट्म-इंटीग्रेशन और अधोसंरचना-प्रबंधन-सेवा में अग्रणी पथ प्रदर्शक बन गया है।

अजय चौधरी के नेतृत्व में एचसीएल ने अनेक नई परियोजनाओं को पूरा किया है, जिन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। इनमें सूचना प्रौद्योगिकी के रिटेल क्षेत्र में पदार्पण द्वारा एससीएल इंफोसिस्ट्म को डिजिटल जीवनशैली की व्यापकता में शामिल करना, केन्द्राभिमुखता (कन्वर्जेस) के लिए प्रौद्योगिकी की क्षमता का निर्माण तब करना, जब सूचना-प्रौद्योगिकी संबंधी केन्द्राभिमुखता, एक नारा मात्र ही हुआ करता था, सिस्ट्म-इंटीग्रेषन के व्यापक व्यापार की शुरूआत करना, गुणवत्ता आंदोलन के जरिए कंपनी की अगुवाई करना और जनता के लिए सूचना प्रौद्योगिकी के कथन को अमल में लाना, इसके कुछ उदाहरण रहे हैं। भारत की विनिर्माण क्षमता में अत्यधिक विश्वास रखते हुए अजय चौधरी ने भारत में विनिर्माण के महत्व को आगे लाने में अनवरत रूप से कार्य किया है।

वर्ष 2009 में अजय चौधरी को केन्द्रीय सूचना-प्रौद्योगिकी एवं संचार मंत्रालय द्वारा गठित आईटी टास्क फोर्स का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। इस समिति ने सरकार को अपनी व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत की। टास्क फोर्स में उद्योग-निकायों तथा मेट और नैसकॉम आदि सहित विभिन्न एसोसिएशनों का विचारशील नेतृत्व शामिल था।

भारत के घरेलू सूचना-प्रौद्योगिकी बाजार के समर्थक के रूप में अजय चौधरी के योगदान तथा भारत में इलेक्ट्रानिक्स के क्षेत्र में उनके अनवरत प्रयासों की मान्यतास्वरूप डाटाक्वेस्ट आईटी पर्सन आफ द ईयर 2001 अवार्ड, वर्ष 2010 के लिए ईएलसीआईएनए-ईएफवाई द्वारा इलेक्ट्रानिक्स मैन आफ द ईयर, व्यूअर्स च्वाइस के लिए सीएनबीसी एशिया बिजनेस लीडर अवार्ड 2010, सीएनबीसी टीवी-18 इंडिया बिजनेस लीडर अवार्डस् 2010 के छठे संस्करण में इंडिया इनोवेटर आफ द ईयर अवार्ड आदि से सम्मानित किया गया। अजय चौधरी को देश के सूचना-प्रौद्योगिकी के उत्पादों के लिए अतुलनीय इको-प्रणाली के विकास, कंप्यूटर हार्डवेयर और साफ्टवेयर के क्षेत्र में उनके विचारपूर्ण नेतृत्व के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रूड़की द्वारा वर्ष 2010 में डाक्टरेट आफ साइंस (डी.एससी.) से भी सम्मानित किया गया।