सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

आलोक चटर्जी को सरहद पार से बुलावा

ओंम पुरी के बाद बीस वर्ष पहले राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली से स्वर्ण पदक का गौरव हासिल करने वाले रंगमंच के स्थापित अभिनेता आलोक चटर्जी को एक बार फिर सरहद पर का बुलावा आया है। आलोक चटर्जी जबलपुर के रहने वाले हैं। इस महीने के आखिरी सप्ताह वे डेनमार्क की राजधानी कोप्न्हेगें की रंगभूमि पर अपने अभिनय का उजास बिखेरेंगे।
मामला है भी थोड़ा लीक से हटकर। दरअसल उनका चयन हुआ है नाटक पीस्त आन् द मून के लिए, जिसमें वे मुख्य किरदार निभाएंगे। मानवीय संबंधों और सपनों को जीते इस पात्र के लिए नाटक के निर्देशक कलोशेव को आलोक सबसे सटीक लगे। पांच भाषाओं केनेदियन, इंग्लिश, स्पेनिश, जर्मन और हिंदी में एक साथ इस अनोखे प्रयोग का आनलाइन प्रसारण होगा। आलोक हिंदी का प्रतिनिधित्व करेंगे। इस उप्लाब्दी का श्रेय वे पिछले बर्लिन प्रवास को देते हैं, जहाँ कलोशेव की नजर उन पर गई और जल्दी ही इस विदेशी रंगकर्मी ने उन्हें अपने थियटर के लिए अनुबंधित कर लिया। अलावा इसके इन दिनों आलोक आज़ादी के बाद मध्यप्रदेश के रंगमंचिया विस्तार को किताबी शक्ल देने की तैयारी कर रहें हैं।

टिप्पणियाँ

Dr. Vijay Tiwari "Kislay" ने कहा…
ALOK CHATERJEE KO SAHAD PAAR SE BULAWA PASAND AAYA.. CONGRETULATION GULUSH JEE

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विवेचना रंगमण्डल राष्ट्रीय नाट्य समारोह-2010: उत्कृष्ट रंगकर्म को दर्शकों का समर्थन

जबलपुर की विवेचना रंगमण्डल ने पिछले दिनों सात दिवसीय ‘रंग परसाई-2010 राष्ट्रीय नाट्य समारोह’ का आयोजन जबलपुर के मानस भवन में किया। यह नाट्य समारोह रंगकर्मी संजय खन्ना को समर्पित था। विवेचना की स्थापना वर्ष 1961 में हुई थी और संस्था ने 1975 से नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्शन से अपनी रंग यात्रा की शुरूआत की, जो आज तक जारी है। देश में विवेचना रंगमण्डल की पहचान एक सक्रिय सरोकार से जुड़ी हुई रंगकर्म संस्था के रूप में है। विवेचना रंगमण्डल पिछले कुछ वर्षों से नए निर्देशकों की नाट्य प्रस्तुतियों को राष्ट्रीय समारोह में भी मौका दे रही है। इस बार के नाट्य समारोह में भी जबलपुर में आयोजित अंतर महाविद्यालयीन नाट्य प्रतियोगिता की तीन श्रेष्ठ नाट्य प्रस्तुतियों को मौका दिया गया, ताकि दर्शकों को नया रंगकर्म देखने का अवसर मिल सके। इस प्रयास को रंगकर्मियों के साथ-साथ दर्शकों ने भी सराहा। इस बार के नाट्य समारोह की एक खास बात यह भी रही कि दर्शकों को सात दिन में नौ नाटक देखने को मिले। समारोह की शुरूआत और अंत गंभीर और विचारोत्तेजक नाटकों से हुआ एवं अन्य दिन हास्य नाटकों के साथ नौटंकी भी देखने को मिली।
नाट्य समारो…

जबलपुर में कविता पोस्टरों की प्रदर्शनी, काव्य पाठ और कला व्याख्यान पर केन्द्रित दो दिवसीय 'दृश्य और श्रव्य' कार्यक्रम आयोजित

प्रगतिशील लेखक संघ, विवेचना, विवेचना रंगमंडल और सुर-पराग के तत्वावधान में पिछले दिनों (१३-१४ मार्च को) जबलपुर में दो दिवसीय 'दृश्य और श्रव्य' कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में पिछले दो दशक के हिंदी के श्रेष्ठ कवियों राजेश जोशी, वीरेन डंगवाल और राजकुमार केसवानी का काव्य पाठ, कविताओं की पोस्टर कला कृतियों की नुमाइश और विखयात विश्वविखयात चित्रकार एवं कथाकार अशोक भौमिक का व्याख्यान हुआ। दो दिवसीय दृश्य और श्रव्य कार्यक्रम का आयोजन इस मायने में महत्वपूर्ण रहा कि इसमें जबलपुर के साहित्यकारों, लेखकों, चित्रकारों, रंगकर्मियों के साथ आम लोगों खासतौर से महिलाओं की बड़ी संखया में सहभागिता रही। दो दिन तक जबलपुर के साहित्य और कला प्रेमियों ने अपनी शाम स्थानीय रानी दुर्गावती संग्रहालय की कला वीथिका में विचारोत्तेजक कविता पाठ सुनने के साथ कविताओं की पोस्टर कला कृतियां देखने में गुजारी। अशोक भौमिक द्वारा 'समकालीन भारतीय चित्रकला में जनवादी प्रवृत्तियां' विषय पर पावर पाइंट प्रस्तुतिकरण के साथ दिया गया व्याख्यान कला प्रेमियों के साथ-साथ कला से वास्ता न रखने वाले आम लोगों के ल…

प्रतिरोध को थिएटर का माध्यम बनाने वाले रंगकर्मी बादल सरकार

बादल सरकार का नाम देश में नाटक का पर्याय है। कलकत्ता में जन्में बादल सरकार ने कई वर्ष इंजीनियर के रूप में काम किया। विदेश से रंगकर्म का डिप्लोमा लेने के पश्चात् उन्होंने रंग जगत में प्रवेश किया। उनके अभिनव तरीके ने रंगमंच में उनकी अलग पहचान विकसित की और बादल सरकार रंग जगत का एक शीर्ष नाम बन गया। बादल दा ने गत 15 जुलाई को जीवन के 83 वर्ष पूर्ण किए हैं।
बादल सरकार से प्रेरित हो कर देश के सैकड़ों रंगकर्मी सड़कों पर नाटक करने उतरे और प्रतिरोध के लिए थिएटर को माध्यम बनाया। थिएटर आडोटोरियम और उसके तमाम तामझाम को छोड़ कर ‘सुधीन्द्र नाथ सरकार’ ने जब थिएटर को जनता से सीधे संवाद करने का माध्यम बना कर नुक्कड़ नाटक की अपनी शैली विकसित की, तो रंग जगत में एक तूफान सा आ गया। सन् 1970 के आसपास उन्होंने थिएटर आडोटोरियम से नुक्कड़ की यात्रा शुरू की। उस समय बांगला थिएटर जगत में शंभू मित्र, तृप्ति मित्र और उत्पल दत्त के नाम शीर्ष पर थे। बादल सरकार बताते हैं- ‘‘मैंने अपना काम कविताओं से शुरू किया। सन् 1956 में मैंने अपना पहला नाटक साल्यूशन एक्स लिखा। फिर सन् 1956 में बारो पिशीमा आया। अभी हाल ही में उनकी दो पुस्त…