गुरुवार, 13 सितंबर 2007

कामरेड त्रिलोक सिंह के बहाने से

15 सितंबर को कामरेड त्रिलोक सिंह को गुजरे एक वर्ष हो गए. जबलपुर में हिंदी की उत्कृष्ट साहित्यक पुस्तिकाओं और पत्रिकाओं को घर-घर तक पहुचाने में कामरेड त्रिलोक सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका थी। जबलपुर में शायद ही कोई लिखने-पढ़ने वाला व्यक्ति होगा, जिसे त्रिलोक सिंह नहीं जानते थे। यही उनकी जीविका थी और यही जीवन का मिशन। घर-घर पुस्तकें ले जाना। कामरेड त्रिलोक सिंह की पहली पुण्यतिथी कब निकल गयी किसी को याद नहीं है. जबलपुर के नामचीन साहित्यकार भी भूल गए और वे लोग भी भूल गए जो पल-पल में साहित्य को जीने की क़सम खाते हैं।

वैसे जबलपुर में साहित्य गोष्ठी होना आम बात है। कवि गोष्टी तो दरी बिछाकर शुरू हो जाती है. स्तर की बात न पूछी जाये तो अच्छा है। पिछले दिनों कुछ ऐसा ही हुआ जब मीडिया से लुप्त होता साहित्य विषय को केंद्रित एक गोष्टी में जबलपुर के साहित्यकारों ने अपनी-अपनी भावनाएं व्यक्त कीं. इस कार्यक्रम में नईदुनिया के सम्पादक राजीव मित्तल भी मौजूद थे। उनके सामने जबलपुर के कुछ साहित्यकारों ने इस तरह अपने विचार व्यक्त किये जैसे वे उन्हें बताना रहे हो कि अख़बार कैसे निकला जाना चाहिए। मालूम हो कि नईदुनिया जबलपुर से जल्द निकलने वाला है और इसको लेकर समाज के सभी वर्गों में एक उत्सुकता है। सब अपने-अपने ख्याल से सोच रहें हैं। जबलपुर को नईदुनिया से बहुत आशा हैं। इस हिसाब से सम्पादक राजीव मित्तल के सामने चुनौती भी हैं। उन्हें ऐसा अख़बार निकलना होगा, जो खिलाडियों की भावनाओं को भी समझे और साहित्यकारों की भी। सब को लगता है उनके समाचारों और विधा को पर्याप्त स्थान मिले। लेकिन राजीव मित्तल ने स्पष्ट कर दिया कि उनकी प्राथमिकताएँ समाचार हैं। उन्होने पिछले अनुभव के आधार के हवाले से कहा कि वे साहित्य की दुकानदारी चलने नहीं देंगे। यह सुनकर कुछ साहित्यकार दुःखी हो गए।

जबलपुर में अधिकांश साहित्कार इस मुगालते में रहतें हैं कि वे बडे लेखक हैं, लेकिन वे क्या लिख रहे हैं वह समझ से परे है। उनकी दुनिया अपने में ही सीमित है। उन्हें देश-दुनिया के सरोकार प्रभावित नहीं करते। लगता है उन्होंने हरिशंकर परसाई, ज्ञानरंजन, मलय से कुछ नहीं सीखा।

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