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पहल का नया अंक


ज्ञानरंजन ने अमेरिका से लौटकर जल्द पहल का नया अंक निकल दिया। यह 86 नंबर का अंक है। इस अंक की विशेषता बहुत दिनों बाद विष्णु खरे की लिखी कविताएँ हैं। इन कविताओं में केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह पर भी एक कविता है, जो एक बहस को छेड़ने के लिए काफी है। अर्जुन सिंह कॉंग्रेस में वामपंथी जाते हैं। उन्होने अपने मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले विभिन्न विभागों में वामपंथिओं को काफी संरक्षण दिया है। इन्हीं अर्जुन सिंह पर विष्णु खरे ने सिला शीर्षक से राजनैतिक कविता लिखी है। इस कविता को लेकर दो पक्ष बन गए हैं। दरअसल विष्णु खरे इस कविता के माध्यम से संदेश देना चाहतें हैं कि कॉंग्रेस में भी अर्जुन सिंह को लेकर अंतर्विरोध है। मनमोहन सिंह से चिदंबरम तक 1857 के कार्यक्रम को लेकर अर्जुन सिंह का पार्टी में विरोध करते हैं। इस पूरे प्रकरण को लेकर विष्णु खरे कहते हैं कि अर्जुन सिंह को यह त्रासदी पहचानना चाहिऐ।
पहल के नए अंक में इंगमार बर्गमन को भी श्रदांजलि दी गई है। असद जैदी कि "1857: सामान की तलाश" कविता और इस पर मंगलेश डबराल की टिप्पणी वर्तमान संदर्भ की बेचैनी भरी तलाश है। असद जैदी की कविता आज की आँखों से अतीत को देखती है और अतीत की आवाजों में आज को सुनने की कोशिश करती है। कविता की अन्तिम पंक्तियाँ -
क्या अब दुनिया में कहीँ भी नहीं है अन्याय
या तुम्हें ही नहीं सूझता उसका कोई उपाय।
पाठकों से संवाद करती है। 150 करोड़ रुपए का शोर थमने के बाद सवाल है कि क्या अब अन्याय भी मिट चुका है ?
बस्तर के कवि शाकिर अली की कविताएँ सुन्दरता से शुरू होकर नक्सली समस्या की तह तक जाती हैं। इसी प्रकार पवन करण की कविता "अमेरिका का राष्ट्रपति होने के मज़े" पूंजीवाद की पोल खोलती है।

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