शनिवार, 9 फ़रवरी 2008

पहल 87







पहल का 87 वें नम्बर का अंक प्रकाशित हुआ। इस अंक की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह अंक सुप्रसिद्ध फिल्मकार माइकल एंजिलो एंतोनिओनी पर केन्द्रित है। अतः इसकी शुरुआत भी एंतोनिओनी के जीवन पर, उनकी शैलीगत विशेषताओं आदि पर लिखे गए विभिन्न लेखों से हुई है। नवम्बर-दिसम्बर 2007 के इस अंक में माइकल एंजिलो एंतोनिओनी के साथ साथ मराठी दलित कवियों के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर भुजंग मेश्राम एवं उर्दू साहित्य की जानी मानी लेखिका कुर्रतुलऎन हैदर के निधन पर लेख स्वरूप श्रद्धांजली अर्पित की गई है। इसके बाद नोम चोम्सकी के द्वारा अपनी पुस्तक ‘पतित राज्य:शक्ति का दुरुपयोग और लोकतंत्र को अघात’ के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र पर लगाए गए अभियोगो की पड़ताल कर उसका वैचारिक विश्लेषण दिया गया है। लम्बी कहानियों में कैलाशचन्द्र की डूब,स्याही के धब्बे, वंदना राग की यूटोपिया और पंखुरी सिन्हा की नयनतारा नयनतारा आमार प्रकाशित की गईं हैं। अन्य स्थायी स्तंभों के अलावा स्त्री-विमर्श के अंतर्गत डॉ. सुधा सिंह और रामचंद्र सरोज के पिछले दो अंकों में प्रकाशित लेखों के बाद इस बार राजीव मित्तल का एक उत्तेजक लेख प्रकाशित किया गया है जिसमें उन्होंने हरिमोहन झा, तस्लीमा नसरीन और सआदत हसन मंटो के हवाले से न केवल वर्तमान बल्कि वैदिक काल से स्त्रियों की स्थिति एवं उस पर पुरुषप्रधान समाज द्वारा दी जा रही प्रताड़ना एवं उनके साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार पर टिप्पणियां की गई हैं जिन्होंने स्त्री विमर्श को एक ऊंचाई प्रदान की है।
“इस बार पहल सम्मान 2007 की घोषणा नहीं की जा रही है। इसे अंतराल वर्ष के रूप में रखा जा रहा है। इस बीच इसके सभी शुभेच्छुओं के बीच अंतरंग चर्चा के उपरांत नए सिरे से निर्णय लिए जाएंगे।“

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