सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

काफी हाउस


काफी हाउस
जबलपुर के पारम्परिक सिटी काफी हाउस ने भी अन्य शहरों के काफी हाउस की तरह अपना रंग रूप बदल लिया है। शायद कई लोगों को जानकारी न हो कि जबलपुर में इंडियन काफी हाउस का हेड क्वार्टर भी है। यहां के काफी हाउस में एसी लग गया है। लम्बे लम्बे पर्दे इसे एक्सक्लूसिव बना देते हैं। अब यहां किसी को मीटिंग या प्रेस काफ्रेंस की इजाजत नहीं है। ज्यादा देर बैठने पर वेटर पूछ लेता है। पहले जैसा अपनापन नहीं दिखता. इससे ही एक कविता काफी हाउस पर उपजती है।

यह क्या हो गया
काफी हाउस भी मजबूर हो गया
बड़े रेस्त्राओं से टक्कर लेने को
इसलिए उसमें बदलाव दिखने लगा
लम्बे लम्बे पर्दे दीवारों पर रंग बिरंगे रंग
जमीन पर कालीन
काफी के साथ अब कांटीनेंटल डिश भी तैयार है
काफी हाउस की फिल्टर काफी में रंग बदल से गए हैं
काफी की गरम कड़क में पहले जैसा स्वाद नहीं
और न ही काफी हाउस की टेबलों में पहले जैसे ठहाके।
हेल्पर से शुरु हुआ था कैरियर
जूनियर, सीनियर फिर अब मैनेजर
आंखें तलाश रहीं
वर्षों पहले की हंसी, खुलेपन, सेंट्रल टेबल की चर्चा,
छुट्टी के दिन छह महीने में निकलने वाले परिवार को
पहले यहां नजर आ जाते थे, प्रेम करने वाले,
संपूर्ण क्रांति के सपने देखने वाले, सर्वहारा वर्ग के प्रतिनिधि
कालेजों के प्रोफेसर, कवि, साहित्यकार।
अरे इसी टेबल पर बैठते थे परसाईं और रजनीश
परसाईं को यहीं मिले थे जीवन के रंग और ओशो को भविष्य का दर्शन
स्वयंसेवक भी कभी कभार काफी पीने आ जाते थे चुपचाप
क्योंकि काफी हाउस को समझा जाता था
प्रगतिशीलों का अड्डा
काफी हाउस में बैठते थे इंटेलिजेंस के गुप्तचर
क्योंकि यहां घटता था और चर्चा होती थी जीवन की
मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव काफी की चुस्कियों में
संवेदनाओं को देते थे मलहम।
काफी हाउस की मेजों पर देखे जाते थे सपने
नेता, अभिनेता, निर्देशक, कवि, फोटोग्राफर, पत्रकार बनने के
कुछ गरीब कर लेते थे यहां पत्रकार वार्ता भी
निठल्लों के दिन कट जाते एक काफी प्याली के साथ
वेटर कभी नहीं पूछता था कि कैसे बैठे
सुबह के तीन चार अखबारों के साथ यहां
घर की चिक चिक से बच जाते थे।
यह क्या हो गया काफी हाउस को
अब पहले जैसा कुछ नजर नहीं आ रहा
रोज बदल बदल कर आते हैं प्रेमी प्रेमिकाएं
उनकी हंसी और वादे रोज एक से रहते हैं
परसाईं को लोग भूल गए हैं
कवि, साहित्यकार चलते फिरते नजर आ रहे हैं
वैसी ही उनकी प्रतिबद्ताएं फुसफुसाहट में सुनाई दे रही हैं
नए पत्रकारों के लिए ही अब काफी हाउस की पत्रकार वार्ताएं
छुटभैये नेताओं भी पसंद नहीं यहां की बैठक
परिवार के बच्चों को आकर्षित नहीं करती गरम सांभर की भाप
संपूर्ण क्रांति और सर्वहारा प्रतिनिधि पांच सितारा होटल में खो गए
कॉलेजों के प्रोफेसरों को डर लगता है, अब यहां बैठने में
क्योंकि छात्र नहीं उठते हैं उनको देखकर अपनी कुर्सी से
ज्यादा देर बैठने में पर अब उठती है यहां घंटी
क्योंकि काफी हाउस भी मजबूर हो गया
बड़े रेस्त्राओं से टक्कर लेने को
अरे यह क्या हो गया काफी हाउस को।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विवेचना रंगमण्डल राष्ट्रीय नाट्य समारोह-2010: उत्कृष्ट रंगकर्म को दर्शकों का समर्थन

जबलपुर की विवेचना रंगमण्डल ने पिछले दिनों सात दिवसीय ‘रंग परसाई-2010 राष्ट्रीय नाट्य समारोह’ का आयोजन जबलपुर के मानस भवन में किया। यह नाट्य समारोह रंगकर्मी संजय खन्ना को समर्पित था। विवेचना की स्थापना वर्ष 1961 में हुई थी और संस्था ने 1975 से नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्शन से अपनी रंग यात्रा की शुरूआत की, जो आज तक जारी है। देश में विवेचना रंगमण्डल की पहचान एक सक्रिय सरोकार से जुड़ी हुई रंगकर्म संस्था के रूप में है। विवेचना रंगमण्डल पिछले कुछ वर्षों से नए निर्देशकों की नाट्य प्रस्तुतियों को राष्ट्रीय समारोह में भी मौका दे रही है। इस बार के नाट्य समारोह में भी जबलपुर में आयोजित अंतर महाविद्यालयीन नाट्य प्रतियोगिता की तीन श्रेष्ठ नाट्य प्रस्तुतियों को मौका दिया गया, ताकि दर्शकों को नया रंगकर्म देखने का अवसर मिल सके। इस प्रयास को रंगकर्मियों के साथ-साथ दर्शकों ने भी सराहा। इस बार के नाट्य समारोह की एक खास बात यह भी रही कि दर्शकों को सात दिन में नौ नाटक देखने को मिले। समारोह की शुरूआत और अंत गंभीर और विचारोत्तेजक नाटकों से हुआ एवं अन्य दिन हास्य नाटकों के साथ नौटंकी भी देखने को मिली।
नाट्य समारो…

जबलपुर में कविता पोस्टरों की प्रदर्शनी, काव्य पाठ और कला व्याख्यान पर केन्द्रित दो दिवसीय 'दृश्य और श्रव्य' कार्यक्रम आयोजित

प्रगतिशील लेखक संघ, विवेचना, विवेचना रंगमंडल और सुर-पराग के तत्वावधान में पिछले दिनों (१३-१४ मार्च को) जबलपुर में दो दिवसीय 'दृश्य और श्रव्य' कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में पिछले दो दशक के हिंदी के श्रेष्ठ कवियों राजेश जोशी, वीरेन डंगवाल और राजकुमार केसवानी का काव्य पाठ, कविताओं की पोस्टर कला कृतियों की नुमाइश और विखयात विश्वविखयात चित्रकार एवं कथाकार अशोक भौमिक का व्याख्यान हुआ। दो दिवसीय दृश्य और श्रव्य कार्यक्रम का आयोजन इस मायने में महत्वपूर्ण रहा कि इसमें जबलपुर के साहित्यकारों, लेखकों, चित्रकारों, रंगकर्मियों के साथ आम लोगों खासतौर से महिलाओं की बड़ी संखया में सहभागिता रही। दो दिन तक जबलपुर के साहित्य और कला प्रेमियों ने अपनी शाम स्थानीय रानी दुर्गावती संग्रहालय की कला वीथिका में विचारोत्तेजक कविता पाठ सुनने के साथ कविताओं की पोस्टर कला कृतियां देखने में गुजारी। अशोक भौमिक द्वारा 'समकालीन भारतीय चित्रकला में जनवादी प्रवृत्तियां' विषय पर पावर पाइंट प्रस्तुतिकरण के साथ दिया गया व्याख्यान कला प्रेमियों के साथ-साथ कला से वास्ता न रखने वाले आम लोगों के ल…

प्रतिरोध को थिएटर का माध्यम बनाने वाले रंगकर्मी बादल सरकार

बादल सरकार का नाम देश में नाटक का पर्याय है। कलकत्ता में जन्में बादल सरकार ने कई वर्ष इंजीनियर के रूप में काम किया। विदेश से रंगकर्म का डिप्लोमा लेने के पश्चात् उन्होंने रंग जगत में प्रवेश किया। उनके अभिनव तरीके ने रंगमंच में उनकी अलग पहचान विकसित की और बादल सरकार रंग जगत का एक शीर्ष नाम बन गया। बादल दा ने गत 15 जुलाई को जीवन के 83 वर्ष पूर्ण किए हैं।
बादल सरकार से प्रेरित हो कर देश के सैकड़ों रंगकर्मी सड़कों पर नाटक करने उतरे और प्रतिरोध के लिए थिएटर को माध्यम बनाया। थिएटर आडोटोरियम और उसके तमाम तामझाम को छोड़ कर ‘सुधीन्द्र नाथ सरकार’ ने जब थिएटर को जनता से सीधे संवाद करने का माध्यम बना कर नुक्कड़ नाटक की अपनी शैली विकसित की, तो रंग जगत में एक तूफान सा आ गया। सन् 1970 के आसपास उन्होंने थिएटर आडोटोरियम से नुक्कड़ की यात्रा शुरू की। उस समय बांगला थिएटर जगत में शंभू मित्र, तृप्ति मित्र और उत्पल दत्त के नाम शीर्ष पर थे। बादल सरकार बताते हैं- ‘‘मैंने अपना काम कविताओं से शुरू किया। सन् 1956 में मैंने अपना पहला नाटक साल्यूशन एक्स लिखा। फिर सन् 1956 में बारो पिशीमा आया। अभी हाल ही में उनकी दो पुस्त…