शनिवार, 29 मार्च 2008

उड़नतश्तरी का होली आयोजन और लुकमान की याद



पिछले दिनों समीर लाल यानी की उड़नतश्तरी के जबलपुर स्थित घर में होली के मौके पर एक आत्मीय आयोजन हुआ। आत्मीय आयोजन था, इसलिए इसमें समीर लाल के नजदीकियों के अलावा उनके पिताजी श्री पी. के. लाल के मित्र भी थे। मुझे भी इस आयोजन में समीर लाल ने आमंत्रित किया। समीर लाल से मेरी जान-पहचान रंजन दासगुप्ता के जरिए लगभग 14 -15 वर्ष पहले हुई थी। 1999 में वे कनाडा चले गए। इसके बाद मेरा उनसे सम्पर्क नहीं हुआ। अलबत्ता रंजन दासगुप्ता से उनके बारे में जानकारी मिलती रहती थी। पिछले वर्ष मैंने भी ब्लाग लिखना शुरु किया। जब ब्लाग की दुनिया में प्रविष्ट हुआ, तब मुझे जानकारी मिली कि हिन्दी ब्लागिंग में समीर लाल का बहुत नाम है। दैनिक भास्कर भोपाल में हिन्दी ब्लाग पर एक पृष्ठ की जानकारी प्रकाशित हुई। इसमें समीर लाल के महत्वपूर्ण विचार थे। उसी समय मुझे गिरीश बिल्लौरे से खबर मिली कि समीर लाल जबलपुर आए हुए हैं। गिरीश बिल्लौरे, समीर लाल से हिन्दी ब्लाग पर एक व्याख्यान करवाना चाहते थे, लेकिन कोई कार्यक्रम निश्चित नहीं हो पा रहा था। (सभी के प्रयासों से समीर लाल का व्याख्यान विश्व रंगमंच दिवस को 27 मार्च को हुआ) होली के एक दिन पहले समीर लाल का फोन आया कि उन्होंने होली के अवसर पर घर में कव्वाली का एक कार्यक्रम रखा है और इसमें मुझे जरूर पहुंचना है।


मैं होली के दूसरे दिन समीर लाल के घर निश्चित समय से थोड़ी देर से पहुंचा। कव्वाली शुरु हो चुकी थी। कार्यक्रम स्थल पर मैंने देखा कि एक जाना-पहचाना व्यक्ति मंच पर बैठ कर कव्वाली गा रहा था। उसकी कव्वाली आमतौर पर मंचीय कव्वाली से हट कर थी। और हो भी क्यों नहीं। वह व्यक्ति कोई प्रोफेशनल कव्वाल नहीं था, बल्कि वह पेशे से एक अकाउंटेंट और एडवोकेट है। यह व्यक्ति समीर लाल के आयोजन में अपने गुरु शेख लुकमान को श्रद्धांजलि देने के उद्देश्य से उनके द्वारा प्रस्तुत कव्वाली, गजल और गीत को गाने आया हुआ था। यह व्यक्ति सुशांत दुबे था। जबलपुर में लुकमान के सिर्फ दो ही शिष्य हैं। एक सुशांत दुबे और दूसरे शेषाद्रि अय्यर।


लुकमान अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन आज भी उनके गाए गीत गूंज रहे हैं। उनके गीतों की अलख सुशांत दुबे और शेषाद्रि अय्यर ने जगाई रखी है। लुकमान मूलत: जबलपुर के थे। उन्हें बचपन से ही गाने गुनगाने का शौक था। यह बात उनके बेहद करीब के लोग जानते थे। उनके एक दोस्त के यहां शादी हो रही थी। सेहरा पढ़ने के बाद नित्यरंजन पाठक की कव्वाली हुई। इसी महफिल में दुर्गा गुरु और एडवोकेट अब्दुल वहाब भी थे। जैसे ही कव्वाली खत्म हुई, तो एडवोकेट वहाब के इशारे पर दुर्गा गुरु ने लुकमान से 'कुछ' सुनाने की फरमाईश की। सभी लोगों के जोर देने पर पहले लुकमान थोड़े शर्माए और झिझके, लेकिन जैसे ही उन्होंने 'तमन्ना के गुंचे खिले जा रहे हैं, बहार आ रही है कि वह आ रहे हैं' गजल सुनाई तो लोग पागल से हो गए। इसके बाद लुकमान सारी रात सुनाते रहे, और लोग सुनते रहे। इसके बाद जो सिलसिला शुरु हुआ, वह जबलपुर में 55 वर्ष तक लगातार चलता रहा। लुकमान जिस महफिल में गाएं और वह सुबह तक न चलें, ऐसा बहुत ही कम हुआ।


जबलपुर के प्रसिद्ध साहित्यकार भवानी प्रसाद तिवारी के यहां वर्षों पहले साहित्य और संगीत की बैठकें जमा करती थीं। अब्दुल वहाब और भवानी प्रसाद तिवारी परिचित थे और एक दिन वहाब साहब लुकमान को उनके घर ले गए। उस दिन तिवारी जी की संगीत बैठक में एक शास्त्रीय गायक अपनी प्रस्तुति दे रहे थे। उस समय लुकमान के साथ अंतरराष्ट्रीय हॉकी रैफरी सुरेन्द्र शुक्ला (सुक्खन दादा) भी थे। जरुरी काम के कारण उस समय वहां भवानी प्रसाद तिवारी मौजूद नहीं थे। जैसे ही शास्त्रीय गायक ने अपना गायन समाप्त किया, तो लोगों ने लुकमान से गाने की फरमाईश की। साहित्य और कला के दिग्गज लोगों को देख कर लुकमान थोड़ा सहमे हुए थे। उन्होंने कहा शुरु करता हुं, लेकिन मजाक नहीं उड़ाईएगा। लुकमान ने बिना किसी संगीत के वहजाद लखनवी की गजल-'मस्ती नवाज शोखी अंदाज का फिराना जुल्फें सिया घटाएं आंखें शराबखाना' सुनाई तो सुनने वालों को लगा कि जैसे एक ताजा झोंका आया हो। कुछ देर बाद भवानी प्रसाद तिवारी आ गए। महफिल में मौजूद लोगों ने उन्हें लुकमान की गायकी का अंदाज बयां किया। लुकमान ने उन्हें पहली गजल फिर सुनाई। इसको सुन कर भवानी प्रसाद तिवारी ने कहा कि अब इससे ऊंची ही बात रहे। यह महफिल भी रात भर चलती रही। लुकमान ने मुझे बताया था कि इस घटना के बाद तो जैसे दरवाजा ही खुल गया। फिर भवानी प्रसाद तिवारी के यहां होने वाली हर हफ्ते की शनिवार रात की महफिल में लुकमान की उपस्थिति और उनका गायन एक परपंरा बन गई। भवानी प्रसाद तिवारी के यहां उन दिनों आने वालों में केशव प्रसाद पाठक, रामानुजलाल श्रीवास्तव 'ऊंट', रामेश्वर प्रसाद गुरु, गणेश प्रसाद नायक, पन्नालाल श्रीवास्तव 'नूर', प्रेमचंद श्रीवास्तव 'मजहर', नर्मदा प्रसाद खरे जैसे साहित्यकारों के साथ कई युवा पत्रकार और समाजवादी थे।


लुकमान की ख्याति हिन्दी गीत और प्रसिद्ध कवियों और साहित्यकारों के पद्य को गीत के रुप में गाने से हुई। लुकमान द्वारा गाए हुए नीरज का गीत-'विरह रो रहा है, मिलन गा रहा है, किसे याद रखूं, किसे भूल जाऊं', भवानी प्रसाद तिवारी के गीत 'प्यार न बांधा जाए साथी' और 'माटी की गगरिया' महादेवी वर्मा के गीत 'बीन भी हूं मैं तुम्हारी रागिनी भी हूं' एवं 'चिर सजग आंखें, उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना जाग तुझको दूर जाना' को जबलपुर के बाहर दिल्ली, इंदौर, इलाहबाद, बनारस के संगीत प्रेमी आज भी याद करते हैं। लुकमान ने छठे से ले कर आठवें दशक तक इतना नाम कमाया कि जबलपुर की कुछ प्रसिद्ध चीजों में लुकमान कव्वाल भी एक थे। लुकमान के लिए अकबर इलाहबादी का यह शेर याद आ जाता है-


'गुजरे हैं इश्क नाम के एक हजरते बुजुर्ग
हम लोग भी फकीर उसी सिलसिले के हैं'

7 टिप्‍पणियां:

Zololkis ने कहा…

See please here

Udan Tashtari ने कहा…

वाह पंकज भाई, क्या रिपोर्ट पेश की है. आनन्द आ गया. मौका था, दस्तुर था तो प्रोग्राम के दौरान हमने भी घेरे हुए मित्रों को अपनी कविताऐं ठेल ही दीं. :)

gulush ने कहा…

अच्छा होगा कि वह कविताएं आप सभी चिट्ठाकारों के लिए भी ठेल दें

Sanjeet Tripathi ने कहा…

शानदार!!
दिल खुश हो गया इसे पढ़कर!
शुक्रिया!

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' ने कहा…

रोको उसे वो सच बोल रहा है...!
पुख्ता मकानों की छतें खोल रहा है.
जैसे बात जब लुकमान के सुरों के संग सज-धज कर निकलती तो जबलपुरियों दीवानगी सर चढ़ कर बोलने लगती थी, मुझे लुकमान को छूने की ललक रहती झट उनके पैर छू लेता. मिलन,मित्र संघ,आदि-आदि संस्थाओं के अंतरंग कार्यक्रमों में लुकमान का होना उतना ही ज़रूर था जितना जबलपुर में कार्यक्रमों का होते रहना , माटी की गागरिया जैसे गीत आज भी भुलाए नहीं भूले जाते !!
उसी परम्परा का निर्वाह कर रहें हैं सुशांत दुबे और शेषाद्रि अय्यर।फिर भी जाने क्यों हम सभी जबलपुरिये
लुकमान के बाद लुकमान की तलाश में इन्हीं दोनों की महफ़िल सजवाना चाहतें हैं . सुशांत जी गुम थे अब ऑन लाइन हुए हैं , शेषाद्री बरसों से ऑन लाइन हैं

yunus ने कहा…

भाई अपन भी जबलपुरिया ही हैं । लुकमान की अच्‍छी याद निकाली । पन्‍नालाल श्रीवास्‍तव 'नूर' की कुछ ग़ज़लें अपने दिल का टुकड़ा हैं साहब । वो खुदा भी और यादें बुतां भी वाला शेर तो आपको याद ही होगा अगर याद नहीं है तो कहिएगा सुना देंगे । अच्‍छी रिपोर्ट पेश ही । कभी कभी हम जबलपुर को बहुत मिस करते हैं । ऐसे में ऐसी चौपाली रिपोर्ट उस मिस करने की इंटेन्सिटी को और बढ़ा देती है ।

bavaal ने कहा…

प्रिय पंकज भाई, आपकी रिपोर्ट पढ़कर आत्मिक संतोष हुआ. जबलपुर-चौपाल के माध्यम से सभी जबलपुरी भाइयों को यथा-योग्य. आपका -