बुधवार, 2 अप्रैल 2008

चारदीवारी में बूढ़े

आज 1 अप्रैल को मेरे मां के चाचा जी अर्थात मेरे नाना जी का 94 वां जन्मदिन है। वे हम लोगों के घर से लगभग 10-12 किलोमीटर दूर रहते हैं। हम लोग उनसे और नानी से किसी खास मौकों पर ही मिल पाते हैं। हम लोगों के जन्मदिन पर उनकी बधाई एक महीने पहले आ जाती है। उन्होंने यह गुण अपने दो बड़े भाईयों से सीखा है। उनके बड़े भाईयों का निधन हो चुका है। सभी भाई अंग्रेजों के समय के थे, इसलिए उनमें समय की पाबंदी और अनुशासन कूट-कूट कर भरा है। नाना और नानी की इतनी आयु हो जाने के बाद भी वे किसी पर निर्भर नहीं हैं। अपना दैनिक कार्य स्वयं ही निबटाते हैं। उन लोगों को देख कर जीवन जीने की कला सीखी जा सकती है। इसके लिए रविशंकर जी की आर्ट आफ लिविंग की जरुरत नहीं है। दोनों की स्मरणशक्ति लाजवाब है। इसका कारण सादा जीवन, समय पर सोना-समय पर उठना और नियमित जीवनशैली है। उनका एक बेटा और तीन बेटियां हैं और वे सब जबलपुर से बाहर ही हैं। समय-समय पर उनका आना होता रहता है और नाना-नानी भी उनसे मिलने जाते हैं, लेकिन अधिक आयु के कारण अब यह ज्यादा संभव नहीं है। उन लोगों का स्वस्थ रहने का सहज तरीका है। आज भी वे सोलर कुकर में खाना बनाते हैं। उनका घर और बगीचा हम सभी के लिए एक प्रेरणा है।
नाना जी ने अपना जन्मदिन दोस्तों के साथ मनाया। दिन भर में हम लोगों के अलावा कुल जमा आठ लोग ही उनके घर बधाई देने पहुंचे, लेकिन इसका आनंद उन्होंने खूब उठाया। इसका कारण उनकी सकारात्मक सोच है। जन्मदिन के दिन ही साल में एक बार इतने अधिक लोग उनके घर पहुंचते हैं, बाकी 364 दिन उनके घर में लगभग अकेले ही कटते हैं। बेटे और बहु द्वारा भेजा गया ग्रीटिंग कार्ड उनकी खुशी को द्विगुणित कर रहा था। बधाई देने आए लोगों को उन्होंने ग्रीटिंग कार्ड दिखा कर अपनी खुशी सभी के साथ बांटी। हम लोग शाम के समय उनके यहां बधाई देने वाले शायद अंतिम थे। विदा होते समय हम लोगों को वापस आते समय अच्छा नहीं लग रहा था, क्योंकि नाना-नानी वापस फिर अपनी दुनिया में चले जाएंगे। जहां वे फिर अगले वर्ष का इंतजार करेंगे कि जन्मदिन आए और कुछ लोग उनसे इसी बहाने मिलने आएं और वे उनसे अपनी कुछ खुशियां बांत सकें। उनके घर से आने के बाद उन बुजुर्गों पर एक कविता लिखने का मन आया है, जो बिल्कुल अकेले रह रहे हैं। यह कविता आप लोगों के साथ बांट रहा हूं।

घर की चारदीवारी में कट जाते हैं बूढ़ों के दिन
चारदीवारी में कब होती है सुबह और शाम
बूढ़े नहीं जानना चाहते हैं इसे
उन्हें डर लगता है अंशुमान-विभांशु के प्रकाश से
इससे ही होती सुबह और शाम
सुबह की रौशनी उत्साह भरती है, तिमिर अवसाद
बूढ़े परेशान हैं उत्साह-अवसाद के चक्र से
इसलिए वे चारदीवारी में कैद हैं।

चारदीवारी में बूढ़ों की स्मृतियों में कैद हैं जीवन के रंग-विरंग
जिन्हें बांट देना चाहिए
चार सोपानों में
चौथे सोपान में जी रहे हैं बूढ़े
चारदीवारी में देख रहे हैं जीवन के अक्स
चारदीवारी के उधड़ रहे प्लास्टर की तरह रही है जिंदगी उनकी।

चारदीवारी से शुरु हुआ था जीवन का संघर्ष
बड़ी जतन से रौंपे थे पौधे
जीवन की खुशियां वे पौंधों में देखते
सबको अपने कर्म करने को कहते
चारदीवारी को था अपनी नींव पर बड़ा गर्व
इसमें उन्हें पता नहीं कि कब पौधे पेड़ बन गए
पेड़ों की जड़ें चारदीवारी की नींव तक पहुंच गईं।
जड़ों ने चारदीवारी को हिला दिया
पेड़ों की शाखाएं खुले में फैल गईं
चारदीवारी में सिमट गई जिंदगी बूढ़ों की।

चारदीवारी में रखी असंतुलित टेबल से उन्होंने रिश्ता बना लिया
क्योंकि वह जो उनकी तरह हिल-डुल रही थी
टेबल पर समाया था बूढ़ों का पूरा संसार
टेबल पर फैले अखबार से होती थी सुबह
टेबल पर रखी गोलियों के खाने से वे जी रहे थे
टेबल पर कट जाती थी सब्जी
टेबल पर खा लेते थे खाना
और रात में जब नहीं आती थी नींद
तब टेबल ही सहारा होती थी
अब चारदीवारी में बूढ़ों के साथ टेबल भी हो गई है कैद।

1 टिप्पणी:

mahendra mishra ने कहा…

" अब चारदीवारी में बूढ़ों के साथ टेबल भी हो गई है कैद "
नानाजी को मेरी और से जन्मदिन पर ढेरों बधाई और शुभकामनाये
बहुत बढ़िया पंकज जी