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तारे जमीं पर और आमिर खान का भला हो!


भारतीय समाज में हिंदी फिल्मों का कितना व्यापक प्रभाव है, इसकी बानगी पिछले दिनों उस समय देखने को मिली, जब बच्चों के स्कूल के रिजल्ट आए। भला हो आमिर खान का और उनकी फिल्म ‘तारे जमीं पर’ का कि उनकी फिल्म से प्रभावित हो कर अभिभावकों ने खराब रिजल्ट लाने के बावजूद बच्चों को न तो डांटा और न ही पीटा। एक ओर वे अभिभावक थे, जो कि बच्चों के अच्छे रिजल्ट से गौरवान्वित थे, तो वहीं कुछ ऐसे अभिभावक भी मिले जो गर्वपूर्वक बता रहे थे कि उनका बेटा परीक्षा में कुछ लिख कर नहीं आया। बिल्कुल ‘तारे जमीं पर’ के ईशान अवस्थी की तरह। ऐसे अभिभावकों को अपने बच्चे में ईशान अवस्थी की भूमिका निभाने वाले दर्शनील सफारी की छवि उभर रही थी।

अमीर लेकिन कम पढ़े-लिखे एक अभिभावक ने तो भौंएं ऊपर करते हुए कहा - ‘‘बेटे ने तो कापियों में सिर्फ आड़ी-टेढ़ी लाइनें ही खींच दीं, अपने आमिर खान की फिल्म जैसे। मेडम भी आश्चर्य कर रहीं थीं कि फिल्म की तरह कैसे हो गया।’’ यहां अभिभावक के साथ स्कूल की टीचर भी हतप्रभ थीं। मैंने पूछा कि बच्चे की रिजल्ट पर क्या प्रतिक्रिया थी ? अभिभावक ने गर्व से कहा-‘‘वह कह रहा था कि बिल्कुल ‘तारे पर जमीं’ जैसा हो गया न पापा।’’

मुझे लगा कि काश हमारे बचपन में आमिर खान और ‘तारे जमीं पर’ दोनों ही होते तो रिजल्ट खासतौर से 30 अप्रैल के दिन धुकधुकी न होती। 27-28 अप्रैल से ही भगवान को सुमरने लगते थे। रिजल्ट अच्छा आने पर भी यहां-वहां घूम कर समय काटते हुए घर पहुंचते थे कि जितनी देर हो जाए उतना ही भला। घर पहुंच कर ‘‘किस-किस में कम नंबर आए हैं। गणित में तो तुम कमजोर हो ही।’’ जैसी बातें सुनने को तो मिलेंगी ही और हो सकता है एक-आध चांटा भी पड़ जाए।

सातवीं कक्षा तक तो पिता जी की डांट और पिटाई का डर बना रहा, लेकिन रिजल्ट के कुछ दिन बाद ही उनका निधन हो गया। आठवीं कक्षा में नाना के घर आ गए। पढ़ाई-लिखाई क्या हो रही है, इसकी चिंता सबको थी, लेकिन पुराने परफार्मेंस के आधार पर सब लोग चिंतित थे। परीक्षा देते-देते दादा जी की तबियत बिगड़ गई और सबको लगा कि उनकी मृत्यु कभी भी हो सकती है। पोतों से मिलना उनकी अंतिम इच्छा थी। दूसरे कस्बे में जब उनसे मिलने के लिए हम लोग जिस दिन गए तो उसके अगले ही दिन विज्ञान का पर्चा था। परीक्षा की बात करने पर कहा गया-‘‘जाना तो पड़ेगा, देखा जाएगा।’’ दादा जी से अंतिम बार मिल कर दूसरी सुबह मुझे अकेले ही ट्रेन में बैठा दिया गया। तब मैं अपनी विज्ञान की एक पुस्तक के साथ था। रास्ते में कुछ लोगों को आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले अकेले लड़के को देख कर शक हुआ। उन्हें मैंने पूरा वृतांत सुनाया कि दादा जी मिल कर लौट रहा हूं न कि घर से भाग रहा हूं।

नाना के घर वापस आ कर ट्रेन में जितनी देर विज्ञान पढ़ सका, उस आधार पर परीक्षा दे आया। घर वाले तो अच्छे नंबर, क्या पास होने तक की आशा में नहीं थे। मुझे याद है कि उस वर्ष आठवीं की बोर्ड परीक्षा का रिजल्ट मई की 15 तारीख को आया था। नाना जी ने डीएससी आफिस में फोन कर आठवीं कक्षा के रिजल्ट की पूछताछ की और एक कागज में नंबर लिखने लगे। सामने बैठ कर मैं उनके चेहरे के भावों को पढ़ने की कोशिश कर रहा था। कुछ ही क्षणों में उन्होंने फोन रख कर मुझे बधाई देते हुए कहा कि तुमने 78 प्रतिशत अंक पाए हैं। जब मैंने अच्छे नंबर पाए, उस समय मेरे पिताजी मेरे साथ न थे और न ही कोई पूछने वाला था कि मैंने किस-किस विषय पर कितने नंबर पाए और नंबर कम क्यों हैं, लेकिन जब मैं कागजों में नंबर देख रहा था, तब मुझे लग रहा था कि पिताजी का आशीर्वाद और नसीहतें जरूर मेरे साथ हैं।

टिप्पणियाँ

Vaibhav ने कहा…
आपने तो पुरानी यादें ताजा कर दी, जब १०वी में ८०% अंक आये थे तब पहली बार पिताजी ने पीठ थपथपाई थी, आज भी याद है वो क्षण ...वाह कितना सुखद समय था, शायद सबसे बड़ा पुरस्कार |
पुराने संस्मरण दिल में उत्साह पैदा कर देते है जरुरी है कि हर किसी अच्छे कार्य के लिए प्रोत्साहन दिया जाना. बहुत ही उम्दा पोस्ट. बधाई.
Anil ने कहा…
मैंने अपने बचपन में कुछ सहपाठियों को फेल होने पर स्कूल में डंडे से पिटते देखा है। पहले तो बच्चे को फेल होने का दुख, ऊपर से उसकी पिटायी! यार कोई मुझे शिक्षा मंत्री बना दो!
gulush ने कहा…
बच्चों के लिए मनोविज्ञान कुछ हद तक ठीक है। पूरे परिवार के बड़े-बुजुर्गों के अनुभव को देखते हुए और अब पिता होने के नाते मैं पुराने स्कूल को ज्यादा तरजीह देता हूं।
Gopal Awashi ने कहा…
please leave double face. one side you compare tare jameen par and in prectial life you all ways torture your son.
gulush ने कहा…
गोपाल जी,
मैं तो 'तारे जमीं पर' को वास्तविकता की कसौटी पर परख रहा हूं।
रही अपने बेटे को टार्चर करने की. तो जिस प्रकार मेरे दादा, नाना, पिताजी और
परिवार के सभी बुजुर्गों ने मुझे समय-समय पर सलाह और नसीहतें दी हैं,
उसी तरह मैं अपने बेटे को भी सलाह व नसीहत दे रहा हूं। आपने तो पत्रकारिता
में लंबे समय तक एज्युकेशन बीट देखी है, यदि आप आज की नई पीढ़ी को समझ
नहीं पाए तो फिर इतने वर्ष की पत्रकारिता व्यर्थ है।
Gopal Awashi ने कहा…
baat new genration ki nahi hai Mr.Swamy,behave ki hai. aap apna face bachane jurnalism carrior per sawal mat karo. pl.behave like a gentle papa.
gulush ने कहा…
पत्रकारिता पर सवाल इसलिए है कि अब इसके सरोकार बदल गए हैं।
घर व पिता के संस्कारों और उनकी नसीहतों के कारण के कारण ही आप
पत्रकारिता में सफल हुए हैं, यह अटल सत्य है।

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