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ज्ञानंरजन ने कहा-पारदर्शी हो साहित्यिक पुरस्कारों की प्रक्रिया



प्रसिद्ध साहित्यकार और पहल के संपादक ज्ञानरंजन ने कहा है कि प्राय: पुरस्कृत और सम्मानित लोग आत्मकथन की तरफ जाते हैं, परन्तु मेरे लिए भारतीय भाषा परिषद का सम्मान एक दर्पण की तरह है, जिसमें मैं खुद को और अपने अतीत को निहारता हूं। मत-मतांतर के साथ पत्रकारी किस्म के विवाद व अवसर के बाद विलक्षणता की ऐसी घड़ी चल रही है, जिसमें एक घातक हिंसा पैदा हो चुकी है। उन्होंने कहा कि साहित्य व राजनीति के बीच किसी भी तरह का फर्क गायब हो चुका है। ज्ञानरंजन कहते हैं कि उनकी सोच यह है कि हमें अपने समस्त सांस्कृतिक उपक्रमों व उसके प्रबंधन पर बाजार के रिवाज से हट कर नए सिरे से विचार कर एक नया सांस्कृतिक आंदोलन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें अपने पुरस्कारों की प्रक्रिया को खोल देना चाहिए और उसकी राजनीति व गोपनीयता को भंग कर देना चाहिए। ज्ञानरंजन ने कहा-‘‘मैंने जो कुछ भी कहा है, वह मेरी तथा मेरी कहानियों की ही आवाज है।"

उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध साहित्यकार और पहल के संपादक ज्ञानरंजन को पिछले दिनों कोलकाता में हिंदी साहित्य में अमूल्य योगदान देने के लिए भारतीय भाषा परिषद ने वर्ष 2008 के साधना सम्मान से सम्मानित किया। ज्ञानरंजन सहित डा. महिंदर कौर गिल (पंजाबी), आर. वैरामुत्थु (तमिल) और रामचंद्र बेहरा (उड़िया) को भी साधना सम्मान से सम्मानित किया गया। युवा साहित्यकारों में हिंदी के लिए डा. अल्पना मिश्रा, निर्मला पुतुल (संथाली), मधुमीत बावा (पंजाबी) और एस. श्रीराम (तमिल) को अपनी-अपनी भाषा के साहित्य में योगदान देने के लिए युवा साहित्कार सम्मान से अलंकृत किया गया। उड़िया के साहित्यकार रमाकांत रथ ने साहित्यकारों को सम्मानित किया।

रमाकांत रथ ने इस अवसर पर कहा कि साहित्य में जूनियर व सीनियर नहीं होता। साहित्य एक परम्परा है, जो निरंतर गतिशील रहती है। साहित्यकार को अपने आप को स्टेनोग्राफर से ज्यादा नहीं समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान करते हैं। भाषा मानवीय संस्कृति को जोड़ती है। कुछेक भारतीय भाषाओं को क्लासिकल भाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए। भारतीय भाषाओं को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है।

तमिल के सम्मानित कवि वैरामुत्थु ने कहा कि जब जीवन के प्रति ललक खत्म हो जाए व पृथ्वी विस्मित करने लगे कविता वहीं समाप्त हो जाती है। उड़िया साहित्यकार डा. रामचंद्र बेहरा ने कहा कि रचनात्मक लेखन आत्म अभिव्यक्ति का माध्यम है। लेखक की रचना में जीवन के उनके अनुभवों और दृष्टि की झलक दिखती है।

युवा साहित्कार डा. अल्पना मिश्रा ने कहा कि साहित्य में समय और समाज को अभिव्यक्त करना चाहिए। स्त्री को आलू छीलने से ले कर चिप्स तक की पीड़ा को समझने की जरूरत है।

संथाली साहित्यकार निर्मला पुतुल ने कहा-‘‘मुझे जो सम्मान मिला है, वह संथाल समुदाय का सम्मान है। संथाली साहित्य में गीतों की प्रमुखता है। इसके बोल बड़े कीमती हैं। लोक कंठों और परम्पराओं में संथाली साहित्य सुरक्षति है। दुर्भाग्य है कि कुछ साहित्यकारों ने संथाली क्रांतिकारियों को लुच्चा कहने में भी संकोच नहीं किया है। कुछ भद्र जन संथाली भाषा को संविधान की आठवीं सूची में जगह मिलने से भयभीत हैं।’’

समापन भाषण देते हुए रामकुमार मुखोपाध्याय ने कहा कि साहित्य हमारे लिए आवश्यक है। साहित्य अतीत व वर्तमान को जोड़ता है। कार्यक्रम का संचालन भारतीय भाषा परिषद की कुसुम खेमानी ने किया। स्वागत भाषण संस्था के निदेशक डा. विजय बहादुर सिंह ने दिया।

टिप्पणियाँ

shaktisanchar ने कहा…
ज्ञानरंजन जी के सभी वक्तव्य महत्वपूर्ण होते हैं। इसी प्रकार भारतीय भाषा परिषद के सम्मान समारोह में आपके ब्लाग में प्रस्तुत रपट में
उनका यह वक्तव्य भी खास है कि साहित्यिक पुरस्कारों की प्रक्रिया में भी पारदर्शिता होनी चाहिए। ज्ञानरंजन के संपादन में "पहल" ने नई ऊंचाईयों को छुआ है। "पहल" को बंद करने में राजेन्द्र यादव और पंकज विष्ट ने जिस प्रकार नकारात्मक दृष्टिकोण दिखाया था, वह साहित्य के वातावरण को ही दूषित करता है।
VIJAY TIWARI " KISLAY " ने कहा…
सर्व प्रथम आदरणीय ज्ञान जी को इस सम्मान के लिए अशेष बधाईयाँ.
आदरणीय ज्ञान जी की टिप्पणी " साहित्य व राजनीति के बीच किसी भी तरह का फर्क गायब हो चुका है। " आज के परिवेश और साहित्य की गरिमा के होते ह्रास को देखते हुए एक दम सही और दो टूक अभिव्यक्ति है.
- विजय
vijay gaur/विजय गौड़ ने कहा…
सभी सम्मानित रचनाकारों को बहुत बहुत बधाई।
मुनीश ( munish ) ने कहा…
congrats all! cash reward should also go up!
ठीक कहा दादा ने आज गेंदा लाल जी विश्वकर्मा को भी कोई साहित्यिक सम्मान मिला है साल में दो तीन सम्मान मिल ही जातें हैं उनको उनको भी बधाइयाँ .
Harkirat Haqeer ने कहा…
सभी रचनाकारों को बहुत बहुत बधाई.....!!!

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