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आन गांव के सिद्ध पंडित अजय पोहनकर


पिछले दिनों रेडियो एंड म्यूजिक डाट काम में किराना घराने के गायक पंडित अजय पोहनकर का एक इंटरव्यू पढ़ने को मिला। इस इंटरव्यू को पढ़ते हुए मैं अतीत में चला गया। आम भारतीयों की तरह मैं भी नास्टलाजिक हूं। मुझे पंडित अजय पोहनकर और उके परिवार से जुड़ी बातें याद आने लगीं। प्रयास करने के बाद मुझे पंडित अजय पोहनकर का मोबाइल नंबर मिला और उनसे बात करने को स्वयं को रोक नहीं सका। जब मैंने उनको फोन लगाया, तब वे मुंबई के ट्रैफिक में फंसे हुए थे। जब उन्हें यह जानकारी मिली कि मैं जबलपुर से बात कर रहा हूं, तो वे भावुक हो गए और उन्होंने कहा कि वे दूसरे दिन स्वयं मुझसे बात करेंगे। बहुत से लोगों और जबलपुर के लोगों को ही यह जानकारी नहीं है कि अजय पोहनकर जबलपुर के रहने वाले हैं। उनके लिए "घर का जोगी जोगड़ा, आन गांव के सिद्ध" कहावत सटीक बैठती है।
दूसरे दिन निश्चित समय पर मेरी उनसे बातचीत हुई। संक्षिप्त बातचीत में पंडित अजय पोहनकर ने सबसे पहले कहा-‘‘मुझे जबलपुर और मध्यप्रदेश ने तो भुला दिया।’’ पंडित जी ने कहा कि वे मध्यप्रदेश और खासतौर से मध्यप्रदेश के लिए बहुत कुछ करना चाहते हैं, लेकिन कोई इसके लिए पहल तो करे। मैंने उन्हें लगभग 10-12 वर्ष वर्ष जबलपुर में हुई संगीत सभा और बातचीत का जिक्र किया, तो उन्होंने कहा कि वह कार्यक्रम जबलपुर के सीनियर एडवोकेट और अब सुप्रीम कोर्ट के वकील विवेक तन्खा की पहल पर आयोजित हुआ था। पंडित अजय पोहनकर ने कहा कि वे जबलपुर और मध्यप्रदेश के नए गायकों को मार्गदर्शन देना चाहते हैं और गुरूकुल परम्परा को आगे बढ़ाना चाहते हैं। इसके लिए यदि उन्हें जमीन मिल जाए तो वे एक संगीत अकादमी की स्थापना करेंगे, जहां वे नए गायकों को ख्याल, ठुमरी और परफार्मेंस टेक्निक की शिक्षा देने चाहेंगे। पंडित अजय पोहनकर ने बातचीत में इस बात पर दुख व्यक्त किया कि उनके 50 वर्ष के संगीत योगदान को मध्यप्रदेश सरकार ने याद नहीं रखा है और न ही कालिदास सम्मान के काबिल समझा। पंडित जी को इस बात का भी दुख है कि महाराष्ट्र व मध्यप्रदेश सरकार ने अभी तक पद्मश्री या पद्म भूषण सम्मान के लिए उनके नाम की अनुशंसा नहीं की, जबकि ऐसे सम्मान उनको 20-25 वर्ष पूर्व ही मिल जाने चाहिए थे। पंडित अजय पोहनकर ने कहा कि मध्यप्रदेश के छोटे शहर सतना में उनके शिष्य रमाकांत त्रिपाठी और विनोद मिश्रा ने कुछ दिन पूर्व ही एक अच्छा कार्यक्रम आयोजित कर उनको गाने का मौका दिया, लेकिन बड़े शहरों में ऐसे आयोजन क्यों नहीं होते ?
पंडित जी बात करने के पश्चात् मुझे पुरानी बातें याद आने लगीं। बात शायद वर्ष 1977 की है। उस समय हम लोग जबलपुर के राइट टाउन मोहल्ले में रहते थे। उस समय मैं मोंटेसरी स्कूल में पढ़ा करता था। यह हिंदी माध्यम स्कूल जबलपुर ही क्या मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध होमसाइंस कालेज के परिसर में स्थित है। उस हिंदी माध्यम स्कूल की उस समय इतनी ख्याति थी कि उसमें प्रवेश के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती थी। इस स्कूल के अधिकांश विद्यार्थी माडल स्कूल में प्रवेश पाते थे। उस समय आठवीं और ग्यारहवीं की 25 की मेरिट लिस्ट में माडल स्कूल के विद्यार्थियों की संख्या लगभग 15 से 17 के बीच में रहती थी। इन्हीं दो स्कूलों के पढ़े विद्यार्थी आज आईएएस, डाक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, संगीतज्ञ के रूप में नाम कमा रहे हैं। मैं रोज स्कूल प्रभात पुल से जाया करता था। प्रभात पुल के रास्ते में काफी प्रबुद्ध परिवारों के मकान थे। उनमें कुछ या उनके परिवार के लोग तो अभी भी रह रहे हैं। इन्हीं लोगों में से एक डा. सुशीला पोहनकर का घर प्रभात पुल के किनारे था। मुझे उनके घर में डा. सुशीला पोहनकर के नाम से लगी नेमप्लेट से ही यह जानकारी मिली कि इस घर में कोई पोहनकर परिवार रहता है।
उस समय मैं डा. सुशीला पोहनकर या पंडित अजय पोहनकर की शख्सियत से परिचित नहीं था, लेकिन मांटेसरी स्कूल में पांचवी कक्षा में पहुंचने के वक्त यह जानने लगा कि डा. सुशीला पोहनकर होम साइंस में संगीत की शिक्षा देती हैं। बाद के दिनों में अपनी मां से मुझे जानकारी मिली कि डा. सुशीला पोहनकर एक अच्छी गायिका भी हैं। मांटेसरी स्कूल में ही पढ़ते समय होमसाइंस कालेज के कार्यक्रमों में डा. सुशीला पोहनकर के निर्देशन में संगीत के एक-दो कार्यक्रम देखने और सुनने को भी मिले। इससे मेरी बाल बुद्धि को अहसास हुआ कि वे संगीत की अच्छी जानकार हैं। कुछ दिनों के पश्चात् एक दिन मैंने देखा कि जिस मकान में पोहनकर परिवार रहता है, वहां उनकी नेमप्लेट नहीं थी। मेरी एक मौसी होम साइंस में पढ़ाती थीं और उनके पोहनकर परिवार से घनिष्ठ संबंध थे। उन्हीं से मुझे और मेरी मां को इस बात को जानकारी मिली कि पोहनकर परिवार बंबई शिफ्ट हो गया है और उन्होंने अपना मकान बेच दिया है।
इसके बाद पोहनकर परिवार के संबंध में कुछ सुनने को नहीं मिला। लगभग 10-12 वर्ष पहले पंडित अजय पोहनकर एक कार्यक्रम के लिए जबलपुर आए। जैसा कि पहले जिक्र किया गया है कि यह कार्यक्रम जबलपुर के प्रसिद्ध एडवोकेट विवेक तन्खा ने आयोजित किया था। उस समय मैं दैनिक देशबन्धु एक साप्ताहिक सांस्कृतिक कालम ‘संस्कृति’ लिखा करता था। इसी कालम के लिए मैंने तब पंडित अजय पोहनकर एक इंटरव्यू लिया। इतने वर्षों में लोग यह भूल चुके थे कि पंडित अजय पोहनकर का जबलपुर से कोई संबंध है। जैक्सन होटल में पंडित अजय पोहनकर से लंबी बातचीत हुई। उन्होंने उस बातचीत में कहा था कि वे कव्वाली सुनना पसंद करते हैं और कभी मौका मिला तो वे कव्वाली गाएंगे।
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में पंडित अजय पोहनकर एक सम्मानीय नाम है। किराना घराने का प्रतिनिधित्व करने वाले पंडित अजय पोहनकर ने संभवत: एकमात्र ऐसे गायक हैं, जिन्होंने महान गायकों उस्ताद आमीर खान, पंडित भीमसेन जोशी, पंडित जसराज, उस्ताद नजाकत अली सलामुद्दीन, पंडित निखिल बैनर्जी.....जैसे संगीतज्ञों की छत्र-छाया में आगे बढ़े हैं।
अजय पोहनकर ने सिर्फ आठ वर्ष की आयु में नागपुर की एक संगीत सभा में सार्वजनिक रूप से अपना गायन प्रस्तुत किया था। इस संगीत सभा में उनके नाम की सिफारिश किसी और ने नहीं बल्कि उस्ताद आमिर खान ने की थी। अजय पोहनकर के पिताजी जबलपुर में वकालत करते थे और समाज में उनकी काफी प्रतिष्ठा थी। धनाढ्य व्यक्ति होने के बावजूद संगीत में उनकी काफी रूचि भी थी। उन दिनों अमीर परिवारों में गाने को हेय दृष्टि से देखा जाता था। मां-बाप को चिंता सताती रहती थी कि यदि बच्चा गाना गाने लगेगा, तो जायदाद की देखभाल कौन करेगा ? अजय पोहनकर के साथ ऐसा नहीं था। उनकी मां डा. सुशीला पोहनकर किराना घराने की थी और उन्होंने अपने बेटे को संगीत का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया था।
अजय पोहनकर के पिता की संगीत में रूचि और मां का संगीत शिक्षक होने का फायदा यह था कि उनके घर में उस समय के तमाम बड़े संगीतज्ञों का आना-जाना लगा रहता था। उस्ताद आमिर खान जब भी जबलपुर आते थे, तो वे पोहनकर परिवार के घर में ही रूकते थे। सिर्फ आमिर खान ही नहीं बल्कि उस समय के वे सभी संगीतज्ञ, जो जबलपुर आते थ, उनके घर में जरूर जाते थे। इससे पोहनकर परिवार का घर जबलपुर में संगीत गतिविधियों का मुख्य केन्द्र बन गया। आज लोग किसी भी स्थान में हवाई जहाज से आते हैं और दूसरी उड़ान से चले जाते हैं, लेकिन उन दिनों संगीतज्ञ तीन-चार दिन और कभी-कभी एक सप्ताह तक रूका करते थे। कई बार जबलपुर के आसपास संगीत सभा के आयोजन के दौरान भी प्रसिद्ध संगीतज्ञ समय निकाल कर जबलपुर आते और पोहनकर परिवार से मिलने जाते। इस प्रकार अजय पोहनकर का कई महान् संगीतज्ञों से परिचय हुआ। डा. सुशीला पोहनकर ने भी अपने बेटे को प्रोत्साहित किया कि वे महान् संगीतज्ञों की बातों को गंभीरतापूर्वक सुनें और जीवन में उनका पालन करें।

डा. सुशीला पोहनकर भी एक अच्छी गायिका थीं, लेकिन उन्होंने गायन को कभी भी पेशेवर रूप में नहीं अपनाया। इसका कारण उस समय एक अकेली महिला का बाहर जा कर गाने को अच्छा नहीं माना जाता था और न ही इसके लिए उनको प्रोत्साहित किया जाता था। अजय पोहनकर के दादा जी ने अपनी बहु को इस बात की स्वीकृति अवश्य दे दी कि वे अपने बेटे यानी कि अजय के माध्यम से अपनी इच्छा को पूरी कर सकती हैं।

पंडित जसराज का भी पोहनकर परिवार से गहरा नाता था और वे डा. सुशीला पोहनकर को अपनी बहिन मानते थे। इस रिश्ते के कारण अजय पोहनकर को पंडित जसराज का सानिध्य मिला। अजय पोहनकर को किशोरवय में महान् संगीतज्ञों से मिलने, उनका गायन सुनने और अन्य बातों को सीखने का मौका मिला और इसका उन्होंने पूरा आनंद भी उठाया। संगीतमय माहौल ने अजय को गायन में आगे बढ़ने में पूरी सहायता की। अजय ने संगीत की मूल बातें ही नहीं सीखी, बल्कि यह भी सीखा कि संगीतकारों के साथ बैठ कर क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।
पंडित अजय पोहनकर ने नागपुर की संगीत सभा की सफलता के पश्चात् उस्ताद नजाकत अली सलामुद्दीन, फिल्म अभिनेता गोविंदा की मां प्रसिद्ध ठुमरी गायिका निर्मला देवी और पंडित निखिल बैनर्जी के सानिध्य में शुरूआत की। इसके पश्चात् दस वर्ष की आयु में उस्ताद आमिर खान की सिफारिश पर उन्हें बंबई आमंत्रित किया गया। सन् 1959 में जब अजय पोहनकर 11-12 वर्ष के थे, तब सवाई गंधर्व समारोह में गायन के लिए उन्हें पंडित भीमसेन जोशी ने आमंत्रित किया। 12 दिन तक चलने वाले कलकत्ता समारोह में भी उन्हें अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने का मौका मिला। इस समारोह में गायकों को अपना गायन कौशल पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, उस्ताद हाफीज अली खान साहब (उस्ताद अमजद अली खान के पिता) जैसे संगीतज्ञों के समक्ष प्रस्तुत करना पड़ता था। इन तमाम संगीत सभाओं में अजय पोहनकर को खूब प्रशंसा मिली। बेगम अख्तर ने जबलपुर के प्रवास के दौरान उनकी कंपोज की गई ठुमरी को अच्छे से प्रस्तुत करने पर अजय पोहनकर को प्यार और प्रोत्साहन की दृष्टि से कुछ रूपए दिए। बेगम अख्तर ने अजय पोहनकर से कहा कि वे भविष्य में भी उनकी कंपोज की गई रचनाओं को गा सकते हैं।

आज पंडित पोहनकर के बेटे अभिजीत भी युवा गायक के रूप में नाम कमा रहे हैं और अपनी परिवार की परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। पिता-पुत्र ने ‘‘पिया बावरी’’ नाम से एक फ्यूजन अल्बम निकाला है, जो काफी सफल रहा है। वर्तमान में टीवी रिएल्टी शो में विजेता बनने वाले कई प्रतिभागी पंडित अजय पोहनकर के शिष्य हैं।

टिप्पणियाँ

पंडित अजय पोहनकर के बारे में बहुत बढ़िया जबलपुर यात्रा संस्मरण और जानकारीपूर्ण आलेख . आभार.
प्रिय मित्र
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अखिलेश शुक्ल्
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भाई गुलुश जी
पंडित अजय पोहनकर जी , उनके परिवार एवं उनको साहित्यिक उपलब्धियों भरा आलेख पढ़ कर बड़ा आर्श्चय हुआ कि संस्कारधानी के ऐसे महान लोगों को वहीँ के लोगों ने भुला दिया , कभी यहाँ के संगीत प्रेमियों को भी उनकी याद नहीं आई.

पोहनकर जी की असहजता स्वाभाविक है. उन्हें भी अपनी माटी , अपनी जड़ों से जुडाव तो होगा ही.
यदि आदरणीय पोहनकर जी ने भी स्वयं इस दिशा में यदि पहले ही स्वस्फूर्त कुछ प्रयास किये होते तो शायद आज गुलुश जी को इस विषय में इतना लिखने की आवश्यकता ही न होती.
- विजय

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