मंगलवार, 29 जून 2010

ब्रिटिशकलीन डिलाइट टॉकीज का अवसान

ही मुझे एक पान की दुकान से जानकारी मिली कि डिलाइट टॉकीज 1 जुलाई से बंद हो रही है। आज के नौजवानों के लिए डिलाइट टॉकीज बंद होने की बात कुछ खास मायने नहीं रखती है, लेकिन मेरे जैसे जबलपुर के खांटी लोगों के लिए यह एक बड़ी खबर है। डिलाइट टॉकीज का एक ऐतिहासिक महत्व है। आज के नौजवान मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखना पसंद करते हैं। उन्हें डिलाइट टॉकीज के महत्व की जानकारी भी नहीं होगी, लेकिन मुझ जैसे 70 के दशक की पैदाइश के लोगों के लिए डिलाइट टॉकीज का अपना एक अलग महत्व है।

वर्तमान मल्टीप्लेक्स युग के पहले जबलपुर में टॉकीजों की संखया अच्छी-खासी थी। प्रसिद्ध अभिनेता प्रेमनाथ के पिता राय करतारनाथ की एम्पायर टॉकीज और डिलाइट टॉकीज ब्रिटिशकालीन जबलपुर में अंग्रेजी और हॉलीवुड सिनेमा के प्रदर्शन के मुखय केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध थे। संभवतः मध्यप्रदेश में अंग्रेजी और हॉलीवुड की फिल्मों को प्रदर्शित करने का श्रेय दोनों टॉकीजों को ही है। एम्पायर टॉकीज में स्वतंत्रता के पहले ऑपेरा शो हुआ करते थे और फिर फिल्मों का प्रदर्शन हुआ। राय करतारनाथ ने टॉकीज का अधिपत्य लेने के बाद भी टॉकीज का नाम नहीं बदला। वहीं डिलाइट टॉकीज भी स्वतंत्रता के पूर्व अस्तित्व में आ गई थी। शुरूआत में डिलाइट टॉकीज नागपुर के एक क्रिद्गिचयन मिशनरी ट्रस्ट की संपत्ति थी। इसके पश्चात्‌ जबलपुर में प्लाजा टॉकीज (बाद में जयंती टॉकीज) को संचालित करने वाली कंपनी सुप्रीम फिल्म एक्सचेंज ने डिलाइट टॉकीज का संचालन किया। जानकारों ने बताया कि गोरखपुर निवासी डा. भटनागर ने भी कुछ दिन डिलाइट टॉकीज को संचालित किया। सिविल लाइन के प्रतिष्ठित नागरिक डा. डिसिल्वा के प्रयासों से आर. पी. नायक परिवार को डिलाइट टॉकीज की संपत्ति मिली और वर्तमान में उनके परिवार के सदस्य इसके मालिक हैं। बताया गया है कि टॉकीज बंद होने के पश्चात्‌ अब यहां मार्केट के साथ-साथ बहु- मंजिला आवासीय परिसर का निर्माण होगा।

बाद के दिनों में जबलपुर में हिंदी फिल्मों का प्रदर्शन करने वाले थिएटरों में भी अंग्रेजी और हॉलीवुड की फिल्में प्रदर्शित होने लगीं। दरअसल एम्पायर और डिलाइट टॉकीज क्रमशः जबलपुर के केंट और सिविल लाइन क्षेत्र में स्थित थीं और इस क्षेत्र में अभिजात्य और भद्र लोग रहा करते थे। ये लोग अंग्रेजी और हॉलीवुड की फिल्में देखना पसंद करते थे। सातवें-आठवें दशक में डिलाइट टॉकीज में अन्य भारतीय भाषाओं की फिल्में भी प्रदर्शित होने लगी।

मेरे जेहन में आज भी डिलाइट टॉकीज में देखी हुईं क्लॉसिक फिल्मों की स्मृतियां अमिट हैं। मैंने ऐतिहासिक डिलाइट टॉकीज में क्लियोपेट्रा, बैनहर, लारेंस आफ अरेबिया, द डीप, टावरिंग इनफर्नो, जेम्स बांड सीरिज की लगभग सभी फिल्में, बू्रस ली इरा की एंटर द ड्रेगन, रिटर्न आफ द डे्रगन, फिस्ट आफ फ्यूरी, अफ्रीकन सफारी, हटारी, स्टार वार्स, द एम्पायर्स स्ट्राइक बैक, इंडियना जोंस, मैड मेक्स, लारेल-हार्डी, चॉर्ली चैपलिन, म्यूनिख-मांट्रियल-मास्को ओलंपिक की तीन घंटे की फिल्में देखी हैं। जबलपुर में अंग्रेजी फिल्मों के देखने के शौकिन एम्पायर के साथ डिलाइट टॉकीज में नियमित रूप से आते थे।

मुझे याद है कि रविवार को सुबह के शो में डिलाइट टॉकीज में क्षेत्रीय भारतीय भाषाओं की फिल्मों का प्रदर्शन भी होता था। जबलपुर के कई बंगाली, तमिल, तेलुगु, मलयाली और तो और उड़िया परिवार अपनी-अपनी भाषा की फिल्में यहां देखने आते थे। अडूर गोपाल कृष्ण की कुछेक फिल्म यहां प्रदर्शित हुईं हैं। यूथ फिल्म फोरम द्वारा आयोजित हंगेरियन फिल्म फेस्टीवल को लोग आज भी याद करते हैं।

डिलाइट टॉकीज के साथ कुछ विशेषताएं भी जुड़ी हुई थीं। जैसे कि इस टॉकीज के कुछ प्रतिबद्ध दर्शक थे। इनमें से कुछ तो जबलपुर के आसपास के लोग भी थे। ऐसे प्रतिबद्ध दर्शक जब भी सिनेमा देखते थे, तो वे सिर्फ डिलाइट टॉकीज ही जाते थे। यहां फिल्म देखने वाले कई दर्शक इंटरवल में मटन का समोसा जरूर खाते थे। यदि कहा जाए तो फिल्म देखना या मटन समोसा खाना दोनों ही एक दूसरे के लिए बहाना होते थे।

नौवें दशक की शुरूआत में डिलाइट टॉकीज भू-मंडलीकरण की चपेट में आ गया। वीडियो पॉयरेसी और हॉलीवुड की फिल्मों के घर-घर में पहुंचने से डिलाइट टॉकीज दर्शकों के लिए तरसने लगी। इसका तोड़ अंग्रेजी के साथ हिंदी और दक्षिण की अश्लील फिल्मों का प्रदर्शन कर निकाला गया। बताया जाता है कि इन फिल्मों में ब्लू फिल्मों को भी जोड़ कर लोगों को आकर्षित करने और टॉकीज के अस्तित्व बचाए रखने का प्रयास किया गया। इस प्रकार की फिल्मों के प्रदर्शन से लोग टॉकीज से ही दूर होते गए। कालांतर में तो टॉकीज में फिल्मों के मुख्य पोस्टर ही प्रवेश द्वार से गायब हो गए और अश्लील फिल्म देखने के शौकीन लोग सिर्फ फिल्मों का नाम देख कर ही टॉकीज जाने लगे।

वैसे तो डिलाइट टॉकीज की परम्परा और विरासत उसी दिन खत्म हो गई थी, जिस दिन से यहां अश्लील फिल्मों का प्रदर्शन शुरू हुआ, लेकिन 1 जुलाई को इसकी अवसान तिथि कह सकते हैं। डिलाइट टॉकीज बंद होने के बाद भी लोग इस क्षेत्र को डिलाइट ही कहा करेंगे, क्योंकि डिलाइट टॉकीज जबलपुर के लोगों की एक आदत के रूप में शामिल हो गई थी। जब मैं यह वृतांत लिखा ही रहा था, तब मेरी पत्नी ने कहा कि बाहर निकलो तो डिलाइट से माचिस ले आना। पत्नी की बात सुन कर बेटा भी बोला डिलाइट से मेरा पेन भी ले लेना।



3 टिप्‍पणियां:

satish aliya ने कहा…

pankaj bhai mja aagya, baba solanki ke bare mein padkar urja mili.badia lekhan ke liye bdhai.

Rahul Singh ने कहा…

कुछ स्‍थान, कुछ चीजें और माहौल तथा कुछ लोग होते हैं, जिनसे शहर का चरित्र बनता है. मेरे लिए जबलपुर जैसे शहर में याद करने को बहुत कुछ है, लेकिन इसपोस्‍ट को पढ़कर याद आ रहे हैं गोल बाजार वाले डॉ. एम सी चौबे.

VIJAY TIWARI 'KISLAY' ने कहा…

पंकज जी
डिलाईट एवं एम्पायर छविगृह की जानकारी इनसे अंजान लोगों का ज्ञानवर्धन करेगी.
आप के ज्ञानपरक आलेख के लिए बधाई.
विजय तिवारी " किसलय "