शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

जबलपुर में कामरेड शेषनारायण राय स्मृति व्याख्यान व काव्यपाठ


विवेचना जबलपुर और पहल ने मिलकर जबलपुर में 17 जुलाई 2011 को कामरेड शेषनारायण राय स्मृति व्याख्यान व काव्यपाठ का आयोजन किया। कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक का व्याख्यान और नरेन्द्र जैनमंगलेश डबराल का काव्यपाठ संपन्न हुआ। कामरेड शेषनारायण राय विवेचना जबलपुर के संस्थापकों में से एक और जबलपुर शहर के प्रमुख वामपंथी नेता थे। जिस समय मुक्तिबोध और परसाई जैसे महान लेखकों की किताबें कोई प्रकाशक नहीं छाप रहा था उस समय का. शेषनारायणराय ने मुक्तिबोध की किताब कामायनी एक पुनर्विचार और परसाई जी की किताबें सुनो भाई साधो बेईमानी की परत छापी थी। परसाई जी और का राय बहुत घनिष्ठ मित्र थे। इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर एक सत्य घटना है जो का राय के साथ घटी थी। कहानी में भला आदमी कामरेड राय हैं। एक दूसरी प्रसिद्ध रचना एक लड़की पांच दीवाने का राय की पुस्तक दुकान यूनीवर्सल बुक डिपो के आस पास की घटना है। इस दुकान पर न केवल परसाई जी की नियमित बैठक थी वरन् यहां से उस समय के जबलपुर की साहित्यिक सांस्कृतिक राजनैतिक गतिविधियां संचालित होती थीं। इसी दुकान में बैठे बैठे मित्रों ने विवेचना का गठन किया था। उद्देश्य था गोष्ठियों के माध्यम से आम जनता को घटनाओं की सचाई बताई जाए। कामरेड राय ने एक संपन्न परिवार में जन्म लेकर भी अपना जीवन किसान मजदूरों की लड़ाई लड़ते बिताया। वे जबलपुर की कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव रहे। उनकी पांचवीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में जबलपुर शहर के साहित्यिक सांस्कृतिक अभिरूचि के लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाएं उपस्थित थीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार श्री श्याम कटारे ने की। कार्यक्रम स्थल को विनय अंबर और ऋषि जेना ने मंगलेश व नरेन्द्र की कविताओं पर आधारित पोस्टरों से सजाया था।
व्याख्यान का विषय था कला, संस्कृति और आज की सांस्कृतिक संकेत । देश के सुविख्यात चित्रकार अशोक भौमिक ने कहा कि देश में अनेक संगठन अनेक राजनैतिक दलों से प्रभावित हैं पर आज की जरूरत है कि सभी संगठन अपने अपने पूर्वाग्रह छोड़कर सच्चे
अर्थों में गरीबों, जरूरतमंदों, आदिवासियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष करें। आज गरीबों की लड़ाई कोई नहीं लड़ रहा। उन्होंने अपना व्याख्यान चित्त प्रसाद की चित्रकला पर केन्द्रित कर अपनी बात कही। चित्त प्रसाद के चित्रों को प्रदर्शित कर उन्होंने बताया कि किस तरह एक चित्रकार संघर्षरत मजदूरों किसानों के बीच जाकर उनकी हलचलों को कलात्मक रूप से चित्रित करता है जो सदियों तक एक रिकार्ड के रूप में हमारे बीच रहेगा। चित्तप्रसाद के चित्रों में समय के साथ उनकी समझ और देश के मजदूर किसानों के बदलते हालात को आसानी से चिन्हित किया जा सकता है। चित्तप्रसाद की गहरी मानवीय दृष्टि और बारीक अवलोकन बहुत प्रभावित करते हैं। लिनोकट में इतना श्रेष्ठ काम बहुत दुर्लभ है वो भी तब जब उन्होंने किसी कला विद्यालय में शिक्षा नहीं ली थी। अशोक भौमिक के व्याख्यान के बाद दूसरे चरण में सर्वप्रथम तापसी नागराज ने मंगलेश डबराल की कविता मां मुझे पहचान नहीं पाई जब मैं घर लौटा सर से पांव तक धूल से सना हुआ और नरेन्द्र जैन की कविता एक दिन हमसे पूछा जाएगा हम क्या कर रहे थे का गायन किया। इसके बाद नरेन्द्र जैन ने काव्यपाठ किया। उन्होंने उज्जैयनी में एक पिंजारवाड़ी है और पिंजारवाड़ी में एक उज्जैयनी’, आसमान इतना खाली है जितनी तुम्हारी आंख’, जब कुछ भी नहीं हुआ करता आलू जरूर होता है, कवि के जाने के बाद हमने नहीं लिखी कोई कविता, ध्वस्त होती हुई दुनिया का मैं अंतिम नागरिक हुआ। नरेन्द्र जैन के बाद मंगलेश डबराल ने अपना रचना पाठ किया। उन्होंने संगतकार, यह नंबर मौजूद नहीं, नया बैंक, टार्च, पुरानी तस्वीर आदि अपनी चुनिंदा कविताएं सुनाईं। कार्यक्रम के अंत में पंकज स्वामी ने आभार प्रदर्शन किया।

कोई टिप्पणी नहीं: