रविवार, 26 फ़रवरी 2012

रंग कर्मियों के जत्थे उदास हैं



(रंगकर्मी, निर्देशक और कवि अलखनंदन का पिछले दिनों भोपाल में निधन हो गया। उनके संबंध में विख्यात साहित्यकार ज्ञानरंजन ने एक महत्वपूर्ण संस्मरण आलेख लिखा है। यह आलेख नागपुर से प्रकाशित लोकमत में 26 फरवरी को प्रकाशित हुआ है।)

रंगकर्मी, निर्देशक और कवि अलखनंदन ने चार दशकों तक निरंतर रंगकर्म करते हुए अनेक बेजोड़ नाटकों की प्रस्तुतियाँ देश भर में की हैं। उन्हें संगीत नाटक अकादमी का सर्वोच्च सम्मान भी मिला जो इसी वर्ष मार्च में दिल्ली में दिया जाना था, पर मृत्यु ने इसे संभव नहीं होने दिया। इसी 12 फरवरी को मात्र 64 वर्ष की उम्र में, भोपाल में उनका निधन हुआ। देश और मध्यप्रदेश में इस निधन से रंग कर्मियों को गहरा आघात लगा है। उनके अपने रंग-मंडल के अनगिनत सदस्य और पूरा वक्ती कार्यकर्त्ता गहरे शोक में हैं। भोपाल के भारत-भवन से बाहर स्वतंत्र रूप से नाटकों का मंचन करना और श्रमजीवी तरीके से 'नट बुंदेले' नाम की रंग संस्था को राष्ट्रीय पहचान देना एक ऐसा चुनौतीपूर्ण काम था जिसे अलखनंदन ने बखूबी संगठित और संपादित किया। जबकि अपार साधनों के बावजूद भारत-भवन अपना रंगमंडल नहीं चला पाया। हम सभी जानते हैं कि हिन्दी में मौलिक नाटकों की लम्बी कमी, साधनों का अभाव, और घटते दर्शकों की परिस्थितियों के कारण निरंतर रंग-कर्म करना अब मुश्किलों भरा काम है। इसलिये अलखनंदन जैसे सक्रिय रंगकर्मी की मौत एक बड़ा सांस्कृतिक आघात है।


अलखनंदन मजबूत काठी के स्वस्थ और सकारात्मक व्यक्ति थे। शरीर पुखता और कसरती था। किशोर अवस्था से ही भारतीय भाषाओं के साहित्य और खासतौर पर लोक-नाट्‌य की पढ़ाई करने लगे थे। वे उदार वामपंथी थे, आत्महत्या के विरुद्ध थे, लेकिन आजीवन कठोर परिश्रम और रंगकर्म की लगातार रात-दिन जागती दिनचर्याओं और मुठभेड़ों ने उन्हें पता ही नहीं चला, धीरे-धीरे तोड़  दिया। उनके फेंफड़े तबाह हुए और चौबीस घंटों की आक्सीजन उन्हें लग गई। उन्हें 'फाइब्रोसिस ऑफ लंग्स' की बीमारी थी। उपचार बहुत हुआ पर चारागर हार गये। अलखनंदन 1948 में बिहार के लड़ाकू जिला भोजपुर में पैदा हुए और फरवरी 2012 में उनका निधन हुआ। बिहार से विस्थापित होकर वे छत्तीसगढ, सरगुजा और बुंदेलखण्ड के इलाकों में बार-बार जाते रहे। इन इलाकों से उनका गहरा लगाव और प्रेम था। उनकी समूची बुनावट में जो मिश्रण था वह इसी घुमंतू आचरण का परिणाम था। वे भोजपुरी बोलना कभी नहीं भूले, जबकि उनका अंतिम लेण्डस्केप बुंदेलखण्ड ही बना। जबलपुर आकर वे स्थिर हुए और प्राण प्रण से काम करना शुरू हुआ। उनकी काया में जो भाषा तैर रही थी वह संघर्षशील हिन्दी पट्टियों में ही तैयार हुई थी। अलखनंदन कुंभकार के चाक की तरह अविराम अपने जीवन को चलाते रहे। उन्होंने नाटक किये भी और लिखे भी।
भोजपुर से जबलपुर
मेरी अलखनंदन से मुलाकातें 1970 के आसपास शुरू हुईं। मुझे इलाहाबाद से आये 10 वर्ष हो चुके थे और जबलपुर शहर की आत्मा को हमने पकड़ लिया था। यही वह समय था जब अलख में नाटकों का कीड़ा पैदा हुआ। उसने आरंभिक दिनों में नौटंकी, रामलीलाएं खूब देखीं और आधुनिक नाटकों की तरफ उसका रुझान बढ ने लगा था। वह चौबीस घंटा बेचैन प्राणी था और नींद में भी संवाद बोलते-बोलते उठ बैठता था। वह सतपुला (जबलपुर का एक अंचल जहां से आर्डिनेंस फेक्ट्री इस्टेट द्याुरू होती थी और जहां श्रमिकों के क्वार्टर्स भी थे) से शहर के मध्य तक हांफता हुआ, मिलन की उतावलियों के साथ, युवकों की तरह कभी सायकिल से कभी पैदल आता जाता था। बीच में कभी घमापुर में कहानीकार राजेन्द्र दानी से भी बैठक करता था। उसकी आवारगी सोद्देश थी। शामों का वार्तालाप, मित्र मिलन, कार्य-योजनाएं, देर रात तक नाटकों का पाठ, रिहर्सल आदि होते रहते थे। उस समय तक नई पीढ़ी पर हरिशंकर परसाई का जादू चढ़ ने लगा था। विनोद कुमार शुक्ल और नरेश सक्सेना को शहर छोड़ कर गये हुए लगभग एक दशक हो रहा था। मुक्तिबोध की मृत्यु हो चुकी थी, लेकिन उनके सृजन का साया शहर पर जबरदस्त रूप से मंडरा रहा था। परसाई की उपस्थिति और मुक्तिबोध की अनुपस्थिति ने छात्रों, अध्यापकों, लेखकों, पत्रकारों और रंग-कर्मियों को उत्तेजित किया हुआ था। भोजपुर के बाद एक नया अलखनंदन जबलपुर में पैदा हो रहा था। तीस साल वह जबलपुर में रहा और तीस साल भोपाल में। शुरूआत उसकी जबलपुर में हुई और अंत भोपाल में। राजधानी में, सर्वसाधारण से जुड़े रंग-कर्म और लोकप्रिय रंगमंच की वजह से वह नाटक के संसार का सिरमौर बना और मुखयमंत्री, संस्कृति मंत्री को भी उसका गुणगान करना पड़ा। जबकि उसकी शवयात्रा में अभिनेता, राजनैतिक-सांस्कृतिक कार्यकर्त्ता, लेखक, दर्शक, स्तंभकार और हिन्दी-उर्दू की दुनिया के बहुत से लोग शामिल थे।
कारंत का साथ
मेरी मुलाकातें उससे सातवें-आठवें दशक में खूब हुईं और जल्दी ही हम एक दूसरे के साथी हो गये। उसके भीतर मुझे अपना आवारापन नज़र आता था। इलाहाबाद से उखड़  जाने के बाद मैं जबलपुर में अपने ठिकाने बना रहा था। उन दिनों जबलपुर बहुत ही खूबसूरत और शानदार था, सांस्कृतिक रूप से खूब सम्पन्न। इसी वजह से मैं एक आंशिक कम्यूनिस्ट बन सका। हमने मिल-जुलकर विवेचना जैसी रंग-संस्था का निर्माण किया, जिसने अब अपनी कीर्ति के 50 वर्ष पूरे कर लिये हैं। इसी समय अलखनंदन एक पक्का युवक हुआ और उसने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ  के लोक-नाट्‌यों, लोक-संगीत का गहरा अध्ययन कर लिया था, जिस वजह से बाद में वह अपने रंगमंच पर काव्यात्मक-बिंबों की रचना और लोकतत्वों का पनराविष्कार और नवाचार के लिये चर्चित हो सका। इसी आधारभूमि की वजह से अलखनंदन को भारत-भवन में रहते हुए कारंत जैसे विश्वविख्यात निर्देशक का न केवल साथ मिला बल्कि उनके माहिर रंग-संगीत का अनुभव भी मिला। विदित हो कि भारत-भवन के रंगमंडल में अलखनंदन आठ सालों तक ब. व. कारंत के सहायक निर्देशक रहे। कारंत के बाद अलख सर्वोच्च निर्देशक पद पर जाने के लिये पूरी योग्यता रखने बावजूद उससे इसलिये वंचित रहे कि उन दिनों के एक जाने-माने संस्कृति-जार ने ऐसी संभावना से उन्हें वंचित कर दिया।

जबलपुरिया शुरुआत
सातवें दशक के अंतिम दौर में जबलपुर की अपनी रक्षा-मंत्रालय की अच्छी खासी नौकरी छोड़ कर पूरा वक्ती रंग कर्म करने की बात अलख मुझसे हमेशा करते थे। मैं उन्हें रोकता था पर वे नहीं माने। उन्होंने चुपचाप अंतिम निर्णय कर लिया। अलखनंदन एक बेचैन, मेहनती और जिद्दी आदमी था। निर्णय में उसकी भावुकता नहीं थी, मेरे रोकने में जरूर थी। कुछ ही दिनों पहले जबलपुर में पंकज स्वामी को एक साक्षात्कार देते हुए, अलख ने कहा था कि अगर मुझे 250 वर्ष का जीवन मिले तो उतने ही समय तक रंग कर्म करते हुए थकूंगा नहीं। इसलिये उसने नौकरी छोड़  दी और आजाद हो गया। वह बिल्कुल निडर था और लक्ष्यभेद के लिये तत्पर था। बाद में उसने भोपाल के एक बड़े उर्दू शायर फज्ल ताविश के नाटक 'डरा हुआ आदमी' की शानदार यादगार प्रस्तुति की और जबलपुर में भी 'विवेचना' ने इसका मंचन किया।
जहां तक मुझे याद आता है अलखनंदन की जबलपुरिया शुरूआत एक नुक्कड़ नाटक से हुई - 'जैसे हम लोग'। इसे हिन्दी के कथाकार शशांक ने लिखा था। शशांक तब मनोविज्ञान के छात्र थे और उन्हें इस नाटक को समय पर लिख देने के लिये मैंने एक कमरे में बंद कर दिया था। एक स्थानीय रंग-संस्था 'कचनार' के लिये अलख ने मशहूर नाटकों, 'रंग गंधर्व' और 'तीन अपाहिज' का निर्देशन किया। विवेचना के साथ उन्होंने 'दुलारी बाई', 'बकरी', 'इकतारे की आँख', 'बहुत बड़ा सवाल', और 'वेटिंग फॉर द गोडो' जैसे बड़े नाटक किये और इन नाटकों ने खूब धूम मचाई। इसी दौरान अलख ने धमतरी, रायपुर, बिलासपुर और बाद में अम्बिकापुर, रायगढ  में ऐसी कार्यशालाएं कीं जिनसे स्थानीय रंगकर्मी उभर कर आ सके। आज भी वे नाटक के जीते-जागते केन्द्र बने हुए हैं। यह 1975 से 1980 का समय था।
राष्ट्रीय पहचान
अलख के जीवन का दूसरा दौर उसकी राष्ट्रीय पहचान का है, जिसमें वह जबलपुर से भोपाल प्रवास पर गया और प्रमुखतः वहीं रह गया। उस समय भारत-भवन में रंगमंडल का ताना-बाना बुना जा रहा था और अलख उसके संस्थापकों, निर्माताओं में एक प्रमुख व्यक्ति था। उसने लगभग आठ वर्ष तो देश के विख्यात और महान रंगशिल्पी ब. व. कारंत के साथ ही काम किया। कुल 16 वर्ष अलखनंदन भारत भवन में रहा। उसने 'आधे अधूरे', 'क्लर्क की मौत', 'आगरा बाज़ार', 'शस्त्र संतान', 'चंदा बेड़नी', 'ताम्र पत्र', 'जगर मगर अंधेर नगर' और 'चारपाई' जैसे सफल नाटकों की प्रस्तुति की। मोहन राकेश, रामेश्वर प्रेम, हबीब तनवीर, त्रिपुरारी शर्मा और मणि मधुकर के नाटकों के अलावा उसने स्वयं के भी नाटक किये। उसका एक खास काम यह था कि उसने बच्चों के लिये 10 से अधिक नाटकों की परिकल्पना की और उनका मंचन किया, करवाया। एशिया कविता समारोह में उसने श्रीकांत वर्मा के 'मगध' की नाट्‌य प्रस्तुति की थी, जिसे खूब सराहना मिली। उसने बेंगलुरू में उर्दू थियेटर की स्थापना की और २० साल तक देश के बड़े नाट्‌य समारोहों में यादगार प्रस्तुतियाँ भी उसके खाते में हैं।

नट बुंदेले का अवदान
भारत भवन से मुक्त होने से पहले ही उसने एक नाटक टुकड़ी 'नट बुंदेले' की स्थापना कर ली थी, जिसमें वह शेष जीवन काम करता रहा। यही उसका मौलिक दस्ता था। वह लगातार कविताएं लिख रहा था। उसके दो-तीन संग्रह आये, पहला कविता संग्रह 2003 में आया था, जिसका नाम 'घर नहीं पहुँच पाता' था। वह अपने नाटकों में कविताओं का प्रयोग अक्सर करता था। उसके एक नाटक में मुक्तिबोध की एक कविता का पाठ मैंने भी किया था।

अलखनंदन ने जब 'ताम्र पत्र', नट बुंदेले के बैनर पर किया तब वह रंग भाषा में एक सृजनात्मक मुठभेड  करने की क्षमता पैदा कर चुका था। उसका कद इतना बड़ा हुआ कि उसके एक नाटक 'महानिर्वाण' में खुद ब. व. कारंत ने एक अभिनेता की हैसियत से काम किया। यह 1994-95 की घटना है। भोपाल गैस त्रासदी पर उसके नाटक 'बांझ घाटी' के समय विख्यात अभिनेत्री विभा मिश्रा से उसका गहरा विवाद भी हुआ। उसने अरुण पांडे, सीताराम सोनी, राजेन्द्र कामले, गौरीशंकर यादव, अजय घोष, आलोक चटर्जी, तपन बेनर्जी, इरफान सौरभ और रंजना भट्ट जैसे बड़े अभिनेता थियेटर की दुनिया को दिये और बसंत काशीकर जैसे युवा रंग निर्देशक को गहरी प्रेरणाएं।
अलखनंदन को शिखर सम्मान, संगीत नाटक अकादमी का शीर्ष राष्ट्रीय सम्मान, हबीब तनवीर सम्मान, स्पंदन पुरस्कार और नरसी सम्मान आदि अनेक सम्मान मिले। पर उसका वास्तविक सम्मान रंग जनों के भीतर था। कहते हैं कि वह भोपाल शहर में होने वाला, भरसक, हर नाटक देखता था। भारत भवन में उसके लिये एक कुर्सी सदैव खाली रहती थी। वह नाटक देखता और चुपचाप लौट जाता था। वह तत्काल प्रतिक्रिया नहीं देता था। जिस दिन यह कुर्सी खाली रह जाती थी, इसका मतलब होता था कि अलखनंदन भोपाल में नहीं है। अब यह कुर्सी सदैव खाली रहेगी।

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

विवेचना रंगमण्डल राष्ट्रीय नाट्‌य समारोह-2012 : उत्कृष्ट रंगकर्म को दर्शकों का समर्थन


बलपुर की विवेचना रंगमण्डल ने पिछले दिनों पांच दिवसीय 'रंग परसाई-2012 राष्ट्रीय नाट्‌य समारोह' का आयोजन 'शहीद स्मारक' में किया। यह नाट्‌य समारोह प्रसिद्ध कवि और गीतकार पंडित भवानी प्रसाद तिवारी को समर्पित था। विवेचना की स्थापना वर्ष 1961 में हुई थी और संस्था ने 1975 से नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्शन से अपनी रंग यात्रा की शुरूआत की, जो आज तक जारी है। देश में विवेचना रंगमण्डल की पहचान एक सक्रिय सरोकार से जुड़ी हुई रंगकर्म संस्था के रूप में है। विवेचना रंगमण्डल पिछले कुछ वर्षों से नए निर्देशकों की नाट्‌य प्रस्तुतियों को राष्ट्रीय समारोह में भी मौका दे रही है। इस बार के नाट्‌य समारोह में भी नए नाट्‌य निर्देशकों को मौका दिया गया। इस प्रयास को रंगकर्मियों के साथ-साथ दर्शकों ने भी सराहा। इस बार के नाट्‌य समारोह की एक खास बात यह भी रही कि दर्शकों को पांच दिन में छह नाटक देखने को मिले। समारोह की शुरूआत हास्य नाटक से हुई और अंत गंभीर और विचारोत्तेजक नाटक से हुआ। नाट्‌य समारोह की एक विशेषता यह भी रही कि इसमें हरिशंकर परसाई, मुक्तिबोध, बादल सरकार और राही मासूम रजा लिखित नाटकों को प्रस्तुत किया गया। नाट्‌य समारोह में एक नाट्‌य प्रस्तुति ऐसी भी रही, जिसे कलाकारों ने बिना स्क्रिप्ट के प्रस्तुत किया। कुल मिला कर कहें तो जबलपुर के दर्शकों को पांचों दिन अलग-अलग रंगों के नाटक देखने को मिले और उन्होंने इसका भरपूर आनंद लिया। नाट्‌य समारोह के समापन पर भोपाल के रंगकर्मी जावेद जैदी को विवेचना रंगमण्डल ने प्रतीक चिन्ह और ग्यारह हजार रूपए की राशि भेंट कर सम्मानित किया।
नाट्‌य समारोह के पहले दिन विवेचना रंगमण्डल ने प्रगति-विवेक पाण्डे के निर्देशन में बादल सरकार लिखित वल्लभपुर की रूप कथा को प्रस्तुत किया। वल्लभपुर की रूप कथा बादल सरकार का सिचुएशनल कॉमेडी नाटक है। इस नाटक को बादल सरकार ने सन्‌ 1963 में लिखा था। इसका प्रथम मंचन बादल सरकार द्वारा स्थापित संस्था 'शताब्दी' ने 28 नवम्बर 1970 में किया था। तब से इस नाटक को देश भर की कई रंग संस्थाएं प्रस्तुत कर चुकी हैं। वैसे वल्लभपुर की रूप कथा अंग्रेजी फिल्म 'यू आर नोएंजल्स' पर आधारित नाटक है। विवेचना रंग मण्डल ने नाट्‌य समारोह के माध्यम से इस नाटक को पहली बार प्रस्तुत कर के दर्शकों को काफी प्रभावित किया। सिचुएशनल कॉमेडी के कारण दर्शकों ने नाटक का भरपूर मजा लिया। बिना मध्यांतर के लंबा नाटक होने बावजूद दर्शक कहीं भी उकताए नहीं। नाटक के एक निर्देशक विवेक पाण्डे ने मुख्य पात्र भूपति की भूमिका भी निभाई। उन्होंने सफल अभिनय के साथ एक जटिल विषय वाले नाटक की प्रभावी प्रस्तुति कर दोहरी सफलता अर्जित की। नाटक में सभी कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया, लेकिन रवीन्द्र मुर्हार ने संजीव की भूमिका निभा कर दर्शकों का दिल जीत लिया।
समारोह के दूसरे दिन दो नाट्‌य प्रस्तुतियां हुईं। द फेक्ट आर्ट एन्ड कल्चर सोसायटी, बेगुसराय ने गजानन माधव मुक्तिबोध लिखित 'समझौता' और मंच मुम्बई ने 'हम बिहार से चुनाव लड़ रहे हैं' को प्रस्तुत किया। हम बिहार से चुनाव लड़ रहे हैं हरिशंकर परसाई का सशक्त व्यंग्य है और इसे विजय कुमार मंच पर उतने ही प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करते हैं, इसलिए जबलपुर में लगभग एक-डेढ़  वर्ष के अंतराल में इस नाटक के मंचन होते रहते हैं। विजय कुमार ने एकल अभिनय से परसाई के व्यंग्य को और धारदार बना दिया है, जिसे जबलपुर के दर्शक खासा पसंद करते हैं। दूसरी नाट्‌य प्रस्तुति समझौता भी एकल अभिनय पर आधारित थी। यह नाटक विचारोत्तेजक है, जिसमें दुनिया को सर्कस के रूप में प्रस्तुत किया गया है। कहानी का नायक नौकरी की तलाश में एक दफ्तर से दूसरे के बीच भागते रहने की पीड़ा नाटक का धरातल है। समझौता एक ऐसे नौजवान की कहानी है, जो मौजूदा हालात के सामने असहाय और मजबूर है। नाट्‌य प्रस्तुति उस समय चरमोत्कर्ष पर पहुंच जाती है, जब दुनिया में सफलता के लिए इंसान स्वयं को जानवरों के रूप में ढालने को तैयार हो जाता है। वैश्वीकरण की अंधी दौड  के समय में 'समझौता' जीवन की कड़वी सच्चाईयों को उजागर करने का सफल प्रयास है। पूरे नाटक में मानवेन्द्र त्रिपाठी ने फिजीकल थिएटर को एक पाठ्‌य पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया है। नाटक में संगीत और प्रकाश परिकल्पना ने विषय के सम्प्रेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नाटक के निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन प्रस्तुति के माध्यम से अपनी बात कहने में पूर्णतः सफल रहे।
समारोह के तीसरे दिन दस्तक, मुम्बई ने दास्तान गोई की प्रस्तुति दी। दास्तान गोई का लेखन व निर्देशन महमूद फारूखी ने किया है। जबलपुर में दास्तान गोई को राणा प्रताप सेंगर, शेख उस्मान और राजेन्द्र कुमार ने प्रस्तुत कर महमूद फारूखी और दानिश हुसैन की याद को ताजा कर दिया। इससे पहले फारूखी और हुसैन दास्तान गोई को प्रस्तुत कर चुके हैं। समारोह में दास्तान गोई की पारम्परिक दास्ताने अमीर हमजा के दो मुख्य किरदारों अमीर हमजा और उसके दोस्त अमर अय्यार की कहानी के साथ-साथ समकालीन डा. विनायक सेन की संघर्ष गाथा को दास्तान गोई के रूप में प्रस्तुत कर एक नया प्रयोग किया गया, जिसे दर्शकों का समर्थन भी मिला।
समारोह के चौथे दिन मुम्बई की रंग संस्था सारंग ने 'लैट्‌स अनपैक!' की प्रस्तुति दी। यह नाटक दर्शकों के लिए बिल्कुल नया अनुभव रहा। बिना स्क्रिप्ट के नाटक में छह पात्र 15 दिनों के लिए दुनिया से पूरी तरह अलग हो कर साथ रहते हैं। इस दौरान उनके पास एक अखबार, टेलीविजन, जिम, बगीचा और साथ में रखने के लिए कुछ निजी समान के अलावा कुछ नहीं रहता है। छहों पात्र पहेलीनुमा-विचित्र कामों में फंस जाते हैं, कुछ अजीब से खेल खेलते हैं और जटिल चर्चाएं करते हैं। इस सब में वे मजबूर हो जाते हैं अपने भीतर को झांकने के लिए और अपने परिप्रेक्ष्य पर सवाल उठाने के लिए और अपनी सहज प्रवृत्ति से रूबरू होने के लिए। नाटक का संदेश ही है कि हम अपने को अनपैक कर लें या जैसे हैं वैसे ही रहें बिना किसी आवरण के। इस नाटक की खासियत है कि इसका हर मंचन अपने आप में मौलिक है। छह पात्रों के बातों से दर्शक स्वयं को आत्मसात्‌ कर लेता है। हिंग्लिश होने के बावजूद नाटक में पात्रों की बातचीत का दर्शक आनंद लेते हैं और स्वयं को भी एक पात्र समझने लगते हैं। यही बात इस नाटक की सफलता का एक महत्वपूर्ण पहलु है।
नाट्‌य समारोह की अंतिम प्रस्तुति के रूप में संभावना भोपाल ने 'टोपी शुक्ला' का मंचन किया। टोपी शुक्ला राही मासूम रजा के उपन्यास का नाट्‌य रूपांतरण है। कहानी भारत की आजादी के कुछ पहले की है और आजादी के बाद के भारत के नौजवानों के सपनों और ख्वाहिशों को दर्शाती है। जिंदा रहने के लिए लोग समझौता करते हैं और जो समझौता नहीं कर पाता है, वह आत्महत्या कर लेता है। राही मासूम रजा के अनुसार यह कहानी 'समय' की है, इस कहानी का हीरो 'समय' है, समय के अलावा कोई इस लायक नहीं है कि उसे कहानी बनाया जाए। यह नाटक अवसाद से शुरू हो कर अवसाद पर खत्म होता है। नाटक में प्रसिद्ध रंगकर्मी अलखनंदन के बेटे अंशपायन सिन्हा 'अंशु' ने टोपी शुक्ला के मुख्य पात्र की भूमिका निभाई। नाटक के दूसरे दिन अंशपायन सिन्हा को अपने पिता अलखनंदन के निधन की खबर जबलपुर में ही मिली। टोपी शुक्ला की विषयवस्तु अवश्य आजादी के समय की है, लेकिन इसमें उठाए गए साम्प्रदायिकता के सवाल आज भी सम-सामयिक हैं और लोगों को उद्वेलित कर रहे हैं। साम्प्रदायिकता जैसे नाजुक विषय को निर्देशक जावेद जैदी और उनके कलाकारों ने बहुत संजीगदी से प्रस्तुत किया।
विवेचना रंगमण्डल ने राष्ट्रीय नाट्‌य समारोह के आयोजन से इस मिथक को भी तोड़ा कि नाटकों को दर्शक देखने नहीं आते। नाट्‌य समारोह के पांचों दिन प्रेक्षागृह में दर्शकों की भीड़  जुटी और उन्होंने टिकट खरीद कर उत्कृष्ट रंगकर्म को समर्थन और सहयोग भी दिया।

साज का सुर मिलाने की तरह इस जनम में नर्मदा परिक्रमा का सुर मिलाते रहे : अमृतलाल वेगड़ अगले जनम में नर्मदा परिक्रमा करने की इच्छा

‘’ अगर सौ साल बाद क‍िसी को एक दंपत‍ि नर्मदा परिक्रमा करता द‍िखाई दे , पति के हाथ में झाड़ू हो और पत्नी के हाथ में टोकरी और खुरपी , पति ...