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February, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

रंग कर्मियों के जत्थे उदास हैं

(रंगकर्मी, निर्देशक और कवि अलखनंदन का पिछले दिनों भोपाल में निधन हो गया। उनके संबंध में विख्यात साहित्यकार ज्ञानरंजन ने एक महत्वपूर्ण संस्मरण आलेख लिखा है। यह आलेख नागपुर से प्रकाशित लोकमत में 26 फरवरी को प्रकाशित हुआ है।)
रंगकर्मी, निर्देशक और कवि अलखनंदन ने चार दशकों तक निरंतर रंगकर्म करते हुए अनेक बेजोड़ नाटकों की प्रस्तुतियाँ देश भर में की हैं। उन्हें संगीत नाटक अकादमी का सर्वोच्च सम्मान भी मिला जो इसी वर्ष मार्च में दिल्ली में दिया जाना था, पर मृत्यु ने इसे संभव नहीं होने दिया। इसी 12 फरवरी को मात्र 64 वर्ष की उम्र में, भोपाल में उनका निधन हुआ। देश और मध्यप्रदेश में इस निधन से रंग कर्मियों को गहरा आघात लगा है। उनके अपने रंग-मंडल के अनगिनत सदस्य और पूरा वक्ती कार्यकर्त्ता गहरे शोक में हैं। भोपाल के भारत-भवन से बाहर स्वतंत्र रूप से नाटकों का मंचन करना और श्रमजीवी तरीके से 'नट बुंदेले' नाम की रंग संस्था को राष्ट्रीय पहचान देना एक ऐसा चुनौतीपूर्ण काम था जिसे अलखनंदन ने बखूबी संगठित और संपादित किया। जबकि अपार साधनों के बावजूद भारत-भवन अपना रंगमंडल नहीं चला पाया। हम सभी जानते है…

विवेचना रंगमण्डल राष्ट्रीय नाट्‌य समारोह-2012 : उत्कृष्ट रंगकर्म को दर्शकों का समर्थन

बलपुर की विवेचना रंगमण्डल ने पिछले दिनों पांच दिवसीय 'रंग परसाई-2012 राष्ट्रीय नाट्‌य समारोह' का आयोजन 'शहीद स्मारक' में किया। यह नाट्‌य समारोह प्रसिद्ध कवि और गीतकार पंडित भवानी प्रसाद तिवारी को समर्पित था। विवेचना की स्थापना वर्ष 1961 में हुई थी और संस्था ने 1975 से नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्शन से अपनी रंग यात्रा की शुरूआत की, जो आज तक जारी है। देश में विवेचना रंगमण्डल की पहचान एक सक्रिय सरोकार से जुड़ी हुई रंगकर्म संस्था के रूप में है। विवेचना रंगमण्डल पिछले कुछ वर्षों से नए निर्देशकों की नाट्‌य प्रस्तुतियों को राष्ट्रीय समारोह में भी मौका दे रही है। इस बार के नाट्‌य समारोह में भी नए नाट्‌य निर्देशकों को मौका दिया गया। इस प्रयास को रंगकर्मियों के साथ-साथ दर्शकों ने भी सराहा। इस बार के नाट्‌य समारोह की एक खास बात यह भी रही कि दर्शकों को पांच दिन में छह नाटक देखने को मिले। समारोह की शुरूआत हास्य नाटक से हुई और अंत गंभीर और विचारोत्तेजक नाटक से हुआ। नाट्‌य समारोह की एक विशेषता यह भी रही कि इसमें हरिशंकर परसाई, मुक्तिबोध, बादल सरकार और राही मासूम रजा लिखित नाटकों को प्रस…