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विवेचना रंगमण्डल राष्ट्रीय नाट्य समारोह-2010: उत्कृष्ट रंगकर्म को दर्शकों का समर्थन


जबलपुर की विवेचना रंगमण्डल ने पिछले दिनों सात दिवसीय ‘रंग परसाई-2010 राष्ट्रीय नाट्य समारोह’ का आयोजन जबलपुर के मानस भवन में किया। यह नाट्य समारोह रंगकर्मी संजय खन्ना को समर्पित था। विवेचना की स्थापना वर्ष 1961 में हुई थी और संस्था ने 1975 से नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्शन से अपनी रंग यात्रा की शुरूआत की, जो आज तक जारी है। देश में विवेचना रंगमण्डल की पहचान एक सक्रिय सरोकार से जुड़ी हुई रंगकर्म संस्था के रूप में है। विवेचना रंगमण्डल पिछले कुछ वर्षों से नए निर्देशकों की नाट्य प्रस्तुतियों को राष्ट्रीय समारोह में भी मौका दे रही है। इस बार के नाट्य समारोह में भी जबलपुर में आयोजित अंतर महाविद्यालयीन नाट्य प्रतियोगिता की तीन श्रेष्ठ नाट्य प्रस्तुतियों को मौका दिया गया, ताकि दर्शकों को नया रंगकर्म देखने का अवसर मिल सके। इस प्रयास को रंगकर्मियों के साथ-साथ दर्शकों ने भी सराहा। इस बार के नाट्य समारोह की एक खास बात यह भी रही कि दर्शकों को सात दिन में नौ नाटक देखने को मिले। समारोह की शुरूआत और अंत गंभीर और विचारोत्तेजक नाटकों से हुआ एवं अन्य दिन हास्य नाटकों के साथ नौटंकी भी देखने को मिली।
नाट्य समारोह के पहले दिन अंतर महाविद्यालयीन नाट्य प्रतियोगिता की श्रेष्ठ तीन प्रस्तुतियों खराशें, गिरहें और अगरबत्ती का मंचन हुआ। इन तीनों प्रस्तुतियों का निर्देशन क्रमशः रजनीश यादव, संतोष राजपूत और आशीष पाठक ने किया। तीनों निर्देशक रंगकर्म में लम्बे समय से सक्रिय हैं, लेकिन निर्देशक के रूप में भी उन्होंने अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है। विशेषकर आशीष पाठक ने लगभग तीन-चार वर्षों में नाट्य लेखक के साथ निर्देशक के रूप में नए प्रयोगों के कारण पहचाने जा रहे हैं। खासतौर से उनके सोमनाथ, पापकार्न और रेड फ्राक नाटक के जहां भी मंचन हुए, वहां के दर्शकों ने विषयवस्तु, प्रस्तुति और कल्पनाशीलता के कारण नाटकों को काफी पसंद किया है। इस राष्ट्रीय नाट्य समारोह में भी रेड फ्राक का मंचन हुआ और नाट्य प्रस्तुति से प्रभावित हुए।
नाट्य समारोह के पहले दिन के नाटक खराशें-देश के बंटवारे के पश्चात् की परिस्थितियों, गिरहें-समाज के विभिन्न वर्गों में महिलाओं की स्थिति और अगरबत्ती-फूलन देवी से सुर्खियों में आए बेहमई हत्याकांड के भूगोल पर रची गई काल्पनिक कथा की प्रस्तुति थीं। ‘अगरबत्ती’ नाटक का मूल तत्व हत्याकांड में मारे गए पुरूषों की विधवाओं का अगरबत्ती के कारखाने में काम करते हुए इस दुर्लभ सत्य तक पहंुचना कि ‘‘पापी नातेदार भी हो तो पापी ही होता है’’ था। नाटक के अंत में एक विधवा द्वारा अपने पति की राख अगरबत्ती के मसाले में मिला देना, ताकि वो जले और भी ज्यादा तिल-तिल कर सदियों तक अगरबत्ती की तरह रोज थोड़ा-थोड़ा।
समारोह के दूसरे, तीसरे व चैथे दिन मियां की जूती मियां का सर, चन्दू की चाची और बस इतना ख्वाब है का मंचन हुआ। तीनों नाटक हास्यप्रधान थे। ‘मियां की जूती मियां का सर’ को अभिनव रंगमण्डल, उज्जैन ने शरद शर्मा के निर्देशन में प्रस्तुत किया। मूलतः मौलियर के नाटक को कामोदियादत आर्ते के तत्वों का समावेश कर प्रस्तुत किया गया। नट सम्राट, नई दिल्ली ने ‘चन्दू की चाची’ को श्याम कुमार निर्देशन में प्रस्तुत किया गया। इस नाटक के मूल लेखक ब्रेण्ड थामस हैं। भोपाल की त्रिकर्षि ने श्रीकांत आप्टे लिखित ‘बस इतना ख्वाब है’ को के. जी. त्रिवेदी के निर्देशन में प्रस्तुत किया। तीनों नाटकों की विषयवस्तु परिस्थितिजन्य हास्य की थी, लेकिन ‘बस इतना ख्वाब है’ में हास्य के साथ व्यंग्य की तीखी धार ने दर्शकों को सोचने को मजबूर किया। नाटक में साठ वर्ष के एक ऐसे बूढ़े की चाहत की कहानी है, जो छोटे-छोटे ख्वाबों को दबाते हुए स्वयं दबते-दबते खत्म हो जाता है। आम मध्यमवर्गीय परिवार की विषयवस्तु जबलपुर के रंगप्रेमियों को बहुत भाई।
नाट्य समारोह में विनोद रस्तोगी नाट्य संस्थान, इलाहाबाद ने ‘तोता-मैना’ को नौटंकी शैली में प्रस्तुत किया। अभिलाष नारायण के निर्देशन में प्रस्तुत किए गए नाटक में गांव की सीधी-सादी कहानी को ठेठ नौटंकी वाले संगीत के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। नाट्य प्रस्तुति इस मायने में महत्वपूर्ण थी कि इसमें नौटंकी को बचाने का ईमानदार प्रयास था।
लेखक एवं निर्देशक आशीष पाठक का ‘रेड फ्राक’ नाट्य समारोह की सबसे सशक्त प्रस्तुति कही जा सकती है। समागम रंगमण्डल, जबलपुर की इस प्रस्तुति में दोहरे मापदंडों पर कठोर प्रहार किए गए हैं। विनय शर्मा द्वारा अभिनीत एकपत्रीय वाले इस नाट्य प्रस्तुति में सिद्धांत, आदर्श, विचार, दर्शन, गहन मंथन को एक सूत्र में पिरोकर प्रस्तुत किया गया है। नाटक में लेखक-निर्देशक दर्शकों को संदेश देना चाहता है कि मनुष्य के जीवन में सिद्धांतों का पालन किसी आम पाखंड के कर्मकांड की तरह प्रतीत होने लगता है। यह स्थिति वैसी ही है, जैसे कि आप तमाम उम्र सांप-सीढ़ी के खेल की तरह सिद्धांतों की सीढ़ी चढ़ कर, कष्ट भोगते हुए तप कर लाल हुए और अंत में निन्यान्वे के सांप के काटने से विषाक्त और नीले पड़ गए। इसी लाल से नीले हो जाने की मनोवृत्ति का ट्रांसफार्मेशन ही रेड फ्राक है। लेखक-निर्देशक आशीष पाठक के लोकप्रिय और 40 से ज्यादा बार मंचित हो चुके नाटक ‘पापकार्न’ की तुलना में ‘रेड फ्राक’ ज्यादा विचारोत्तेजक और व्यापक फलक वाला नाटक है। विनय शर्मा ने भी ‘रेड फ्राक’ में भी अपनी अभिनय क्षमता का विस्तार किया है।
नाट्य समारोह की अंतिम प्रस्तुति भूमिका, भोपाल ने ‘गदल’ के माध्यम से की। रांगेय राघव लिखित कहानी का नाट्य रूपांतरण और निर्देशन गोपाल दुबे ने किया। ‘गदल’ में राजस्थान के एक छोटे से गांव और ग्रामीण समाज में महिलाओं की स्थिति को गहराई से प्रस्तुत किया गया। दरअसल गदल का अर्थ है-पानी का ऐसा बहाव, जिसे कोई रोक नहीं सका। नाटक की मुख्य पात्र गदल भी पानी के ऐसे बहाव की तरह है, जिसे कोई रोक नहीं सका और अंत में वह तमाम विरोधों के बीच अपने उद्देश्यों को प्राप्त करती है। लगभग एक घंटे की अवधि वाले इस नाटक में निर्देशक ने राजस्थान की संस्कृति और रीति-रिवाजों को सफलता से सम्प्रेषित किया। ‘गदल’ को भी जबलपुर के दर्शकों ने विषयवस्तु और प्रस्तुति के कारण सराहा।
विवेचना रंगमण्डल ने राष्ट्रीय नाट्य समारोह के आयोजन से इस मिथक को भी तोड़ा कि नाटकों को दर्शक देखने नहीं आते। नाट्य समारोह के सातों दिन प्रेक्षागृह में दर्शकों की भीड़ जुटी और उन्होंने टिकट खरीद कर उत्कृष्ट रंगकर्म को समर्थन और सहयोग भी दिया। अलबत्ता समारोह में मेजबान विवेचना रंगमण्डल के नाटक न होने की कमी दर्शकों को खली, आखिरकार विवेचना रंगमण्डल की पहचान उसके मंचित नाटकों से ही है।

टिप्पणियाँ

Doobe ji ने कहा…
good post .....keep it up.......

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