बुधवार, 29 अगस्त 2012

जे. सी. जोशी पंचम शब्द साधक साहित्य सम्मान एवं पाखी महोत्सव-2012: ज्ञानरंजन ने कहा- यह पुरस्कार राजपथ से जनपथ की तरफ जाने जैसा है

(प्रसिद्ध कहानीकार और पहल के संपादक ज्ञानरंजन को 25 अगस्त को जबलपुर में जे. सी. जोशी पंचम शब्द साधक साहित्य सम्मान एवं पाखी महोत्सव-2012 में शब्द साधक शिखर सम्मान से सम्मानित किया। समारोह में मुख्य अतिथि प्रसिद्ध कथाकार शेखर जोशी ने ज्ञानरंजन को 51 हजार रूपए की सम्मान राशि भेंट की। समारोह की अध्यक्षता नर्मदा यायावर, लेखक व कलाकार अमृतलाल बेगड़ ने की। इस अवसर पर ज्ञानरंजन ने अपने चिरपरिचित अंदाज में वक्तव्य दिया। उनका वक्तव्य यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत है) :-

माननीय अध्यक्ष नर्मदा के अविराम यात्री-सर्जक श्री बेगड़ जी, शेखर भाई, अपूर्व जोशी और मंचासीन आयोजक रचनाकार साथियों

    सभागार में बाहर से आए मेरे अनेक मित्र, कथाकार, कवि, कार्यकर्त्ता और स्थानीय नागरिक जीवन के नए-पुराने साथी बैठे हैं। प्यार करने वाले लोग हैं, तरह-तरह के जीवन साथी हैं, कुछ पुराने विद्यार्थी भी हैं। समझिए कि एक छोटा सा तारामंडल ही है। यह पहला सम्मान अथवा पुरस्कार है, जो मेरे गृह नगर में दिया गया, अन्यथा बाकी सभी दूर जगहों में ही दिए गए। इसी शहर में 50 वर्ष का मेरा जीवन बिखर गया है, जिसमें शानदार लोग रहते आए थे। इसलिए मैं किंचित भावुक और आवेगमय रहूं, तो क्षमा करेंगे। इस अवसर पर हम खुशी मनाने के साथ कुछ बेबाक भी रहें, तो बेहतर क्योंकि प्रसन्नताओं के साथ कुछ अफसोस और विषाद भी चिपके हुए हैं-जीवन का यह परम्परावादी विषय भी है कि उजालों के साथ छायाएं भी चलती हैं।

    मित्रों, अभी तक संसार के असंखयक सम्मानों, पुरस्कारों के अवसर पर बहुतेरे वक्तव्य दिए जा चुके हैं। ये वक्तव्य विचित्र, अद्वितीय और अविस्मरणीय हैं और गद्य तथा विचार के बहुमूल्य दस्तावेज भी। इस समुद्र में मेरी भी एक बूंद गिरती है, विलीन भी हो जाएगी। यह एक सुसंस्कृत ढर्रा है, जो मनुष्य जाति के बढ ते हुए नर्क को ढंग देता है। यह शिखर सम्मान, अभी तक मुझसे पर्याप्त वरिष्ठों और शीर्षस्थों को दिया जा चुका है। वरिष्ठों के अलावा चार समकालीन महापुरुषों को, जो हिन्दी की सांस्कृतिक सत्ता और सम्पदा के बड़े उदाहरण हैं। मेरे साथ आते ही यह सम्मान आयु में थोड़ा नीचे खिसक गया है, धारा बदल गई है, वह सामाजिक, सांस्कृतिक सत्ता से कुछ मुक्त हुआ है, भिन्न पंक्ति में बदल गया है, इसके तेवर में तब्दीली भी हुई है। यह शिखर सम्मान मुख्य धारा से अन्तर्धारा की तरफ खिसका है। एक वाक्य में कहना हो तो कहूंगा कि वह राजपथ से जनपथ की तरफ चला है। यह नियोजकों की विचार सरणि है, विवेक मार्ग है या नीति कहा नहीं जा सकता, पर केवल मेरे लिए नहीं, हिन्दी के प्रतिरोधी समाज के लिए यह सुखद है।
    मेरी अपनी जिंदगी, धातु, कोटि और उसके सामाजिक दर्शन में इतना जरूर दिखता रहता है कि मृत्यु के आसपास भारतीय बड़े माने जाने वालों की दुनिया में एक हड़बड़ी होना शुरू हो जाती है। उन पर किताबें आने लगती हैं, उन्हें पुरस्कृत किया जाने लगता है, उनकी अस्वस्थता का प्रसार सहानुभूति के साथ होता है, उन पर यांत्रिक संस्मरण लिखे जाने लगते हैं, उनके प्रति भक्ति, भावुकता और अंधत्व जागृत होने लगता है, उनके एकांत का अपहरण होने लगता है, चिंदी-चिंदी स्वाहा होने लगती है। उनके साक्षात्कारों में 'अनंत' जैसी दार्शनिकता का सवाल जवाब उत्पन्न होता है। इस प्रकार का जीवन व्यवहार और कुछ नहीं विदाई देने की टिपिकल भारतीय शैली है। चुपचाप जाने नहीं देंगे। जैसा जीवन रहा है, वैसी मृत्यु होने नहीं देंगे। प्रायः लोग सम्मानजनक अवसरों पर वृद्ध होने तक एक दार्शनिक भाषा आविष्कृत करते हैं। मेरी चिंता है कि क्या भारतीय समाज में शानदार विदाई संभव है ? जब किसी को पुरस्कृत सम्मानित किया जाता है, तो उम्मीद की जाती है कि वह कुछ विरल करेगा, पर मेरे लिए जीवन ने ऐसा कुछ छोड़ा नहीं है। वास्तव में, मैं यह चाहता था कि जिंदगी मेरा पीछा छोड़े। मेरी दुनिया तो उसी दिन खत्म हो रही थी, जिस दिन सड कों से पोस्ट बॉक्स गायब होने लगे थे। मेरी आवारगी का केंचुल बदल रहा था। मुझे चौराहे, अड्डे, मचान सुकून पसंद हैं और यह जबलपुर जहां मेरे जीवन के अंतिम लोग रहते हैं। आवारगी में अन्य बातों के साथ-साथ यह एक बुनियादी विचार निहित है रहता है कि निठल्लेपन के फल, श्रम के फलों से कम मूल्यवान नहीं हैं। उसकी आंखें खुली रहती हैं, उसके कान तैयार रहते हैं, वह किसी नितांत भिन्न चीज को खोलता रहता है, जो भीड  कभी नहीं देख सकती। यह मुझे वाल्टर बेंजामिन ने बताया। मैं मानता था कि जीवन से हम चीजों को सीधे उठा सकते हैं।

    साथियों, पिछली सदी के शुरूआत में एक आदमी बिना नागा धूप या बर्फ की परवाह किए बिना हर रोज वियना की सड कों पर टहलता दिखाई देता था-यह आदमी बिथोवेन था, जिसने अपनी घुमक्कड़ी के बीच अपनी शानदार स्वर लहरियों का कम्पोजिशन किया। आज कोई इस शैली, इस मार्ग का अनुसरण नहीं करता-पर मेरे लिए अब भी यह मूल्यवान है।

    तरह-तरह की बातें उमड़ रही हैं। लिखने की दुनिया के साथी याद आ रहे हैं। लिखने का मतलब है, अपने को अतिरेक में दिखाना। इसलिए लिखते समय जितना भी अकेलापन हो, वह काफी अकेलापन नहीं है, कितनी ही खामोशी हो वह पर्याप्त खामोशी नहीं है, कितनी ही रात हो वह काफी रात नहीं है। लिखते समय सारा समय ही बहुत कम है, क्योंकि सड कें अंतहीन लंबी हैं और रास्ते से कभी भी भटका जा सकता है। शुक्र है कि मैं भटका नहीं, पर बहुत से लोग मानते हैं कि कहानी से 'पहल' की तरफ जाना मेरा भटकाव ही है। इसके लिए- अपने डिफेंस के लिए मैं आपके सामने मोहम्मद इकबाल का एक शेर पढ ता हूं, जो मैंने 40 वर्ष पहले अपने कहानी संग्रह 'सपना नहीं' के प्रारंभ में दिया था-

                न बचा बचा के तू रख इसे
                    तिरा आईना है वो आईना
                कि शिकस्त हो तो अजीजतर
                    है निगाहे आईना साज  में

    मैं अपनी वास्तविक बात अपने साथी, आज के मुख्य अतिथि शेखर जोशी से शुरू करूंगा। इलाहाबाद में वे मेरे पड़ोसी थे। उनके और मेरे कई समान मित्र थे। उनकी कहानी 'कोसी का घटवार' पढ  कर मैं निर्जन में चला जाता था, मेरा दिल डूबता था- श्रम, दायित्व और एकांत का एक अपरिचित अनुभव मुझे मिला। आप एक दुर्लभ कथाकार हैं। इन्हें मैं अपने कई हीरो में एक मानता था, एक गुरुदत्त थे। मेरे पड़ोस में शेखर जी के अलावा कुछ और युग प्रवर्तक लोग थे। नरेश मेहता, उपेन्द्र नाथ अश्क, सरस्वती शरण कैफ, भैरव प्रसाद गुप्त, दूधनाथ सिंह और नीलाभ और भारती भंडार के सुप्रसिद्ध बैठकबाज वाचस्पति पाठक, जिन्होंने जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त, इलाचंद्र जोशी, निराला-हिन्दी की महान विभूतियों की किताबें छापीं।

    दरअसल मैं बताना चाहता हूं कि मैं किस तरह बन रहा था, मैं किस तरह की मोहब्बत और सोहबत में गढा जा रहा था। यह एक अत्यंत अमूर्त कहानी है। मैं प्रतिभा का नक्षत्र नहीं था, समूह समाज का एक बुनने वाला कीड़ा था। इस कीड़े को भद्र समाज ने थोड़ा-थोड़ा संशकित हो कर स्वीकार किया। अन्यथा नामवर सिंह, विष्णु प्रभाकर, श्रीलाल शुक्ल और राजेन्द्र यादव के साथ मेरी पंक्ति बैठती नहीं। मैं एक भिन्न पंक्ति का लेखक हूं। अगर बहुत सारी पंक्तियां इस दुनिया में या किताब के एक पृष्ठ पर जरूरी हैं, तो मैं किसी भी पंक्ति में रखा जा सकता हूं।

    बहुतों के साथ हुआ होगा, पर मेरे साथ भी यह हुआ कि चालीस से अधिक प्रतिनिधि संकलनों में, पाठ्‌य पुस्तकों और फिल्म निर्माणों में मेरी कहानी 'पिता', 'फेंस के इधर और उधर', 'अमरूद का पेड़' संकलित की गई। ये नरम लड़ाईयों, मामूली तौर पर परिवर्तनगामी और सुशील पीड़ा या बैचेनी की कहानियां हैं। ये कुशल हैं, मार्मिक हैं, तब्दीली का बुनियादी संकेत करती हैं, पर हमारे सभ्यता विमर्श को हल्के से छूती हैं। यह सब बड़े समाज को प्रिय है। लेकिन बहिर्गमन, छलांग, सम्बन्ध, अनुभव, घंटा नहीं संग्रहीत की गई, जो बुनियादी हैं, कुचलती हैं स्तब्ध करती हैं, हमारे सांस्कृतिक समूह को अवाक्‌ करती हैं। तीन दशक बाद भी इन कहानियों का मुहावरा और जबरदस्त हो कर एक राक्षस की तरह जीवित है। कायर समाज इसके बगल हो कर गुजरता है। इन कहानियों में एक अनिवार्य हिंसा और अश्लीलता है। पुराने मानकों और नीतिशास्त्र के मुताबिक ये कहानियां तंग करने वाली हैं। जब ये कहानियां छप कर आती थीं, तो मेरी मां पत्रिकाओं को तकिए के नीचे छिपा देती थीं। कितनी मासूम थीं मेरी मां। ये कहानियां इसलिए जीवित हैं कि हिन्दुस्तान अपने मिजाज में भीतर से बदला नहीं है। मैनरिज्म और शिल्प को छोड  दें, तो कमीनापन बैलोस बढा है।

    बेगड़ जी, शेखर जी, जोशी जी और भाई प्रेम भारद्वाज आज तक मैंने किसी को वास्तविक धन्यवाद नहीं दिया और मैं डिमेंशिया से पीड़ित नहीं हूं, इसलिए इस शिखर के बहाने अपने बनाने वालों, गढ ने वालों को याद करना चाहता हूं।

    धीरेन्द्र वर्मा, रामकुमार वर्मा, डा. रघुवंश, पं. उदय नारायण तिवारी और धर्मवीर भारती जैसे लोग मेरे अध्यापक थे। गार्डन सी रोडारमल, एग्नेश्का सोनी, अरविंद कृष्ण मेहरोत्रा, गिरधर राठी, विष्णु खरे और सुभाष मुखोपाध्याय जैसे मेरी कहानी के अनुवादक रहे। डा. इन्द्रनाथ मदान, उपेन्द्र नाथ अश्क, नेमिचंद्र जैन, नामवर सिंह, सुरेन्द्र चौधरी, विश्वनाथ त्रिपाठी, नागेश्वर लाल, परमानंद श्रीवास्तव, शिवकुमार मिश्र, सुवास कुमार और शंभुनाथ मेरे आलोचक हुए, मुझ पर लिखा। विभिन्न पुरस्कारों की घोषित जूरी में सर्वश्री नामवर सिंह, शानी, सोमदत्त, मैत्रेयी पुष्पा, विनोद कुमार शुक्ल, सत्यप्रकाश, हरिनारायण व्यास, ममता कालिया और नरेश सक्सेना जैसे निर्णायक रहे। मेरे संपादकों की दुनिया उल्लेखनीय है। प्रेमचंद के ज्येष्ठ और कनिष्ठ पुत्र श्रीपत राय और अमृत राय, शैलेष मटियानी, मार्कण्डेय, अशोक बाजपेयी, रमेश बक्षी, धर्मवीर भारती, भैरव प्रसाद गुप्त, चन्द्रभूषण तिवारी मेरे स्मरणीय संपादक थे। धर्मवीर भारती ने मेरी पांच कहानियां छापीं। भारती जी मेरे गुरू भी थे, पर इलाहाबाद में हमारी उनसे तलवार खिंची रहती थी। वे परिमलियन और मैं प्रगतिशील। पर वे लम्बे पत्रों के द्वारा गहरा दबाव बनाते और मैं उनके लिए लिखता। मार्कण्डेय ने 'कथा' में मेरी 'घंटा' कहानी छापी। इस कहानी के लिए उन्होंने मेरा इतना पीछा किया कि सुबह चार बजे उनकी नींद टूट जाती थी और मैं कहानी में जुट जाता। भीष्म साहनी ने मेरी 'संबंध' छापी और कहा कि प्यार और कठोरता का यह अद्‌भुत घर है। कमलेश्वर ने 'फेंस के इधर और उधर' तथा 'पिता' छापी। फेंस के इधर और उधर में एक पंक्ति को तितर-बितर करके उन्होंने कहानी को संवार दिया। 'अनुभव' चन्द्रभूषण तिवारी ने वाम में छापी और भैरव जी ने 'दिवास्वप्नी' छापने से पहले मुझसे बहस की-क्या ऐसा जीवन संसार है कहीं ? मैंने कहा हां है। अगर स्वप्न है तो दिवास्वप्नी भी है-यथार्थ और स्वप्न में गहरा सरगम है। और भैरव जी ने कहानी के उस अपरिचित संसार को स्वीकार किया। मित्रों, भैरव जी को हिन्दी कहानी का सबसे गुरुतर संपादक माना जाता था।

    मैं 'पाखी' के युवा संपादक को और आपको यह सूचना ताजा करना चाहता हूं कि देश के प्रथम आपात्‌काल में 'पहल' पर गहरे आक्रमण किए गए और 'पहल' ने उसका सामना किया। अखबारों के कुछ मशहूर संपादक, स्तंभकार और पत्रकारों ने 'पहल' का जी खोल कर समर्थन किया। टाइम्स ऑफ इंडिया के एक केबिन से पहल पर आक्रमण होता था और दूसरे केबिन से उसका समर्थन। मशहूर पत्रकार मायाराम सुरजन, राहुल बारपुते, कमलेश्वर, राजेन्द्र माथुर, एन. के. सिंह ने अपने स्तंभों और अग्रलेखों में पहल की भूमिका की सराहना की। यह वह समय था, जब देश के अखबार सन्नाटे में थे। मेरा आग्रह है कि नए संपादक सत्य का अन्वेषण करें। सच्चाई की कानाफूसी नहीं होती।

    संपादकों की यह शानदार परम्परा थी। आज कोई संपादक यह नहीं कह सकता कि उसके पूर्वज कुछ दे कर नहीं गए। पर आज के अधिकांश उस मार्ग पर चलना नहीं चाहते। वे भक्त चाहते हैं, उपकृतों का संसार चाहते हैं, लिटरेरी क्लबों का जायका चाहते हैं-हिन्दी की दुनिया कितनी बड़ी, कितनी दूर तक है और कितनी नामालूम पट्टियों तक फैली है, उसकी खोज निरंतर जरूरी है। इस प्रकार इस स्मृति में, मैं अपने अध्यापकों, आलोचकों और पाठकों के प्रति कृतज्ञता प्रकट कर रहा हूं। धन्यवाद दे रहा हूं।

    मुझे निर्जन जगहें पसंद थीं, पर वहां भी अपराधी और पालीथिन पहुंच चुके हैं। सवाल यह है कि क्या एक सक्रिय व्यक्ति को निर्जन में जाने का हक नहीं है ? लेकिन दुर्भाग्य से इस भवसागर में परिंदे ही फंसते हैं। यह जलसा एक झोंके की तरह आया है। मैं लगभग सो रहा था, जीवन संग्राम से बिछुड  गया था कि पाखी और इंडिपेंडेंट मीडिया ने जगाया और कहा कि सुबह हुई है आपको याद किया जा रहा है।

    अंत में मित्रों, मेरा जबलपुर जिसमें मैं रहता हूं उसकी मूल आत्मा भूमंडल के खिलाफ है-वह स्थूल रूप से खिलाफत करता नहीं दिखता पर अपनी जीवन भाषा में अपनी ही मौज में रहता है। कॉफी हाउस से निकल कर जिस पुराने शहर और बस्तियों से होता हुआ घर वापस लौटता हूं, वह कभी दमिश्क का बाजार होता है, कभी ताशकंद का कोना और कभी 'उसने कहा था' की गलियां और कभी बनारस की झलक। यहां 1940-50 के गाने सुनाते हुए रेडियो होते हैं। मैंने सारे कामों को अंजाम दे कर, सारे सौदे बंद करने के बाद, दिल्ली से संबंध विच्छेद करते हुए कुछ फिल्मों, कुछ संगीत और कुछ अमर किताबों, जिसमें मेरे पिता की गालिब भी शामिल है और कुछ शानदार दोस्तों के सहारे इस दुनिया को छोड़ा था, पर बीच-बीच में शनि चमक उठता है और मेरी बुनियादी आवारगी पर विराम लगाता है। मैंने पच्चीस दिन तक इस घोषित सम्मान की चिट्ठी को बच्चों, धर्मपत्नी से छिपाया पर टेलीफोनों में खुसर-पुसर से संदेह पैदा हो गए। क्या मैं वापस आ रहा हूं ? नहीं ! काशीनाथ, रवीन्द्र कालिया और दूधनाथ सिंह, मैं आपको आश्वस्त करता हूं कि मैं वापस नहीं आ रहा हूं। मैं वापस नहीं आ सकता।

    आयोजकों, देश भर के लेखक साथियों, जबलपुर के यारों और आदरणीय भद्रजनों को हार्दिक अभिवादन।

   

   

2 टिप्‍पणियां:

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत ही शानदार अदभुत रहा है सम्मान कार्यक्रम और आज भी सम्मानीय ज्ञान जी के विचार मेरे दिमाग में गूँज रहे हैं ... कृपया ज्ञान जी के विचार इस यूं.टूयूब में ....

http://www.youtube.com/watch?v=PeFHwH3bJ2w&feature=plcp

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

pakhi ke y.. tube mere is chhanal men dekhen ..

http://www.youtube.com/user/mmmmjbp/videos