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ज्ञानरंजन कहानी क्यों नहीं लिखते ?


कोलकाता में साहित्यिक पत्रिका वागर्थ ने नव कथाकारों के लिए एक कहानी प्रतियोगिता का आयोजन किया। प्रतियोगिता के विजेताओं को पहल के संपादक ज्ञानरंजन ने पिछले दिनों कोलकाता में पुरस्कृत किया। उन्होंने इस पुरस्कार वितरण समारोह में नौ पृष्ठ का वक्तव्य दिया। ज्ञानरंजन के वक्तव्य हर समय बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। कोलकाता में भी उनका बोला गया एक-एक शब्द अपने आप में अर्थपूर्ण था। ज्ञानरंजन ने वक्तव्य में स्पष्ट कर दिया कि बाजार और कहानी की अस्मिता या उसके साहित्यपन की अनिवार्यता से जुड़ी बातें ही उनका मुख्य उद्देश्य हैं। उन्होंने कहा कि हमारे भीतर एक अखबार और एक रचनाकार साथ-साथ बना रहता है। इसके लिए रचनाकारों के स्नायुतंत्र में जबरदस्त हलचल और बेचैनी होती रहना जरुरी है।
ज्ञानरंजन ने नए कथाकारों से आग्रह किया कि सबसे जटिल वास्तविकताओं वाले वर्तमान में हम एक अंश तक कहानी के यथार्थ यानी उसके चतुर्दिक यथार्थ के चक्रव्यूह में प्रवेश कर सकें तो यह उनका एक मूल्यवान कदम होगा एवं बड़ी सफलता होगी। यह तभी संभव है, जब हमारे अपनी विधा को केवल डिफेंड करने की शैली न अपनाई जाए। इससे पाठकों, साहित्य रसिकों, कहानीकारों और कहानी के आंदोलनकर्ताओं की समृद्धि हो सकेगी। लेकिन इस सच्चाई के बावजूद कि विधाओं में उपद्रव और विखंडन हो रहा है ऐसा हो नहीं पाता,क्योंकि अखबारों ने समकालीन राजनीति के तहलकों, अत्यधिक चमकती तकनीक ने हमें इतना डांवाडोल कर दिया है कि हम कहानी को अपने नए यथार्थ से जोड़ नहीं पा रहे हैं। यह वेल्डिंग या नवनिर्माण आसान नहीं है। लगभग 50 साल की जबरदस्त बाजार की धधक, धुएं और कोहराम के बाद महान कथाकार सारामागो ने 'केव' उपन्यास लिख कर बाजार की ताकत, उसकी समझ और भूमंडल के षड़यंत्र पर गहरा आक्रमण किया है। अब इसकी भरपूर चर्चा है, क्योंकि सृजनात्मक साहित्य की दुनिया में बाजार की फैन्टेसी का पेंच प्रभावी तौर पर सारागामो ने तोड़ दिया है।
ज्ञानरंजन ने कहा कि इस प्रकार नए जमाने के रचनाकारों के लिए यथार्थ और रचना प्रक्रिया का प्रदर्शन किया है। कहानी का अर्थ भारत जैसे विकासशील, अर्ध विकसित अथवा पिछड़े देशों के समाजों में अभी मरा नहीं है, बल्कि स्पंदित और जीवित है। इसको मूर्छित होने से बचाने का काम नए कहानीकारों का है। तभी उनकी विधा बचेगी अथवा नहीं। एक लेखक को मानना होगा कि उसका काम केवल लिख डालना नहीं है। उन्हें अपनी मेधा को एक दार्शनिक या वैज्ञानिक या चिंतक के साथ बहुआयामी बनाना है। भारतीय भाषाओं में अवशिष्ट रुप में कहानी अभी भी वह कर दिखाती है, जो उपन्यास नहीं दिखा पा रहा है। लेकिन उपन्यास का जबड़ा बहुत बड़ा है, जैसा पश्चिम ने प्रमाणित कर दिया है। ज्ञानरंजन नए कहानीकारों से कहते हैं कि कहानी लिखे ही लिखे मत जाओ, उसका बंकर भी बनाओ।
ज्ञानरंजन नव कथाकारों से कहते हैं- "बाजार एक बतकही नहीं है, वह विशाल जबड़ा है। इस कड़वाहट को पी लेने से लाभ ही है कि शायद हमारे कहानीकार उतने कलावंत नहीं है, उतने सचेत नहीं है, जितना अनिवार्य है। कहानी हमें हंसते-हंसते, तृप्ति देते, आस्वाद से छलते हुए इतना चिंताग्रस्त कर देती है कि क्या कहा जाए। आखिर हम एकत्र होते ही किस लिए हैं। यह हंसी-खुशी कितनी मारक है, कितनी हिंसक है, अर्थवान है। कहानी में यह संभव है।"
दुनिया में कहानी की स्थिति के संदर्भ में ज्ञानरंजन कहते हैं- "तथाकथित शिष्ट दुनिया में या जहां पूंजी की नोक पर सभ्यताएं तांडव कर रही हैं, वहां उनकी भाषाओं में कहानी मर चुकी है। अफ्रीकी देशों, दक्षिणी अमेरिका, कुछ छोटे नामालूम से देशों कहीं-कहीं एशिया और भारत में (पाकिस्तान भी) कहानी का अस्तित्व बना हुआ है। और वह बाजार से टकरा रही है, बाजार में प्रवेश कर रही है और बाजार द्वारा फेंकी जा रही है। बाजार वह जगह है जहां स्वागत किया जाता है, अंगीकृत किया जाता है, सजाया जाता है, बेचा जाता है और फालतू भी कर दिया जाता है।"
ज्ञानरंजन कहते हैं कि उन्हें कहानी के सौंदर्यशास्त्र की बनिस्बत कहानी के बाहरी समाज में दो चीजें अधिक सता रही है। एक तो कहानी का साहित्य भी बने रहना और दूसरा कहानी का बाजार में स्पेस। वे कहते हैं कि समकालीनता और बाजार का गहरा रिश्ता है। दुनिया की किसी भी भाषा की तुलना में हिन्दी में समकालीनता का जोर सबसे अधिक है साहित्य में। परम्परा और भविष्य की बात तो हम कभी-कभी कर लेते हैं। कहानी की रचना में कहानी के पठन पाठन में में हम यूज एण्ड थ्रो के काफी नजदीक रेंग रहे हैं। अब सवाल यह है कि हमारे कहानीकार समझदारी और अपनी सर्वोत्तम सृजनात्मक के साथ इन सबसे मुठभेड़ नहीं कर सकते तो न तो वे समकालीन ही रह सकते हैं और न चर्चित और लोकप्रिय। ऐसा न कर सकने के कारण उनकी कहानी की अवधि भी 6 महीने रह जाएगी। बाजार उनसे डिमांड करेगा नव्यतम की और परिवर्तित ढांचे की। और क्या आप इस तरह लगातार दौड़ते रह सकते हैं। आपका मिजाज, आपकी रचना, आपका तापमान, आपकी बुनावट इस तरह की नहीं है। फिर क्यों उसकी तरफ आकर्षित होते हैं। जो बाजार हमारा विरोधी है, हमारा साथ नहीं देता, हमारे लिए जहां जगह नहीं है, उसका विकल्प खोजने का काम भी हमारी सर्वोच्च चिंता है।
ज्ञानरंजन बाजार की तरफ रचनाकारों के आकर्षण और विवशता के संबंध में कहते हैं कि इसका प्रमुख कारण रचनाकारों को पिछड़ने का डर लगता है। तटस्थ और क्रूर, स्तृतिविहीन समय में समकालीनता बचाती है और हमें लगातार उपस्थित रखती है। यद्यपि समकालीनता के लिए बाजारु विकल्प कम हैं। कुछ साहित्यिक परिशिष्ट अखबारों के, एक-दो साप्ताहिक, जिसमें साहित्यिक अभिव्यक्ति लगभग हाशिए पर है। भारत की किसी भी भाषा की तुलना में समकालीनता हिन्दी में सबसे अधिक है। समकालीनता का एक प्रतिफल और हो गया है कि हिन्दी कहानी भी अब गीत की तरह मंच पर है। मंच माने कहानी के गुटीय अड्डे। अब हिन्दी समाज में 3-4 कहानी की पत्रिकाएं हैं बस। उसमें भी आधी कहानी है, आधा विमर्श। विमर्श भी आप देखें की स्त्री विमर्श, मीडिया विमर्श और दलित विमर्श। समकालीन बाजार में ये टाप थ्री विमर्श हैं, बल्कि केन्द्रीय विमर्श बन गए हैं। साहित्य में राजनीति की कार्बन कापी हो रही है। अभी-अभी कविता के भविष्य पर भी आलोचना ने चिंता प्रगट की है। कहानी की पत्रिकाओं से ही कहानी विमर्श गायब हो गया है। बस कहानी की छुटपुट रिपोर्ट बची है। देश के किसी भी शापिंग आर्केड में साहित्य कला की कोई जगह नहीं है। अफसोस और खेद और कोसने के साथ हम दिन भर अपनी बतकही करते हैं। अपने आचरण को साहित्य की शर्तों पर मोड़ने की कोशिश नहीं करते। बाजार को असहाय झांकते रहते हैं। बाजारों में कुछ अंग्रेजी की जगहें हैं। अंग्रेजी में भी समकालीन किताबें और बेस्ट सेलर हैं। अमेरिका और इंग्लैंड के सबसे शानदार साहित्यिक प्रकाशक धूल चाट रहे हैं। नया बाजार बढ़ रहा है।
ज्ञानरंजन कहते हैं कि उन्होंने अपने वक्तव्य में एक जगह साहित्यपन या साहित्यिकता का उपयोग किया है। बाजार और समकालीनता के बीच ज्ञानरंजन इसे आज भी एक जरुरी मुद्दा मानते हैं। वे कहते हैं कि साहित्य हमारा कवच है। यह हमारी अस्मिता की रक्षा करता है। हमें इस दिशा की तरफ ध्यान देना चाहिए। जिसे बाजार की तरफ जाना हो पापुलर व्यवसायी और खपत वाली कहानी लिखनी हो वे अवश्य लिखें। यह उनका चुनाव है। यह एक जरुरी रास्ता भी है पर जो साहित्य कला जीवन का रसायन बनाना चाहें और भाषा की मौलिक समृद्धि उन्हें भी अपनी जद्दोजहद कायम करनी चाहिए। कहानी, नई कहानियां, उर्दू कहानी, सारिका के अलावा हिन्दी की अन्य शानदार पत्रिकाओं में कहानी को एक विशिष्ट दर्जा था। चाहे वह कल्पना हो, लहर हो, परिमल गुट की पत्रिकाएं हों या प्रगतिशील गुट की। श्रीपतराय, श्यामू सन्यासी, उपेन्द्रनाथ अश्क, धर्मवीर भारती, भैरवप्रसाद गुप्त, मोहन राकेश, बलवंत सिंह, रामनारायण शुक्ल कहानी संपादन के ये सर्वाधिक सम्मानीय नाम हैं। इनके संपादन में निकलने वाली कहानी पत्रिकाओं के प्रिंट आर्डर हजारों में थे, लेकिन कहानी बाजार के चंगुल से स्वतंत्र थी। उन्होंने कहानी की टोटल रक्षा की। ज्ञानरंजन कहते हैं कि इस भव्य परंपरा को तोड़ने या उससे विचलित होने, विरत होने की जरुरत क्यों हुई ? उसे समृद्ध क्यों नहीं किया गया। पता नहीं किन घड़ियों में यह खंडन हुआ, यह अध्ययन का विषय है। जिस तरह समय की राजनीति करवट लेती है, उसी तरह साहित्य की दुनिया में करवटें नहीं बदली जातीं। साहित्य में अगर हमने मांग-आपूर्ति का नियम लागू कर दिया तो यह एक प्रकार की व्यापार प्रणाली होगी।
ज्ञानरंजन कहते हैं- "बाजार के बारे में मेरा नजरिया नकारात्मक नहीं है। बाजार इतनी बुरी जगह नहीं है। गृहस्थों के लिए, जनगण के लिए वह जरुरी ही नहीं जीवित रहने का एक मजबूत आधार है। वह लोकप्रिय कारीगारी के लिए हमारी भूख प्यास के लिए भी एक स्थल है। पर एक रचनाकार के लिए उसमें बहुत अधिक जरुरी चीजें उपलब्ध नहीं हैं। एक साहित्यकार को उसमें प्रवेश की अनिवार्यता नहीं है। हम पानी में जाते हैं, पानी में तैरते हैं, उससे लड़ते हैं। हम बाजार में जाते हैं, बाजार से लड़ते हैं। लेखक की दुनिया अलग है। वह निर्माता है, खोजी है, विचारक है, वह भविष्य और अपने समय में धंसता है, वह बेपरवाह है। जिस दिन हम अपना इनोसेंस खो देते हैं, उस दिन हम एक होशियार आथर हो जाते हैं। अमानवीयकरण का सुराख बनने लगता है। हमारा सृजनात्मक वार्तालाप ही बदल जाता है।
ज्ञानरंजन कहते हैं कि उन्हें संपादक होने के नाते हर पल चेतना और जागरण की जरुरत पड़ती है। इसका कोई अंत नहीं है। वे अपने साहित्य समाज से ही सीखते चलते हैं। कहानी के लिए यह अदभुत समय है। परिपक्व और समृद्ध समाजों में कहानी पदच्युत हो चुकी है। लेकिन यहां भारतीय समाज में हर चीज पिघल रही है। भाषाएं प्रतिभाओं की धनी हैं। यथार्थ तार-तार और विखंडित हो रहा है।
ज्ञानरंजन ने अपने वक्तव्य को समाप्त करते हुए सबसे महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा- " मुझसे यह सवाल पूछा जा सकता है कि आप इतना जान समझ रहे हैं तो लिखते क्यों नहीं कहानी ? इसका जवाब है कि मैं नहीं लिख सकता। लिख सकता हूं पर वह महज ज्ञानवान क्रिया हो्गी जिसका कोई अर्थ नहीं। जानना और सूचित होना पर्याप्त नहीं है। लिखते जाना भी पर्याप्त नहीं है। छपते जाना भी पर्याप्त नहीं है। नए मुहावरे को जन्म देना, त्रासदी के मध्य डूबना-उतरना और लगभग अकेले पड़ जाना, आवेग, धीरज और श्रम और ताजगी और कम उम्र इसके लिए जरुरी है। और भी बहुतेरी चीजें जरुरी हैं। पचासों साल बीत जाने और अनन्य लफड़ों में विचरने वाले बूढ़े अपने समाज में कोई बड़ी भूमिका अदा नहीं कर सकते।"
(ज्ञानरंजन जी का पूरा वक्तव्य वागर्थ के नए अंक में प्रकाशित होगा)

टिप्पणियाँ

vijay gaur ने कहा…
बंधुवर अच्छी रिपोर्ट है. ग्यान जी जिस बाजार से सहमति की बात कर रहे हैं, मेरी समझ से वह देशी बाजार ही हो सकता है. निश्चित ही उस बाजार को आक्रामक तरह से उखाड्ने वाले आरोपित बाजार के समर्थ्क वे नहीं हो सकते. बाजार के सम्बंध में उनको कोट करते हुए उस वक्त्व्य के आगे पीछे और भी कुच्छ रहा होगा, उसे भी रखते तो शायद स्पष्ट नजरिया बन पाता.फ़िर भी रिपोर्ट पढ्वाने के लिये आभार.
Udan Tashtari ने कहा…
बहुत रोचक और जानकारी भरी रिपोर्ट की प्रस्तुति के लिये आभार.. पंकज भाई.
ज्ञानरंजन नव कथाकारों से कहते हैं- "बाजार एक बतकही नहीं है, वह विशाल जबड़ा है। इस कड़वाहट को पी लेने से लाभ ही है कि शायद हमारे नए मुहावरे को जन्म देना, त्रासदी के मध्य डूबना-उतरना और लगभग अकेले पड़ जाना, आवेग, धीरज और श्रम और ताजगी और कम उम्र इसके लिए जरुरी है। और भी बहुतेरी चीजें जरुरी हैं। पचासों साल बीत जाने और अनन्य लफड़ों में विचरने वाले बूढ़े अपने समाज में कोई बड़ी भूमिका अदा नहीं कर सकते।"
इस बात को में जवाब नही सवालों की पोटली समझ रहा हूँ कल जब कोई इसे खोलेगा तो कहानियां बिखर जाएँगी एक बार फिर लोग खुद कहेंगे "पहल" अब हुई है....
यानी ज्ञान जी कल को करीब से देख रहें हैं...!
vijayshankar ने कहा…
ज्ञानरंजनजी इस महादेश के भाषा इतिहास में कुछ महत्वपूर्ण सम्पादकों में से हैं. उनका खंडित वक्तव्य पढ़कर भी एक तस्वीर तो बनती ही है. हिन्दी कहानी को लेकर उनकी चिंताएं बाजिब और गहरी हैं.
bavaal ने कहा…
aapki prastuti main gyanranjanjee ka hona, hindi blog sahityakaaron ko sambal dega.

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