सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

March, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

उड़नतश्तरी का होली आयोजन और लुकमान की याद

पिछले दिनों समीर लाल यानी की उड़नतश्तरी के जबलपुर स्थित घर में होली के मौके पर एक आत्मीय आयोजन हुआ। आत्मीय आयोजन था, इसलिए इसमें समीर लाल के नजदीकियों के अलावा उनके पिताजी श्री पी. के. लाल के मित्र भी थे। मुझे भी इस आयोजन में समीर लाल ने आमंत्रित किया। समीर लाल से मेरी जान-पहचान रंजन दासगुप्ता के जरिए लगभग 14 -15 वर्ष पहले हुई थी। 1999 में वे कनाडा चले गए। इसके बाद मेरा उनसे सम्पर्क नहीं हुआ। अलबत्ता रंजन दासगुप्ता से उनके बारे में जानकारी मिलती रहती थी। पिछले वर्ष मैंने भी ब्लाग लिखना शुरु किया। जब ब्लाग की दुनिया में प्रविष्ट हुआ, तब मुझे जानकारी मिली कि हिन्दी ब्लागिंग में समीर लाल का बहुत नाम है। दैनिक भास्कर भोपाल में हिन्दी ब्लाग पर एक पृष्ठ की जानकारी प्रकाशित हुई। इसमें समीर लाल के महत्वपूर्ण विचार थे। उसी समय मुझे गिरीश बिल्लौरे से खबर मिली कि समीर लाल जबलपुर आए हुए हैं। गिरीश बिल्लौरे, समीर लाल से हिन्दी ब्लाग पर एक व्याख्यान करवाना चाहते थे, लेकिन कोई कार्यक्रम निश्चित नहीं हो पा रहा था। (सभी के प्रयासों से समीर लाल का व्याख्यान विश्व रंगमंच दिवस को 27 मार्च को हुआ) होली के …

पहल पत्रिका में मेगन कछारी की विद्रोही कविताएं

ज्ञानरंजन के संपादन में निकलने वाली 'पहल' ने पहल पत्रिका के रुप में इस बार असमिया कविता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर मेगन कछारी की चुनिंदा कविताओं को 'विद्रोह गाथा' के नाम से प्रकाशित किया है। यह असम से प्रतिरोध, जन विद्रोह और जनजीवन की प्रतिनिधि कविताएं कही जा सकती हैं। मेगन कछारी असम के भूमिगत विद्रोही संगठन संयुक्त मुक्ति वाहिनी असम (अल्फा) के प्रचार भी हैं और संगठन में उनका नाम मिथिंगा दैयारी है। नब्बे के दशक में विद्रोहियों का दमन करने के नाम पर वरिष्ठ उल्फा नेताओं के परिवारों को निशाना बनाया गया था, उस दौरान मेगन कछारी के परिवार के तकरीबन सारे सदस्यों को मार डाला गया था। हाल ही में उन हत्याओं की जाँच करने वाले के. एन. सैकिया आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि तत्कालीन राज्य सरकार और आत्मसमर्पणकारी विद्रोहियों ने गुप्त हत्याएं की थीं। दिसंबर 2003 में भूटान आपरेशन के दौरान उल्फा के जिन पाँच बड़े नेताओं को गिरफ्तार किया गया, उनमें मेगन कछारी भी शामिल थे। मेगन इस समय गुवाहाटी जेल में हैं। डा. इंदिरा गोस्वामी के संपादन में उनकी कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद 'गन्स एंड …

पत्रकारिता शिक्षा का सच

हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान में डा. हेमंत जोशी का पत्रकारिता शिक्षा पर एक यथार्थपरक विश्लेषण प्रकाशित हुआ है। इस विश्लेषण में उन्होंने बिल्कुल सही लिखा है कि पत्रकारिता आज पलक झपकते ही लोगों को ख्याति, पैसा और हैसियत बनाने की सबसे उत्तम सीढ़ी बन गई है। डा. जोशी ने पत्रकारिता पेशे में जाने वाले कई युवक-युवतियां का उदाहरण देते हुए लिखते हैं कि वे देश-दुनिया के बारे में जानना तो दूर, सामान्य ज्ञान में भी कमजोर होते हैं। डा. जोशी का कहना है कि पत्रकारिता के पेशे के प्रति युवा पीढ़ी के इस आकर्षण का यह परिणाम हुआ है कि अनेक विश्वविद्यालयों ने आवश्यक सुविधाओं और प्रशिक्षित अध्यापकों के बिना ही पत्रकारिता के पाठ्यक्रम शुरु कर दिए। कई ऐसे लोग, जिनके पास पूँजी थी या जगह थी या मीडिया में थोड़ी-बहुत पहुँच थी, वह भी कमर कस के इस मैदान में आ गए और लोगों से अनाप-शनाप फीस ले कर उन्हें पत्रकार या टीवी एंकर बनाने का प्रलोभन देने लगे।
डा. हेमंत जोशी का पत्रकारिता शिक्षा पर किया गया विश्लेषण बिल्कुल सटीक है। जबलपुर सहित पूरे मध्यप्रदेश में वर्तमान में पत्रकारिता शिक्षा के संस्थान, जिस प्रकार कुकरमुत्ते की तरह फै…

अंधविश्वास को बढ़ावा देते जबलपुर के समाचार पत्र

जबलपुर के प्रमुख समाचार पत्र अंधविश्वास की घटनाओं को बढ़ावा देने में सबसे आगे रहते हैं। अंधविश्वास की घटनाएं, जिस प्रकार समाचार पत्रों में प्रस्तुत होती हैं, उससे लगता है कि ऐसी घटनाओं पर वे प्रहार नहीं कर रहे हैं, बल्कि उसे अतिरंजित कर उभार रहे हैं। 16 मार्च को जबलपुर के तीन प्रमुख समाचार पत्रों में जिस प्रकार तथाकथित देव बप्पा बाबा द्वारा रोगियों के सिर पर पत्थर रखकर इलाज करने की खबर को प्रस्तुत किया गया, वह सिर्फ अंधविश्वास को ही बढ़ावा देती है। इसी खबर में बाबा के इलाज कार्यक्रम में जबलपुर निवासी विधानसभा अध्यक्ष, एक मंत्री और कलेक्टर की सपरिवार मौजूदगी की बात भी अचरज पैदा करती है। कलेक्टर की पत्नी सरकारी डाक्टर हैं और वे श्रद्धापूर्वक बाबा को पत्थर से इलाज करते देख रही थीं। एक समाचार पत्र में तो यह भी छपा कि विधानसभा अध्यक्ष ने बकायदा बाबा से अपना इलाज कराया। जिस क्षेत्र में बाबा इलाज कर रहे थे, उस क्षेत्र का पुलिस थाना पूरी तरह खाली था, क्योंकि सभी पुलिस वाले बाबा से इलाज करवाने गए थे। समाचार पत्रों में इस प्रकार की प्रस्तुतिकरण आम जन मानस में अंधविश्वास की गहरी पैठ और तर्कहीन बात…

चित्रकार सैयद हैदर रजा के दिल में बसी है मातृभूमि

1950 में भारत छोड़ चुके प्रसिद्घ चित्रकार सैयद हैदर रजा पिछले दिनों जबलपुर के नजदीक नरसिंहपुर में स्थित बबरिया-बचई में चुपचाप पहुंचे। बबरिया-बचई में उन्होंने बचपन के दिन गुजारे थे। मातृभूमि में आते ही रजा ने सड़क के किनारे पत्थर पर बैठकर धूल उठाकर सिर-माथे पर लगा ली, चूम ली और सूटबूट में जमीन में ऐसे लोटपोट हो गए, जैसे कोई बच्चा अपनी मां से लिपट रहा हो। रजा 1950 से पेरिस में रह रहे हैं। उस समय वहां मौजूद पत्रकार बृजेश शर्मा बताते हैं कि अपनी मातृभूमि में पहुंचकर रजा विशद्घ नरसिंहपुरी दिख रहे थे।
सैयद हैदर रजा के लिए गांव के लोगों ने कुर्सी लगाई, लेकिन उन्होंने सड़क के किनारे एक धूल से सने पत्थर पर बैठना पसंद किया। अपनी मातृभूमि पहुंच कर वे बैचेन हो गए और उस स्कूल पहुंच गए, जहां उन्होंने आज से लगभग 75-80 साल पहले पढ़ाई के दिन गुजारे थे। गांव में आकर उन्होंने भावना को इन शब्दों में व्यक्त किया-

"मेरे लिए अपनी जन्भूमि बबरिया को फिर देखना, इस माटी को फिर छूना कितना सुंदर और सुखद अनुभव रहा। सचमुच आप से मिलकर, आपके सुंदर घर देखकर जो आनंद हुआ, उसे शब्दों में व्यक्त करना बहुत कठिन है। बचई और …

समुदाय और समाज में बंटते महिलाओं के क्लब

जबलपुर में आजकल महिलाओं के नए क्लब खूब बनते जा रहे हैं। रोज अखबारों में एक नए क्लब बनने की खबर छपती है। छपे भी भला क्यों नहीं। जबलपुर के तीन प्रमुख समाचार पत्रों ने समाज के विभिन्न वर्गों को अपने से जोड़ने के लिए अलग से सिटी पुल आउट निकालना शुरु किया है। इनमें फोकस महिलाएं और युवा हैं। महिलाएं और युवा हैं, तो फैशन, खानपान की खबरों पर तो जोर रहेगा ही। सर्कुलेशन बढ़ाने का हक प्रत्येक अखबार को है। इसका लाभ सबसे अधिक महिलाओं और कॉलेज के विद्यार्थियों को मिल रहा है। शिक्षा पत्रकारिता का मूल उद्देश्य भटक गया है। कॉलेज की सोशल गेदरिंग, फैशन शो, पश्चिम की तर्ज पर रोज विभिन्न दिवसों पर युवा वर्ग की प्रतिक्रिया ही अखबार के पन्नों में पढ़ने को मिल रही हैं। समाज के विभिन्न वर्ग की महिलाओं की आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता की खबरें सामुदायिक व सामाजिक क्लबों की गतिविधियों में खो गई है।
जबलपुर में समुदाय में बंट रहे महिला क्लब एक खतरनाक प्रवृत्ति को उभारते हैं। अभी तक महिला क्लब मोहल्लों की परिधि में ही थे, लेकिन अब ये ब्राम्हण, अग्रवाल, कायस्थ, मरवाड़ी, जैन, मराठी, छत्तीसगढ़ी, गुजराती, सिंधी, पंजाबी में बंट…

क्योंकि रावण मुस्करा रहा है

ओलंपिक क्वालीफाईंग हॉकी प्रतियोगिता में भारत की पराजय के पश्चात खेलों को लेकर पूरे देश में अपने-अपने तरीके से विश्लेषण किए जा रहे हैं। कोई स्कूली शिक्षा को दोष दे रहा है, तो कोई बुनियादी सुविधाओं को इसके लिए जिम्मेदार मान रहा है। मुझे लगता है कि सबसे बड़ी समस्या खेल मैदानों की है। सभी बच्चे खेलना चाहते हैं, लेकिन खेलें कहाँ ? बच्चों के खेलने के लिए जबलपुर में जगह बची नहीं है। जो बच्चे खेलकूद रहे हैं, वे दुनिया के सबसे खुशकिस्मत बच्चे हैं। जो बच्चे खेल नहीं पाते हैं, इसके पीछे के कारणों को इंगित कर यह कविता प्रस्तुत है-

बारिश खत्म, दशहरे की छुट्टियां, बच्चों में उमंग है
धर्म की पताका फहराने की तैयारी है
रावण मुस्करा कर देख रहा
खेल के मैदान में सचिन-सौरव को खिलते हुए।

हर बच्चे का सपना है
देश के खिलाड़ी बनने का
राम-सीता की दुहाई है,
परम्परा है
खेल के मैदान में ही जलता है रावण
यही है खेल के मैदानों का अब दस्तूर
मैदानों से होती है राजनीति
नेताओं के भाषण
धर्मगुरुओं के प्रवचन
आधुनिक मैनेजमेंट गुरुओं के व्याख्यान
फिल्मी सितारों के नाच-गाने
खेल संघों के चुनाव
नुमाइश और मेले
औद्योगीकरण और उन्नति के वायदे
कला और संस…

हॉकी में भारत की पराजय बनाम जबलपुर

ओलंपिक क्वालिफाईंग प्रतियोगिता में ब्रिटेन से पराजित से होकर भारत 80 वर्षों में पहली बार ओलंपिक में खेलने से वंचित हो गया। पूरा देश इस घटना से दुखी है। मीडिया देश के हाकी के कर्णधारों पर बरस रहा है। इंडियन हाकी संघ के अध्यक्ष केपीएस गिल निशाने पर हैं। दरअसल गिल तो सिर्फ एक उदाहरण हैं। देश भर के खेल संघों में बड़े अधिकारी और राजनेता जिस ढंग से काबिज हैं वह हमारे देश में ही संभव है। जबलपुर भी देश से अलग नहीं है। जबलपुर कभी मध्यप्रदेश की खेलधानी के रूप प्रसिद्व रहा है, लेकिन आज स्थिति बदल गई है। खेल संघों पर बड़े अफसर या राजनेता या पूंजीपतियों का नियंत्रण है। खेल के मैदान बचे नहीं हैं। मैदानों पर व्यवसायिक कॉम्पलेक्स या अपार्टमेंट बन गए हैं। एकमात्र स्टेडियम में खेल के अलावा सब कुछ हो रहा है। दशहरा मनाया जा रहा है, रावण जल रहा है, मोबाइल कंपनी द्वारा प्रायोजित गीत-संगीत के कार्यक्रम हो रहे हैं, धर्मगुरूओं के प्रवचन हो रहे हैं। सुना है अब 26-27 मार्च को मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी स्टेडियम में अपना राष्ट्रीय अधिवेशन करने जा रही है। और इन सबके बीच जबलपुर में सिर्फ खेल ही नहीं हो रहा है।
वह…

बावन तालों का सुन्दर नगर

देखो देखो जबलपुर शहर देखो।
बावन तालों का सुन्दर नगर देखो।

यहां का गुरन्दी बाज़ार मस्त है।
वर्ल्ड फेमस यहां धुआंधार मस्त है।
गढा फाटक, कमानिया का द्वार मस्त है।
नर्मदा पुण्य सलिला कछार मस्त है।
चमचमाता यहां का सदर देखो।
है महाकौशल की आत्मा इधर देखो।
देखो देखो जबलपुर शहर देखो।
बावन तालों का सुन्दर नगर देखो।

मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा गिरिजाघर है यहां।
दूध जैसे संगमरमर है यहां।
संस्कारों में डूबी सहर है यहां।
प्यार सद्भाव की हर डगर है यहां।
महापुरुषों की भूमि अमर देखो।
रानी दुर्गावती का यह घर देखो।
देखो देखो जबलपुर शहर देखो।
बावन तालों का सुन्दर नगर देखो।

राजेश दुबे के कार्टून

राजेश दुबे ने अपने कार्टूनों के जरिए जबलपुर के समाचार पत्रों में कार्टून विधा को एक नया आयाम दिया है। राजेश ने अपनी शुरुआत नवभारत से की और इसके बाद वे दैनिक भास्कर में रहते हुए छह महीने पहले नई दुनिया में आ गए। नई दुनिया में उन्होंने सम सामायिक विषयों पर जिस प्रकार टिप्पणी की हैं, वह आशा बंधाती है कि वे जल्द ही राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने लगेंगे। प्रादेशिक स्तर पर तो उनकी पहचान पहले ही बन चुकी है। उनके कार्टून खासतौर से हरिशंकर परसाईं की सूक्तियों पर उनके व्यंग्य चित्रों की सीरीज काफी ख्याति अर्जित कर चुकी है। राजेश दुबे की टिप्पणियों के साथ उनके स्केच भी आकर्षित हैं। उनका हास्य बोध (सेंस आफ हयूमर) बहुत अच्छा है।
राजेश दुबे कहते हैं कि उन्होंने छह महीने में जितना काम नई दुनिया में किया है, उतना जिंदगी भर में नहीं किया है। इसके लिए वे नई दुनिया के संपादक राजीव मित्तल को पूरा श्रेय देते हैं। राजेश अपने अनुभव के आधार पर कहते हैं कि नई दुनिया में उन्हें जितना प्रोत्साहन मिला, उतना कहीं नहीं मिला। वे कहते हैं कि पहले उनके कार्टून सिर्फ जगह भरने के लिए होते थे। जिस दिन बड़ी खबरें न हो, उस द…