शनिवार, 29 मार्च 2008

उड़नतश्तरी का होली आयोजन और लुकमान की याद



पिछले दिनों समीर लाल यानी की उड़नतश्तरी के जबलपुर स्थित घर में होली के मौके पर एक आत्मीय आयोजन हुआ। आत्मीय आयोजन था, इसलिए इसमें समीर लाल के नजदीकियों के अलावा उनके पिताजी श्री पी. के. लाल के मित्र भी थे। मुझे भी इस आयोजन में समीर लाल ने आमंत्रित किया। समीर लाल से मेरी जान-पहचान रंजन दासगुप्ता के जरिए लगभग 14 -15 वर्ष पहले हुई थी। 1999 में वे कनाडा चले गए। इसके बाद मेरा उनसे सम्पर्क नहीं हुआ। अलबत्ता रंजन दासगुप्ता से उनके बारे में जानकारी मिलती रहती थी। पिछले वर्ष मैंने भी ब्लाग लिखना शुरु किया। जब ब्लाग की दुनिया में प्रविष्ट हुआ, तब मुझे जानकारी मिली कि हिन्दी ब्लागिंग में समीर लाल का बहुत नाम है। दैनिक भास्कर भोपाल में हिन्दी ब्लाग पर एक पृष्ठ की जानकारी प्रकाशित हुई। इसमें समीर लाल के महत्वपूर्ण विचार थे। उसी समय मुझे गिरीश बिल्लौरे से खबर मिली कि समीर लाल जबलपुर आए हुए हैं। गिरीश बिल्लौरे, समीर लाल से हिन्दी ब्लाग पर एक व्याख्यान करवाना चाहते थे, लेकिन कोई कार्यक्रम निश्चित नहीं हो पा रहा था। (सभी के प्रयासों से समीर लाल का व्याख्यान विश्व रंगमंच दिवस को 27 मार्च को हुआ) होली के एक दिन पहले समीर लाल का फोन आया कि उन्होंने होली के अवसर पर घर में कव्वाली का एक कार्यक्रम रखा है और इसमें मुझे जरूर पहुंचना है।


मैं होली के दूसरे दिन समीर लाल के घर निश्चित समय से थोड़ी देर से पहुंचा। कव्वाली शुरु हो चुकी थी। कार्यक्रम स्थल पर मैंने देखा कि एक जाना-पहचाना व्यक्ति मंच पर बैठ कर कव्वाली गा रहा था। उसकी कव्वाली आमतौर पर मंचीय कव्वाली से हट कर थी। और हो भी क्यों नहीं। वह व्यक्ति कोई प्रोफेशनल कव्वाल नहीं था, बल्कि वह पेशे से एक अकाउंटेंट और एडवोकेट है। यह व्यक्ति समीर लाल के आयोजन में अपने गुरु शेख लुकमान को श्रद्धांजलि देने के उद्देश्य से उनके द्वारा प्रस्तुत कव्वाली, गजल और गीत को गाने आया हुआ था। यह व्यक्ति सुशांत दुबे था। जबलपुर में लुकमान के सिर्फ दो ही शिष्य हैं। एक सुशांत दुबे और दूसरे शेषाद्रि अय्यर।


लुकमान अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन आज भी उनके गाए गीत गूंज रहे हैं। उनके गीतों की अलख सुशांत दुबे और शेषाद्रि अय्यर ने जगाई रखी है। लुकमान मूलत: जबलपुर के थे। उन्हें बचपन से ही गाने गुनगाने का शौक था। यह बात उनके बेहद करीब के लोग जानते थे। उनके एक दोस्त के यहां शादी हो रही थी। सेहरा पढ़ने के बाद नित्यरंजन पाठक की कव्वाली हुई। इसी महफिल में दुर्गा गुरु और एडवोकेट अब्दुल वहाब भी थे। जैसे ही कव्वाली खत्म हुई, तो एडवोकेट वहाब के इशारे पर दुर्गा गुरु ने लुकमान से 'कुछ' सुनाने की फरमाईश की। सभी लोगों के जोर देने पर पहले लुकमान थोड़े शर्माए और झिझके, लेकिन जैसे ही उन्होंने 'तमन्ना के गुंचे खिले जा रहे हैं, बहार आ रही है कि वह आ रहे हैं' गजल सुनाई तो लोग पागल से हो गए। इसके बाद लुकमान सारी रात सुनाते रहे, और लोग सुनते रहे। इसके बाद जो सिलसिला शुरु हुआ, वह जबलपुर में 55 वर्ष तक लगातार चलता रहा। लुकमान जिस महफिल में गाएं और वह सुबह तक न चलें, ऐसा बहुत ही कम हुआ।


जबलपुर के प्रसिद्ध साहित्यकार भवानी प्रसाद तिवारी के यहां वर्षों पहले साहित्य और संगीत की बैठकें जमा करती थीं। अब्दुल वहाब और भवानी प्रसाद तिवारी परिचित थे और एक दिन वहाब साहब लुकमान को उनके घर ले गए। उस दिन तिवारी जी की संगीत बैठक में एक शास्त्रीय गायक अपनी प्रस्तुति दे रहे थे। उस समय लुकमान के साथ अंतरराष्ट्रीय हॉकी रैफरी सुरेन्द्र शुक्ला (सुक्खन दादा) भी थे। जरुरी काम के कारण उस समय वहां भवानी प्रसाद तिवारी मौजूद नहीं थे। जैसे ही शास्त्रीय गायक ने अपना गायन समाप्त किया, तो लोगों ने लुकमान से गाने की फरमाईश की। साहित्य और कला के दिग्गज लोगों को देख कर लुकमान थोड़ा सहमे हुए थे। उन्होंने कहा शुरु करता हुं, लेकिन मजाक नहीं उड़ाईएगा। लुकमान ने बिना किसी संगीत के वहजाद लखनवी की गजल-'मस्ती नवाज शोखी अंदाज का फिराना जुल्फें सिया घटाएं आंखें शराबखाना' सुनाई तो सुनने वालों को लगा कि जैसे एक ताजा झोंका आया हो। कुछ देर बाद भवानी प्रसाद तिवारी आ गए। महफिल में मौजूद लोगों ने उन्हें लुकमान की गायकी का अंदाज बयां किया। लुकमान ने उन्हें पहली गजल फिर सुनाई। इसको सुन कर भवानी प्रसाद तिवारी ने कहा कि अब इससे ऊंची ही बात रहे। यह महफिल भी रात भर चलती रही। लुकमान ने मुझे बताया था कि इस घटना के बाद तो जैसे दरवाजा ही खुल गया। फिर भवानी प्रसाद तिवारी के यहां होने वाली हर हफ्ते की शनिवार रात की महफिल में लुकमान की उपस्थिति और उनका गायन एक परपंरा बन गई। भवानी प्रसाद तिवारी के यहां उन दिनों आने वालों में केशव प्रसाद पाठक, रामानुजलाल श्रीवास्तव 'ऊंट', रामेश्वर प्रसाद गुरु, गणेश प्रसाद नायक, पन्नालाल श्रीवास्तव 'नूर', प्रेमचंद श्रीवास्तव 'मजहर', नर्मदा प्रसाद खरे जैसे साहित्यकारों के साथ कई युवा पत्रकार और समाजवादी थे।


लुकमान की ख्याति हिन्दी गीत और प्रसिद्ध कवियों और साहित्यकारों के पद्य को गीत के रुप में गाने से हुई। लुकमान द्वारा गाए हुए नीरज का गीत-'विरह रो रहा है, मिलन गा रहा है, किसे याद रखूं, किसे भूल जाऊं', भवानी प्रसाद तिवारी के गीत 'प्यार न बांधा जाए साथी' और 'माटी की गगरिया' महादेवी वर्मा के गीत 'बीन भी हूं मैं तुम्हारी रागिनी भी हूं' एवं 'चिर सजग आंखें, उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना जाग तुझको दूर जाना' को जबलपुर के बाहर दिल्ली, इंदौर, इलाहबाद, बनारस के संगीत प्रेमी आज भी याद करते हैं। लुकमान ने छठे से ले कर आठवें दशक तक इतना नाम कमाया कि जबलपुर की कुछ प्रसिद्ध चीजों में लुकमान कव्वाल भी एक थे। लुकमान के लिए अकबर इलाहबादी का यह शेर याद आ जाता है-


'गुजरे हैं इश्क नाम के एक हजरते बुजुर्ग
हम लोग भी फकीर उसी सिलसिले के हैं'

रविवार, 23 मार्च 2008

पहल पत्रिका में मेगन कछारी की विद्रोही कविताएं


ज्ञानरंजन के संपादन में निकलने वाली 'पहल' ने पहल पत्रिका के रुप में इस बार असमिया कविता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर मेगन कछारी की चुनिंदा कविताओं को 'विद्रोह गाथा' के नाम से प्रकाशित किया है। यह असम से प्रतिरोध, जन विद्रोह और जनजीवन की प्रतिनिधि कविताएं कही जा सकती हैं। मेगन कछारी असम के भूमिगत विद्रोही संगठन संयुक्त मुक्ति वाहिनी असम (अल्फा) के प्रचार भी हैं और संगठन में उनका नाम मिथिंगा दैयारी है। नब्बे के दशक में विद्रोहियों का दमन करने के नाम पर वरिष्ठ उल्फा नेताओं के परिवारों को निशाना बनाया गया था, उस दौरान मेगन कछारी के परिवार के तकरीबन सारे सदस्यों को मार डाला गया था। हाल ही में उन हत्याओं की जाँच करने वाले के. एन. सैकिया आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि तत्कालीन राज्य सरकार और आत्मसमर्पणकारी विद्रोहियों ने गुप्त हत्याएं की थीं। दिसंबर 2003 में भूटान आपरेशन के दौरान उल्फा के जिन पाँच बड़े नेताओं को गिरफ्तार किया गया, उनमें मेगन कछारी भी शामिल थे। मेगन इस समय गुवाहाटी जेल में हैं। डा. इंदिरा गोस्वामी के संपादन में उनकी कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद 'गन्स एंड मेलोडीज' शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। मेगन कछारी का जन्म 1968 में निचले असम के एक गाँव में हुआ था। वर्ष 1994 में मेमसाहब पृथ्वी और वर्ष 2007 में रूपर नाकफूलि, सोनर खारू उनके कविता संग्रह हैं।
मेगन कछारी की कविताओं का असमिया से हिन्दी में अनुवाद दिनकर कुमार ने किया है। उन्होंने दर्जनों असमिया पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद किया है। वर्ष 1998 में अनुवाद के लिए सोमदत्त सम्मान से सम्मानित दिनकर कुमार गुवाहाटी से प्रकाशित हिन्दी दैनिक सेंटिनल के संपादक हैं।
यहां 'विद्रोह गाथा' में प्रकाशित कुछ कविताएं प्रस्तुत हैं :-


अपने बारे में
अपने बारे में मैं क्या हाल बता सकता हूं किसी को
फिलहाल मेरी सहपाठी, अनिद्रा और मैं
राह देखते हैं खबर की.......
कभी-कभी शिलाखंड डाकिया
दे जाता है मुझे मेरी ही खबर, खबर आती है
इंतजार में थक जाता है कोई प्रशंसक..........
मेरे शरीर में आविष्कृत हुआ है
शीत का अरण्य
और फिर कभी खबर आती है
कहीं लुढ़ककर गिरा हुआ
मेरा मृत्यु संवाद............
अपने बारे में मैं क्या बता सकता हूं किसी को
फिलहाल मेरी सहपाठी अनिद्रा और मैं
राह देखते हैं खबर की.......
प्रतिदिन अनागत प्रश्न और खबर की कीचड़ में
मैं धंसता जाता हूं, आज बहुत दिन हुए
सूर्योदय को देखते हुए.......
क्या गीत सुनाएगा निर्जीव जीवाश्म
श्मशान की निर्जनता को
मैं खेलता रहा हूं कौवे के कोलाहाल में
सिसकती हुई सुबह और
स्वर्ण वृक्ष के सीने से पश्चिम में झुकते हुए
सूरज के साथ.............
मैं जानता हूं आने वाली राह से लौटकर एक दिन
लौटकर नहीं आएगा शिलाखंड डाकिया
नि:सार हो जाएगा एक दिन भूकंप से हिल उठने वाला
प्राचीन ऊबड़-खाबड़ पथ
एक दिन परिचित पर लुढ़क जाएगा मेरा
दुर्गंधमय गला शरीर....
अपने बारे में मैं क्या हाल बता सकता हूं किसी को

ुटबाल
दुख फुटबाल होता तो शायद नहीं होते
इतने सारे गले हुए दर्द, ह्रदय खाली कर
खेलता, दुख का विश्वकप.......
गोलपोस्ट की सीमा पार कर जाता, दुर्निवार
मेरे दोनों पैरों का दुर्धर्ष गोल...
इतना क्या बर्दाश्त किया जा सकता है, जिस यातना के दबाव से
दायाँ-बायाँ, बाएँ-दाएँ में दोनों पैर समाते हुए लगते हैं मुझे
कीचड़मय पृथ्वी के गर्भ में......
दिन और रात, दिन कहते कितने दिन हो गए तुम
आने की बात कहकर भी आए नहीं......
आएंगे-आएंगे कहकर इतने दिन..... इतने दिन हो गए
थक थक कर मायूसी में आँसू से सूखे दो नयन,
बुझ गई हौले हौले स्मृति यादें
दिन और रात-दिन, माह-साल कितने दिन जो हो गए
झुलस-झुलसकर चिताभस्म बना कलेजा मेरा....
दुख फुटबाल होता तो शायद नहीं होते
इतने सारे गले हुए दुख दर्द, ह्रदय खाली कर
खेलता, दुख का विश्वकप.......
गोलपोस्ट की सीमा पार कर जाता, दर्निवार
मेरे दोनों पैरों का दुर्धर्ष गोल.......

गुरुवार, 20 मार्च 2008

पत्रकारिता शिक्षा का सच

हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान में डा. हेमंत जोशी का पत्रकारिता शिक्षा पर एक यथार्थपरक विश्लेषण प्रकाशित हुआ है। इस विश्लेषण में उन्होंने बिल्कुल सही लिखा है कि पत्रकारिता आज पलक झपकते ही लोगों को ख्याति, पैसा और हैसियत बनाने की सबसे उत्तम सीढ़ी बन गई है। डा. जोशी ने पत्रकारिता पेशे में जाने वाले कई युवक-युवतियां का उदाहरण देते हुए लिखते हैं कि वे देश-दुनिया के बारे में जानना तो दूर, सामान्य ज्ञान में भी कमजोर होते हैं। डा. जोशी का कहना है कि पत्रकारिता के पेशे के प्रति युवा पीढ़ी के इस आकर्षण का यह परिणाम हुआ है कि अनेक विश्वविद्यालयों ने आवश्यक सुविधाओं और प्रशिक्षित अध्यापकों के बिना ही पत्रकारिता के पाठ्यक्रम शुरु कर दिए। कई ऐसे लोग, जिनके पास पूँजी थी या जगह थी या मीडिया में थोड़ी-बहुत पहुँच थी, वह भी कमर कस के इस मैदान में आ गए और लोगों से अनाप-शनाप फीस ले कर उन्हें पत्रकार या टीवी एंकर बनाने का प्रलोभन देने लगे।

डा. हेमंत जोशी का पत्रकारिता शिक्षा पर किया गया विश्लेषण बिल्कुल सटीक है। जबलपुर सहित पूरे मध्यप्रदेश में वर्तमान में पत्रकारिता शिक्षा के संस्थान, जिस प्रकार कुकरमुत्ते की तरह फैलना शुरु हुए हैं, वह आश्चर्यजनक है। बिना किसी प्रशिक्षित अध्यापकों के जिस प्रकार पत्रकारिता शिक्षा दी जा रही है, वह इस प्रकार के संस्थानों को मान्यता देने वाले विश्वविद्यालयों की ईमानदारी पर भी प्रश्नचिन्ह लगाती है। पत्रकारिता शिक्षा के संस्थान युवक-युवतियों को राजदीप सरदेसाई, विनोद दुआ, पुण्यप्रसून वाजपेयी, बरखा दत्त से लेकर स्थानीय रोल मॉडलों का उदाहरण देते हुए, उनके समकक्ष या उससे अधिक ऊंचाई तक पहुँचाने का प्रलोभन देते हैं। इस प्रकार के प्रलोभन से गांव के साथ-साथ शहर के स्नातक और पोस्ट ग्रेजुएट विद्यार्थी दिग्भर्मित हो जाते हैं।

मुझे याद है कि एम. काम उत्तीर्ण एक सीधे साधे विद्यार्थी को जबलपुर के एक मीडिया स्कूल के संचालक ने सब्ज-बाग दिखा कर पब्लिक रिलेशन्स के कोर्स में एडमिशन करवा दिया। इसके लिए उस विद्यार्थी ने यहां वहां से जुटा कर बड़ी रकम फीस के रुप में दी। आज लगभग चार वर्ष हो रहे हैं, वह विद्यार्थी आज भी सड़कों पर ही घूम रहा है। इस विद्यार्थी ने जब मीडिया स्कूल में एडमिशन लिया, तब वहां कोई भी पोस्ट ग्रेजुएट स्तर में अध्यापन करने वाला अध्यापक नहीं था और न ही आज है। इस प्रकार के तथाकथित मीडिया स्कूल और संस्थान वर्ष भर विद्यार्थियों से लंबी-चौड़ी रकम ले कर पत्रकारिता शिक्षा के नाम पर बहलाते और फुसलाते रहते हैं। साल भर विद्यार्थी भी इस मुगालते में रहता है कि बस कुछ दिन में ही वह एक बड़ा पत्रकार या टीवी जर्नलिस्ट बनने वाला है। जब हकीकत सामने आती है, तब वह सिर्फ पछताता ही है। बैचलर आफ जर्नलिज्म जैसे कोर्स में अध्यापकों का वेतन देने से बचने के लिए पूरा कोर्स साल भर के स्थान पर दो-तीन महीने में खत्म कर दिया जाता है और शेष समय में संस्थान का संचालक स्वयं ही पत्रकारिता का व्यवहारिक व सैद्घांतिक ज्ञान बांटने लगता है।

जबलपुर में आजकल टीवी के साथ-साथ रेडियो जॉकी के फर्जी कोर्स का धंधा भी पनपना शुरु हो गया है। इन कोर्स के लिए नौजवानों के साथ अधेड़ भी रुचि लेने लगे हैं। एफएम के इस दौर में प्रत्येक व्यक्ति को महसूस होने लगा है कि उसमें शायद एक अच्छे रेडियो जॉकी या एनाउंसर बनने की क्षमता है। लोगों के इसी भ्रम का फायदा उठा कर जबलपुर के मीडिया स्कूल और संस्थान एक-दो महीने के क्रेश कोर्स संचालित कर रहे हैं। इसी प्रकार के एक मीडिया स्कूल में जाने पर मैंने देखा कि वहां अधिकांश संख्या अधेड़ महिलाओं की थी, जो कि रेडियो जॉकी बनने की तमन्ना से क्रेश कोर्स कर रही थीं। उनके अलावा अन्य विद्यार्थी 'स' और 'श' का उच्चारण में फर्क नहीं कर पा रहे थे। मुन्ना भाई में रेडियो जॉकी की भूमिका निभाने वाली विद्या बालन की "गुड मार्निंग मुंबई" की तर्ज पर "गुड मार्निंग जबलपुर" की लाइनों को दोहरा कर सबको इस बात की अनुभूति करवाई जा रही थी कि वे ही जबलपुर की विद्या बालन हैं। सभी विद्यार्थी अपनी टेप की गई आवाज सुन-सुन कर खुश हो रहे थे।

दरअसल मीडिया स्कूल और संस्थानों में इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर कृछ नहीं रहता है। एक अलमारी में 10-20 किताबें रख कर विद्यार्थियों को इस भ्रम में रखा जाता है कि उन्हें किताबें खरीदने की जरूरत नहीं होगी। परीक्षाओं के समय विद्यार्थियों को जब पुस्तकें नहीं मिलती है, तब उन्हें पत्रकारिता शिक्षा का सच समझ में आता है।

इस संबंध में वर्षों से विश्वविद्यालय में संचालित होने वाले पत्रकारिता विभागों की स्थिति कुछ अच्छी नहीं हैं। यहां अध्यापन करने वाले शिक्षक स्वयं भ्रम के शिकार हैं। उन्हें पत्रकारिता की नई प्रवृत्तियों की जानकारी नहीं है। किताबी ज्ञान तो बांट दिया जाता है, लेकिन व्यवहारिक शिक्षा देने में विश्वविद्यालय के अधिकांश अध्यापक असफल रहते हैं, क्योंकि उनका स्वयं का व्यवहारिक अनुभव शून्य ही रहता है। पत्रकारिता शिक्षा के संबंध में यह बात भी महसूस की गई है कि अध्यापक पत्रकारिता के व्यवहारिक पक्ष को समझा नहीं पाते हैं और वहीं प्रोफेशनल पत्रकार अपने पेशे का ज्ञान तो दे सकते हैं, लेकिन वे क्लास रूम में एक अच्छे शिक्षक की भूमिका नहीं निभा पाते हैं। इस दृष्टि से पत्रकारिता प्रशिक्षण का मानकीकरण होना चाहिए, जिससे पत्रकारिता शिक्षा और प्रशिक्षण का स्तर तो ऊंचा हो और अच्छी-खासी फीस लेने पर भी नियंत्रण लगे।

सोमवार, 17 मार्च 2008

अंधविश्वास को बढ़ावा देते जबलपुर के समाचार पत्र

जबलपुर के प्रमुख समाचार पत्र अंधविश्वास की घटनाओं को बढ़ावा देने में सबसे आगे रहते हैं। अंधविश्वास की घटनाएं, जिस प्रकार समाचार पत्रों में प्रस्तुत होती हैं, उससे लगता है कि ऐसी घटनाओं पर वे प्रहार नहीं कर रहे हैं, बल्कि उसे अतिरंजित कर उभार रहे हैं। 16 मार्च को जबलपुर के तीन प्रमुख समाचार पत्रों में जिस प्रकार तथाकथित देव बप्पा बाबा द्वारा रोगियों के सिर पर पत्थर रखकर इलाज करने की खबर को प्रस्तुत किया गया, वह सिर्फ अंधविश्वास को ही बढ़ावा देती है। इसी खबर में बाबा के इलाज कार्यक्रम में जबलपुर निवासी विधानसभा अध्यक्ष, एक मंत्री और कलेक्टर की सपरिवार मौजूदगी की बात भी अचरज पैदा करती है। कलेक्टर की पत्नी सरकारी डाक्टर हैं और वे श्रद्धापूर्वक बाबा को पत्थर से इलाज करते देख रही थीं। एक समाचार पत्र में तो यह भी छपा कि विधानसभा अध्यक्ष ने बकायदा बाबा से अपना इलाज कराया। जिस क्षेत्र में बाबा इलाज कर रहे थे, उस क्षेत्र का पुलिस थाना पूरी तरह खाली था, क्योंकि सभी पुलिस वाले बाबा से इलाज करवाने गए थे। समाचार पत्रों में इस प्रकार की प्रस्तुतिकरण आम जन मानस में अंधविश्वास की गहरी पैठ और तर्कहीन बातों का भरोसा जमाती है। भला जब विधानसभा अध्यक्ष, मंत्री और कलेक्टर साहब वहां बैठे हैं, तो आम लोगों को तो भरोसा होगा ही ! क्या प्रशासन अभी तक भर्रा की बात भूला नहीं है ?

जबलपुर के निकट 6 सितंबर 2007 को भर्रा गांव में इसी प्रकार एक तथाकथित बाबा के झाड़-फूंक कार्यक्रम में भगदड़ से 61 लोग गंभीर रुप से घायल हुए थे और 13 लोग मर गए थे। तब भी ऐसे आयोजन में प्रशासन के सहयोग की बात सामने आई थी। चौंकाने वाली बात यह है कि जनाक्रोश के चलते बाबा के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया गया, लेकिन बाबा को पुलिस थाने में वीआईपी ट्रीटमेंट दिया गया।

मुझे याद है कि कुछ वर्ष जबलपुर के सर्वाधिक प्रसार संख्या वाले एक समाचार पत्र ने एक छोटी लड़की द्वारा भविष्यवाणी करने के समाचार प्रकाशित करने का सिलसिला शुरु किया था। समाचार पत्र में समाचार छापने से उस लड़की के परिवार के लोग खूब खुश थे। इसे वे भगवान का आशीर्वाद मानते थे। परिवार में उस लड़की को दूसरे बच्चों से अलग ट्रीटमेंट मिलने लगा। इससे परिवार में विसंगति भी आई। अब यही लड़की बड़ी हो गई है। इसके पिता अब समाचार पत्रों में जा कर उसकी भविष्यकर्त्ता की मार्केटिंग करने लगे हैं, लेकिन अब पहला जैसा रिस्पांस नहीं है, क्योंकि लड़की बड़ी हो गई है। इसमें अचरज वाली बात कुछ भी नहीं है। अखबार लीक से हटकर समाचार छापने में विश्वास रखते हैं। अब वह सामान्य लोगों की तरह भविष्यवाणी कर रही है, तो इसमें नया क्या है। शायद इस बात को लड़की का पिता समझ नहीं पा रहा है।

इसी तरह जबलपुर के समाचार पत्रों में पहले लौकी या कद्दू में भगवान की छवि उभरने के समाचार प्रमुखता से प्रकाशित होते थे और ऐसे समाचार नि:संदेह अंधविश्वास की भावना को ही पुख्ता करते थे। वर्तमान में सभी अखबारों में धर्म खासतौर से तथाकथित बाबाओं की समाचार प्रकाशित करने की होड़ लगी हुई है। पूरा का पूरा पृष्ठ धर्म और बाबाओं पर समर्पित है। समाचार पत्र जबलपुर के विकास की बात तो करते हैं, लेकिन विकास की खबरें कहां हैं ?

रविवार, 16 मार्च 2008

चित्रकार सैयद हैदर रजा के दिल में बसी है मातृभूमि



1950 में भारत छोड़ चुके प्रसिद्घ चित्रकार सैयद हैदर रजा पिछले दिनों जबलपुर के नजदीक नरसिंहपुर में स्थित बबरिया-बचई में चुपचाप पहुंचे। बबरिया-बचई में उन्होंने बचपन के दिन गुजारे थे। मातृभूमि में आते ही रजा ने सड़क के किनारे पत्थर पर बैठकर धूल उठाकर सिर-माथे पर लगा ली, चूम ली और सूटबूट में जमीन में ऐसे लोटपोट हो गए, जैसे कोई बच्चा अपनी मां से लिपट रहा हो। रजा 1950 से पेरिस में रह रहे हैं। उस समय वहां मौजूद पत्रकार बृजेश शर्मा बताते हैं कि अपनी मातृभूमि में पहुंचकर रजा विशद्घ नरसिंहपुरी दिख रहे थे।
सैयद हैदर रजा के लिए गांव के लोगों ने कुर्सी लगाई, लेकिन उन्होंने सड़क के किनारे एक धूल से सने पत्थर पर बैठना पसंद किया। अपनी मातृभूमि पहुंच कर वे बैचेन हो गए और उस स्कूल पहुंच गए, जहां उन्होंने आज से लगभग 75-80 साल पहले पढ़ाई के दिन गुजारे थे। गांव में आकर उन्होंने भावना को इन शब्दों में व्यक्त किया-


"मेरे लिए अपनी जन्भूमि बबरिया को फिर देखना, इस माटी को फिर छूना कितना सुंदर और सुखद अनुभव रहा। सचमुच आप से मिलकर, आपके सुंदर घर देखकर जो आनंद हुआ, उसे शब्दों में व्यक्त करना बहुत कठिन है। बचई और बबरिया में बिताए दो दिन अनोखी अनुभूति बन गए हैं।"


रजा अपने सहपाठी लल्लू राजपूत के यहां से पेरिस तुलसी की पत्ती ले गए थे। उन स्मृतियों को याद करते हुए कहते हैं-


"आपकी आंगन में लगी हुई तुलसी के पांव पत्तों को संभालकर पेरिस लाया हुं। ये मेरे स्टूडियो में, जहां चित्र बनाता हूं सजी-बसी हैं। मेरे मन में बार-बार याद आती हैं- ये स्मृतियां, गांव के दृश्य, साफ सुंदर मकान, आम, इमली और बिही के पेड़, बच्चों की प्यारी सूरतें।"


रजा अपनी मातृभूमि को देश में कला का एक महत्वपूर्ण केन्द्र बनाना चाहते हैं। आज भी गांव के पत्थर और पुरानी लावारिस पड़ी खंडित मूर्तियां सैयद हैदर रजा के लिए बेहतर चित्र बनाने के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं।


शनिवार, 15 मार्च 2008

समुदाय और समाज में बंटते महिलाओं के क्लब


जबलपुर में आजकल महिलाओं के नए क्लब खूब बनते जा रहे हैं। रोज अखबारों में एक नए क्लब बनने की खबर छपती है। छपे भी भला क्यों नहीं। जबलपुर के तीन प्रमुख समाचार पत्रों ने समाज के विभिन्न वर्गों को अपने से जोड़ने के लिए अलग से सिटी पुल आउट निकालना शुरु किया है। इनमें फोकस महिलाएं और युवा हैं। महिलाएं और युवा हैं, तो फैशन, खानपान की खबरों पर तो जोर रहेगा ही। सर्कुलेशन बढ़ाने का हक प्रत्येक अखबार को है। इसका लाभ सबसे अधिक महिलाओं और कॉलेज के विद्यार्थियों को मिल रहा है। शिक्षा पत्रकारिता का मूल उद्देश्य भटक गया है। कॉलेज की सोशल गेदरिंग, फैशन शो, पश्चिम की तर्ज पर रोज विभिन्न दिवसों पर युवा वर्ग की प्रतिक्रिया ही अखबार के पन्नों में पढ़ने को मिल रही हैं। समाज के विभिन्न वर्ग की महिलाओं की आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता की खबरें सामुदायिक व सामाजिक क्लबों की गतिविधियों में खो गई है।

जबलपुर में समुदाय में बंट रहे महिला क्लब एक खतरनाक प्रवृत्ति को उभारते हैं। अभी तक महिला क्लब मोहल्लों की परिधि में ही थे, लेकिन अब ये ब्राम्हण, अग्रवाल, कायस्थ, मरवाड़ी, जैन, मराठी, छत्तीसगढ़ी, गुजराती, सिंधी, पंजाबी में बंटते जा रहे हैं। हम समाज में चाहे जितनी प्रगतिशीलता की बात कर लें, परन्तु जातिगत व संकीर्णता की भावना सब पर हावी है। चाहे वे पुरूष हों या महिलाएं। बात जाति तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें भी उपजाति वर्गीकरण तक पहुंच गया है। ब्राम्हणों में सनाढ़्य, कान्यकुब्ज, गौर में विभक्त होकर महिलाएं अपने क्लब बनाकर बैठकें कर रही हैं।मारवाड़ी, राजस्थानियों और स्थानीय में बंट गए हैं।

बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। ऐसे क्लबों की पदाधिकारियों ने अपनी संस्थाओं से पचास वर्ष से ऊपर की महिलाओं के लिए प्रवेश निषिद्घ कर दिया है। सीनियर सिटीजन के लिए एकता कपूर तक के सीरियल पैरवी कर रहे हैं। इससे किसी को फर्क नहीं पड़ता। उनको भी नहीं पड़ता, जिन्होंने समाज में महिलाओं का नेतृत्व संभालने का ठेका ले रखा है।

शुक्रवार, 14 मार्च 2008

क्योंकि रावण मुस्करा रहा है

ओलंपिक क्वालीफाईंग हॉकी प्रतियोगिता में भारत की पराजय के पश्चात खेलों को लेकर पूरे देश में अपने-अपने तरीके से विश्लेषण किए जा रहे हैं। कोई स्कूली शिक्षा को दोष दे रहा है, तो कोई बुनियादी सुविधाओं को इसके लिए जिम्मेदार मान रहा है। मुझे लगता है कि सबसे बड़ी समस्या खेल मैदानों की है। सभी बच्चे खेलना चाहते हैं, लेकिन खेलें कहाँ ? बच्चों के खेलने के लिए जबलपुर में जगह बची नहीं है। जो बच्चे खेलकूद रहे हैं, वे दुनिया के सबसे खुशकिस्मत बच्चे हैं। जो बच्चे खेल नहीं पाते हैं, इसके पीछे के कारणों को इंगित कर यह कविता प्रस्तुत है-

बारिश खत्म, दशहरे की छुट्टियां, बच्चों में उमंग है
धर्म की पताका फहराने की तैयारी है
रावण मुस्करा कर देख रहा
खेल के मैदान में सचिन-सौरव को खिलते हुए।


हर बच्चे का सपना है
देश के खिलाड़ी बनने का
राम-सीता की दुहाई है,
परम्परा है
खेल के मैदान में ही जलता है रावण
यही है खेल के मैदानों का अब दस्तूर
मैदानों से होती है राजनीति
नेताओं के भाषण
धर्मगुरुओं के प्रवचन
आधुनिक मैनेजमेंट गुरुओं के व्याख्यान
फिल्मी सितारों के नाच-गाने
खेल संघों के चुनाव
नुमाइश और मेले
औद्योगीकरण और उन्नति के वायदे
कला और संस्कृति का उत्थान
सिर्फ नहीं होते हैं, तो खेल और उसके आयोजन
क्योंकि रावण खड़ा मुस्करा रहा है
खेल के मैदान में।


रावण भी जानता है
खेल के मैदान में क्या होना चाहिए
क्या नहीं होना चाहिए
सबसे बड़ी दिक्कत है,
रावण ही हमको
खेलते हुए देखना नहीं चाहता
मजबूरन कोर्ट-कचहरी
खेल के मैदान में खेल क्यों नहीं ?
विश्व विजेता बनने का सपना
भरभरा जाता है
क्योंकि अदालत में भी रावण मुस्करा रहा है।

गुरुवार, 13 मार्च 2008

हॉकी में भारत की पराजय बनाम जबलपुर


ओलंपिक क्वालिफाईंग प्रतियोगिता में ब्रिटेन से पराजित से होकर भारत 80 वर्षों में पहली बार ओलंपिक में खेलने से वंचित हो गया। पूरा देश इस घटना से दुखी है। मीडिया देश के हाकी के कर्णधारों पर बरस रहा है। इंडियन हाकी संघ के अध्यक्ष केपीएस गिल निशाने पर हैं। दरअसल गिल तो सिर्फ एक उदाहरण हैं। देश भर के खेल संघों में बड़े अधिकारी और राजनेता जिस ढंग से काबिज हैं वह हमारे देश में ही संभव है। जबलपुर भी देश से अलग नहीं है। जबलपुर कभी मध्यप्रदेश की खेलधानी के रूप प्रसिद्व रहा है, लेकिन आज स्थिति बदल गई है। खेल संघों पर बड़े अफसर या राजनेता या पूंजीपतियों का नियंत्रण है। खेल के मैदान बचे नहीं हैं। मैदानों पर व्यवसायिक कॉम्पलेक्स या अपार्टमेंट बन गए हैं। एकमात्र स्टेडियम में खेल के अलावा सब कुछ हो रहा है। दशहरा मनाया जा रहा है, रावण जल रहा है, मोबाइल कंपनी द्वारा प्रायोजित गीत-संगीत के कार्यक्रम हो रहे हैं, धर्मगुरूओं के प्रवचन हो रहे हैं। सुना है अब 26-27 मार्च को मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी स्टेडियम में अपना राष्ट्रीय अधिवेशन करने जा रही है। और इन सबके बीच जबलपुर में सिर्फ खेल ही नहीं हो रहा है।
वहीं दूसरी ओर जबलपुर के रानीताल में जोर शोर से स्पोटर्स कॉम्पलेक्स बनाने की बात की गई थी, लेकिन यहां तो हाल और बुरा है। तालाब में बनाया गया साइकिल बेलोड्रम धसक गया है। सालों से क्रिकेट की टर्फ विकेट बन रही है। मेटिंग पर क्रिकेट चल रही है। जबलपुर की क्रिकेट का कथित उत्थान करने वालों ने ऐसा पेवेलियन बनवा दिया, जिसके ड्रेसिंग रूम से पिच ही नहीं दिखती है। इसी खेल कॉम्पलेक्स में दो वर्ष पहले तथाकथित राष्ट्रवादियों ने एक नाटक भी मंचित करवाया था। मध्यप्रदेश के छोटे-छोटे शहरों में रणजी ट्राफी के मैच हो रहे हैं, लेकिन जबलपुर के नवोदित खिलाड़ी अपने शहर में रणजी ट्राफी देखने के लिए तरस रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच के आयोजन की बात तो छोड़िए।
अब हॉकी की बात- एक समय भारत में जबलपुर की हॉकी का लोहा माना जाता था। जबलपुर के क्लब और विश्वविद्यालय की टीम देश भर की नामी प्रतियोगिताओं में अच्छा प्रदर्शन करती थीं। वर्तमान में प्रतिस्पर्धात्मक हॉकी देखने को नहीं मिल रही है। स्थानीय स्तर की प्रतियोगिताएं वर्षों से बंद हैं। हॉकी संघ के कर्णधारों को गिरते स्तर से कोई सरोकार नहीं है। वे सिर्फ पद का सरोकार रखना चाहते हैं और दफ्तर में बैठकर दूध पीते रहते हैं। राष्ट्रीय प्रतियोगिता में मध्यप्रदेश क्वार्टर फाइनल तक पहुंच नहीं पा रही है। हॉकी का गढ एक अदद एस्ट्रो टर्फ के लिए तरस रहा है। सिवनी, बैतूल जैसे छोटे शहरों में एस्ट्रो टर्फ लग गई है या लगने वाली है, लेकिन जबलपुर अभी तक आश्वासन के बीच उलझा हुआ है।
जबलपुर में लगभग इसी तरह सभी खेलों का हाल बुरा है। पूरी दुनिया कुश्ती गद्दे पर लड़ रही है, लेकिन कुश्ती के ठेकेदार अखाड़ों का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं और कुश्ती को रसातल में ले जा रहे हैं। वालीबॉल, बॉस्केटबाल में भी कोई संभावना नहीं दिख रही है। वुशू में बच्चे आगे आते दिखे, लेकिन एसोसिएशन के सचिव की संदिग्ध गतिविधियों से अभिभावक बच्चों को खेल के मैदान में भेजने से डरने लगे। फुटबाल में एक समय जबलपुर विश्वविद्यालय ने कलकत्ता विश्वविद्यालय को पराजित कर पूरे देश को अपना मुरीद बना लिया था। यहां के क्लबों की तूती बोलती थी।
दरअसल जबलपुर में खेलों के हित के संबंध में सोचने वाले लोग बचे नहीं हैं। मध्यप्रदेश खेल परिषद में बाबूलाल पाराशर जैसे लोग जबलपुर की दावेदारी मजबूती से रखते थे और उनकी बात को गंभीरता से सुना जाता था। विक्रम अवार्ड की सूची में जबलपुर का नाम भरा रहता था। राजनैतिक रूप से जबलपुर के किसी भी सांसद या विधायक ने खेलों के विकास की बात नहीं की। ऐसे लोग खेल आयोजन में सिर्फ उदघाटन या पुरस्कार बांटने ही जाते हैं। राकेश सिंह ने अवश्य सांसद का चुनाव लड़ते समय खेल खासतौर से जबलपुर में खेलों के विकास की बात की थी। उनके चुनाव घोषणा पत्र में खेलों को एक प्रमुख मुद्दा बनाया गया था, लेकिन पांच साल बीतने को है, उनका ध्यान अभी तक इस ओर नहीं गया है। रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार की तरह खेलकूद चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनता ?

रविवार, 9 मार्च 2008

बावन तालों का सुन्दर नगर

देखो देखो जबलपुर शहर देखो।
बावन तालों का सुन्दर नगर देखो।

यहां का गुरन्दी बाज़ार मस्त है।
वर्ल्ड फेमस यहां धुआंधार मस्त है।
गढा फाटक, कमानिया का द्वार मस्त है।
नर्मदा पुण्य सलिला कछार मस्त है।
चमचमाता यहां का सदर देखो।
है महाकौशल की आत्मा इधर देखो।
देखो देखो जबलपुर शहर देखो।
बावन तालों का सुन्दर नगर देखो।

मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा गिरिजाघर है यहां।
दूध जैसे संगमरमर है यहां।
संस्कारों में डूबी सहर है यहां।
प्यार सद्भाव की हर डगर है यहां।
महापुरुषों की भूमि अमर देखो।
रानी दुर्गावती का यह घर देखो।
देखो देखो जबलपुर शहर देखो।
बावन तालों का सुन्दर नगर देखो।

गुरुवार, 6 मार्च 2008

राजेश दुबे के कार्टून






राजेश दुबे ने अपने कार्टूनों के जरिए जबलपुर के समाचार पत्रों में कार्टून विधा को एक नया आयाम दिया है। राजेश ने अपनी शुरुआत नवभारत से की और इसके बाद वे दैनिक भास्कर में रहते हुए छह महीने पहले नई दुनिया में आ गए। नई दुनिया में उन्होंने सम सामायिक विषयों पर जिस प्रकार टिप्पणी की हैं, वह आशा बंधाती है कि वे जल्द ही राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने लगेंगे। प्रादेशिक स्तर पर तो उनकी पहचान पहले ही बन चुकी है। उनके कार्टून खासतौर से हरिशंकर परसाईं की सूक्तियों पर उनके व्यंग्य चित्रों की सीरीज काफी ख्याति अर्जित कर चुकी है। राजेश दुबे की टिप्पणियों के साथ उनके स्केच भी आकर्षित हैं। उनका हास्य बोध (सेंस आफ हयूमर) बहुत अच्छा है।
राजेश दुबे कहते हैं कि उन्होंने छह महीने में जितना काम नई दुनिया में किया है, उतना जिंदगी भर में नहीं किया है। इसके लिए वे नई दुनिया के संपादक राजीव मित्तल को पूरा श्रेय देते हैं। राजेश अपने अनुभव के आधार पर कहते हैं कि नई दुनिया में उन्हें जितना प्रोत्साहन मिला, उतना कहीं नहीं मिला। वे कहते हैं कि पहले उनके कार्टून सिर्फ जगह भरने के लिए होते थे। जिस दिन बड़ी खबरें न हो, उस दिन तीन-तीन कालम के कार्टून बनाने को कहा जाता था। राजेश मानते हैं कि अखबार में जब तक संपादकीय सहयोग न मिले, तब तक कार्टूनिस्ट का सफल होना संभव नहीं है। इस संबंध में उनका कहना है कि नई दुनिया में आठ-आठ कालम की कार्टून पटटी, जिस प्रकार कई बार प्रकाशित की गई है, उससे दूसरे समाचार पत्रों में भी प्रतिस्पर्धा पनपी है। वे भी अखबार में कार्टूनों को प्रमुखता देने लगे हैं। इससे प्रोफेशनेलिज्म भी आया है। अब कार्टूनिस्ट को काम करने के लिए कंप्यूटर भी मिलने लगे हैं और काम करने का पैसा भी।

अवधेश बाजपेयी की चित्रकला में डाट‍िज़्म की अद्भुत अवधारणा

अवधेश बाजपेयी जब चार-पांच वर्ष आयु के थे , उस समय वे गांव में घर में मां के साथ अन्य महिलाओं के साथ बैठे हुए थे। दोपहर बाद के समय में बड...