गुरुवार, 30 जून 2022

‘’और सुकरात चला गया’’ : रजनीश ने आज से 52 वर्ष पहले जबलपुर को कहा था अलविदा

आचार्य रजनीश ने आज से ठीक 52 वर्ष पूर्व 30 जून 1970 को जबलपुर को अलविदा कहा था। जब वे जबलपुर छोड़ कर बंबई जा रहे थे, तब उन्होंने जबलपुर की तारीफ करते हुए कहा था कि वे यहीं पनपे हैं, यहां पढ़े हैं, यहीं बढ़े हैं। उन्होंने कहा था कि पेड़ जितना ऊंचा चले जाएं, आसमान छूने लगे लेकिन जड़ें तो उसकी ज़मीन में रहती हैं। जबलपुर में मेरी जड़ें हैं, इसलिए इस शहर में आता रहूंगा। इसके बाद वे जो जबलपुर से गए तो फिर कभी यहां नहीं लौटै। रजनीश का वक्तव्य वर्ष 1970 को उनके जबलपुर छोड़ने से दो दिन पूर्व यानी 28 जून का था। रजनीश के जबलपुर को अलविदा कहने पर नवभारत अखबार ने अच्छी व सटीक हेड‍िंग लगाई थी-‘’और सुकरात चला गया।‘’  

28 जून 1970 को जबलपुर के शहीद स्मारक में रजनीश को विदाई देने के लिए एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में जबलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति डा. राजबली पांडे उपस्थि‍त थे। डा. राजबली पांडे ने अपने संक्ष‍िप्त भाषण में कहा-‘’पूरी सभ्यता आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जिस आप यानी की रजनीश एक नया स्वरूप देना चाहते हैं। यद्यपि आप जबलपुर से जा रहे हैं पर आप ने जो प्रेरणा, जो प्रेम हम सभी को दिया है वह हमें सदा स्मरण रहेगा। आप का जन्म पूरी मानवता के लिए हुआ है इसलिए आप का व्यक्त‍ित्व किसी भौगोलिक सीमा के बंधन में भी नहीं रह सकता। आप कृपया विदा होते समय हम सभी को वह संदेश दें जिससे प्रेरणा ले कर हम नई राह तलाश सकें।‘’

जब लोगों से शांत होने की अपील की लेकिन असर नहीं हुआ-रजनीश ने जब जबलपुर को अलविदा कहा तब वे एक सामान्य व्यक्त‍ि ही थे। गढ़ा रोड पर कमला नेहरू नगर में डा. हर्षें के नजदीक लाल बंगले में किराए से रहते थे। लोगों को वे खादी भंडार में खादी खरीदते मिल जाते तो महावीर वाचनालय में प्रवचन देते हुए भी। जबलपुर के आसपास वे आयोजकों की कार से प्रवचन या व्याख्यान देने जाते थे। जबलपुर में तरण तारण जयंती में भी वे शामिल होते थे। इस आयोजन में भी वे व्याख्यान देते थे। वर्ष 1970 के पहले ही बंबई के फिल्म इंडस्ट्री के कुछ लोग रजनीश के सम्पर्क में आने लगे थे। जबलपुर में महेन्द्र कपूर नाइट का आयोजन रजनीश के बंबई सम्पर्क के कारण संभव हुआ था। राइट टाउन स्टेडियम के एक कोने पवेलियन की तरफ महेन्द्र कपूर नाइट को देखने गए कुछ लोगों ने जानकारी दी कि शुरूआत में तो महेन्द्र कपूर की गायन प्रस्तुति का सिलसिला ठीक चलता रहा, लेकिन ‘’ एक तारा बोले तुन तुन क्या कहे ये तुमसे सुन सुन’’ जैसे ही गीत शुरू हुआ कार्यक्रम स्थल पर बमचक मच गई। उपद्रव शुरू हो गया, कुर्स‍ियां फ‍िंकने लगीं और भगदड़ मच गई। रजनीश को सामने आना पड़ा। उन्होंने लोगों से शांत होने की अपील की। रजनीश का व्याख्यान या प्रवचन सुनने वाले ज़रूर मंत्रमुग्ध हो जाते थे, लेकिन यहां कोई असर नहीं हुआ।

अनुयायीवाद पर किया था कड़ा प्रहार-रजनीश के व्याख्यान शहीद स्मारक में सप्ताह में एक या दो बार होने लगे थे। रजनीश के भाई अरविंद जीवन जाग्रति केन्द्र की ओर से रजनीश के व्याख्यान का आयोजन श्रीनाथ तलैया स्थि‍त आर्य समाज मंदिर में प्रति मंगलवार को करते थे। रजनीश के अंग्रेजी में दिए गए व्याख्यानों का आयोजन स‍िविल लाइंस स्थि‍त लियोनार्ड थ‍ियोलॉजिकल कॉलेज में भी हुए हैं। जबलपुर में प्रेम और विवाह’, ‘गांधी के ऊपर पुनर्विचारकार्ल मार्क्स व बुद्धविषय पर केन्द्र‍ित उनके व्याख्यान काफ़ी चर्चित व विवादास्पद रहे। रजनीश निडर व बेखौफ व्यक्त‍ि थे। उन्होंने इन व्याख्यानों में अनुयायियों पर कड़ा प्रहार किया था। रजनीश ने कहा था कि जिस प्रकार अनुयायी महापुरूषों को ऊपर उठाते हैं और वहीं अनुयायी उन्हें पतन की गर्त में गिरा देते हैं। रजनीश अनुयायीवाद के खि‍लाफ थे। इस विषय पर उनकी एक कविता अच्छी व महत्वपूर्ण है। जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज और एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग कॉलेज के विद्यार्थी उनके मुरीद थे। उनके व्याख्यान के पहले केएल सहगल की आवाज वाले एक व्यक्त‍ि भजन व गीत गाते थे। व्याख्यान की शुरूआत रजनीश ‘’मेरे प्रिय आत्मन’’ से करते और ‘’आप सब के हृदय में बैठे प्रभु को मेरा प्रणाम’’ से खत्म करते थे। व्याख्यान के बाद रजनीश शहीद स्मारक के बाहर खड़े हो जाते और लोगों से काफ़ी देर तक बात करते रहते थे।

नहीं बोल पाते थे-रजनीश के भाषणों में कई बार इंसान खो गया है’, ‘हमारे भीतर की लालटेन बुझ गई है’ ‘इसके सौ कारण हैं पर मुख्य कारण यह हैजैसे वाक्य प्राय: आते थे। कुछ अंग्रेजी के शब्द भी उनके भाषण में आते थे। तब वे नहीं बोल पाते थे। शेक्सपियर को सेक्सपियर बोलते। ज़का उच्चारण उनके लिए असंभव था। बोलते समय भाषण में उनकी आंखें बंद हो जाती थीं और लगता वे शून्य को संबोध‍ित कर रहे हों। बोलते वक्त वे लम्बे लम्बे ठहराव (पॉस) लेते थे। रजनीश ने प्लेटो, अरस्तू, कनफ्यूश‍ियस, ग्रीन, शंकर, अरविंदो, रसेल, बुद्ध, मार्क्स को बारीकी से पढ़ा था। उनके व्याख्यान में छोटे-छोटे वाक्य, उदाहरण, लतीफे, रोचक प्रसंग, आरोह‍ अवरोह, लयात्मकता, क्रांतिकारिता का आभास दिलाने वाली भाषा का जीवन दर्शन रहता था। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ रहा था। उनकी व‍िश‍िष्टता स्वीकृत हो रही थी, वे असामान्य दिखने लगे थे और दिखाने भी लगे थे। जो असामान्य है, साधारण से हट कर है, वहीं उन्हें प्रिय था। व्याख्यान के दौरान रजनीश कहते थे कि लोग उनकी बात को इसलिए समझ नहीं पाएंगे क्योंकि पच्चीसवीं शताब्दी के हैं। वे पैदाइशी भगवान नहीं थे लेकिन वे धीरे धीरे आचार्य से भगवान की ओर बढ़ रहे थे। उन्होंने आस्था को मज़ा में बदल दिया था।

दो विरोधाभासी विचारक एक मोहल्ला-जबलपुर के दो विचारक जो विरोधाभासी भी और अपने विचारों में चरम हैं, वे एक ही मोहल्ले में रहते थे। रजनीश नेपियर टाउन में शास्त्री ब्रिज मार्ग के एक तरफ और हरिशंकर परसाई दूसरी ओर रहते थे। दोनों समकालीन विचारक आपस में मिलते जुलते रहते थे। रजनीश ने एक बार परसाई का हवाला देते हुए कहा था कि हमारे शहर के मशहूर व्यंग्यकार हैं ने उनको (रजनीश) को फ्रॉड की सूची में नंबर एक पर रखा है। यदि वे मुझे दूसरे या तीसरे नंबर पर रखते तो मुझे बहुत दुख होता। परसाई ने उस दौरान अपने एक व्यंग्य में लिखा था कि दुनिया में तीन फ्रॉड हैं- रजनीश, महेश योगी और स्वयं परसाई। रजनीश जबलपुर में वर्ष 1959 से 61 तक भालदारपुरा में, छह माह देवताल-गुप्तेश्वर में और वर्ष 1961 से 68 तक नेपियर टाउन में देवकीनंदन जी के घर में रहे और उसके बाद गढ़ा रोड में कमला नेहरू नगर में डा. हर्षे के बंगले के बगल में लाल बंगले में रहने आ गए थे।

रजनीश तीन बाबाओं से हुए प्रभावित-रजनीश जबलपुर के मग्गा बाबा, पागल बाबा और मस्ता बाबा से प्रभावित रहे। मग्गा बाबा तुलाराम चौक पर नीम के पेड़ के नीचे पड़े रहते थे। मग्गा बाबा का रूप रंग एकदम काला था। मग्गा बाबा को जबलपुर के रिक्शे वाले मुफ्त में यहां वहां घुमाते रहते थे।     

रजनीश ने युक्रांत पत्रि‍का निकाली थी-जीवन जाग्रति केन्द्र में रजनीश को भीखम चंद जैन, अजित कुमार, डा. बिजलानी, अरूण जक्सी, भाई मेडीवाला, अरविंद जैन, दत्ता एडवोकेट सक्र‍िय सहयोग देते थे। ये लोग दो-दो रूपए चंदा कर के शहीद स्मारक या अन्य कोई स्थान रजनीश के व्याख्यान के लिए बुक किया करते थे। रजनीश ने जबलपुर में जीवन जाग्रति केन्द्र की ओर से एक पत्रिका युक्रांतका प्रकाशन किया था। वैसे रजनीश जबलपुर में जयहिन्द और नवभारत में पत्रकारिता कर चुके थे। नवभारत में तो वे सब एडीटर के रूप में कार्य कर चुके थे। युक्रांत का संपादन रजनीश के फुफेरे भाई अरविंद कुमार किया करते थे।

शुक्रवार, 24 जून 2022

जबलपुर के महापौर

सात बार के महापौर पंडित भवानी प्रसाद तिवारी जिनकी मुट्ठी में जनचेतना बंद थी 

जबलपुर के सात बार महापौर रहे। इतने सालों तक कोई मेयर नहीं रहा जितने साल पंड‍ित तिवारी रहे। बाद में वे राजसभा के दो बार सदस्य भी रहे। सेठ गोविंददास 1950 से लगातार संसद सदस्य रहे और किसी ने यह नहीं कहा ये नगरी गोविंददास की है, सब ये कहते थे कि ये नगरी पंडित भवानी प्रसाद की है। तिवारी जी की लोकप्रियता उनकी अपनी जीवनशैली के कारण थी। उस समय मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार होते हुए भी जबलपुर नगर निगम व म्युनिसपेलिटी पर सदा ही प्रजा समाजवादी का ही कब्जा रहा और जिसके सिरमौर पंडित भवानी प्रसाद तिवारी रहे। आजादी के बाद जब जबलपुर नगर पालिका का स्तरोन्नयन हो कर उसे नगर निगम का दर्जा मिला तो उसके प्रथम महापौर के पद को भवानी प्रसाद तिवारी ने सुशोभि‍त किया। उस समय नगर निगम में महापौर का चुनाव आज भी भांति पांच वर्ष के लिए और सीधे जनता द्वारा न हो कर प्रतिवर्ष प्रत्यक्ष प्रणाली अर्थात निर्वाचित पार्षदों द्वारा किया जाता था। हर‍िशंकर परसाई का मानना था कि भवानी प्रसाद तिवारी मूल रूप से कवि थे-बल्क‍ि केवल कवि थे, राजनीतिज्ञ नहीं। इसलिए राजनीति भी वे कवि की तरह करते थे और छलछंद, काटछांट, जमाना-पटाना, अवसरवादिता, निर्मम सत्ता संघर्ष कर नहीं पाते थे। परसाई कहते थे कि जन चेतना उनकी मुट्ठी में बंद थी। भवानी प्रसाद तिवारी नगर निगम की कार का व्यक्तिगत उपयोग कभी नहीं करते थे। उस समय मेयर की कार का नंबर MPJ 102 था। मेयर रहते हुए वे जबलपुर में किसी कार्यक्रम में रिक्शे से जाते थे। भवानी प्रसाद तिवारी जबलपुर के संभवतः एकमात्र ऐसे नेता थे जो हिंसक भीड़ को अपने उद्बोधन से नियंत्रित कर लेते थे। एक ऐसा ही वाक्या तिलक भूमि तलैया में हुआ जब एक सभा में भीड़ उत्तेजित व हिंसक हो गई। तब सिटी कोतवाल प्रयाग नारायण शुक्ल भवानी प्रसाद तिवारी को वहां यह अनुरोध कर के ले गए कि वे दो मिनट खड़े हो कर भाषण दे देंगे तो भीड़ शांत भी हो जाएगी और पुलिस का काम हल्का हो जाएगा। तिलक भूमि तलैया पहुंच कर जैसे ही भवानी प्रसाद तिवारी ने भाषण देना शुरू किया भीड़ शांत हो गई और पुलिस का काम बिना लाठी चार्ज किए हो गया। वर्ष 1977 में जब भवानी प्रसाद तिवारी का निधन हुआ तब उनकी शवयात्रा में इतनी भीड़ उमड़ी जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। शहर के जिस व्यक्ति को यह खबर मिली वह शवयात्रा में शामिल हुआ। सबसे ज़रूरी व महत्वपूर्ण बात यह कि भवानी प्रसाद तिवारी के बाद उनके परिवार का कोई सदस्य राजनीति में नहीं आया।


साइकिल पर चलने वाले महापौर रामेश्वर प्रसाद गुरू ने बनवाया था मालवीय चौक


रामेश्वर प्रसाद गुरू की पहचान जबलपुर में साइकिल में चलने वाले महापौर के रूप में रही है। वर्ष 1962 में क्राइस्ट चर्च स्कूल के श‍िक्षक रामेश्वर प्रसाद गुरू जबलपुर के महापौर बने थे। प्रजा समाजवादी पार्टी (पीएसपी) बनाने में रामेश्वर प्रसाद गुरू, भवानी प्रसाद तिवारी, गणेश प्रसाद नायक, सवाईमल जैन की महत्वपूर्ण भूमिका थी। रामेश्वर प्रसाद गुरू व भवानी प्रसाद तिवारी की जोड़ी मिल कर ‘प्रहरी’ अखबार निकलाती थी। उस समय ‘प्रहरी’ में छपी सामग्री को लोग ध्यान से पढ़ते थे। उस समय के लोगों की जानकारी के अनुसार गांव से लोग यह देखने आते थे कि ‘प्रहरी’ के संपादक कौन लोग और वे कैसे दिखते हैं। हर‍िशंकर परसाई ‘प्रहरी’ में नियमित रूप से लिखने वाले कुछ लोगों में से एक थे। रामेश्वर प्रसाद गुरू व भवानी प्रसाद तिवारी के साथ रामानुज लाल श्रीवास्तव ऊंट ने होली को जबलपुर का सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतीक पर्व बनाया था। इन लोगों ने होली का जुलूस शुरू किया था जिसमें साहित्यकार, संस्कृति कर्मी, नेता, व्यवसायी, श‍िक्षक, विद्यार्थी, पत्रकार नाचते-गाते मोहल्लों के नुक्कड़ों पर, चौराहों पर, तिमुहानों पर इकट्ठे होते थे। लोग मिलते जाते, हुरियारों का कारवां बढ़ता जाता। कहीं कोई भदेसपन नहीं, कहीं कोई घटियापन नहीं, कोई लुच्चापन नहीं, मस्ती भरी शालीनता की रेशम की डोरी कभी टूटती नहीं।
परसाई के गद्य गुरू-रामेश्वर प्रसाद गुरू के पिता कामता प्रसाद गुरू थे, जिन्होंने हिन्दी की पहली व्याकरण पुस्तक लिखी थी। इस नाते रामेश्वर प्रसाद गुरू के भीतर साहित्य के बीज थे। उन्होंने कुमार हृदय के नाम से कविताएं भी लिखी थीं। रामेश्वर प्रसाद गुरू को हरिशंकर परसाई का गद्य गुरू भी माना जाता है। परसाई को सीधी व साफ दो टूक भाषा लिखने की प्रेरणा रामेश्वर प्रसाद गुरू ने ही दी थी।   
खोजी पत्रकार-रामेश्वर प्रसाद गुरू इलाहाबाद से प्रकाशि‍त होने वाले अंग्रेजी दैनिक नार्दन इंड‍िया पत्र‍िका के जबलपुर प्रतिनि‍ध‍ि भी थे। रामेश्वर प्रसाद गुरू के प्रिय श‍िष्यों में पत्रकार निर्मल नारद रहे हैं। गुरू जी को खोज या अन्वेक्षण का जुनून था। एक बार गुरू जी व निर्मल नारद दोनों बिलहरी के कब्रिस्तान में यह पता करने के लिए दिन भर घूमते रहे कि यहां सबसे पहले किस अंग्रेज को दफनाया गया था।   
व्यक्त‍िगत कार्य के लिए नगर निगम वाहन का उपयोग नहीं किया-सफेद पजायमा और कुर्ता पहनने वाले गुरू जी क्राइस्ट चर्च स्कूल में अध्यापन करने के दौरान जबलपुर के महापौर चुने गए। सुबह वे दीक्ष‍ितपुरा से स्कूल साइकिल से जाते थे। स्कूल के बाद नगर निगम में महापौर की आसंदी में बैठते थे। लोगों ने उनसे कहा कि उन्हें नगर निगम के चार पहिया वाहन का उपयोग करना चाहिए। रामेश्वर प्रसाद गुरू ने स्पष्ट रूप से इंकार करते हुए कहा कि वे घर से स्कूल या किसी भी व्यक्ति‍गत कार्य के दौरान साइकिल का ही उपयोग करेंगे। हां जब वे महापौर की हैसियत से कहीं भी जाएंगे, तब ही वे नगर निगम की कार का उपयोग करेंगे। नगर निगम वापस आ कर वे साइकिल से घर जाते थे। क्राइस्ट चर्च स्कूल में अध्यापन के दौरान उन्होंने कई मेधावी विद्यार्थ‍ियों को पढ़ाया था, जिसमें एचसीएल के को-फांउडर अजय चौधरी व नामी वकील विवेक तन्खा जैसे व्यक्त‍ित्व शामिल हैं।
जबलपुर का सबसे प्रस‍िद्ध मालवीय चौक बनवाया-रामेश्वर प्रसाद गुरू ने महापौर के रूप में नगर निगम में वित्तीय साधनों की कमी को देखते हुए चंदा जमा कर के सुभद्रा कुमार चौहान की प्रतिमा नगर निगम प्रांगण में स्थापित करवाई थी। उन्होंने महापौर के रूप में मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा लगवा कर मालवीय चौक नामकरण किया था। उनके कार्यकाल में नगर निगम जबलपुर ने कई ग्रंथों का प्रकाशन किया, जो संदर्भ के रूप में आज भी प्रासंगिक व उपयोगी हैं। शहर के श‍िक्षा जगत में उनका अप्रतिम योगदान रहा। उन्होंने ड‍िस्ल‍िवा रतनसी स्कूल की स्थापना की। नगर के मॉडल हाई स्कूल में आज से 62 वर्ष पूर्व तत्कालीन प्राचार्य श‍िव प्रसाद निगम के साथ मिल कर उन्होंने महात्मा गांधी की पुण्यतिथ‍ि 30 जनवरी को मौन दिवस के रूप में मनाने की शुरूआत की थी।

एक रूपए मानदेय लेने वाले महापौर सवाईमल जैन

वर्ष 1947 में जब भवानी प्रसाद तिवारी व रामेश्वर प्रसाद गुरू ने साप्ताहिक अखबार ‘प्रहरी’ निकाला तब उस अखबार के व्यवस्थापक सवाईमल जैन थे। ये सब 35 की उम्र के आसपास के थे। यह अखबार इतना प्रखर व ओजस्वी होता था और सामग्री इतनी सनसनीखेज होती थी कि शनिवार की शाम इसके निकलते ही चौराहों पर चर्चा होने लगती थी। सब जगह ‘प्रहरी’ की चर्चा। तरूणों के लिए यह बहुत प्रेरक था। एक तरह से ‘प्रहरी’ उग्र समाजवादियों का अखबार था। उस दौरान सीमित संसाधनों में सवाईमल जैन व्यवस्थापक के रूप में ‘प्रहरी’ के प्रकाशन में मदद किया करते थे। भवानी प्रसाद तिवारी के साथ मिल कर सवाईमल जैन ने जबलपुर में शैक्षण‍िक व सांस्कृतिक गतिविध‍ियों को विस्तारित किया।
सवाईमल जैन शुरूआत में सराफा बाजार की एक गली के भीतर गली में जैन मंदिर ट्रस्ट का एक बड़ा सा अहाता में मौजूद मकान में रहते थे। यहीं उनके परिवार का प्रतिभा प्रिंटिंग प्रेस छापाखाना था। उनके परिवार द्वारा ही सुषमा साहित्य मंदिर नामक पुस्तक दुकान भी संचालित होती थी, जो जबलपुर के हर पुस्तक प्रेमी के लिए आकर्षण का केन्द्र थी। सवाईमल जैन के परिवार के छापेखाने की प्रिंटिंग मशीन की सहायता से रामनवमी 1963 के दिन जबलपुर समाचार का प्रकाशन मायाराम सुरजन ने प्रारंभ किया था। 
सवाईमल जैन ने सत्रह वर्ष की आयु से स्वतंत्रता संग्राम के सभी आंदालनों में सन् 1930, 1932, 1941 तथा 1942 में सक्रिय भाग लिया। इन आंदोलनों में बढ़ चढ़ भाग लेने से उन्हें कुल साढ़े तीन वर्ष का कारावास भी हुआ। सवाईमल जैन ने नेशनल बॉयस स्काउट्स एसोस‍िएशन संस्था का गठन कर के सत्याग्रह संबंधी अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए। वर्ष 1939 में त्रिपुरी में कांग्रेस के 52 वें अधिवेशन को लाने के लिए जबलपुर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साथ सवाईमल जैन विशेष योगदान था। उन्होंने त्रिपुरी कांग्रेस में किसानों व नवयुवकों का प्रत‍िन‍िध‍ित्व किया। सुभाष चंद्र बोस ने जब राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद त्यागा और फारवर्ड ब्लाक के साथ मंडला रवाना हुए तब उनके साथ जबलपुर से भवानी प्रसाद तिवारी व सवाईमल जैन साथ गए थे। 
देश स्वतंत्र होने के बाद सवाईमल जैन ने समाजवादी दल का गठन किया और नगर निगम चुनाव होने पर बहुमत हासिल किया। वे वर्ष 1952 से 1964 तक जबलपुर नगर निगम में महत्‍वपूर्ण पदों खासतौर से स्थायी समिति के अध्यक्ष रहे। वर्ष 1960 में सवाईमल जैन लगातार दो बार महापौर चुने गए। महापौर चुने जाने के बाद सवाईमल जैन ने निर्णय लिया कि वे मानदेय के रूप में सिर्फ एक रूपए ही लेंगे। उस समय उनके इस कदम की चर्चा पूरे देश में हुई। अपने पूर्ववर्ती की तरह सवाईमल जैन साइकिल से नगर निगम जाया करते थे। भवानी प्रसाद तिवारी की तरह ही सवाईमल जैन ने नगर निगम के वाहन का उपयोग व्यक्त‍िगत या सामाजिक कार्यों के लिए नहीं किया। महापौर के पद रहने के दौरान उनका तत्कालीन नगर निगम आयुक्त से टकराव काफ़ी सुर्ख‍ियों में रहा। सवाईमल जैन नगर निगम की फाइलों को देखने, अध्ययन करने और उनमें हस्ताक्षर आफ‍िस के अलावा घर से करना चाहते थे, लेकिन इस पर तत्कालीन नगर निगम आयुक्त को आपत्त‍ि थी। सवाईमल जैन का तत्कालीन मुख्यमंत्री कैलाश नाथ काटजू से भी एक मुद्दे को ले टकराव हुआ लेकिन अंतत: जीत सवाईमल जैन की ही हुई। सवाईमल जैन के महापौर काल में जबलपुर की सबसे बड़ी रहवासी बस्ती कमला नेहरू नगर का श‍िलान्यास हुआ था।     
सवाईमल जैन इसके बाद वर्ष 1970 के उपचुनाव और वर्ष 1972 के आम चुनाव में जबलपुर पश्च‍िम से विधायक निर्वाचित हुए। मध्यप्रदेश विधानसभा में उनका कुल कार्यकाल दिसंबर 1970 से अप्रैल 1977 तक लगभग सात वर्ष तक का रहा। इस दौरान सवाईमाल जैन मध्यप्रदेश विधानसभा की महत्वपूर्ण समितियों के सदस्य व अध्यक्ष रहे। 10 मार्च 1976 से 30 अप्रैल 1977 तक वे विधानसभा के उपाध्यक्ष रहे।

इंजीनियर और उद्यमी मुलायम चंद्र जैन जब चुने गए महापौर

पिछली शताब्दी के पांचवे व छठे दशक में जबलपुर की प्रजा समाजवादी पार्टी (पीएसपी) में सिर्फ राजनैतिज्ञ, वकील, कवि या शायर ही इसके सक्र‍िय कार्यकर्त्ता नहीं थे, बल्क‍ि इसमें इंजीनियरों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। पीएसपी में सक्र‍िय इंजीनियर मुलायम चंद्र जैन वर्ष 1963 में जबलपुर के महापौर चुने गए। वे जबलपुर के प्रतिष्ठ‍ित उद्यमी व्यवसायी परिवार मुन्नी-बप्पू के प्रतिभाशाली सदस्य थे। मुलायम चंद्र जैन को जबलपुर के लोग इंजीनियर साहब और काका जी के संबोधन से पुकारते थे।   
मुलायम चंद्र जैन ने जबलपुर के मॉडल हाई स्कूल से प्रारंभ‍िक श‍िक्षा ली और आगे की पढाई के लिए नागपुर चले गए। यहां उन्होंने इंटर साइंस तक अध्ययन किया और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय (बीएचयू) चले गए। वर्ष 1943 मे बीएचयू से इंजीनियरिंग स्नातक होने के बाद जबलपुर वापस आए। इंजीनियरिंग पढ़ाई के दौरान मुलायम चंद्र जैन ने जबलपुर की गन केरिज फेक्टरी में प्रेक्ट‍िकल ट्रेनिंग की थी। उस समय वे तत्कालीन सीपी एन्ड बरार (वर्तमान मध्यप्रदेश) के जैन समुदाय के पहले इंजीनियर थे। इस दौरान मुलायम चंद्र जैन बीएचयू में स्वतंत्रता संग्राम के भूमिगत आंदोलन में शामिल हो गए। बीएचयू में मुलायम चंद्र जैन ने ब्रिटिश प्रपार्टी हवाई जहाज को बारूद से उड़ा दिया था। वहां उनके साथ देवदत्त गुप्ता, बलानी जी, राजनारायण जैसे साथी थे। राजनारायण ने इमरजंसी के बाद चुनाव में इंदिरा गांधी को हराया था। मुलायम चंद्र जैन जब जबलपुर लौटे तो जबलपुर पुलिस के पास उनकी गिरफ्तारी का वारंट आ चुका था। मुन्नी-बप्पू परिवार का उस समय जबलपुर में प्रदेश की सबसे बड़ी हाइल मिल थी। इसी आइल मिल के फायर बॉयलर्स में मुलायम चंद्र जैन ने बनारस से लाए सभी समान, कपड़े व कागजों को डाल कर सबूत मिटाने की दृष्ट‍ि से नष्ट कर दिया था। दो दिन बाद जबलपुर पुलिस ने मुलायम चंद्र जैन को गिरफ्तार कर लिया। एक महीने जबलपुर जेल में रखने के बाद उनको बनारस की जेल में स्थानांतरित कर दिया गया। वहां मुलायम चंद्र जैन को जयप्रकाश नारायण व अशोक मेहता का सानिध्य मिला। गांधी जी के प्रयास के बाद अंग्रेज शासन ने स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों को छोड़ा जिसमें मुलायम चंद्र जैन भी शामिल थे। यहीं मुलायम चंद्र जैन समाजवादियों के सम्पर्क में आए और प्रजा समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। 
स्वतंत्रता के बाद जबलपुर में नगर निगम का गठन हुआ। भवानी प्रसाद तिवारी महापौर  बने और मुलायम चंद्र जैन पार्षद निर्वाचित हुए। उन्होंने पार्षद रहते हुए भी स्थायी समिति को अप्रत्यक्ष रूप से संभाले रखा। नगर विकास की योजना बनाई और उनको क्र‍ियान्वित करने के रास्ते निकाले। एक इंजीनियर होने के नाते मुलायम चंद्र जैन नियोजित विकास की योजना बनाते थे। उस दौरान जबलपुर नगर निगम का यह दुर्भाग्य रहा कि नगर निगम की सत्ता पीएसपी के पास थी लेकिन प्रदेश में शासन कांग्रेस का था। इससे नगर विकास के कोष की कमी हर समय बनी रहती थी। जगमोहन दास आपसी बातचीत में मुलायम चंद्र जैन से कहते थे कि कांग्रेस में शामिल हो जाओ जबलपुर का विकास होने लगेगा। 
वर्ष 1963 में जबलपुर नगर निगम के महापौर चुनाव में मुलायम चंद्र जैन चुने गए। महापौर के रूप में मुलायम चंद्र जैन ने इंजीनियरिंग कॉलेज वाटर फिल्टरेशन प्लांट और फगुआ नाला वाटर सप्लाई जैसे महत्वपूर्ण कार्यों का क्र‍ियान्वयन कर जबलपुर को उस समय मांग के अनुसार साफ यव स्वच्छ पानी की सप्लाई की शुरूआत की। पूर्व की महापौरों की तरह मुलायम चंद्र जैन ने भी सरकारी वाहन के लिए कुछ नियम बनाए। महापौर के वाहन में कभी भी उनके परिवार का कोई सदस्य नहीं बैठा। कहीं भी वे जब जाते थे तब उनके परिवार के सदस्य उनकी निजी कार में बैठ कर पीछे चलते थे। वर्ष 1965 में डा. एससी बराट इस शर्त पर महापौर बने कि मुलायम चंद्र जैन को स्थायी समिति के अध्यक्ष का कार्यभार संभालना होगा। तब मुलायम चंद्र जैन ने महापौर का पद संभालने के बावजूद डा. बराट का सम्मान करते हुए स्थायी समिति के अध्यक्ष का कार्यभार संभाला था।   
वर्ष 1965 में अशोक मेहता के नेतृत्व में पीएसपी का विलय कांग्रेस में हो गया। मुलायम चंद्र जैन कांग्रेस में शामिल हो गए, लेकिन राजन‍ीति में पहले की तरह सक्र‍िय नहीं रहे। श्याम सुंदर मुशरान और नीतिराज सिंह चौधरी के आग्रह के बाद भी मुलायम चंद्र जैन विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की ओर से खड़े नहीं हए बल्क‍ि उन्होंने दो विधानसभा सीट में अन्य लोगों के नाम की सिफारिश कर उन्हें विजयी बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 
मुलायम चंद्र जैन ने जबलपुर में सिम्पलेक्स इंडस्ट्री की स्थापना की। ब्रिटिश काल में गन केरिज फेक्टरी में काम न होने पर लोगों को छुट्टी दे दी गई, तब मुलायम चंद्र जैन ने पहल की लोगों को अपने परिवार के आइल मिल में रोजगार के अवसर दिए। गन केरिज फेक्टरी के इतिहास में यह पहली व आख‍िरी बार हुआ जब मुलायम चंद्र जैन ने वहां के मूल कर्मियों को बेरोजगार होने की दशा में काम भी दिया और फेक्टरी की मशीनों का उपयोग निजी तौर पर किया। उन्होंने जर्मन मशीनों का इंडियन मॉडल बना कर उसे ‘स्वास्त‍िक’ नाम से पेटेंट करवाया था।  
मुलायम चंद्र जैन महाकोशल चेम्बर ऑफ कामर्स के अध्यक्ष रहे और इस संगठन का भवन बनवाने में बड़ी भूमिका निभाई। चेम्बर ऑफ कामर्स के पच्चीसवीं स्थापना दिवस समारोह में मुलायम चंद्र जैन के अनुरोध पर तत्कालीन रेल मंत्री माधवराव स‍िंध‍िया ने कुतुब एक्सप्रेस का नाम बदल कर महाकोशल एक्सप्रेस किया था। मुलायम चंद्र जैन वर्षों तक जबलपुर स्वतंत्रता सेनानी संघ के अध्यक्ष रहे। 

महापौर के रूप में कानूनविद्, श‍िक्षक और शायर पन्नालाल श्रीवास्तव ‘नूर’

वर्ष 1964 में जबलपुर के महापौर ऐसे व्यक्त‍ि बने जिनके व्यक्त‍ित्व में अध‍िवक्ता, श‍िक्षक, सार्वजनिक कार्यकर्त्ता, राष्ट्रीय अग्रणी और साहित्य‍िक एक साथ समाहित थी और इन सबके समन्व‍ित स्वरूप में पन्नालाल श्रीवास्तव ‘नूर’ की साह‍ित्य‍िक प्रखरता व तेजस्व‍िता की प्रधानता थी। पन्नालाल श्रीवास्तव ‘नूर’ का हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू और फारसी भाषा में गहन अध्ययन और ज्ञान ऐसी उपलब्ध‍ियां थीं जिससे सभी लोग रश्क कर सकते हैं। उनका व्यक्ति‍त्व बहुआयामी और कभी कभी विरोधी दिशाओं में फैला हुआ था। एक ओर कानून जैसे नीरस विषय में प्रस‍िद्ध‍ि प्राप्त कानूनविद्, व‍िध‍ि श‍िक्षक व वर‍िष्ठ अध‍िवक्ता और दूसरी ओर नि:स्वार्थ देश सेवक और तेजस्वी साह‍ित्य‍िक प्रतिभा। इन सबके बीच एक संवेदनशील कवि व शायर। उन्होंने वकालत का पेशा अख्तयार किया तो खुल कर सियासी मैदान में भी रहे। उनको जहां कहीं कोई बात अपने उसूलों के ख‍िलाफ़ नज़र आई उन्होंने उसका इज़हार फौरन कर दिया। 
पन्नालाल श्रीवास्तव ‘नूर’ को अदालत में किसी मामले में पैरवी के बाद बार रूम में आ कर आराम कुर्सी में आंखें बंद करके निश्चेष्ट बैठे रहने में बड़ा आनंद आता था। पन्नालाल श्रीवास्तव के अभ‍िन्न मित्र जबलपुर के मशहूर शायर प्रेमचंद श्रीवास्तव ‘मज़हर’ थे। वे जीएस कॉलेज के प्राचार्य थे। नूर साहब ने जबलपुर में उर्दू की एक बड़ी संस्था अंजुमन तरक्कीये बनाई थी। उनकी प्रेरणा से जनाब आग़ा जब्बार खां साहेब के निवास स्थान में नियमित रूप से मुशायारे का आयोजन संभव हुआ था। मुशायारों में तब हाईकोर्ट के जज, प्रमुख डाक्टर, वकील-बैरिस्टर, प्रोफेसर, प्रतिष्ठ‍ित व्यवसायी, उच्च सरकारी व सैनिक अध‍िकारी शामिल होते थे। नूर साहब ने ख़य्य़ाम और हाफ़‍िज की रूबाईयों का अनुवाद मूल फारसी से हिन्दी में किया था। जबलपुर में होने वाले मुशायरे में नूर साहब सबसे अंत में अपनी शेर व शाइरी पेश करते थे। इस वजह से लोग उनकी ग़ज़ल सुनने अक्सर दो-दो बजे रात तक बैठे रहते थे। पन्नालाल श्रीवास्तव की पुस्तक ‘मंज़‍िल मंज़‍िल’ तक़रीज़ विख्यात शायर रघुपति सहाय फ़‍िराक़ ने लिखी थी। जब यह पुस्तक छपी तब पूरे उर्दू संसार में इस बात को ले कर चर्चा हुई कि फ़‍िराक़ साहब जिस पुस्तक की तक़रीज़ लिख रहे हों, वह पुस्तक तो ख़ास होगी और ल‍िखने वाला भी ज़रूर काबिल होगा। 17 सितंबर 1972 को फ़‍िराक़ साहब ने लिखा-‘’जनाब ‘नूर’ को उर्दू से अच्छी खासी वाक़फ़‍ियत है, और वह रवां दवां तौर पर अपने ख़यालात को सफ़ाई के साथ मौज़ूं अश्आर के सांचे में ढाल देते हैं। उनका अन्दाज़े-बयान शुस्त: है, और उनके कलाम में जो ज़बान की चाश्नी है उसका रह रह कर अन्दाज़ हो जाता है।‘’    
पंडित भवानी प्रसाद तिवारी राजनीति व साहित्य में पन्नालाल श्रीवास्तव के अग्रजवत थे। पंडित तिवारी की प्रेरणा से वे राजनीति में आए। नूर साहब प्रजा समाजवादी पार्टी (पीएसपी) के साइंलेट वर्कर थे, लेकिन वे वर्ष 1952 में जब नगर निगम की राजनीति में आए, तब से वर्ष 1977 तक वे नगर निगम के सदस्य रहे। पीएसपी की ओर से नूर साहब जबलपुर नगर निगम में वर्ष 1964 में महापौर के रूप में चुने गए। उनके महापौर कार्यकाल में जबलपुर में साह‍ित्यि‍क व सांस्कृतिक वातावरण का विस्तार हुआ। नूर साहब ने ही जबलपुर में आल इंड‍िया मुशायरा की शुरूआत करवाई। उर्दू में उनकी महारत को देखते हुए उन्हें मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के गठन के समय सदस्य मनोनीत किया गया। 
वर्ष 1964 में पन्नालाल श्रीवास्तव ‘नूर’ को हितकारिणी व‍िध‍ि महाविद्यालय का प्राचार्य नियुक्त किया गया। ‘नूर’ साहब का असल जौहर उनकी इंसानियत और इंसान दोस्ती रही। इस में मेहनत तो ज्यादा पड़ती है मगर सच यही है कि फ़र‍िश्ता से इंसान बनना बेहतर है। पन्नालाल श्रीवास्तव ‘नूर’ सही मानों में इंसान थे और बकौल रशीद अहमद सिद्दीकी अच्छे शायर की असल पहचान भी यही है। 

हिकमत और श़फा सिद्ध डा. एस. सी. बराट का अल्प महापौर कार्यकाल

जबलपुर नगर निगम महापौर के इतिहास में एक व‍िश‍िष्ट उपलब्ध‍ि दर्ज है, जब एक महापौर जबलपुर विश्वविद्यालय के रेक्टर और फिर कुलपति बने। यह उपलब्ध‍ि वर्ष 1965 में उस समय दर्ज हुई जब डा. एस. सी. (सत्यचरण) बराट को जबलपुर नगर निगम का महापौर नामांकित किया गया। उस समय मध्यप्रदेश के किसी नगर निगम में पहली बार एक चिकित्सक महापौर के पद पर आसीन हुआ था। राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले द्वारका प्रसाद मिश्र उस वक्त मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे। वे डा. बराट के अभ‍िन्न मित्र थे। दोनों लगभग प्रतिदिन जबलपुर में होने पर पत्ते खेला करते थे। वर्ष 1965 में कुछ ऐसी परि‍स्थि‍ति निर्मित हुई और तत्कालीन जबलपुर की राजनीति में बंगला-बखरी को संतुलित करने के लिए एक अध्यादेश ला कर नगर निगम को भंग कर दिया गया था। जबलपुर में निर्विवाद छव‍ि रखने वाले डा. एस. सी. बराट को महापौर के रूप में मनोनीत किया गया। वे ऐसे व्यक्त‍ि थे जिनता सम्मान जबलपुर ही नहीं पूरे प्रदेश व देश में था। नगर के लोग उनका सम्मान करते थे और प्यार भी खूब किया करते थे। उनसे किसी को कोई खतरा नहीं था। वे घृणाहीन व्यक्त‍ि थे। डा. बराट का महापौर के रूप में कार्यकाल लगभग छह माह का रहा और बाद में उन्होंने स्वयं इस्तीफा दे दिया। उनका अल्प कार्यकाल आज भी लोग याद करते हैं। वंशीलाल पांडे के बाद डा. बराट जबलपुर विश्वविद्यालय के रेक्टर और बाद में विश्वविद्यालय के कुलपति भी बने। 
डा. बराट चिकित्सा पेशा को नई ऊंचाईयां दी थीं। वे स्वतंत्रता सेनान‍ियों, श‍िक्षकों व विद्यार्थि‍यों से कोई फीस नहीं लेते थे। एक बार विद्यार्थ‍ियों के उग्र होने और सुपर मार्केट के श‍िलान्यास पत्थर को नुकसान होने पर डा. बराट ने नाराज हो कर कुछ दिन विद्यार्थ‍ियों का नि:शुल्क इलाज बंद कर दिया था, लेकिन कुछ दिन बाद वे नरम पड़ गए और अपनी परंपरा को बरकरार रखा। तीसरे पुल के पास जहां उनकी क्लीनिक थी, वहां बाहर से आने वाले मरीजों व उनके परिजन के लिए नि:शुल्क रहने की व्यवस्था की गई थी। उनके विशाल बंगले का बड़ा सा बरामदा गांव देहात से आने वाले  मरीजों के लिए महफ़ूज़ रहता था। वे वहीं बनाते, खाते-सोते और ठीक होकर ही घर लौटते थे। डा. बराट से इलाज करवाने वाले सिर्फ जबलपुर के लोग नहीं थे। होशंगाबाद, इटारसी, सागर सहित पूरे महाकोशल व बुंदेलखंड के लोग उनके पास अपने मर्ज को ले कर पहुंचते थे और ठीक हो कर खुशी-खुशी अपने घर जाते थे। डा. बराट के अभ‍िन्न सहयोगि‍यों में डा. नंदकिशोर रिछारिया, डा. चौबे व डा. श्रीवास्तव रहे हैं।
आपाधापी के इस दौर के डाक्टर और शायद मरीजों को भी मुआयना करने का डा. एस. सी. बराट का तरीका अजीब लग सकता है पर था बड़ा कारगर जो उनकी दवा के असर को दोगुना कर देता था। हीलिंग टच और मरीजों के साथ संवाद स्थापित करने में डा. बराट माहिर थे। अपनी कुर्सी के समक्ष आरामदेह  बैंच पर मरीज को वे लगभग लिटा लिया करते थे और फिर आहिस्ता-आहिस्ता पेट दबाते हुए बातचीत का सिलसिला शुरू करते कुछ इस तरह के सवालों के साथ- ‘’हां तो क्या बाहर गांव गए थे ? पानी काय का पीते हो ? रात में पक्का खाना ज्यादा खाया है। बारात में गए थे।‘’ मरीज अगर हां में जवाब देता तो कहते वहीं से ले आए हो बीमारी। कोई बात नहीं। ठीक हो जाओगे। दवा दे रहा हूं। समय से खा लेना पर कुछ खाने के बाद। और हां ठीक हो जाओ तो आकर बता देना। करीब दस पंद्रह मिनट के इस सत्र में मरीज अच्छा महसूस करता और जैसे ही उठकर चलने  को होता, तो रोक के पूछते जूता कैसा पहनते हो ? हील डेढ़ इंच काफी है। चलने में आरामदायक होना चाहिए। डा. बराट बी-काम्पलेक्स के जबर्दस्त हिमायती थे। वे कहते थे कि खाना खाते वक्त थाली में बी-काम्पलेक्स की गोली साथ में रखना चाहिए। खाना खाते-खाते साथ में बी-काम्पलेक्स खा लेना चाहिए। इसी प्रकार डा. बराट वाटरबरीज कम्पाउंड सीरप (Waterburys Compound) प्रत्येक मरीज को प्रिस्क्रि‍प्शन में लिखते थे। वैसे तो डा. बराट क्षय रोग विशेषज्ञ थे पर हर मर्ज़ की दवा जानते थे। हिकमत और श़फा दोनों ही उनको सिद्ध थी।

ज़मीनी आदमी दादा गुलाब चन्द गुप्ता जब जबलपुर के महापौर बने

सात रूपए मासिक वेतन पर भर्रू की कलम से बही खाते लिखने वाले गुलाब चन्द गुप्ता को भले ही बिहारीलाल खजांची का मुनीम कहा जाता रहा हो, लेकिन वास्तव में वे तो कलम के ही मजदूर थे। किसे पता था कि यही कलम का मजदूर एक दिन जबलपुर का महापौर ही नहीं मध्यप्रदेश विधानसभा का सदस्य भी निर्वाचित होगा।  जबलपुर नगर निगम में डा. एस. सी. बराट के इस्तीफा देने के बाद वर्ष 1965 में गुलाब चन्द गुप्ता चुने गए। उनके साथ‍ी व जबलपुर के लोग उन्हें ‘दादा’ कहते थे। गुलाब चन्द गुप्ता अपने पूर्ववर्ती महापौर की तुलना में बिल्कुल अलग थे। उनसे पूर्व जबलपुर के जितने महापौर हुए वे साहित्यकार, श‍िक्षक, उद्यमी, चिकित्सक थे। गुलाब चन्द गुप्ता ज़मीनी आदमी थे। उनके पास किसी विश्वविद्यालय की डि‍ग्री नहीं थी, उनकी विद्यालयीन श‍िक्षा भी कम थी पर संसार के जगत विश्वविद्यालय में उन्होंने जो श‍िक्षा पाई थी वह ऐसी विलक्षण और मेरीटोरियस थी जिसने गुलाब दादा के जीवन को पुरूषार्थी, उदात्त और व्यावहारिक बना दिया था। उनकी सूझबूझ व दूरदर्श‍िता किसी श्रेष्ठ व्यक्त‍ि से कम नहीं थी। दादा गुलाब चन्द गुप्ता जबलपुर की अक्खड़पन व फक्कड़पन परंपरा के प्रत‍िन‍िध‍ि थे। 
 उनकी सहज बुद्ध‍ि का लोहा सभी लोग मानते थे। दादा इस संसार के ऐसे यात्री थे जिन्होंने अपनी मंज़‍िल पा ली थी। वे उस जनता के लिए जीते थे जिस जनता के प्रत‍िन‍िध‍ित्व का दाय‍ित्व उन्होंने लिया था। उस दायित्व को वे अपनी बुद्ध‍ि, युक्त‍ि और शक्त‍ि के समन्वय से पूरा करते थे। जिस दिन उनका दाय‍ित्व पूरा हो गया उस दिन वे भगवान के प्यारे हो गए।  
दादा गुलाब चन्द का आरंभ‍िक जीवन कष्टों, आपदाओं और भीषण गरीबी में बीता था। जब वे स्वतंत्रता आंदोलन में कारावास में थे, तब पत्नी की बीमारी का समाचार आया। लोगों ने कहा ‘पेरोल’ पर जा कर देखना चाहिए। तब उन्होंने उत्तर दिया-मैं आवेदन नहीं करूंगा। और जब वह चल ही बसी तो संस्कार के लिए अध‍िकारियों ने जाने की अनुमति दी तो दादा गुलाब चन्द ने जाना स्वीकार नहीं किया। दीवारों के घेरे के बाहर उनकी अनुपस्थि‍ति में ही चिता धू धू कर उठी। 
कांग्रेस के मूल से समाजवादी शाखा फूट कर निकली थी उसके जबलपुर में प्रमुख स्तंभ दादा गुलाब चन्द गुप्ता थे। वे सक्र‍िय राजनीतिज्ञ थे और कांग्रेस के सुस्थापित वर्ग के विरोध में खड़े हुए। उन्होंने वर्ष 1930 से 1942 तक चारों आंदोलनों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और कारावास भोगा। गुलाब चन्द्र गुप्ता का नेताजी सुभाष चंद्र बोस से गहरा नाता था। उसी सम्पर्क और प्रभाव के कारण उन्होंने अपने पुत्र का नाम सुभाष रखा था। बाद में सभी पुत्रों का नामकरण सुभाष चंद्र बोस के परिवार के सदस्यों के नाम पर हुआ। सुभाष चंद्र बोस त्रिपुरी कांग्रेस अध‍िवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष पद को त्याग कर फारवर्ड ब्लाक के साथ 6 जुलाई 1939 को जब जबलपुर से मंडला रवाना हुए तब उनके साथ गुलाब चन्द गुप्ता, भवानी प्रसाद तिवारी व सवाईमल जैन भी साथ में थे। गुलाब चन्द गुप्ता और भवानी प्रसाद तिवारी का अभ‍िन्न साथ था। एक बार जबलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रभुदयाल अग्न‍िहोत्री ने कहा था कि गुलाब दादा और भवानी भाई को जोड़ देने से एक पूरा आदमी बनता था।   
वर्ष 1967 में गुलाब चन्द गुप्ता ने कटनी (मुड़वारा-रीठी) विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और विजयी हो कर विधायक बने। इस चुनाव में वे जबलपुर से कटनी अपने पुत्र के साथ वेस्पा स्कूटर में जाते थे। वे लोग सौ-सौ मील का सफर स्कूटर पर तय करते थे। विधानसभा पहुंच कर दादा गुलाब चन्द ने प्रथम सत्र से अपनी तीव्र बुद्ध‍ि व वाक् पटुता से ऐसा प्रभाव जमाया कि पूरे सदन और भोपाल के पत्रकारों ने उनका लोहा मान लिया।  उनके बारे में कहा जाता था कि वे राजनीति के मैदान के विकट ख‍िलाड़ी थे। कभी तो खेल करने के लिए खेल करते और लोगों को मोहरा बना लेते थे। सत्ता से अध‍िक उन्हें विरोध का खेल खेलने का मज़ा खूब आता था।

जन आंदोलन के प्रणेता डा. के. एल. दुबे पांच पार्षदों के सहारे चुने गए महापौर

डा. के. एल. दुबे वैसे तो होम्य‍िोपैथी चिकित्सक थे लेकिन उनकी असली पहचान जनता व कर्मचारियों के नेता के रूप में थी। डा. के. एल. दुबे कट्टर समाजवादी और राम मनोहर लोहिया के अनुयायी थे। वे मूल रूप से कानपुर देहात के ग्राम रामसारी तहसील घाटमपुर के निवासी थे। लोहिया की तरह कद काठी होने और जबलपुर में किसी भी समस्या के लिए जन आंदोलन करने के कारण लोग उन्हें ‘जबलपुर का लोहिया’ कहने लगे थे। समाजवादियों की तरह पूरे समय उत्तेजित दिखने वाले डा. के. एल. दुबे की स्थायी पोशाक धोती कुर्ता थी। उनके कुर्ते की बांह कोहनी तक मुड़ी रहती थी। तुर्शी व जुझारूपन उनका स्थायी भाव था। उनका पूरा नाम कन्हैया लाल दुबे था लेकिन शायद ही कोई उन्हें इस नाम से पहचानता था। वे तो सभी के लिए डा. के. एल. दुबे ही थे। 
कानपुर और जबलपुर में रहने के दौरान डा. के. एल. दुबे ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। कलकत्ता से होम्‍य‍िोपैथी की श‍िक्षा ग्रहण करने के बाद डा. के. एल. दुबे वर्ष 1944 में जबलपुर आ गए। उन्होंने वर्ष 1946-47 में प्रेक्ट‍िस शुरू की। तुलाराम चौक में उनकी ड‍िस्पेंसरी थी। डाक्टरी प्रेक्ट‍िस का सिलसिला वर्ष 1963-64 तक चला। इसके बाद वे राजनीति व जन सेवा में पूरी तरह से सक्र‍िय हो गए और प्रेक्ट‍िस पीछे छूट गई। 
स्वतंत्रता के पूर्व जबलपुर नगर निगम चुनाव में वे वर्ष 1945 में पहली बार राइट टाउन वार्ड से पार्षद चुने गए। वर्ष 1957 में डा. के. एल. दुबे होम साइंस कॉलेज से एमएलबी स्कूल मार्ग में गायकवाड़ कम्पाउंड में किराए के मकान में रहने आ गए। वर्ष 1957 से ही मृत्यु पर्यत तक उनका स्थायी अड्डा नगर निगम से शास्त्री ब्रिज (मोटर स्टेंड) जाने वाले रास्ते पर लक्ष्मी टेलर की दुकान हुआ करती थी। लक्ष्मी टेलर के मास्टर मूलचंद थे। इसके अलावा डा. के. एल. दुबे का दूसरा अड्डा इसी मार्ग के सामने दूसरी ओर जहांगीराबाद की अबू वकर की साइकिल दुकान थी। वे सुबह से नगर निगम पहुंच जाया करते थे और दिन भर दोनों जगहों पर वे लोगों से मिलते-जुलते थे और उनका समय बीतता था।
डा. के. एल. दुबे रहते तो राइट टाउन में थे लेकिन उनकी पूरी तरह राजनीति व जन सेवा घमापुर में केन्द्र‍ित थी। लगातार सक्र‍िय रहने के कारण वे वर्ष 1956 में पूर्वी घमापुर वार्ड और वर्ष 1973 में लालमाटी वार्ड से पार्षद चुने गए। वर्ष 1963 में कांग्रेस की ओर से नारायण प्रसाद चौधी जब जबलपुर नगर निगम के महापौर निर्वाचित हुए तब डा. के. एल. दुबे सोशलिस्ट उम्मीदवार के रूप में उप महापौर बने। इस चुनाव में डा. के. एल. दुबे ने बाबूराव परांजपे को हराया था। कहा जाता है कि जब तक डा.    के. एल. दुबे रहे तब तक बाबूराव परांजपे का राजनीति में सूर्य नहीं चमक पाया। 
डा. के. एल. दुबे घमंडहीन, जातपात न मानने वाले और लोगों में एकदम घुल जाने वाले व्यक्त‍ि थे। जाति से ब्राम्हण होने के बावजूद वे सफाई कर्मचारियों के एकमेतन नेता रहे। उन्होंने कई प्रादेश‍िक व केन्द्रीय शासन के कर्मचारियों की यूनियन को एक सूत्र में बांध कर उनका लम्बे समय तक नेतृत्व किया। वर्तमान जबलपुर पूर्व विधानसभा क्षेत्र उनका कार्यक्षेत्र रहा था और राजनीति में मुख्य आधार दलित वोट रहा। डा. के. एल. दुबे के जन आंदोलन घमापुर और आसपास के क्षेत्र से शुरू होते और धीरे धीरे पूरे शहर में उसका असर देखने को मिलता था। पानी की कमी के समय मटके फुड़वाने का जन आंदोलन उनकी ही देन है। 
डा. के. एल. दुबे का तत्कालीन नगर निगम प्रशासक एल. पी. तिवारी से हर समय टकराव बना रहता था। एल. पी. तिवारी के प्रशासन काल में जबलपुर में नगर निगम ने कई महत्वपूर्ण कार्य किए थे लेकिन डा. दुबे प्रतिदिन उनके सामने समस्याओं की फेहरिस्त रख कर आंदोलन की चेतावनी दिया करते थे। वर्ष 1967 का एक वाक्या यह भी है कि जगमोहन दास की मूर्ति स्थापित कर दी गई थी लेकिन उसका अनावरण कार्यक्रम तय नहीं हो पा रहा था। इस बात से डा. के. एल. दुबे उत्तेजित थे। उन्होंने नगर निगम प्रशासक को चेतावनी दी कि एक निश्च‍ित तारीख को वे स्वतंत्रता सेनानी व सर्वोदयी नेता गणेश प्रसाद नायक से मूर्ति का अनावरण करवा देंगे। इस बात को सुन कर एल. पी. तिवारी तुरंत भोपाल रवाना हुए और वहां से विजयाराजे स‍िध‍िंया का कार्यक्रम तय कर के आ गए। जगमोहन दास की मूर्ति का अनावरण हुआ। विजयाराजे स‍िध‍िंया मंच से उतर कर गणेश प्रसाद नायक के पास इस अनुरोध के साथ गईं कि वे ऊपर मंच पर चल कर मूर्ति का अनावरण करें। नायक जी ने विनम्रता से इंकार कर दिया। इस कार्यक्रम में डा. के. एल. दुबे ने सत्य शोधक संघ का पर्चा एक नागरिक के नाम से वितरित करवाया, जिससे काफ़ी विवाद हुआ।
डा. के. एल. दुबे वर्ष 1973-74 में सोशलिस्ट पार्टी की उम्मीदवार के रूप में जबलपुर के महापौर चुन लिए गए। उस समय सिर्फ पांच समाजवादी ही पार्षद के रूप में चुने गए थे, लेकिन डा. दुबे ने कांग्रेस व निर्दलीयों के सहयोग से जबलपुर नगर निगम की सत्ता जीत ली थी। उस समय अनिल शर्मा सोशलिस्ट उप महापौर चुने गए थे। डा. दुबे वर्ष 1975 में स्थायी समिति के कार्यवाहक अध्यक्ष चुने गए। इसी वर्ष वे नगर निगम में प्रतिपक्ष के नेता बने। डा. दुबे का जिंदगी भर कार्य क्षेत्र जबलपुर पूर्व रहा और वर्ष 1977 में विधानसभा चुनाव में वे जबलपुर पश्च‍िम कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में खड़े हुए और विधायक निर्वाचित हुए। इसके बाद वर्ष 1980 तक डा. दुबे कांग्रेस विधायक दल के मुख्य सचेतक र‍हे। उन्होंने जबलपुर नागरिक सहकारी बैंक के अध्यक्ष का दाय‍ित्व भी निभाया और विश्वविद्यालय कोर्ट सभा के सदस्य भी रहे।           
डा. के. एल. दुबे का समाजवाद इस मायने में महत्वपूर्ण है कि वे जीवन पर्यंत क‍िराए के मकान में रहे और पैदल या साइकिल से नगर निगम या अपने कार्य क्षेत्र में जाते रहे।

मंगलवार, 24 मई 2022

‘बर्न कोर्ट’ के जमींदोज होने के साथ ही 130 वर्ष पुराना इतिहास दफ़न हो गया

बर्न स्टेंडर्ड कंपनी के जनरल मैनेजर के जबलपुर सिविल लाइंस स्थि‍त बंगला बर्न कोर्टजमींदोज होने के साथ ही जबलपुर में बर्न स्टेंडर्ड कंपनी का 130 वर्ष पुराना इतिहास भी दफ़न हो गया। हावड़ा में एक इंजीनियरिंग कंपनी की शुरुआत 1871 में एक सेवानिवृत्त कर्नल आर्चीबाल्ड स्विंटन ने की थी। वर्ष 1809 में था जब अलेक्जेंडर बर्न मिस्टर करी के साथ कंपनी के प्रमुख बने तो कंपनी 'बर्न एंड करी' कहलाई। करी 1831 में चले गए और कंपनी 'अलेक्जेंडर बर्न एंड कंपनी' बन गई, जिसे बाद में 'बर्न एंड कंपनी' से अनुबंधित किया गया। 'बर्न एंड कंपनी लिमिटेड' का गठन 1895 में 'बर्न एंड कंपनी' के व्यवसाय को अधिग्रहित करने और जारी रखने के लिए किया गया। बर्न एन्ड कंपनी लिमिटेड वर्ष 1895 में बनी थी। वर्ष 1900 की शुरूआत में इसका हेड आफ‍िस 12 मिशन रो कलकत्ता में और एक साइट आफ‍िस हावड़ा में था। इस साइट आफि‍स को हावड़ा आयरन वर्क्स के नाम से जाना जाता था। इसके आफ‍िस जब्बलपोर (जबलपुर), बंबई, रानीगंज, रंगून, सिंगापुर और स्ट्रेट्स सेटलमेंट में कार्यालय थे। इंग्लैंड में इस कंपनी को बर्न क्रेडॉक एन्ड कंपनी के नाम से जाना जाता था और वहां इसके आफ‍िस लंदन व ग्लासगो में थे।

कलकत्ता के ड्रेनेज सिस्टम में जबलपुर के बने पाइपों का उपयोग-बर्न एन्ड कंपनी की जबलपुर फैक्टरी वर्ष 1892 में स्थापित हुईं। इसके बाद बंगाल में रानीगंज में फैक्टरी बनी। इन दोनों फैक्टरियों में टाइल्स, फायर ब्रिक्स (ईंट), स्टोन वेयर, पाइप्स और रिफ्रेक्टरीज बनती थीं। जबलपुर के बाद कटनी के निवार में भी बर्न स्टेंडर्ड कंपनी की फैक्टरी स्थापित हुईं। कलकत्ता के पूरे ड्रेनेज सिस्टम में बर्न स्टेंडर्ड फैक्टरी जबलपुर के बने पाइपों का उपयोग किया गया था। बर्न एन्ड कंपनी ने रेलवे के लिए यात्रा व माल वेगन का निर्माण भी किया। 

जेसू के रूप में गुणवत्ता व विश्वसनीय बिजली सप्लाई-
वर्ष 1946 में 'बर्न एंड कंपनी लिमिटेड' का 'मार्टिन एंड कंपनी' के साथ विलय हो गया और यह 'मार्टिन, बर्न एंड कंपनी' बन गई। मार्टिन बर्न कंपनी की जबलपुर इलेक्ट्र‍िक सप्लाई अंडरटेकिंग (जेसू) ने जबलपुर में  बिजली सप्लाई का काम शुरू किया। सातवें दशक के मध्य तक जेसू की बिजली सप्लाई की गुणवत्ता व विश्वसनीयता ऐसी थी कि जिसे आज भी लोग याद करते हैं। जबलपुर में गोकुलदास धर्मशाला के पीछे की ब‍िल्ड‍िंग जेसू ईस्ट और मिशन कम्पाउंड का भवन जेसू वेस्ट के नाम से मशहूर रहा। आज भी कुछ लोग दोनों बिजली दफ्तरों को जेसू नाम से ही पुकारते हैं। लोग दोनों बिजली दफ्तरों को जेसू नाम से ही पुकारते हैं।


दुर्गा पूजा
, नाट्य मंचन व फुटबाल-
बर्न स्टेंडर्ड का जबलपुर से गहरा संबंध रहा। वर्ष 1956 में मध्यप्रदेश के पुनर्गठन के समय जबलपुर में किसी अति विश‍िष्ट व्यक्ति‍ की अगवानी में बर्न स्टेंडर्ड कंपनी के जनरल मैनेजर को शामिल किया जाता था। पांचवे दशक में बर्न कंपनी के जनरल मैनेजर मिस्टर मरवाहा जबलपुर में खूब लोकप्रिय रहे। बर्न स्टेंडर्ड की स्थापना के साथ नौकरी के लिए बंगला परिवार जबलपुर आए। इन्हीं परिवारों से जबलपुर में दुर्गा पूजा और नाट्य मंचन की परम्परा शुरू हुई। छठे से नौवे दशक तक यहां आयोजित होने वाली ऑल इंड‍िया फुटबाल टूर्नामेंट में कलकत्ता की बर्न स्टेंडर्ड फैक्टरी की टीम और उसके ख‍िलाड़ी अपने उत्कृष्ट खेल के कारण लोकप्रिय रहे।

अभिनेता प्रेमनाथ किससे कहते थे - घोड़ा अस्तबल में नहीं बिकता, बाजार में बिकता है


  
फिल्म अभ‍िनेता प्रेमनाथ (Premnath) अपने गृह शहर जबलपुर (Jabalpur) से बहुत प्यार करते थे। जबलपुर में ही उनके पिता राय कर्तारनाथ (Rai Kartarnath) की एम्पायर टाकीज (Empire Talkies) थी। ब्रिटिश कालीन एम्पयार टॉकीज की खूबी इसकी स्थापत्य कला और विशाल स्क्रीन था। एम्पायर टॉकीज में ज्यादातर अंग्रेजी फिल्में ही रिलीज होती थीं। जेम्स बांड सीरिज की प्राय: सभी फिल्में एम्पायर टॉकीज में ही प्रदर्श‍ित होती थी। 7वें से 9वें दशक तक यहां हिन्दी फिल्में खासतौर से राजश्री बैनर (Rajshree Banner) की सभी फिल्में लगीं और खूब देखी गईं। राज कपूर की फिल्में भी एम्पायर टॉकीज में रि-रिलीज होती रहीं।

राज कपूर के छोटे भाई कई बार पत्नी संग आते थे जबलपुर

प्रेमनाथ बंबई की फिल्मी दुनिया से जबलपुर वर्ष में दो-तीन बार आते रहते थे। उनकी बहिन कृष्णा का विवाह राज कपूर से रीवा में हुआ था, लेकिन कृष्णा भी अवकाश बिताने जबलपुर आती थीं। उस समय उनके साथ पुत्र रणधीर (Randhir), ऋष‍ि (Rishi)  और पुत्री रितु (Ritu)बच्चों के रूप में आते थे। प्रेमनाथ के छोटे भाई राजेन्द्रनाथ व नरेन्द्रनाथ ने भी फिल्म अभिनेता के रूप में नाम कमाया। राजेन्द्रनाथ, मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सहपाठी रहे। छोटी बहिन उमा जबलपुर में हॉकी की खिलाड़ी रहीं और बाद में उनका विवाह प्रेम चोपड़ा से हुआ। राज कपूर के छोटे भाई शम्मी कपूर भी कई बार अपनी पत्नी गीता बाली के साथ जबलपुर आए थे। उनका आना घरेलू या मांगलिक कार्यक्रम के आयोजन के कारण होता था। एम्पायर टॉकीज के बाएं ओर प्रेमनाथ का बंगला था। जहां उनकी लाल रंग की शेवरलेट कार खड़ी रहती थी। इस कार को जबलपुर के उस समय के प्रसिद्ध मैकेनिक रमजान कारीगर ठीक किया करते थे। उन्होंने ही कार के मूल रंग को बदल कर उसे लाल रंग में परि‍वर्तित कर दिया था। एम्पायर टॉकीज के मैनेजर रहे डीपी बाजपेयी ने बताया कि उन्हें उस कार में कई बार प्रेमनाथ व उनकी पत्नी बीना राय के साथ बैठ कर घूमने का मौका मिला था। डीपी बाजपेयी ने बताया कि वे लोग बंगले से जबलपुर के आसपास घूमने जाया करते लेकिन जल्द लौट कर वापस आ जाते थे। इसकी वजह कार में पेट्रोल की खपत बहुत थी।कार गैलन भर पेट्रोल पीती थी। प्रेमनाथ लाल रंग की शेवरलेट को अपने प्राणों से ज्यादा प्यार किया करते थे लेकिन उनकी मृत्यु के बाद बेटों ने उस कार को कबाड़ समझ कर बेच दिया।


प्रेमनाथ की पत्नी की फिल्म 'इंसानियत' जबलपुर की श्याम टॉकीज में लगी थी

प्रेमनाथ की पत्नी बीना राय की फिल्म 'इंसानियत' जबलपुर की श्याम टॉकीज में लगी। इस फिल्म में बीना राय के साथ दिलीप कुमार व देव आनंद हीरो थे। फिल्म को बीना राय बंबई में नहीं देख पायी थीं। जबलपुर आने पर वे उस फिल्म को देखना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने श्वसुर राय कर्तारनाथ से फिल्म देखने की अनुमति मांगी। राय साहब ने तब के तत्कालीन पुलिस एसपी बीएल पाराशर को मसला बताते हुए सहायता मांगी। पुलिस एसपी की कार में उनकी दो बेटियों के साथ बीना राय बुर्का पहन कर फिल्म देखने गईं। एसपी साहब ने भी पूरे मसले को इतना गोपनीय रखा कि उन्होंने अपनी बेटियों को यह नहीं बताया कि उन्हें किसके साथ और कहां जाना है। जब एसपी साहब की कार एम्पायर टॉकीज पहुंची तब बेटियों को जानकारी मिली कि उन्हें बीना राय के साथ उनकी अभिनीत फिल्म देखने जाना है। एसपी साहब की कार श्याम टॉकीज में भीतर तक गई और किसी को कानों कान खबर नहीं हुई। श्याम टॉकीज के फेमिली बाक्स में पहुंच कर बीना राय ने अपना जब बुर्का हटाया तब एसपी साहब की बेटियों ने बीना राय का चेहरा पहली बार देखा। बीना राय ने पूरी फिल्म तन्मयता से देखी। फिल्म खत्म होते ही एसपी साहब की कार से बीना राय चुपचाप निकल गईं।

1963 में हुई थी आधुनिक रंगकर्म की शुरुआत

टॉकीज से बाहर निकलते दर्शकों में उस समय हलचल हुई जब उन्हें यह जानकारी मिली कि बीना राय भी फिल्म देखने आयीं हैं। दर्शकों की भीड़ टॉकीज में ठहर गई लेकिन तब तक काफ़ी देर हो चुकी थी। उस वक्त बीना राय एम्पायर टॉकीज के बाजू में अपने बंगले में प्रविष्ट हो चुकी थीं। 1963 में प्रेमनाथ अपने पिता राय कर्तारनाथ के निधन के कारण जबलपुर आए थे। उसी समय जबलपुर में आधुनिक रंगकर्म की शुरुआत हो रही थी। श्याम खत्री राजकला मंदिर संस्था की ओर से एक बड़ा प्रोडक्शन ‘राह के कांटें’ का निर्देशन कर रहे थे। श्याम खत्री ने इस नाटक को लिखा भी था। नाटक का मंचन शहीद स्मारक में होने वाला था। ‘राह के कांटे’ के साथ फिल्म अभिनेता प्रेमनाथ का नाम भी उस समय जुड़ गया, जब वे शहीद स्‍मारक में पहले मंचन के दौरान मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हुए। इससे पूर्व प्रेमनाथ कभी भी जबलपुर में किसी नाटक के मंचन में दर्शक के रूप में उपस्थित नहीं हुए थे। नाटक के कलाकार श्याम गुप्ता के आमंत्रण के कारण नाटक देखने आने वाले थे। 

नाटक शुरू होने के ठीक पहले प्रेमनाथ शहीद स्मारक पहुंच गए। प्रेमनाथ के कारण नाटक में भीड़ उमड़ गई। जितने लोग शहीद स्‍मारक के अंदर थे उससे की गुना लोग बाहर खड़े थे। टिकट खिड़की बंद हो चुकी थी। टिकट न मिलने से निराश लोगों ने बाहर ही प्रेमनाथ की एक झलक पा कर संतोष कर लिया। निर्धारित समय पर नाटक शुरू हुआ। प्रेमनाथ सहित सभी दर्शक पूरे नाटक को ध्यान से देखते रहे।। नाटक जैसे ही समाप्त हुआ, पूरा शहीद स्मारक तालियों से गूंज उठा। प्रेमनाथ को पात्र परिचय के समय मंच पर आमंत्रित किया गया। प्रेमनाथ प्रस्तुति से प्रभावित हुए और उन्होंने प्रशंसा की। प्रेमनाथ को तीन अभिनेताओं श्याम किशोर गुप्ता, देवीदयाल झा और राकेश श्रीवास्तव ने विशेष रूप से प्रभावित किया। उन्होंने मंच पर ही घोषणा कर तीनों अभिनेताओं को बंबई आमंत्रित किया और कहा कि जब भी वे बंबई आएंगे, उन्हें वे ‘एक दिन का बंबई का सुल्तान’ बनाएंगे। तीनों अभिनेता अलग-अलग बंबई गए और प्रेमनाथ की मेजबानी में वे ‘एक दिन का सुल्तान बने। 

प्रेमनाथ को समोसा बहुत पसंद था

इस नाटक के पश्‍चात् प्रेमनाथ का जबलपुर के रंगमंच से आत्मीय संबंध बन गया। श्याम खत्री को भी उन्होंने बंबई आमंत्रित किया। श्याम खत्री बंबई में उनसे दो-तीन बार मिले। एक बार उन्होंने प्रेमनाथ के साथ फिल्म देखी और यहां-वहां सैर भी की। प्रेमनाथ जब भी जबलपुर आते वे एम्पायर टॉकीज के मैनेजर के जरिए श्याम खत्री को खबर करवाते थे। श्याम खत्री व पास्कल पाल के साथ दो-तीन बार प्रेमनाथ के बंगले गए। प्रेमनाथ स्वयं तो कम खाते थे लेकिन सामने वाले को जबर्दस्ती ज्या‍दा भोजन करवा देते थे। एक बार 1966 में प्रेमनाथ जबलपुर आए, तब श्याम खत्री को कोई खबर नहीं मिली। प्रेमनाथ जिलहरी घाट में नर्मदा नदी में तैरने जाते थे। वहीं से वे सीधे श्याम खत्री के ‘दिया जले सारी रात’ नाटक की रिहर्सल में पहुंच गए। जैसे ही प्रेमनाथ रिहर्सल स्थल पर पहुंचे तो किसी ने अंदर सूचना भिजवाई कि प्रेमनाथ आ रहे हैं। सभी कलाकार सतर्क हो गए। प्रेमनाथ बहुत देर तक सभी कलाकारों को पृथ्वी थिएटर के अनुभव सुनाते रहे। बीच-बीच में वे कभी नाटकों के दृश्य को अभिनय कर प्रदर्शित करने लगते तो कभी इतने उत्साह से यहां से वहां चलते कि पूरा सेट थरथरा जाता। प्रेमनाथ सभी को ‘बाबू’ कह कर संबोधित करते थे। अचानक उन्होंने श्याम खत्री से कहा-‘’बाबू ....समोसा मंगाओ, बाबू....समोसा मंगाओ।‘’ प्रेमनाथ को समोसा बहुत पसंद था। जब भी उन्हें मौका मिलता वे समोसा ही खाना चाहते थे। अगले दिन प्रेमनाथ शहीद स्मारक में ‘दिया जले सारी रात’ को देखने पहुंचे। इस नाटक को भी प्रेमनाथ ने बहुत रूचि के साथ देखा। 


जब भी जबलपुर के कलाकारों को मदद की जरूरत पड़ी, प्रेमनाथ पीछे नहीं हटे

प्रेमनाथ कई बार श्याम खत्री सहित अन्य रंगकर्मियों से कहते थे- "घोड़ा अस्तबल में नहीं बिकता, बाज़ार में बिकता है।‘’ उनके यह कहने का आशय यह था कि जो लोग फिल्म’ में जाना चाहते हैं, वे यहां अपना समय खराब कर रहे हैं। जो स्ट्रगल आप यहां कर रहे हैं, वह स्ट्रगल बंबई में करें। प्रेमनाथ सभी रंगकर्मियों से कहते थे कि दिल लगा कर काम सीखे और मेहनत से करे। जब भी जबलपुर के कलाकारों को जरूरत पड़ी, प्रेमनाथ सहायता करने में पीछे नहीं हटे बल्किआगे बढ़ कर उन्होंने मदद की। धर्मराज जायसवाल के नाटक का मुहुर्त प्रेमनाथ के एम्पायर टॉकीज में ही हुआ। कई बार उन्होंने एम्पायर टॉकीज को नाटक की रिहर्सल के लिए फ्री में दिया। बाद के समय में प्रेमनाथ जबलपुर के सभी रंगकर्मियों से खुल गए थे। सहजता व सरलता से बातचीत करते थे। 

प्रेमनाथ के जीवन में वर्ष 1966 का बहुत महत्व है। इस वर्ष उन्हें ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस’ फिल्म में नेताजी की मुख्य भूमिका के लिए लगभग पक्का कर लिया गया था। उन्होंने श्याम खत्री को ‘दिया जले सारी रात’ में मंचन के समय फिल्म की प्रारंभिक तैयारी के कुछ वह फोटोग्राफ्स दिखाए, जिसमें प्रेमनाथ नेताजी की आजाद हिंद फौज की वर्दी में थे। फिल्‍म के स्क्रीन टेस्‍ट के समय वह फोटो उतारे गए थे। फिर अचानक उस भूमिका को अभिभट्टाचार्य ने निभाया। 1966 में ही विजय आनंद के निर्देशन में बनी फिल्म ‘तीसरी मंजि़ल’ रिलीज हुई और हिट भी। इस फिल्म में  प्रेमनाथ ने खलनायक कुंवर साहब की भूमिका निभाई थी। प्रेमनाथ इसके बाद इतने व्यस्त हो गए कि उनका जबलपुर आना काफी कम हो गया और श्याम खत्री सहित अन्य रंगकर्मियों की स्मृति में सिर्फ उनके साथ बिताए गए कुछ पल रह गए। 

बंबई की इस पहली यात्रा से श्याम गुप्ता के प्रेमनाथ के साथ संबंध व्यक्त‍िगत व प्रगाढ़ हो गए। अगली यात्रा में वे जब बंबई पहुंचे, तब प्रेमनाथ फिल्मों की शूटिंग में व्यस्त थे। एक दिन वे श्याम गुप्ता को फेमस सिने लेब  ‘प्यार मोहब्बत’ की रिलीज के पूर्व की स्क्रीनिंग में ले गए। वहां पहुंच कर श्याम गुप्ता का प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा। उस स्क्रीनिंग में श्याम गुप्ता के आदर्श बन चुके देवानंद साहब भी मौजूद थे। स्क्रीनिंग हो जाने के पश्चात् प्रेमनाथ श्याम गुप्ता का परिचय देवानंद से यह कह कर करवाया कि ये हमारे शहर जबलपुर के सर्वश्रेष्ठ अभ‍िनेता श्याम गुप्ता हैं। प्रेमनाथ ने देव साहब से कहा कि उनकी किसी फिल्म में श्याम गुप्ता के लिए कोई रोल है क्या ? देव साहब ने कहा कि यदि ये चाहें तो किसी फिल्म में ‘एकस्ट्रा’ के रूप में श्याम गुप्ता को मौका मिल सकता है। प्रेमनाथ ने श्याम गुप्ता से पूछा-‘बाबू..बाबू एकस्ट्रा में जाओगे।‘ श्याम गुप्ता उस समय ‘एकस्ट्रा’ का अर्थ समझते नहीं थे। उन्होंने प्रेमनाथ से ‘एकस्ट्रा’ का अर्थ पूछा। प्रेमनाथ ने बताया कि जो कलाकार भीड़ का हिस्सा बनता है, उसे ‘एकस्ट्रा’ कहते हैं। श्याम गुप्ता ने कहा कि वे तो नाट्य कलाकार हैं, ‘एकस्ट्रा’ के रूप में तो वे कतई फिल्मों में काम करना पसंद नहीं करेंगे। इस बात से प्रेमनाथ बहुत खुश हुए और उन्होंने इनाम स्वरूप अपने जेब में रखे पैसों में से कुछ पैसे श्याम गुप्ता को जबर्दस्ती थमा दिए। श्याम गुप्ता कुछ समझ नहीं पाए। प्रेमनाथ ने कहा कि यदि तुम ‘एकस्ट्रा’ बनने की बात को स्वीकार कर लेते तो मेरे घर के दरवाजे तुम्हारे लिए सदैव को बंद हो जाते।

प्रेमनाथ ने की 'मीरा' नाम की एक फ़िल्म की घोषणा

जबलपुर के अन्‍य कलाकारों की तरह उस दौरान प्रसिद्ध रेडियो अनाउंसर मनोहर महाजन व फिल्‍म प्रेमनाथ का एक किस्‍सा याद रखने लायक है। फ़िल्म अभिनेता प्रेमनाथ ने बड़े ही जोर-शोर के साथ 'मीरा' नाम की एक फ़िल्म की घोषणा की। यह फ़िल्म जबलपुर के कलाकारों के साथ बनाई जानी थी। प्रेमनाथ की टॉकीज 'एम्पायर' में कलाकारों का ऑडिशन रखा गया था। सामने वाली सीट पर खुद प्रेमनाथ गहरी नज़र गढ़ाए बैठे हुए थे। एक-एक कलाकार मंच पर आते जा रहे थे। जब मनोहर महाजन की बारी आई तो वे अपने गुरू राम सिंह गोंटिया के दिए गए संस्‍कार के मुताबिक मंच पर साष्टांग लेट गए। वहीं दूसरे कलाकार मंच को छूकर हाथों को माथे से लगाते थे। प्रेमनाथ ने आंखें गढ़ाए इस नजारा को देखा कि एक कलाकार मंच पर आने से पहले उसे साष्टांग दंड प्रणाम कर रहा है। वे कुर्सी में बैठे हुए चिल्‍लाए-‘’ बाबू....बाबू....बस तुम्‍हारा ऑडिशन हो गया। कुछ करने की जरूरत नहीं है।‘’ मनोहर महाजन हैरान रह गए कि जब उन्‍होंने कुछ किया ही नहीं तो ऑडिशन कैसे हो गया ? प्रेमनाथ ने कहा कि जिस कलाकार का मंच के प्रति ऐसा समर्पण हो, उसका अभिनय देखने की जरूरत ही नहीं है। ‘मीरा’ फिल्‍म में मनोहर महाजन का चयन हो गया, लेकिन प्रेमनाथ की अचानक बढ़ती व्‍यस्‍ताओं के कारण यह फिल्‍म आगे बढ़ नहीं पाई।

बुधवार, 18 मई 2022

धार्मिक आस्थाएँ एवं मिथक प्रकृति को नष्ट कर रहे हैं-ज्ञानरंजन

 (17 मई 2022 को रानी दुर्गावती संग्रहालय जबलपुर की कला वीथ‍िका में कदमसंस्था के आयोजन में पहल के संपादक ज्ञानरंजन का दिया गया व्याख्यान)


श्रोताओं, जब मैं आपके सामने अपने छोटे वक्तव्य की शुरुवात करने जा रहा हूँ, एक सूचना देना चाहूँगा कि दुनिया की एक तिहाई मिट्टी दूषित और खराब हो चुकी है। क़दम संस्था के निर्माता योगेश गनोरे जी के लम्बे और निरन्तर आग्रह के बाद बहुत संकोच के साथ आज मैं यहाँ उपस्थित हूँ। याद नहीं कितने सालों बाद आज यह संक्षिप्त व्याख्यान देने जा रहा हूँ। मैं देश दुनिया के पर्यावरण के लोकप्रिय सूत्रों को आपके समक्ष रखना चाहता हूँ। यहाँ यश-गाथा, आलोचना और समीक्षाओं के साथ क़दम की लम्बी यात्रा के दौर को देखा जा सकता है। इसमें एक दिग्दर्शन भी है। यह देखना ज़रूरी है कि क़दम के घनीभूत क्रियाकलापों में, आत्मीय आंदोलन, पर्यावरण प्रेम, प्रकृति से संवाद के बीच बौद्धिक जागरण और चेतना की कोई भूमिका है कि नहीं। कहीं चले जा रहे हैं, केवल चले जा रहे हैं, इस हवा में यांत्रिकता तो नहीं उभर रही है? ज़रूरत है कि समय के आयने में अपने समर्पण को भी देखें।

बंधुओं, जब आप अपनी सोद्देश्य दिनचर्या में डूबे रहते हैं, स्वप्न देखते हैं, तल्लीन और मशगूल रहते हैं तो यह एक स्थानीय हरक़त और समाचार होता है। पौधा ब्रह्माण्ड से जुड़ा है और विश्वदृष्टि विकसित करने के लिए प्रेरित करता है। इस जबलपुर शहर में पौधे से जुड़ा क़दम का कार्य-व्यापार है। वह घट रहा है या बढ़ रहा है, इसे देखिये। क़दम के सदस्यों, भक्तगणों, कार्यकर्त्ताओं, परिवार जनों, स्कूली बच्चों और जन्मदिन को पौधारोपण से यादगार बनाने वाले अनाम साथियों - आप पौधा लगा रहे हैं, दीपक जला रहे हैं, आप मोमबत्तियां लेकर चल पड़े हैं। आपका काम क़ीमती, आदर्शों से भरा, स्थानीय और आत्मजयी है। इस अवसर पर थोड़ा अगल बगल, आगे पीछे भी देखते चलें। अपने ही देश में अभी चार-पाँच दशक पूर्व दक्षिण के क़ीमती चंदन के जंगल तस्करी की भेंट चढ़ गये। वीरप्पन को घेरा नहीं जा सका। उसके मरणोपरान्त भी सिलसिला चला हुआ है। पाखण्ड देखिये कि अब मध्यप्रदेश में सत्ता चंदन के जंगल लगायेगी। इसी इलाके में हाथीदांत की तस्करी भी हुई और हज़ारों हाथियों की हत्या होती रही।  इसलिए मुझे एक अनाम कवि की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं - केवल दो चार पंक्तियाँ सुनें -

आज  जो  अंकुर है

कल वही पौधा होगा

और   परसों   वही

बाज़ार का सौदा होगा

पेड़ अखिल विश्व के काला बाज़ारों में खप रहे हैं। कहानी नई नहीं पुरानी है और हालत गंभीर हैं। आप एक पौधा लगाते हैं, सारी शक्ति झोंक देते हैं, समूची दुनिया एकत्र हो जाती है और दूसरी तरफ सौ वृक्ष कट जाते हैं। यह सच्चाई आपको निराश करने, हताश करने के लिए नहीं बता रहा हूँ, दिमाग़ी तौर पर मज़बूत बनाने की कोशिश कर रहा हूँ।

दोस्तों, संसार से करोड़ों ज़रूरी चीज़ें लुप्त हो गईं, हर दिन हो रही हैं। इनमें क़ीमती चीज़ें और व्यर्थ की चीज़ें भी होती हैं। इन क़ीमती चीज़ों का पुनर्जन्म नहीं होगा। ये मनुस्मृति के दायरे से बाहर होंगी। ये हमारा ही करिश्मा है। हमारी धार्मिक आस्थाएँ एवं मिथक हैं। ये आस्थाएँ  पहाड़ों, जंगलों, नदियों को; मूलतः प्रकृति को ही नष्ट कर रही हैं। आत्महत्याओं को हमारी उन्मादी जनता आस्था कहती है। प्राचीन आस्थाओं में वृक्ष भी बचता था और जीवन भी। अब आस्था मग़रूर लोगों, शास्ताओं का हथियार है। मतलब आदमी वैचारिक भ्रष्ट है तो वृक्ष नहीं बचेंगे।

मैं अपनी मुख्य शुरूवात, दो कविताओं के पाठ से करूँगा। पहली कविता सुप्रसिद्ध कवि नरेश सक्सेना की है और दूसरी राजस्थानी कवि विनोद पदरज की; जिनकी कविताएँ इसी सभागार में क़दम के तत्वावधान में पढ़ी गईं थीं। नरेश सक्सेना की कविता का शीर्षक है - एक वृक्ष भी बचा रहे और विनोद पदरज की कविता - सौ पेड़ों के नाम का । इन कविताओं का सीधा सम्बन्ध क़दम के उद्देश्यों से है। लेकिन इन कविताओं ने पर्यावरण पर विश्वदृष्टि फेंकी है और ये हमें अपने कार्यों को संसार के बड़े विमर्शों से जोड़ती हैं। सुनिये -

अंतिम समय में जब कोई नहीं जायेगा साथ

एक वृक्ष ही जायेगा

अपनी चिड़ियों-गिलहरियों से बिछुड़कर

साथ जायेगा एक वृक्ष

अग्नि में प्रवेश करेगा वही मुझसे पहले

 

कितनी लकड़ी लगेगी

श्मशान की टाल वाला पूछेगा

ग़रीब से ग़रीब से ग़रीब भी सात मन तो लेता ही है

 

लिखता हूँ अंतिम इच्छाओं में

कि बिजली के दाहघर में हो मेरा संस्कार

ताकि मेरे बाद

एक बेटे और बेटी के साथ

एक वृक्ष भी बचा रहे संसार में।

दोस्तों, संदेश है कि जब तक रूढ़ियाँ नहीं टूटेंगी, हमारे लक्ष्य पूरे नहीं होंगे। बिजली के दाहघर पर इस हिन्दू देश में क्यों ताले पड़े हैं; यह हमारे समग्र दायित्व-बोध का हिस्सा है।

विनोद पदरज की कविता :- सौ पेड़ों के नाम’ -

साढ़ बीत जाता था

पुरवा नहीं चलती थी

बरखा नहीं होती थी

तो अपनी सांवली चट्टान जैसी पीठ

बीजणी की डण्डी से खुजाते

बाबा कहते थे

सौ पेड़ों का नाम लो

पुरवा चलेगी  बरखा आएगी

 

पर मुझको तो याद नहीं थे

सौ पेड़ों के नाम

आम  पीपल  बड़

शीशम और पलाश

खैर  खिरणी  धौंक

नीम  बबूल  अमलतास

फिर मैं चुप हो जाता था

बड़े भाई कुछ और नाम जोड़ते थे

काका कुछ और

अंततः बाबा ही

सौ पेड़ों के नाम लेते थे एक सांस में

पुरवा चलने लगती थी

बरखा होने लगती थी अटाटूट

ताल तलैया भर जाते थे

खेत तरबतर हो जाते थे

 

बाबा चले गये

और किसी को याद नहीं सौ पेड़ों के नाम

जितने नाम हम लेते हैं

उतनी सी बरखा होती है।

आप सभी को याद होगी अपने बचपन की जब लाखों बच्चे आती-पाती’, ‘आम की पातीका खेल खेलते थे और वनस्पतियों के प्रति प्रेम शुरू से पुष्ट होता था।

संदेश देखें कि स्मृति-लोप, पर्यावरण के सवाल और क्रिया-कलापों में शुद्धता गार्ड करना कितना ज़रूरी है। गार्ड लठैत नहीं करते, हमारा विवेक करता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे मंच पर घुसपैठ है और एक चतुर व्यापारी कविता पढ़ जाता है।

बहरहाल, कविता में एक शोक है, अतीत का लोप है और उसके दुष्परिणाम। क्या क़दम के उद्देश्यों के बीच यह ऐतिहासिक गतिरोध नहीं है? कविता अपना आत्मलोचन भी करती है।

दोस्तों, आइये देखें कि हमारी दुनिया में क्या हो रहा है। बीसवीं सदी के बाद अब इक्कीसवीं सदी में सत्ता, राजनीति, समाज, संस्कृति, पर्यावरण और शक्ति की संरचनाओं के सम्मुख मनुष्य की नियति से जुड़े जो कठिन प्रश्न उठे हैं  उनका सामना कठिन हो गया है।

हमारे समय में करोड़ों चीज़ें गायब हो रही हैं। यह चोरी नहीं सभ्यता पर डकैती है। क्योंकि गायब होने की गति तूफानी है। यह कैसा समय है कि जल्लाद आनंद से झूम रहे हैं। मैना के पंख गायब हो गये हैं। जूते हैं  पर पैर नहीं। सरगोशियाँ हैं पर स्पंदन नहीं। बीस लाख लोगों के इस शहर में एक अकेला पौधा जूझ रहा है। मित्रों, समय बहुत दुष्ट चीज़ है, आसानी से पकड़ में नहीं आता। महाभारत में यक्ष युधिष्ठिर से पूछता है कि दुनिया में सबसे मूल्यवान क्या है? युधिष्ठिर का उत्तर है - समय। और यही समय हमारी हथेलियों से रेत की तरह झर रहा है। पौधों में जो मिट्टी हम डाल रहे हैं वह कितनी आर्गेनिक (जैविक) है  हम नहीं जानते। जगह जगह की मिट्टी, पानी बदल जाते हैं, इसलिए पहचान कठिन है।

करोड़ों चीज़ें गायब हैं और हम याद करें तो सौ दो सौ चीज़ें याद रह गयी हैं। तितलियाँ गायब हैं, जुगनू नहीं दीखते, गौरैय्या गायब है और कव्वे। गुल्लक गायब है और वीणा। अमेज़ान के जंगल कम हो गये, ब्राजील के जंगल जल गये। मनुष्य मात्र एक फेंफड़ा लेकर जीवित है। बांसुरी गायब है और कदम्ब का पेड़। सारंगी गायब है और सुरपराग। लाहुल स्पिति में बारिश नहीं होती। नैनीताल गेठिया से तीस मील दूर झरने की आवाज़ आती थी। सन्नाटे गायब हैं, शोर भरपूर है। काली घनी रातें दिखाई नहीं देतीं, आकाश बदल गये हैं। स्मृति लोप इतना है कि मुझे तीन जगह 17 तारीख दर्ज़ करनी पड़ी। और ट्रैफिक जैम इतना है कि घड़ियाँ बेकार हो गईं। भवानी भाई के सतपुड़ा के घने जंगल वैसे नहीं रह गये। हरी घाटी गायब है। नीलगिरि गंजी हो गयी और सुंदरबन में अब सुंदर नहीं बचा। दण्डकारण्य में अब बारूद की गंध भर गई है। इसी शहर के कथाकार तरुण भटनागर के उपन्यासों से पता चलता है कि जब तक जंगल जंगलियों के पास था, सुरक्षित था अब नये नागरिक आप हैं, जंगलों का नया रजिस्टर लेकर तबाह करने।

मैं आपको वृक्षों के आयाम और त्रासदी के उदाहरण दे रहा हूँ। क्योंकि सरस्वती लुप्त हुई तो वाटर-वर्ल्ड आने ही थे। शहनाई गायब हो रही है तो डी जे विकल्प बना। हमारी आस्थाओं ने विकृतियों को जन्म दिया है। पता नहीं किन ओस की बूंदों से नहाई दूबों से पूजा पाठ हो रहा है। ऐसा नहीं कि पेड़ों को बचाने के सकारात्मक आन्दोलनकारी क़दम नहीं उठे। उठे पर पैर तोड़ दिये गये। उत्तराखण्ड के जंगलों को बचाने के लिए सौ साल से कोशिश हुई। चिपको आंदोलन हम भूले नहीं। हज़ारों मर्द औरतें पेड़ों का आलिंगन कर अड़े रहे, लेकिन यात्राओं ने, विकास की अंधी अवधारणाओं ने पेड़ काट डाले। आजीवन उपवास करने वाले मर गये। इतिहास में तो दर्ज  है पर प्रेरणाओं में नहीं, शिक्षा में नहीं। उत्तराखण्ड के पहाड़ दरक गये, झरने कुपथगामी हो गये। गांव गायब हो गये, लेकिन वृक्षों की कटाई का विकास नहीं थमा।

साथियों, अगर वृक्ष नहीं कटेगा तो सभ्यताओं का रंग रोगन कहाँ से आयेगा। टिम्बर, वार्निश, पालिश कैसे बनेगी? ये सवाल बहुत सारे लोगों से बार बार पूछे जाने चाहिए। इन सवालों को उठाया जाना ही उनके उत्तर पाने एवं समाधान ढूढ़ने की दिशा में पहला क़दम होगा। ज़रूरी यह है कि ये सवाल उठाये जायें हर मंच से क्योंकि सारे समाधान और विकल्प अंततः इन्हीं के बीच से निकलकर आएंगे। हमारी दुनिया विकल्पहीन नहीं है, पर उस तक पहुँचने के लिए कठोर क़दम उठाने होंगे। समग्र दायित्वबोध एक चुनौती है; इसमें एक नहीं असंख्य चुनौतियाँ शामिल हैं। इन्हें दिमाग के दर्पण में देखें और विमर्श करें। छोटे-छोटे समूह बनायें और क़दम बढ़ाएं। अन्यथा रासायनिक कूड़े से कितनी मछलियाँ मारी जायेंगी, कितनी जलधाराएँ अपवित्र होंगी, कितने वन उजाड़ होंगे, हमें इसका डेटा नहीं पता चलेगा।

यह उचित है कि रथ हम सब मिलकर खींचें। इसी को समग्र दायित्वबोध कहेंगे। लेकिन हर व्यक्ति की विधा भिन्न है, उसकी रचनात्मक शैलियाँ भिन्न हैं। हिन्दी पट्टी में पहला महत्त्वपूर्ण उपन्यास वीरेन्द्र कुमार जैन का था - डूब। जिन्होंने हरियाली पर, नागरिक बसाहट पर विकास के बुल्डोजर का मार्मिक चित्रण किया। इसके बाद टिहरी की डूब हमारे इतिहास में दर्ज़ है; इसकी महान औपन्यासिक रचना विद्यासागर नौटियाल ने की। नर्मदा बचाओ आंदोलन भी लम्बा खिंचा, पर असफल हुआ। उसे प्रेमशंकर रघुवंशी ने अपनी लम्बी कविता में गुंजित किया। कई बार आंदोलन असफल होते हैं। बड़े बांधों ने नदियों का चरित्र बदल दिया; उन्हें जलाशयों में बदल दिया। हमारे शहर में हज़ारों गाँच, बरगी की डूब में आये। इसे लोग भूल गये और नये सौन्दर्य, सैर-सपाटे में व्यस्त हो गये। कृतघ्न जातियों का यही हश्र होता है, वे प्रकृति विनाश का जश्न मनाती हैं। हाल ही में बुलेट ट्रेन की कल्पना हमारा नया आघात था। पेड़ों की गणना नहीं कर सकते जो काटे गये। वह तो मुम्बई में आरे के जंगल बचाने का जबरदस्त जन-आंदोलन हुआ और कुछ बचा। हमारे संसार में यह सब घटित हो रहा है  तो आपको उसे देखना होगा। यही समग्र आत्मबोध की परिकल्पना है। हमारे देश में एक प्राचीन मिथक है। जब सृष्टि डूब रही थी, जल प्रलय के दिन, तब वट का एक पत्ता जल के ऊपर बचा रहा। विश्वास है कि वही सृष्टि को बचायेगा। यह वृक्ष प्रयाग में संगम के किनारे है, जो अब किले के भीतर है। सेना के और रिजर्व र्बैंक के कब्ज़े में। नहीं तो लोग उसका पूजा पाठ शुरू कर देते और महान मिथक को निरर्थक बना देते।

हमारे शहर में क़दम संस्था एक वृक्ष की शक्ल ले रही है, उसकी शाखाएँ कई स्थानों पर तैयार हो रही हैं। मुहावरे में कहें तो, ‘जितनी शाखाएँ उतने पेड़। क़दम की तस्वीर अभी तो सुन्दर है। कभी-कभी तस्वीरें और छवियां एक व्यक्ति के जीवन में दूर भविष्य तक जीवित रह सकती हैं।

लेकिन जब विस्तार होता है तो भीड़ सदस्य बनने लगती है। चेतना मंद होने लगती है। उद्देश्य की पवित्रता सफलताओं के आगे सोने लगती है। सुख मिलने लगता है। आप जो क़दम के नियंता हैं, योजनाकार हैं, बलिदानी हैं, संगतकार हैं  कैसे देखेंगे कि मात्र श्रेय लेने वाले भी तो आपके आंगन के चारों तरफ नहीं मंडरा रहे हैं।

बहरहाल, आप जिस सीढ़ी पर हैं  वहाँ से भविष्य को देखने के लिए गजानन माधव मुक्तिबोध की कुछ सुनहरी पंक्तियों का उदाहरण दूंगा ताकि कविता से शुरू होकर कवि के बयान पर ही अंत हो -

‘‘वीरान मैदान, अंधेरी रात, खोया हुआ रास्ता, हाथ में एक पीली मद्धम लालटेन। यह लालटेन समूचे पथ को पहले से उद्घाटित करने में असमर्थ है। केवल थोड़ी सी जगह पर ही उसका प्रकाश है। ज्यों ज्यों वह क़दम बढ़ाता जायेगा, थोड़ा थोड़ा उद्घाटन होता जायेगा। चलने वाला पहले से नहीं जानता कि क्या उद्घाटित होगा। उसे अपनी पीली मद्धम लालटेन का ही सहारा है। वह शुरू में यह भी नहीं बता सकता कि रास्ता किस ओर घूमेगा और किन किन वास्वतिकताओं का सामना करना पड़ेगा।’’

आपके लिए अपने पथ पर बढ़ते जाने का काम ही महत्त्वपूर्ण है। यही आपका प्राप्य है, यही आपकी खोज है। यही आपका आत्मसंघर्ष है।?

विश्वास है मेरे मंतव्य को, इशारों को आप लोगों ने ग्रहण किया होगा।


‘’और सुकरात चला गया’’ : रजनीश ने आज से 52 वर्ष पहले जबलपुर को कहा था अलविदा

आचार्य रजनीश ने आज से ठीक 52 वर्ष पूर्व 30 जून 1970 को जबलपुर को अलविदा कहा था। जब वे जबलपुर छोड़ कर बंबई जा रहे थे , तब उन्होंने जबलपुर की ...