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बुधवार, 25 जनवरी 2023

पौराण‍िक पात्रों से समकालीन सवालों का साहस है ‘भूमि’/पंकज स्वामी


लगभग डेढ़ दशक में देश के समकालीन रंगकर्म में जबलपुर के रंग समूह समागम रंगमंडल की विशि‍ष्ट पहचान बन चुकी है। हिंदी पट्टी में समागम रंगमंडल को सर्वाध‍िक संभावनापूर्ण और प्रयोगधर्मिता के लिए जाना-पहचाना जाता है। समागम रंगमंडल के मंचित नाटकों की विशेषता उनका समकालीन मुद्दों से टकराहट है। समागम रंगमंडल ने आशीष पाठक लिखि‍त और स्वाति दुबे निर्देश‍ित नए नाटक ‘भूमि’ का मंचन पिछले दिनों जबलपुर में किया। यह नाटक का दूसरा मंचन था। इस मंचन से कुछ दिन पूर्व नाटक का पहला मंचन जयपुर के जयरंगम में हुआ। 

‘अगरबत्ती’ की सफलता के बाद आशीष पाठक से उनके नाट्य लेखन को ले कर हर समय उत्सुकता रहती है। उन्होंने 25 वर्षों के नाट्य जीवन में 17 नाटक लिखे हैं। आशीष पाठक ने इंटर कॉलेज नाट्य प्रस्तुतियों के लिए स्वयं के लिखे विषकन्या नाटक से शुरूआत की थी। इसके पश्चात् सुगंधि, सोमनाथ व अगरबत्ती का निर्देशन किया। हयवदन के निर्देशन ने उनके लिए व्यापकता व विस्तार का द्वार खोला। 

वर्ष 2008 में आशीष पाठक ने समागम रंगमंडल नाट्य समूह गठित किया। समूह के गठन के साथ उन्होंने पॉपकार्न नाटक का लेखन किया और समागम की पहली प्रस्तुति के रूप में दर्शकों के समक्ष पेश किया। एकल अभ‍िनय पर केन्द्र‍ित पॉपकार्न दर्शकों के लिए हवा का ताजा झोंका था। पॉपकार्न के पश्चात् आशीष पाठक ने एक नया नाटक रेड फ्रॉक को लिख कर मंच पर प्रस्तुत किया। यह प्रस्तुति भी विचारधारा के अंतर्विरोध को दर्शाती थी। नाटक की विषयवस्तु ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया। इस नाटक के पश्चात् समागम रंगमंडल ने अपनी प्रस्तुतियों में मुख्यधारा के कलाकारों से किनारा कर लिया और कॉलेज के विद्यार्थ‍ियों व नवोदित कलाकारों को अवसर देना प्रारंभ किया। आशीष पाठक यहां से एक बार फिर बुनियादी स्तर की लौटे। उन्होंने डकैत चूहे में बेक स्टेज करने वाले एक कलाकार को मुख्य भूमिका निभाने का अवसर दिया।

आशीष पाठक ने समागम रंगमंडल के माध्यम से पारम्परिक स्क्र‍िप्ट के स्थान पर स्वयं के लिखे या असामान्य विषयों को नाट्य रूपांतरण कर नाटक की विषयवस्तु बनाया है। नाट्य रूपांतरण के रूप में प्रस्तुत किया गया आशीष पाठक का सुदामा के चावल उनकी महत्वपूर्ण प्रस्तुति है। हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचना को उन्होंने तीव्रता के साथ मंच पर प्रस्तुत किया। सुदामा के चावल से राजनैतिक सत्‍ता पर कठोर प्रहार किया है। इस नाट्य प्रस्‍तुति को राजनैतिक दवाब का सामना भी करना पड़ा है। मध्‍यप्रदेश में तो आयोजक सुदामा के चावल के मंचन से बचने लगे हैं। सुदामा के चावल को अहीराई नृत्‍य शैली में प्रस्‍तुत कर रंगकर्म का नया फार्म प्रस्‍तुत किया गया। इस प्रस्तुति में परसाई काव्‍यात्‍मक रूप में दर्शकों के समक्ष आए।

समागम रंगमंडल की इसके पश्‍चात् की प्रस्‍तुतियां रावण, सराय और यहूदी की लड़की में लोक तत्‍व एवं संगीत  का उपयोग बखूबी किया गया। यहां एक बात गौरतलब है कि प्रस्तुतियों का लोक तत्‍व जटिल नहीं है, बल्कि वह दर्शकों से तदात्‍म स्‍थापित कर लेता है। लोर्का लिखित बिरजिस कदर का कुनबा समागम रंमंडल की एक महत्‍वपूर्ण प्रस्‍तुति है। जटिल विषय पर आधारित इस प्रस्‍तुति में कॉलेज विद्यार्थ‍ियों जैसे अनगढ़ कलाकारों से होशि‍यारी से काम लिया गया। समागम रंगमंडल अपनी प्रस्‍तुतियों में नाट्य लेखक को बराबरी से श्रेय देती है। महेश एलकुंचवार के वासांसि जीर्णानी के मंचन के लिए आशीष पाठक व स्वाति दुबे ने लेखक से व्‍यक्तिगत मिलने की काफी जद्दोजहद की। नागपुर में बार-बार जा कर आखि‍र एक दिन आशीष पाठक महेश एलकुंचवार से मिलने में सफल हो गए। नाटक की चर्चा के साथ आशीष पाठक लेखक को उनकी रायल्‍टी देने में भी ईमानदारी दिखाई। इस प्रस्‍तुति को एक संवाद की यात्रा के नाम से प्रस्‍तुत करते रहे। आशीष पाठक अपने लिखे नाटक को निरंतर अद्यतन करते हुए प्रयोग की प्रक्रिया में रहते हैं। अगरबत्ती नाट्य प्रस्तुति के लिए उन्होंने काफ़ी शोध‍ किया। इसके लिए वे और स्वाति दुबे बुंदेलखंड एवं जालौन और आसपास के क्षेत्रों में गाए जाने वाले गीतों को खोज कर नाटक में प्रस्तुत किया है।  अगरबत्ती की खास‍ियत उसकी परिकल्पना व जटिलता है। आशीष पाठक अन्य नाट्य लेखक व निर्देशकों की तुलना में जटिलता में ज्यादा जाते हैं। 

आशीष पाठक ने ‘भूमि’ को लिखने में लगभग तीन-चार वर्ष का समय लगाया है। इसके लिए उनकी योजना एक डेढ़ वर्ष पूर्व शुरू हो चुकी थी। ‘भूमि’ दरअसल महाभारत के पात्र बभ्रुवाहन पर केन्द्र‍ित है लेकिन नाटक में अर्जुन और चित्रांगदा के चरित्र उभर कर सामने आते हैं। इन दोनों पात्रों के संवाद व विषयवस्तु के माध्यम से आशीष पाठक ‘भूमि’ को समकालीनता सवालों से जोड़ देते हैं। नाटक के पात्र और उनके विचार प्रतीक के रूप में सामने आते जाते हैं। नाटक के मुख्य पात्र अर्जुन व बभ्रूवाहन पुरूष हैं तो चित्रांगदा व उलूपी महिलाओं का प्रतिन‍िध‍ित्व करते हुए द्वन्दों को उभारती हैं। आशीष पाठक नाटक में अश्वमेध यज्ञ के माध्यम से साम्राज्यवादी विस्तार व इच्छाओं को इंगित करते हैं तो भूमि को स्त्री से जोड़ते हैं। वे भूमि को मिथकों से जोड़ते हैं। 

अर्जुन ने श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा के अलावा दो और विवाह किए थे। अर्जुन ने दूसरा विवाह मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा जिसका पुत्र बभ्रुवाहन और तीसरा विवाह उलूपी से किया था जिसका पुत्र अरावन था। बभ्रुवाहन अपने नाना की मृत्यु के बाद मणिपुर का राजा बनाया गया। जब युधिष्ठिर ने अश्वमेघ यज्ञ करवाया तो यज्ञ के घोड़े को बभ्रुवाहन ने पकड़ लिया था। घोड़े की रक्षा के लिए अर्जुन मौजूद थे तब बभ्रुवाहन का अपने पिता से युद्ध होता है और युद्ध में बभ्रुवाहन जीत जाता और अर्जुन मूर्छित हो जाता है। अपनी मां चित्रांगदा के कहने पर बभ्रुवाहन मृतसंजीवक मणि द्वारा अर्जुन को चैतन्य कर देता है। 

अर्जुन, चित्रांगदा, बभ्रूवाहन जैसे पात्रों को केन्द्र में रख कर रवीन्द्र नाथ टैगोर नाटक और जयशंकर प्रसाद ने कहानी लिखी है। इस कथा पर कन्नड़ व तेलगु में फिल्में बनी है। इन फिल्मों में कन्न्ड़ के सुपर स्टार राजकुमार और एनटीआर जैसे कलाकारों ने अभ‍िनय किया। हिन्दी में भी अलग अलग समय में दो फिल्मों का निर्माण हुआ। आधुनिक काल में आशीष पाठक ने इस विषयवस्तु पर नाटक लिख कर इसे समसामयिकता दी है। नाटक लिखने के बाद स्वति दुबे ने मण‍िपुर की यात्रा कर वहां की संस्कृति, वेशभूषा, मार्शल आर्ट जैसी बारीक बातों का अध्ययन कर उसे नाटक में उतारा। पिछले वर्ष जुलाई-अगस्त में समागम रंगमंडल ने मण‍िपुरी मार्शल आर्ट थांग-टा का बीस दिनों का एक वर्कशॉप आयोजित किया। इसके लिए उन्होंने मण‍िपुर से विशेष रूप से चिंगथम रंजीत खुमान को आमंत्र‍ित कर अपने कलाकारों को प्रश‍िक्षण दिया। थांग-टा मण‍िपुर का पारम्परिक मार्शल आर्ट है, जिसमें सांस की लय के साथ समन्व‍ित रूप से शारीरिक नियंत्रण का अभ्यास किया जाता है। थांग-टा में कलाकारों को भाले व तलवार का प्रश‍िक्षण भी दिया गया। जबलपुर के अमित सुदर्शन कलाकारों को केरल के मार्शल आर्ट कलारी पट्टू के साथ मणिपुरी मार्शल आर्ट का लगातार प्रशिक्षण देते आ रहे हैं। 

शोध, लेखन, यात्रा, प्रश‍िक्षण, थकाऊ रिहर्सल के बाद ‘भूमि’ दर्शकों के समक्ष मंचन के रूप में सामने आया। इस नाटक की डिजाइनिंग, क्राफ्ट व परिकल्पना में निर्देशक स्वाति दुबे की मेहनत स्पष्ट रूप से झलकती है। 90 मिनट की प्रस्तुति में उन्होंने एक एक दृश्य में खासी मेहनत की है। कलाकारों की आंगिक क्र‍ियाएं मंच पर देख कर महसूस होता है कि वे भी पूरे नाटक में डूबे हुए हैं। कलाकारों की स्पीच पर खूब मेहनत की गई। लंबे संवाद कहीं बोझ‍िल नहीं होते बल्क‍ि दर्शक मंच पर सामने देखते हुए एक एक शब्द व सशक्त संवाद को सुनने का जतन करते हैं। नाटक का गीत जाओ तुम पुरवा के संग लौट आना तुम में नृत्य व संगीत रिलेक्स पैदा करता है। यह गीत सोम ठाकुर का है और इसे संगीतबद्ध संजय उपाध्याय ने किया है। किसी पारम्परिक मणिपुरी लोक संगीत की तुलना में इस गीत को मंच पर प्रस्तुत करना ज्यादा प्रभावकारी सिद्ध हुआ।आशीष पाठक की लाइट डिजाइनिंग अद्भुत रही। बांस का सेट विषयवस्तु को आधार व मजबूती देता है। नाटक के अंत में अर्जुन व बभ्रूवाहन के बीच का खड्ग युद्ध की मौलिकता व स्वाभाविकता इससे पूर्व नाटकों में कभी देखने को नहीं मिली। स्वाति दुबे चित्रांगदा की भूमिका को अपने संवादों के जरिए विस्तार के साथ प्रभावी बनाती हैं। नवयुवती के अल्हड़पन से मां तक के भाव सहजता के साथ सम्प्रेष‍ित होते हैं। अर्जुन के रूप में हर्ष‍ित सिंह कहीं कहीं अनुभवी कलाकार स्वाति दुबे के समक्ष मंच पर संकोची प्रदर्श‍ित होते हैं। उन्हें मंच पर यह संकोच का भाव छोड़ना होगा। 

आशीष पाठक व स्वाति दुबे मण‍िपुरी पृष्ठभूमि में ‘भूमि’ को जिस सफलता से प्रस्तुत किया है, संभवत: ऐसा मण‍िपुर के रंग समूह नहीं कर सकेंगे। आशीष व स्वाति अगरबत्ती के धूसर से भूमि के व‍िभ‍िन्न रंगों में आए हैं। यह एक बदलाव है। ऐसी विविधता की ख्वाहिश लेखक व निर्देशक में होना अच्छी बात है। आशीष पाठक स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि जब वे मौलिक विषय पर नाटक लिखते हैं तो उनको स्वतंत्रता रहती है। यही स्वतंत्रता उनकी चिंगारी है। इस चिंगारी की कमी ‘भूमि’ में खलती तो ज़रूर है। बहरहाल आशीष व स्वाति की चम्बल से दूर पूर्वोत्तर की यह यात्रा लंबे समय तक देश के मंचों पर दिखती रहेगी और सराहना भी बटोरेगी।

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

विवाद और निर्विवाद के दो छोरों पर बंधी रस्सी पर चलने वाले विश्वभावन देवलिया

जबलपुर की वर्तमान रंग पीढ़ी विश्वभावन देवलिया को न तो जानती-पहचानती है और न उन्होंने उनका नाम सुना होगा। अरूण पाण्डेय ने किसी ज़माने में किसी संदर्भ में कहा था कि विश्वभावन देवलिया विवाद और निर्विवाद के दो छोरों पर बंधी रस्सी पर चलने वाले व्यक्तित्व का नाम है और तब तक रहेगा, जब तक लोगों की स्मृतियों में यह नाम किसी भी बहाने गाहे-बेगाहे कौंधता रहेगा। सातवें दशक की शुरूआत में जब जबलपुर में रंग संस्थाएं सामाजिक या जमींदारों के अत्याचार वाले नाटक कर रहे थीं, उस समय विश्वभावन देवलिया हयवदन,अबदुल्ला दीवाना, व्यक्तिगत, बदन, अंधायुग जैसे आधुनिक नाटकों का मंचन कर मीलों आगे चल रहे थे। उनके आगे चलने का कारण अध्ययन व नाटकों के प्रति असीम अनुराग था। विश्‍वभावन देवलिया के सभी नाटकों में जबलपुर की सभी रंग प्रतिभाओं की हिस्सेदारी रही थी। जबलपुर को आधुनिक रंगदृष्टि प्रदान करने वालों में विश्वभावन देवलिया का नाम निर्विवाद रूप से सबसे पहले है। ये बात अलग है कि उस रास्ते पर वे अपने बदतर प्रबंधन और लोगों को बहुत जल्द नाराज कर लेने के चलते ज्यादा दूर तक नहीं चल पाए। वे लोगों को बहुत जल्द अपना भी बनाते थे और फिर वही व्यक्ति उनके नाम से बिदकने लगता था। 

एक कस्बे‍ के मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे विश्वभावन देवलिया ने रंगमंच की शुरूआत रामलीला में लक्ष्‍मण के किरदार से शुरू की। मिडिल स्कूल के शिक्षक से विश्वविद्यालय के हिन्दी प्राध्यापक तक की यात्रा में काफी उतार चढ़ाव रहे। शिखर तक पहुंचने और वहां से वापसी की दास्तान के बीच ढेरों अखबारी जानकारी, जो सत्य और असत्य के छोरों के बीच अर्धसत्य सी झूलती रही और देवलिया वर्ष 1998 में दुनिया छोड़ गए। 

सातवें दशक में जबलपुर में रंग गतिविधियों का एक अड्डा रामानुजलाल श्रीवास्तवव ‘ऊंट’ का आवास था। यानी कि ऊंट के पुत्र विनोद श्रीवास्‍तव ‘खस्ता’ का घर। श्याम टॉकीज का रसवंती कैफे, रूपांजलि स्टूडियो, काफी हाउस और शेरे पंजाब होटल रंगकर्मियों के अन्य  अड्डे थे। दिव्येन्दु गांगुली, प्रभात मिश्रा, गोविंद मिश्रा, कुमार किशोर, बारेलाल खुशाल, मेर्लिन खुशाल, राजेन्द्र मोरे आदि नाटकों के स्टार माने जाते थे। इन सभी अड्डों पर काफी गहमागहमी हुआ करती थी। श्याम खत्री, राजेन्द्र दुबे, करूणाकर पाठक, मिर्जा अजहर बेग, कुलकर्णी बंधु, केके नायकर भी नाटकों में अभिनय किया करते थे। ऐसे समय विश्वभावन देवलिया ‘अनुकृति’ संस्था के लिए हरिशंकर परसाई की रचना ‘रानी नागफनी की कहानी’ का नाट्य रूपांतरण ‘लंगड़ी टांग’ की मंचन की तैयारी कर रहे थे। कलाकारों को भूमिकाएं सौंपने के साथ रिहर्सल होने लगी थी। रिहर्सल खस्ता जी के यहां होती थी। ‘लंगड़ी टांग’ में सुभाष पात्रो, गौरीशंकर यादव, अरूण श्रीवास्तव, अलखनंदन, पुष्पा  पचौरी, सतीश मदान, देवीदयाल झा शामिल थे।  नाटक की रिहर्सल कम होती थी और नाटक की तैयारियों को ले कर बातें ज्यादा होती थी। लोगों का आना-जाना लगा रहता था। 

इसी समय सन् 1973 में वर्तमान विवेचना रंगमंडल के निर्देशक अरूण पाण्डेय घूमने की दृष्टि से जबलपुर पहुंचे। उनका पूरा परिवार तो जबलपुर में व्यवस्थित हो चुका था, लेकिन अरूण पाण्डेय काशी व गंगा मोह के कारण बनारस में रूक गए थे। अरूण पाण्डेय जब छुट्टी मनाने जब जबलपुर पहुंचे तो वह समय अक्टूाबर व दशहरे के समय का था। सेठ गोविंददास के जन्म माह होने के कारण शहीद स्मारक अक्टूबर में रंग संस्थायओं को निशुल्क उपलब्ध होता था। शहीद स्मारक का प्रबंधन उस समय विश्वभावन देवलिया देखा करते थे। अक्टूबर माह में जबलपुर की रंग संस्थाओं की सक्रियता बढ़ जाती थी और हर दूसरे दिन नाटकों का मंचन होता था। रंगकर्म में रूचि होने के कारण अरूण पाण्डेय शहीद स्मारक पहुंच गए। उसी दिन ‘पांच लोफर’ का मंचन होने वाला था। अरूण पाण्डेय को वहां जानकारी मिली कि विश्वभावन देवलिया के नए नाटक की रिहर्सल खस्ता जी के घर में हो रही है। अरूण पाण्डेय शाम को जब खस्‍ता जी के घर पहुंचे तो वहां उनकी मुलाकात विश्वभावन देवलिया से हुई। देवलिया ने कहा कि भूमिकाएं तो सभी वितरित हो चुकी हैं। जोड़ने के लिहाज से अरूण पाण्डेय को प्रामप्टिंग का काम सौंप दिया। यहीं अरूण पाण्डेय की पहली मुलाकात गौरीशंकर यादव व अन्य कलाकारों से हुई। विश्वभावन देवलिया व अन्य लोगों से मुलाकात होने के बाद अरूण पाण्डेय को जबलपुर के रंग इतिहास, रंग खेमा, रंग उपलब्‍ध‍ियों और रंग उखाड़-पछाड़ से परिचित होने का मौका मिला। रिहर्सल देखने और काम करने के तरीके से वे विश्वभावन देवलिया की निर्देशकीय प्रतिभा के कायल हो गए। अरूण पाण्डेय की निरंतरता व समर्पण से प्रभावित हो कर या दाना डालने की प्रवृत्ति के चलते देवलिया ने अरूण पाण्डेय को ‘अनुकृति नाट्य संस्‍था’ का सचिव बनाने का वायदा किया। इसके बाद अरूण पाण्डेय की साइकिल देवलिया की मोपेड का पीछा करने लगी। इसी पीछा करने में अरूण पाण्डेय जबलपुर के रंग जगत व साहित्य  जगत से परिचित होते गए।        

विश्वभावन देवलिया अपनी मोपेड पर दिन भर शहर के इस कोने उस कोने तक भागा करते थे। उस समय जबलपुर का रंगमंच पूरी तरह दानदाताओं की दया पर ही निर्भर था। टिकट ले कर नाटक देखने की परम्परा न थी। इसी कारण विश्वभावन देवलिया ढेर सारे सेठों के चक्कर लगाते थे। वे घूम-घूम कर चंदा बटोरते और शाम को जब रिहर्सल में पहुंचते, तब तक थक कर निढाल हो जाया करते। ‘लंगड़ी टांग’ की डेढ़ माह की रिहर्सल में सारे कलाकारों ने विश्वभावन देवलिया को धोखा दे दिया या उनसे नाराज हो कर चले गए। अंत में कुछ लोग ही बचे, जिनके सहयोग से नाटक का मंचन संभव हो पाया। उस समय गंगा मिश्रा (आनंद) ‘अनुकृति’ की दूसरी पंक्ति के मजबूत स्तंभ थे। गंगा मिश्रा प्लाजा सिनेमा (अब की जयंती टॉकीज) में गेटकीपर थे। वे शाम को समय निकाल कर रिहर्सल में पहुंचते थे। गंगा मिश्रा ढेर सारे सपने देखते थे और एक दिन सपनों को पूरा करने के लिए बंबई भी पहुंच गए। वर्तमान में वे मुंबई की फिल्मी इंडस्ट्री से जुड़े हुए हैं। अनुकृति नाट्य संस्था  में विश्वभावन देवलिया, पुष्पा  पचौरी व गंगा मिश्रा ही स्थायी कलाकार व व्यक्ति थे। शेष लोग आते-जाते रहते थे। यह भी सत्य है कि एक न एक बार सभी ने विश्व‍भावन देवलिया के साथ काम किया। वे लोग दुबारा क्यों नहीं आए इसका जवाब विश्वभावन देवलिया ही दे सकते थे। पुष्पा पचौरी दरअसल विश्वभावन देवलिया की साली (पत्नी की बहिन) थीं। वे एक अच्छी व अग्रणी महिला कलाकार थीं, लेकिन कुछ वर्षों के पश्‍चात् रहस्‍यमय तरीके से उन्होंने आत्‍मदाह कर लिया।   

सबसे बड़ी समस्या यह थी कि विश्वभावन देवलिया रंगकर्म के साथ साहित्य व पत्रकारिता जगत में घुसपैठ कर रहे थे। यदि वे रंगकर्म को ही सिद्ध करते तो काफी आगे जाते और सफल होते। उन्होंने रत्नकुमारी, नर्मदा प्रसाद खरे, रामेश्वर शुक्ल अंचल के सहारे द्वारका प्रसाद मिश्रा (डीपी) का झंडा उठा लिया। तब प्रगतिशीलों और परम्परावादी साहित्यकारों का स्पष्ट विभाजन था। देवलिया परम्परावादी साहित्यकारों की ओर से प्रगतिशीलों पर कलम से हमला करते रहते थे। उनका व्‍यक्तित्‍व व जीवन विरोधाभास वाला था। एक ओर वे परसाई की रचना का नाट्य रूपांतरण कर नाटक का मंचन करते, तो दूसरी ओर हरिशंकर परसाई व ज्ञानरंजन जैसे प्रगतिशीलों का विरोध भी। ‘धर्मयुग’ के संपादक धर्मवीर भारती ने धर्मयुग में उनके कुछ लेख छाप कर बाद में मोहरे के रूप में इस्तेमाल कर प्रगतिशीलों पर आक्रमण करने में उन्‍हें अगुआ बनाया। विश्वभावन देवलिया ने दरबार कला के माध्यम और डीपी मिश्रा के आशीर्वाद से जबलपुर विश्वविद्यालय में प्राध्यापक का पद प्राप्त कर लिया।  

रंगमंच की कसौटी पर यदि विश्वभावन देवलिया को कसा जाए तो वे जबलपुर के पहले आधुनिक दृष्टि के निर्देशक थे। उनकी डाक्टरेट-'नाट्य प्रस्‍तुतिकरण: स्‍वरूप और प्रक्रिया' नाटक पर ही थी। कई नाटकों का उन्होंने निर्देशन किया। ढेरों कलाकारों को मंच से प्रारंभिक परिचय करवाया। जबलपुर से बाहर कई स्थानों में जा कर या वर्कशाप के माध्यम से ‘अंधायुग’ जैसे नाटकों का निर्देशन किया। वे उत्कृष्ट रंग समीक्षक रहे। नटरंग में उनके कई आलेख छपे। परन्तु उनका समस्त रंग व्यापार ‘मैं’ के इर्द-गिर्द ही सिमटने के कारण ज्यादा फल-फूल नहीं पाया और परम्परा विकसित नहीं हुई। वहीं उनके साथ के कई लोग रंगकर्म में अच्छा खासा नाम कमा पाए।

विश्वभावन देवलिया को जो-जो विस्तार मिलता गया, उसे वे संभाल नहीं पाए। मालवीय चौक व काफी हाउस में दसों साल तक उनका नाम लेने पर उन दिनों अठन्नी जुर्माना देना पड़ता था। देवलिया एकमात्र ऐसे किरदार रहे हैं, जो शहर की तासीर के मुताबिक हमेशा तौले जाते रहे। यह बात भी सत्य है कि उनकी तुला में नकारात्मकता का बांट दिनोंदिन ऐसा बढ़ता गया कि उनके शुभचिंतक भी उनसे मुंह चुराते नज़र आए।

विश्वभावन देवलिया का एक वृतांत चोरों के गिरोह बनाने का भी है। शहर के लगभग आठ शातिर चोर उनके चेले थे। ये चोर दिन भर रेकी कर रात में चोरी करते थे। चोरी के बाद देवलिया के घर में बैठ कर समान का बंटवारा और निबटारा किया जाता था। पुलिस ने कुछ ही दिनों में गिरोह को पकड़ लिया और सभी को सजा मिली। उन्‍होंने एक बार गेरूए वस्‍त्र धारण कर, बड़े-बड़े व दाड़ी रख कर संन्‍यासी का रूप धर लिया। उनके जीवन का यही विरोधाभास था। एक ओर तो वे हरिशंकर परसाई की रचना 'टार्च बेचने वाले' से प्रभावित होते और कुछ  दिन बाद टार्च बेचने वालों जैसा ही रूप धर लेते। इसी रूप में देवलिया प्रसिद्ध छायाकार रजनीकांत यादव के दाना गोदाम स्थित आकार स्‍टूडियो में पहुंचे। उस समय रजनीकांत यादव व उनके भतीजे मुकुल दोनों की काफी देर तक विश्‍वभावन देवलिया को पहचान नहीं पाए। देवलिया ने जब अपना परिचय दिया तो दोनों भौंचक्‍के रह गए। रजनीकांत यादव ने स्‍मृति में तैरते हुए बताया कि देवलिया एक बार उन्‍हें चाणक्‍य नाम से मशहूूर डीपी मिश्रा की फोटो खिंचवाने के लिए साथ में ले कर गए थे।      

विश्वभावन देवलिया जैसे भी थे, वे जबलपुर शहर की उपज थे। उन्होंने शहर नहीं बनाया, लेकिन देवलिया को बनाने में जबलपुर शहर का ही योगदान है। वे शहर में कई लोगों के यहां नाटक के चंदे के लिए याचक बन कर जाते और वापसी में वे गाली बकते हुए निकलते। ऐन नाटक के दिन कलाकारों का फ्री पास के लिए उनसे झगड़ना और न मिलने पर न आना तो शहर की तब खासियत थी। दुख की बात यह है कि रंगमंच के योगदान पर उनकी चर्चा कम है और अन्य  कर्मों पर ज्यादा है। इसके लिए विश्वभावन देवलिया ही जिम्मेदार हैं। उनके अवसान पर कथाकार राजेन्द्र दानी की महत्वपूर्ण टिप्पणी थी-‘’यार वह क्या चीज होती है जो एक प्रतिभाशाली मनुष्य को इस फिसलन भरे रास्ते पर ले जाती है।‘’     

बुधवार, 28 अप्रैल 2021

एक व्यक्तित्व और थि‍एटर का सारा जहान : धर्मराज जायसवाल ‘डैडी’

 

मध्यप्रदेश एवं जबलपुर के स्वातंत्रोतर नाट्य लेखन, अभिनय, मेकअप व निर्देशन में धर्मराज जायसवाल एक महत्व‍पूर्ण व अनिवार्य नाम है। धर्मराज जायसवाल जबलपुर के हिन्दी नाट्य क्षेत्र में उस समय की देन हैं, जब देश स्वतंत्र हुआ था और हर व्यक्ति प्रत्येक परिस्थि‍तियों में एक आदर्श की खोज करता दिखाई दे रहा था। इसी समय देश का स्वतंत्र होना एक विशेष घटना थी, लेकिन साम्प्रदायिकता का दावानल भी लोगों को उद्वेलित कर रहा था। इन्हीं आदर्शों व दबावों के बीच धर्मराज जायसवाल का किशोर मन प्रभावित न हो ऐसा कैसे हो सकता था। धर्मराज जायसवाल ने अपने पूर्ववर्तियों की तरह राष्ट्र प्रेम से सराबोर नाटक लिखे और उनका मंचन किया। परन्तु उन्होंने स्वतंत्र भारत के पुनर्निर्माण और इसमें विकसित हो रही राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक विकृतियों को अपने नाटक की विषयवस्तु बना कर एक पहल भी की। ठेठ पारसी अंदाज में प्रस्तुत किए गए उनके नाटकों का मूल्यांकन हमारे समीक्षकों ने क्यों नहीं किया, यह समझ से परे है। शायद इसमें काल का फेर हो या स्व‍यं धर्मराज जायसवाल की आज की तरह की जनसम्पर्क शैली जैसे नजरिए की कमी। लेकिन धर्मराज जायसवाल जीवन भर इससे बेखबर रहे। जीवन भर की बेतकुल्लकफी व स्पष्‍टवादि‍ता ने उन्हें  आलोचकों व समीक्षकों से दूर रखा या वे उनसे दूर रहे। 

जबलपुर के नाट्य-सांस्कृुतिक क्षेत्र में ‘डैडी’ से पहचाने जाने वाले धर्मराज जायसवाल का पुराने किस्से सुनाना और उसे बयान करने का उनका रोचक ढंग इस बात को भी सिद्ध करता था कि वे अपने कलाकारों को सहजता के साथ से किसी दृश्य  के संबंध में गहराई से बता देते होंगे। खैर उनकी नाट्य यात्रा यहां से शुरू नहीं होती है। तीसरे दशक की शुरूआत में जब जबलपुर के चौधरी बैजनाथ प्रसाद जायसवाल के यहां धर्मराज ने जन्म लिया, तब चौधरी बैजनाथ ने सोचा नहीं था कि उनका यह पुत्र अपने पिता का खानदानी शराब का व्यवसाय बंद करवा देगा। चौधरी बैजनाथ प्रसाद जायसवाल पहलवान थे। उनकी दिली इच्छा थी कि उनका पुत्र धर्मराज भी उनकी तरह पहलवान बने और पारिवारिक शराब व गल्ले का धंधा करे। धर्मराज छठी-सातवीं कक्षा में पढ़ते हुए कविताओं व गीतों की तरफ आकर्षित हुए। उसी समय उनके पैतृक घर से कुछ ही दूरी पर स्थि‍त गढ़ा फाटक में कानपुर से से एक नौटंकी कंपनी आती थी। इसी नौटंकी को देख कर धर्मराज पहली बार में गहरे तक प्रभावित हो गए। लगभग वे प्रत्येक दिन नौटंकी देखने जाने लगे। उनके कविता, गीत व नौटंकी प्रेम देख कर पिता चौधरी बैजनाथ जायसवाल दुखी व नाराज हो गए। वहीं धर्मराज अपने पिता के शराब के धंधे से नाराज थे। उन्हें दुख इस बात का था कि लोग शराब पीने के बाद उनके पिता को ही भला-बुरा कहने लगते थे। एक दिन इसी नाराजगी ने धर्मराज जायसवाल को बाल मित्र रामकृष्ण नामदेव के साथ बंबई भागने को मजबूर कर दिया। दोनों बच्चे  बंबई पहुंच कर सीधे जबलपुर निवासी फिल्म उद्योग के स्थापित चरित्र अभिनेता कनु राय के पास पहुंचे। दोनों बच्चे कनु राय से पूर्व परिचित थे। कनु राय ने धर्मराज और रामकृष्ण नामदेव को एक फिल्म  में बाल भूमिका के लिए प्रस्ताव भी दिया, लेकिन तब ही दोनों को दूंढ़ते हुए घर वाले वहां पहुंच गए। कनु राय ने दोनों को वापस जबलपुर जाने की सलाह दी और चौधरी बैजनाथ जायसवाल ने भी शराब का धंधा बंद करने की कसम खा ली। इससे संतुष्ट हो कर धर्मराज 18 दिन बाद वापस जबलपुर आ गए। 

     धर्मराज और कानुपर की नौटंकी कंपनी का सिलसिला फिर शुरू हो गया। एक दिन नौटंकी वालों ने धर्मराज के सामने महिला पात्र की भूमिका करने का प्रस्ताव रख दिया। महिला पात्र की भूमिका उन्हें क्‍यों दी गई? इस प्रश्न के उत्तर में धर्मराज कहते थे कि उनकी कद-काठी और मधुर आवाज के कारण उन्हें महिला पात्र की भूमिका दी गई। धर्मराज अब दर्शक से एक कलाकार बन गए और गीत गाने लगे व नृत्य करने लगे। इसी नौटंकी में एक दिन मोदीबाड़ा नाट्य समिति के डी. वी. राव ‘नरेन्द्र और नरसिंहराव कोठाले ने धर्मराज को अभिनय व नृत्य करते देखा और उनसे प्रभावित हुए। राव व कोठाले से धर्मराज की मुलाकात ने नए रास्ते खोले। इस के बाद धर्मराज जायसवाल का बेनी ड्रामेटिक क्लब, डी. बी. बंगाली क्लब और सिटी बंगाली क्लब जैसी संस्थाओं से जुड़ाव हुआ। 

       मोदीबाड़ा नाट्य समिति के साथ जुड़ कर धर्मराज जायसवाल ने आगाजानी कश्मीरी के लिखे ‘हिंद महिला’ नाटक में अभिनय किया और इस नाटक में उन्होंने नायिका की भूमिका निभाई। ‘हिंद महिला’ के निर्देशक मुंशी खंजर थे। उन्होंने धर्मराज जायसवाल को उर्दू सिखाने में बड़ी मेहनत की। बाद में बंटवारे के वक्त मुंशी खंजर पाकिस्तान चले गए। इसके बाद जो सिलसिला शुरू हुआ तो दुर्गादास राठौर, शाहजहां, अमर बलिदान, वीरांगाना लक्ष्मीाबाई जैसे नाटक मंचित हुए। उन दिनों डी. एल. राय बंगला नाटकों के एक प्रसिद्ध लेखक थे और उनके ऐतिहासिक नाटक जबलपुर का बंग समाज करता था। शारीरिक बनावट, बनावट, सुरीली आवाज और अच्छी्हिन्दी होने के कारण धर्मराज जायसवाल का नायिका की भूमिका निभाने का सिलसिला चल रहा था। नायिका की भूमिका करने में रूपसज्जा (मेकअप) में समय लगता था। महिलाएं व लड़कियां धर्मराज जायसवाल को मेकअप में मदद करती थीं, लेकिन गर्मी के मौसम में संपूर्ण रूपसज्जा व महिला वस्त्रों  में उन्हें  तकलीफ और कोफ्त होती थी। दूसरों द्वारा रूपसज्जा किए जाने और इसमें ज्यादा समय लगने पर पर धर्मराज जायसवाल ने स्वयं मेकअप करने की ठानी। उनके इस निश्चय और सीखने की ललक ने उनको रंगमंच के एक बेहतरीन मेकअप उस्ताद के रूप में ला खड़ा किया। जिसकी दाद उस समय के पेशेवर लोग भी देते थे। धर्मराज के साथ टेलीकाम फैक्टररी के एक बांग्लाभाषी इंजीनियर भी नायिका की भूमिका निभाते थे। 

     धर्मराज जायसवाल को डी. एल. राय के लिखे ऐतिहासिक नाटकों को रंगमंच में प्रस्तुति करते हुए कुछ कमियां महसूस होती थीं। डी. एल. राय के नाटकों में एक पात्र लंबे समय तक संवाद बोलते थे और शेष पात्र रंगमंच में चुपचाप खड़े रहते थे। इसमें महिला पात्रों की भूमिका निभाने वाले कलाकार की हालत बुरी हो जाती थी और इस दशा को स्वयं धर्मराज जायसवाल भोग रहे थे। लंबे संवादों की समस्या से निबटने के लिए धर्मराज जायसवाल ने स्वयं नाटक लिखने का निर्णय लिया। इसकी शुरूआत उन्होंने प्रहसन से की। एकांकी लिखने के साथ धर्मराज जायसवाल ने सबसे पहले उर्दू नाटक ‘बागी’ लिखा। ‘बागी’ नाटक में धर्मराज जायसवाल ने छोटे किंतु ओजस्वी संवाद लिखे और पारसी थिएटर शैली को पूरी तरह आत्मतसात कर लिया। उस दौरान धर्मराज जायसवाल सोहराब मोदी की फिल्मों से भी प्रभावित थे, इसलिए ‘बागी’ के बाद के नाटकों में नाटकीयता काफी रही। 

      धर्मराज जायसवाल ने नाटकीयता और प्रस्तुतिकरण को सफलता का मापदंड मानते हुए पारसी थिएटर की शैली अपनाई। ‘बागी’ राष्ट्रीय एकता और साम्प्रदायिक सद्भाव पर आधारित नाटक था। विषय की समसामयिकता और कुछ यथार्थवादी दृष्टिकोण के कारण दर्शकों ने इसे पसंद किया। तीन-चार वर्षों में ‘बागी’ के लगभग 50-60 शो हुए, जो उस समय और आज के संदर्भ में भी आश्चर्यजनक बात थी। ‘बागी’ के साथ ही कुछ ऐसी बातें हुईं, जिन्हें  दुर्भाग्यपूर्ण और मज़ेदार भी माना जा सकता है। ‘बागी’ में पत्रकार शिवनारायण खरे ने एक लड़की की भूमिका निभाई, जिससे युगधर्म के तत्कालीन संपादक भगवतीधर वाजपेयी बहुत नाराज हुए और उनकी नाराजगी बाद में ख्वाजा अहमद अब्बास के नाटक ‘चौदह गोलियों’ के मंचन को ले कर और बढ़ गईं। 1955-56 में ‘बागी’ नाटक के एक मंचन के दौरान राबर्टसन कॉलेज में तेजाब कांड हो जाने से जबलपुर में लंबे अर्सें तक नाटकों का मंचन रूक गया। 

       इसी संदर्भ में एक बात महत्वपूर्ण है कि धर्मराज जायसवाल ने जबलपुर में नाटकों को कॉलेज तक पहुंचाया। ऐसा भी माना जाता है कि जबलपुर के कॉलेजों में स्नेन सम्मेलन के दौरान नाटकों के मंचन की देन और शुरूआत धर्मराज जायसवाल ने ही करवाई। कॉलेजों में नाटक मंचन के दौरान धर्मराज जायसवाल की मुलाकात जबलपुर के प्रसिद्ध कानूनविद् हीरा सिंह चौहान से हितकारिणी महाविद्यालय में हुई। धर्मराज ने एक नाटक के मंचन के दौरान हीरा सिंह चौहान को महिला पात्र की भूमिका सौंप दी। कॉलेजों में ही नाटक करते समय धर्मराज जायसवाल को ‘डैडी’ नाम भी मिल गया। जबलपुर के नाट्य क्षेत्र प्राय: सभी लोग उन्हें ‘डैडी’ नाम से ही ज्यादा जानते थे। ‘डैडी’ नाम मिलने का कारण यह था कि पांचवे व छठे दशक में लड़कियां नाटक में भूमिकाएं करने से हिचकती थीं। धर्मराज जायसवाल उनके घर-घर जा कर नाटकों में काम करने का अनुरोध करते थे। लड़कियों ने अपनी झिझक और सुरक्षा की गारंटी के लिए उनसे कहा। धर्मराज जायसवाल ने लड़कियों से कहा कि वे उन्हें ‘डैडी’ कह सकती हैं और 24-25 वर्ष के नौजवान को ‘डैडी’ नाम दे दिया गया। तब से मृत्युपर्यंत तक वे जबलपुर वालों के लिए सिर्फ ‘डैडी’ ही हो गए।

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शिमला की अखिल भारतीय नाट्य प्रतियोगिता में भाग लेने वाली टीम के सदस्‍यों में धर्मराज जायसवाल साथ में मेर्लिन खुशाल, मदन गुप्‍ता व श्‍याम गुप्‍ता

    धर्मराज जायसवाल ने ‘बागी’ के बाद अपने नाटकों में मेकअप और प्रस्तुतिकरण से दृश्य संयोजनों में विशेष ध्यान दिया। उन्होंने आने नाटकों में छोटी से छोटी भूमिका निभाने वाले कलाकारों के लिए बेहतर अवसर निकाले। ‘बागी’ की सफलता के पश्चात् उन्होंने ‘बर्फ की गोद’ और ‘सरहद’ नाटक प्रस्तुत किए। दोनों नाटक भारत चीन और पाकिस्तान के युद्ध पर आधारित थे। इन नाटकों में धर्मराज जायसवाल पूरी तरह आने फार्म में आ गए। लेखन, निर्देशन, प्रोडकशन, मेकअप से अभिनय तक उन्हों ने सभी क्षेत्रों में महारत दिखाई। उन्होंने अपने सभी नाटकों के मुहुर्त एम्पायर टॉकीज में किए। प्रेमनाथ व बीना राय स्‍नेह के कारण मुहुर्त में शामिल होते थे। प्रेमनाथ ने तो एक कदम बढ़ कर धर्मराज जायसवाल को रिहर्सल के लिए एम्पायर टॉकीज निशुल्क देते थे। इन्हीं  नाटकों से मदन गुप्ता, श्‍याम गुप्ता, बारेलाल खुशाल, मेर्लिन खुशाल व उनकी बहिन रानी जोसफ, मोटा दोसा एवं मणि दोसा जैसे कलाकार रंगमंच पर अवतरित हुए। इसी दौरान ‘झांसी की रानी’ फिल्म प्रदर्शित हुई और सफलता के झंडे गाड़े। इस फिल्म से धर्मराज जायसवाल अत्यंत प्रभावित हुए। इस फिल्म को देख कर उन्होंने रानी दुर्गावती पर ‘गोंडवाना की तलवार’ लिख कर रंगमंच पर प्रस्तुत किया। दो घंटे की अवधि वाले इस नाटक को सर्वप्रथम रेलवे स्टेशन के निकट सीनियर रेलवे इंस्टीट्यूट में मंचित किया गया। ‘गोंडवाना की तलवार’ के पहले मंचन ने ही दर्शकों को झकझोर दिया। धर्मराज जायसवाल के जोशीले संवाद, कलाकारों के अभिनय और उत्कृष्ट प्रस्तुतिकरण की खबरें जबलपुर से बाहर भी पहुंचीं। ‘झांसी की रानी’ फिल्म के पटकथा लेखक गाडरवारा के शंभूरतन दुबे थे। उन्‍होंने ‘गोंडवाना की तलवार’ को जबलपुर में देख कर पूरी टीम को गाडरवारा ले गए और वहां इसका विशेष प्रदर्शन करवा कर सभी कलाकारों को सम्मानित किया। इस नाटक में मनोहर महाजन व प्रकाश जैन ने भी अभिनय किया। अन्य कलाकारों में श्याम गुप्ता, प्रकाश गुप्‍ता और भरत वर्मा बाद में आकाशवाणी में चले गए। मनोहर महाजन भी रेडियो सीलोन में लोकप्रिय हुए। 

    मंचन की दृष्टि से ख्वाजा अहमद अब्बास लिखित नाटक ‘चौदह गोलियां’ का मंचन जबलपुर के रंगमंच के इतिहास की एकअसाधारण प्रस्तुति मानी जाएगी। यह नाटक राष्ट्रप्रेम के स्वर लिए हुए था। इस कारण अंग्रेज सरकार ने नाटक पर प्रतिबंध लगा दिया था। ‘चौदह गोलियां’ के संबंध में कई शोधार्थियों ने भी लिखा। नाट्य निर्देशक अरूण पाण्डेय ने अपने एक लेख ‘धर्म की तरह जिया गया रंगकर्म’ में लिखा- ‘’ यह बात भले किसी स्वंतत्रता संग्राम के इतिहास में भले दर्ज न हो किंतु इस शहर के रंगमंच के इतिहास में जरूर दर्ज है कि आजादी से दो साल पहले 1945 में जब अंग्रेजों का दमन चक्र अपनी चरम सीमा पर था, तब ख्वाजा अहमद अब्बास के नाटक ‘चौदह गोलियां’ के मंचन ने सनसनी मचाते हुए देखने वालों में देश प्रेम का जोश भर दिया था। नाटक की विषयवस्तु और उसको देख कर होने वाली दर्शको की प्रतिक्रिया से अंग्रेज हिल गए।‘’ अंग्रेजों ने नाटक पर प्रतिबंध लगा दिया। नाटक में सनसनी मचने का एक कारण यह भी था, इसमें एक दृश्य  में असली बंदूक का इस्तेमाल कर हवा में गोली चलाई गई थी। चौथे दशक के मध्य में नाटक देखने के लिए टिकट रखी गई और उस समय के हिसाब से वह महंगी थी,लेकिन लोगों ने महंगी टिकट ले कर नाटक देखने में कोई कंजूसी नहीं दिखाई। 

    धर्मराज जायसवाल अपने नाटकों में विषयवस्तु के अनुरूप यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास करते थे। ‘बागी’ नाटक में उन्होंने जबलपुर के गलगला क्षेत्र में हुए एक प्रदर्शन में दृश्य गीत में चालीस पठानों को संयोजित कर प्रस्तुत किया था। इससे जबलपुर के कट्टरपंथी नाराज हो गए थे। 1960 में शिमला में आयोजित होने वाल अखिल भारतीय नाट्य प्रतियोगिता में रेलवे ड्रामेटिक क्लब धर्मराज जायसवाल के निर्देशन में हिन्दी नाटक प्रस्तुत करता था। रेलवे ड्रामेटिक क्लब की ओर से पहली बार ‘सरहद’ नाटक प्रस्तुत किया गया। पहली ही बार में ‘सरहद’ ने पांच पुरस्कार जीते। ‘सरहद’ नाटक में बद्री प्रसाद सोनकर, श्याम पाठक, नारायण सिंह जिद्दी, एडवोकेट अशर्फीलाल यादव, देवीदयाल झा, राजेन्द्र दुबे, भरत वर्मा, रवि शुक्ल, नारायण अलबेला, सुखदेव, उषा एलिजाबेथ आदि कलाकारों ने जीवंत अभिनय कर प्रसिद्धि बटोरी। धर्मराज जायसवाल ने जानकारी दी थी कि इसी प्रतियोगिता मे हबीब तनवीर ने ‘मरघट के कुत्ते’ नाटक को प्रस्तुत किया था। 1961 में रेलवे ड्रामेटिक क्लब ने शिमला प्रतियोगिता में ‘जेल की रोटी’ प्रस्तु्त कर तीन पुरस्कार जीते। खुशाल दंपति भी शिमला में पुरस्कृत हुई। शिमला में पुरस्कार देने विशेष रूप से फिल्म अभिनेता आईएस जौहर व अचला सचदेव आए थे। धर्मराज जायसवाल व बारेलाल खुशाल के अभिनय से प्रभावित हो कर आईएस जौहर ने उन्हें फिल्मों में अभिनय करने का प्रस्ताव दिया। दोनों घरेलू जिम्मेदारियों के कारण बंबई नहीं जा पाए। इलाहाबाद, ग्वालियर और नैनीताल की प्रतियोगिताओं में ‘सरहद’ की स्क्रिप्ट की तारीफ हुई। 

    रेलवे ड्रामेटिक क्लब के लिए निर्देशन व अभिनय करते हुए धर्मराज जायसवाल रेलवे के एक वरिष्ठ अभियंता आईके पुरी के नजदीक आ गए। पुरी रिश्ते में मदनपुरी के भाई थे। आईके पुरी ने रेलवे ड्रामेटिक क्ल‍ब को सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए सहायता देने के लिए हर समय तत्पर रहते थे। पुरी ने ही धर्मराज जायसवाल को जस्टिस हिदायतउल्ला से मिलावाया। बाद में देश के उपराष्ट्रपति बने हिदायतउल्ला ‘सरहद’ नाटक देख कर काफी प्रभावित हुए थे। शिमला नाट्य प्रतियोगिता जीतने के पश्चाात् जबलपुर नगर निगम ने धर्मराज जायसवाल व उनके साथियों का नागरिक सम्मान किया। उस समय भवानी प्रसाद तिवारी महापौर थे।

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    धर्मराज जायसवाल के नाट्य जीवन में शहीद स्मारक ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस दौरान दूसरी संस्थाओं के लिए नाट्य निर्देशन व अभिनय करते हुए धर्मराज जायसवाल ने प्रतिभा कला मंदिर की स्थापना की। शहीद स्मारक की स्थापना और यहां सांस्कृतिक गतिविधियों के चालू होने के बाद प्रतिभा कला मंदिर ने भी सक्रियता से कार्य करना शुरू कर दिया। शहीद स्मारक के उद्घाटन के अवसर पर सेठ गोविंददास के दो नाटकों ‘शंकराचार्य’ व ‘सम्राट हर्ष’ का मंचन हुआ। सम्राट हर्ष का निर्देशन धर्मराज जायसवाल ने किया। इस नाटक में लगभग 60 कलाकारों थे। सम्राट हर्ष में धर्मराज जायसवाल के अनुरोध पर ज्‍योतिषाचार्य पंडित नाथूराम व्यास ने एक पात्र की भूमिका निभाई। उस समय कॉस्टिंग डायरेक्टर की कोई अवधारणा नहीं थी, लेकिन धर्मराज जायसवाल पात्रों के अनुरूप व्यक्तित्व व चेहरे दूंढ़ते रहते थे और उन्हें नाटकों में अभिनय का मौका देते थे। इस नाटक में धर्मराज जायसवाल ने ओपन स्टेज का प्रयोग किया था। यह प्रयोग इससे पूर्व न तो मध्यप्रदेश में हुआ था और न ही जबलपुर में। नाटक के मंचन के समय फिल्म अभिनेता पृथ्वीराज कपूर भी दर्शकों के बीच बैठे थे। वे नाटक देख कर प्रभावित हुए। उन्होंने नाटक की समाप्ति के पश्‍चात् धर्मराज जायसवाल के पास पहुंच कर ओपन स्टेज के प्रयोग के संबंध में पूछा। सम्राट हर्ष को लगभग 50 हजार दर्शकों ने शहीद स्मारक के खुले मैदान में देखा था। रंगकर्मी नवीन चौबे ने जानकारी दी कि सेठ गोविंददास के प्रयास से आगा हश्र कश्मीरी भी एक बार नाटक के मंचन के लिए जबलपुर आए। उनके उस नाटक में धर्मराज जायसवाल को भी अभिनय का अवसर मिला।    

    उस समय दर्शकों को नाटक से जोड़ने का एकमात्र सूत्र अभिनय था। सब कुछ अभिनय से करना पड़ता था, क्योंकि उस दौरान आज जैसी प्रकाश व ध्वनि संयोजन की व्यवस्थाएं नहीं थी। धर्मराज जायसवाल साइकिल के डायनमो से विशेष प्रकाश संयोजन और प्रभाव दिखाते थे। उस समय गढ़ा, घमापुर, सदर, राम मंदिर सतपुला की रामलीलाओं में भी इसका प्रयोग किया जाता था। प्रतिभा कला मंदिर का काम अपनी गति से चल रहा था। कलाकार नाटक से शौकिया रूप से जुड़े हुए थे। जहां नाटकों की रिहर्सल होती थी, उसके आसपास के लोग खाना, चाय और सेट बनाने के लिए कपड़ा वगैरह से मदद करते थे। सरकारी नौकरी करने के कारण कलाकार रात में एक बजे तक रिहर्सल करते थे। 

    धर्मराज जायसवाल को नाट्य प्रेम के साथ अपने भरे पूरे परिवार को भी पालना था। आजीविका के लिए 1949 में धर्मराज जायसवाल ने टेलीकाम फैक्टरी में नौकरी करना शुरू कर दी। नाटकों के कारण जीवन भर उनकी हाजिरी फैक्टरी में कमजोर रही। छठे दशक में धर्मराज जायसवाल ने जबलपुर के बाहर जा कर खूब रंगमंच किया। इसके साथ ही उन्होंने अपनी संस्था प्रतिभा कला मंदिर के माध्यम से रंगमंचीय नाटकों के अलावा शासकीय योजनाओं व कार्यों की जानकारी देने के लिए शिक्षाप्रद नाटक करने भी शुरू किए। सूचना प्रसारण मंत्रालय में 1952 में रजिस्ट्रेशन के बाद प्रतिभा कला मंदिर सरकारी योजनाओं को आम जनता तक पहुंचाने वाले नाटक करने लगी। यह क्रम उनकी मृत्यु तक चला। अब ये काम उनके पुत्र बब्लू संचालित करते हैं। प्रतिभा कला मंदिर के गठन को 70 वर्ष होने को आ रहे हैं। वर्तमान में प्रतिभा कला मंदिर के कलाकार जबलपुर में नुक्कड़ नाटक के माध्यम से कोरोना के खतरे से अगाह कर रहे हैं और मास्क पहनने के फायदे जन-जन तक पहुंचा रहे हैं। 

    छठे दशक में धर्मराज जायसवाल ने ‘गांधी का देश’ नाटक लिखा। ढाई घंटे के इस नाटक को गुलाबचंद दर्शनाचार्य की मदनमहल प्रकाशन ने पुस्तक के रूप प्रकाशित किया। उन्होंने छठे दशक के अंत में शहीद स्मारक की नाट्य गतिविधियों व प्रबंधन का काम विश्वभावन देवलिया को सौंप दिया। जानकारों का कहना है कि धर्मराज जायसवाल जबलपुर में रंगमंच के इनसाइक्लोपीडिया थे, इसलिए विश्वभावन देवलिया घंटों उनके साथ बैठ कर नाटक पर केन्द्रित डाक्टरेट के लिए जानकारी जुटाते रहते थे। देवलिया की डाक्टरेट को सराहना मिली और इसकी सामग्री को व्यावहारिक रूप से उपयोगी माना गया। शहीद स्मारक की जिम्मेदारी से मुक्‍त होने के बाद धर्मराज निश्चिंत हो कर अपने नाटकों में प्रयोग करने लगे। प्रयोग के साथ कई लोग उनसे जुड़ते भी गए। धर्मराज जायसवाल ने अपने कार्यक्रमों से ही प्रसिद्ध कलाकार कुलकर्णी बंधु, के. के. नायकर, रजनीकांत त्रिवेदी, गजेन्द्र  को मौका दिया। उनके नाटकों का संगीत के. के. उपाध्याय देते थे। विख्‍यात श्याम बैंड के संचालक ईश्वरी प्रसाद ने लगभग पन्‍द्रह वर्षों तक बेंजो बजा कर नाटक के पार्श्व संगीत को मधुर बनाया। धर्मराज जायसवाल के नाटकों में दादा शूलपाणि मुखर्जी और बाद में उनके पुत्र विद्युत मुखर्जी ने भी पार्श्व संगीत दिया। डबिंग आर्टिस्ट जरीना कादिर ने भी उनके नाटकों में काम किया। बाद में वे हैदराबाद जा कर फिल्मों में डबिंग आर्टिस्‍ट बन गईं।

    सातवें दशक आते-आते समानांतर फिल्मों  की तरह भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) का प्रभाव बढ़ने लगा। इसी के साथ ताजी हवा के झोंके आए। उसी समय अलखनंदन का नाम तेजी से उभरा। अलखनंदन के वेटिंग फार गोदो, गिनीपिग व बकरी नाटक अपनी विषयवस्तु व प्रस्तुतिकरण के कारण चर्चित हुए। धर्मराज जायसवाल ने इन नाटकों में न तो अभिनय किया और न ही निर्देशन, लेकिन वे प्रोडक्शन से ले कर मेकअप तक जुड़े रहे। उस समय अलखनंदन अपने कलाकारों से कहते थे कि यदि फ्री एक्टिंग सीखनी है तो धर्मराज जायसवाल से सीखो। अलखनंदन के भोपाल जाने के बाद धर्मराज जायसवाल को जबलपुर के थि‍एटर का बदलाव व परिवर्तन नहीं जमा। कुछ सालों के बाद अलखनंदन ने धर्मराज जायसवाल को ‘सतह से उठता आदमी’ फिल्म में एक संपादक की भूमिका करवाई। अलखनंदन इस फिल्म में मणि कौल के सहायक निर्देशक थे। यहा फिल्म वर्ष 1980 में रिलीज हुई थी। धर्मराज जायसवाल का कहना था कि जितने समय अलखनंदन ने जबलपुर में रह कर रंगकर्म किया वह जबलपुर के नाट्य क्षेत्र व विवेचना का स्वर्ण युग था।

    जीवन के अंतिम पड़ाव तक धर्मराज जायसवाल थके नहीं थे। अंतिम वर्षों में उन्होंने सक्रिय रंगकर्म तो नहीं किया, लेकिन किसी भी रिहर्सल या नाट्य प्रदर्शन में उनकी उपस्थिति को कोई टाल नहीं सकता था। जीवन के अंतिम क्षणों तक प्रतिभा कला मंदिर के माध्यम से धर्मराज जायसवाल और उनके ‘मजदूर कलाकार’ (यह धर्मराज जायसवाल के शब्द  थे) जन-जागरण की अलख जगाते रहे। प्रतिभा कला मंदिर में गौरीशंकर यादव ने भी शुरूआत में घूम-घूम कर नाटकों का मंचन किया। धर्मराज जायसवाल जन-जागरण वाले नाटकों में रंगमंच के कलाकारों की सहायता नहीं लेते थे, बल्कि वे स्वयं कहते थे कि उन्हें अपने मजदूर कलाकार इस प्रकार के माध्यम के लिए अधिक उपयुक्त लगते हैं। टेलीकाम फैक्ट्री में जब-जब धर्मराज जायसवाल का वेतन इंक्रीमेंट लगता, तब-तब वे अपने कलाकारों के मानदेय में भी बढ़ोत्तरी करते जाते।   

    धर्मराज जायसवाल को हर समय यह अफसोस रहा कि रंगकर्म में मेकअप विधा के प्रति बहुत कम लोगों की रूचि रही। वे कहते थे कि मेकअप करने में धैर्य की जरूरत होती है और धैर्यवान व्यक्ति उन्हें कोई दिखता नहीं। अपवाद स्वरूप वे कश्यप झा का नाम लेते थे। उनका मानना था कि जबलपुर में कश्यप झा ने मेकअप को गंभीरता से सीखा। उनसे मेकअप की कला नवीन चौबे ने भी सीखी और वे इच्छुक नए लोगों को सिखाते जा रहे हैं।   

    धर्मराज जायसवाल जब उम्रदराज हुए तो, वे झक सफेद शर्ट व पेंट और ब्राउन रंग के फेडोरा हेट के साथ काले जूते पहने नजर आते थे। उनके पास स्वेगा मोपेड थी, जिसमें घर गंजीपुरा से निकल कर सुपर मार्केट काफी हाउस में आते और यहां कुछ देर बैठ कर चाय पीते थे। प्रतिदिन उनका एक चक्कर शहीद स्मारक में जरूर लगता था। शहीद स्मारक में उनके प्राण बसते थे, क्योंकि यहां उन्होंने नाटकों का मंचन कर जीवन के बेहतरीन क्षण बिताए थे। वर्सेटाइल होने के कारण उन्हें जबलपुर का वी. शांताराम कहा जाता था। 

    धर्मराज जायसवाल को अपनी रंगमंच जिंदगी से कोई शिकवा नहीं रहा। उन्होंने राम-भरत के इस वाक्य-‘भावना से कर्त्तव्य ऊंचा है’ को ध्यान में रख कर सारा जीवन गुजार दिया। उनके जीवन चक्र को देखें तो महसूस होता है कि उन्होंने अपने प्रचार-प्रसार के लिए कुछ नहीं किया। वे हमेशा दूसरों को सफलता का श्रेय देते चले गए। 5 अप्रैल 2006 को जब उनका निधन हुआ, तब उनको चाहने वालों की असंख्‍य संख्‍या जबलपुर में ही नहीं बल्कि सुदूर उन गांव-टोलों में भी थी, जहां उन्‍होंने रंगकर्म की रोशनी पहुंचाई थी।  


                                                                 

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

प्रतिरोध को थिएटर का माध्यम बनाने वाले रंगकर्मी बादल सरकार



बादल सरकार का नाम देश में नाटक का पर्याय है। कलकत्ता में जन्में बादल सरकार ने कई वर्ष इंजीनियर के रूप में काम किया। विदेश से रंगकर्म का डिप्लोमा लेने के पश्चात् उन्होंने रंग जगत में प्रवेश किया। उनके अभिनव तरीके ने रंगमंच में उनकी अलग पहचान विकसित की और बादल सरकार रंग जगत का एक शीर्ष नाम बन गया। बादल दा ने गत 15 जुलाई को जीवन के 83 वर्ष पूर्ण किए हैं।

बादल सरकार से प्रेरित हो कर देश के सैकड़ों रंगकर्मी सड़कों पर नाटक करने उतरे और प्रतिरोध के लिए थिएटर को माध्यम बनाया। थिएटर आडोटोरियम और उसके तमाम तामझाम को छोड़ कर ‘सुधीन्द्र नाथ सरकार’ ने जब थिएटर को जनता से सीधे संवाद करने का माध्यम बना कर नुक्कड़ नाटक की अपनी शैली विकसित की, तो रंग जगत में एक तूफान सा आ गया। सन् 1970 के आसपास उन्होंने थिएटर आडोटोरियम से नुक्कड़ की यात्रा शुरू की। उस समय बांगला थिएटर जगत में शंभू मित्र, तृप्ति मित्र और उत्पल दत्त के नाम शीर्ष पर थे।
बादल सरकार बताते हैं- ‘‘मैंने अपना काम कविताओं से शुरू किया। सन् 1956 में मैंने अपना पहला नाटक साल्यूशन एक्स लिखा। फिर सन् 1956 में बारो पिशीमा आया। अभी हाल ही में उनकी दो पुस्तकें पुरोनो कुशुन्डी और प्रोबोशेर हिज्जीबिज्जी आई हैं, जिनमें उनके नाटकों, अनुभवों और विदेश यात्राओं का विवरण है।

सन् 1961 में उनका तीसरा नाटक राम श्याम जोदू आया जो एक विदेशी कहानी पर आधारित था। इस नाटक की सफलता ने उन्हें एक अलग किस्म के थिएटर का जनक बनाया, जिसे भारत में थर्ड थिएटर और साइको फिजिकल थिएटर (मनो-शारीरिक रंगमंच) के नामों से जाना गया। सन् 1963 में उन्होंने दो नाटकों का निर्देशन किया। ये नाटक थे-एवम् इंद्रजीत और वल्लभपुर की रूपकथा । इन नाटकों के साथ ही बादल सरकार का नाम हर रंगकर्मी की जुबान पर छा गया। इसके बाद उनके नाटक लगातार आते रहे। कवि कहानी (1964), बाकी इतिहास (1965), तीसरी शताब्दी (1966), यदि फिर एक बार (1966), पगला घोड़ा (1967), अंत नहीं (1970), सगीना मेहता (1970), अबू हसन (1971), मिछिल-जुलूस (1974) आदि। बाकी इतिहास ने जहां उन्हें महान नाटककार बनाया, वहीं पगला घोड़ा और सारी रात बहुत ही पसंदीदा नाटक बने।

बादल सरकार ने अपने साथियों के साथ ‘परिक्रमा’ कार्यक्रम के साथ बंगाल के अनेक जिलों में गांव-गांव जा कर नाटक किए और बंगाल के ग्रामीण जनों से सीधा रंगसम्पर्क बनाया। नादिया, 24 परगना आदि जिलों में भी गांव-गांव घूम कर बादल सरकार ने रंगकर्म का संदेश दे कर अभिजात्य नाट्य जगत को चुनौती दी। उनके नाटकों में कलाकारों और दर्शकों के बीच कोई फर्क नहीं होता है। बादल सरकार ने आंगन, छत, नुक्कड़ और गांवों में नाटकों को पहुंचा कर नाटक को व्यापक बनाया।

‘‘मेरे नाटक संदेश मेरा संदेश देते हैं। परन्तु मैं महसूस करता हूं कि इन नाटकों को यदि मैं आज लिखता तो इनका फार्म और नेरेशन दूसरा होता। जिस पथ पर मैं अब तक चला और जो नवाचार मैंने भारतीय रंगमंच में किया, उस पर मुझे आज भी विश्वास है।’’

बादल सरकार आज भी सक्रिय हैं, यद्यपि बीमारी के कारण वे घूम-फिर नहीं पाते हैं। आजकल वे अपनी आत्मकथा का तीसरा भाग लिख रहे हैं। बादल दा कहते हैं-‘‘मैं अब भी लिख रहा हूं, हालांकि लोगों ने मुझे अकेला छोड़ दिया है और आज मुझे किसी चीज की कोई इच्छा भी नहीं है।’’

वे आजकल निपट एकांत में जी रहे हैं। न कोई आता है और न कोई जाता है। इस महान नाटककार को जिसने वैकल्पिक रंगमंच को जन्म दिया, उसे उसके लेखन की रायल्टी भी नहीं मिलती। प्रकाशक पिछले एक दशक से उनकी उपेक्षा कर रहे हैं। उनके स्वयं के विद्यार्थी नाटकों का मंचन करते हैं और उन्हें सूचित करना भी जरूरी नहीं समझते।

बादल सरकार को सांस की तकलीफ है और पैरों में डली दो राड के कारण बाहर जाने में वे असमर्थ हैं। पर वे असहाय और निराश नहीं हैं, यद्यपि आर्थिक और भावनात्मक रूप से वे बहुत कष्ट में हैं। उनकी आत्मकथा बहुत कुछ कहती है। उनके अनुभवों का संसार बहुत बड़ा है।

बादल सरकार बताते हैं कि उन्होंने थिएटर अपने परिवार वालों के साथ मिल कर शुरू किया। घर से साड़ी-कपडे ले जा कर उसी से स्टेज बना कर पूरी लगन से नाटक तैयार करते थे। उन्होंने कई बार नाटकों में महिला पात्र का काम किया, हालांकि उनके माता-पिता को यह बिल्कुल पसंद नहीं था।

वर्तमान में बादल सरकार केवल लिख रहे हैं। उनके साथ एक युवा सहायक है। उनके समकालीन शंभू मित्र को भी अंतिम समय में एक होटल में रहना पड़ा था। लोगों का यह याद रखना होगा कि नुक्कड़ नाटक के उनके मुहावरे को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय तक में सम्मान मिला। बादल दा को इस बात का मलाल है कि उनके काम को एक उत्पाद के रूप में बेचा जा रहा है। बीमारी के साथ-साथ वे बादल सरकार को भुलाए जाने के विरूद्ध भी लड़ाई लड़ रहे हैं।

बादल सरकार का रंगकर्म व्यवस्था के विरूद्ध उद्घोष है। उनके फार्म की आसानी और ऊर्जा हर युवा को आकर्षित करती है, इसलिए बादल सरकार के नाटक पूरे देश में हर नाट्य दल द्वारा बार-बार खेले गए। बादल दा के नाटक समाज में अत्याचार और बिखरती समाज व्यवस्था के विरूद्ध तीखा प्रतिरोध करते हैं। समाज और राजनीति की विद्रूपताओं पर उनके नाटक गहरी चोट करते हैं। इस कारण से बादल सरकार के नाटक और वे स्वयं भी देश के रंगकर्मियों के चहेते हैं।

रंग जगत बादल दा के स्वस्थ और सुखी जीवन का आकांक्षी है।

बादल सरकार के प्रसिद्ध नाटक-एवम् इंद्रजीत, अंत नहीं, बासी खबर, बाकी इतिहास, पगला घोड़ा, स्पार्टाकस, प्रस्ताव, जुलूस, भोमा, साल्यूशन एक्स, बारोपिशीमा, सारी रात, बड़ी बुआ जी, कवि कहानी।
(इस आलेख के लेखक हिमांशु राय हैं। वे मासिक इप्टा वार्ता के संपादक हैं। उनका ब्लाग इप्टावार्ता हिंदी हाल ही में शुरू हुआ है। )

रविवार, 19 अप्रैल 2009

इप्टावार्ता हिंदी की शुरूआत

आज से जबलपुर की भारतीय जन नाट्य संघ (इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन-इप्टा) की प्रतिनिधि संस्था विवेचना के महासचिव हिमांशु राय ने इप्टावार्ता हिंदी के माध्यम से एक नया ब्लाग शुरू किया है। इस ब्लाग में इप्टा वार्ता की सामग्री भी नाट्य प्रेमी और रंगमंच में रूचि रखने वाले लोग पढ़ सकेंगे। हिमांशु राय का ब्लाग जगत में स्वागत है।

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