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सोमवार, 5 फ़रवरी 2024

🔴 लेखक के जाने के बाद सहानुभूति में पुरस्कार देना उचित नहीं': ज्ञानरंजन

'लेखकों को पुरस्कार तब दिए जाते हैं, जब उसकी लोकस्वीकृति हो जाती है। कई बार ऐसे लोगों को पुरस्कार नहीं मिल पाता, जिन्हें मिलना चाहिए। अक्सर ऐसा भी देखा गया है कि लेखक के दिवंगत होने के बाद सहानुभूति में उसे पुरस्कार दिया गया। ऐसा नहीं होना चाहिए।' यह बात पहल के संपादक व विख्यात कथाकार ज्ञानरंजन ने 3 फरवरी को बाँदा में पत्रकारों से बातचीत में व्यक्त की। ज्ञानरंजन को 4 फरवरी को बाँदा में प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान से सम्मानित किया गया। 

बांदा का सफर करते हुए मन में कौन सी छवियां कौंधी ? ज्ञानरंजन ने कहा- बनारस, कोलकाता की तरह बाँदा मुझे पहले से आकर्षित करता रहा है। यहां कवि केदारनाथ अग्रवाल और बहुत से रचनाकारों से मुलाकात होती रही है। ज्ञानरंजन ने कहा कि वे बाँदा को जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। पहले और आज की चुनौतियों में कितना अंतर देखते हैं ? 

ज्ञानरंजन ने कहा- जब हमने कलम उठाई थी, तब अनगिनत लिखने वाले थे। मैंने अपने एक संस्मरण में लिखा है कि मैं तारामंडल के नीचे एक आवारागर्द था। तब चुनौतियां बहुत थीं, जिनसे सीखने को मिला। नई तकनीक से लेखन की दुनिया में नई चुनौतियां सामने आई हैं, लेकिन तकनीक मनुष्यता के विरुद्ध नहीं है। मेरा लेखन जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में लाया गया तो उसमें भी स्वागत हुआ।

नए लेखक क्या व्यक्ति और समाज के हितों में समवेत चिंतन कर रहे हैं? ज्ञानरंजन का जवाब था-कोरस में भी एक आवाज अलग होती है। वही सच्ची आवाज होती है। केदारनाथ अग्रवाल की धरती पर उगी नई फसलों से कितना मुतमइन हैं? उन्होंने कहा मैं इलाहाबाद में पढ़ता था। वहां से बाँदा से दूरी बहुत कम है। अक्सर केदार जी से मिलने यहां आता था। उनके बाद से नए लेखकों की परंपरा चल रही है। सुंदर आयोजन होते हैं। यह अन्वेषण का विषय है कि इस छोटे से कस्बे में इतने साहित्यकार कैसे हुए।

'पहल' की यात्रा को अब आप कैसे देखते हैं? ज्ञानरंजन ने कहा-आपातकाल के कुछ महीनों पहले ही पहल की शुरुआत की थी। उसका प्रकाशन बंद कराने को अनेक आक्रमण हुए, लेकिन पाठकों, लेखकों के सहयोग से पहल जारी रही। कोई अंक रोका नहीं। पहल में हर भारतीय भाषा का साहित्य छपता था। नए लेखकों को कोई संदेश ? ज्ञानरंजन ने कहा-हिन्दी में नए लेखकों का बड़ा कुनबा प्रवेश कर रहा है। अच्छे की पहचान कठिन हो गई है। पिछले दिनों अनिल यादव का यात्रा विवरण 'कीड़ाजड़ी' और चंदन पांडेय का उपान्यास 'कीर्तिगान'' प्रकाशित हुआ। यह रचनाएं शीर्ष पर हैं। यह सूची और भी आगे जा सकती है।🔷



शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2024

🔴अभी थके नहीं हैं ज्ञानरंजन

(वर्ष 2024 का प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान पहल के संपादक व विख्यात कथाकार ज्ञानरंजन को उनके आजीवन कथा व सम्पादकीय योगदान के लिए देने का निर्णय लिया गया है। 4 फरवरी को बाँदा में प्रतीक फाउंडेशन के तत्वावधान में एक कार्यक्रम में ज्ञानरंजन को 31000 रूपए की सम्मा‍न निध‍ि व स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया जाएगा।)

88 साल के ज्ञानरंजन कभी थकते नहीं। उनके लेखन व कर्म में एक युवापन की जो छवि है वह लोगों को आकर्ष‍ित करती है। युवा तो उनके मुरीद हैं। इसमें सभी वर्ग के लोग हैं। चाहे वह लेखक हो या चाहे संस्कृतिकर्मी या आम विद्यार्थी जो भी उनसे पहली बार मिलता है, उसके बाद बार-बार उनसे मिलना चाहता है। युवा रचनाशीलता की पूरी ज़मात उनके सम्मोहन में बंधी हुई है। ज्ञानरंजन समकालीन परिदृश्य में सबसे सक्रि‍य व्यक्त‍ित्व हैं। इसके पीछे निष्ठा भरी अटूट सक्रि‍यता का लम्बा अतीत है। लगभग 60 वर्ष से अपनी रचनात्मकता से समकालीन परिदृश्य में ज्ञानरंजन की छवि नायक की है।

ज्ञानरंजन की कीर्ति का मूल आधार उनकी कहानियां हैं। उनकी कहानियों ने हिन्दी कहानी की दिशा ही बदल दी। ज्ञानरंजन ने असाधारण रचनात्मकता से कहानी को नई कहानी से मुक्त करने का ऐतिहासिक कार्य किया है। उन्होंने एक बिल्कुल नई कथा भूमि रची है। पचास वर्षों के अंतराल के बावजूद उनकी कहानियों में विलक्षण ताजगी व सम्मोहन उपस्थि‍त है। ज्ञानरंजन की यह निजी विशेषता है कि वे श‍िखर पर पहुंच कर अपनी रचनात्मक भूमिका में गुणात्मक परिवर्तन कर लेते हैं। कहानियों में अपना अनूठा प्रतिमान स्थापित करने के बाद ज्ञानरंजन ने स्वयं को कहानी लेखन से दूर कर लिया।   

ज्ञानरंजन की भाषा ही है ऐसी है जो सब को आकर्ष‍ित करती है। उनका गद्य विलक्षण है। उनका शब्दों का चयन व वाक्यों की गति से लोग ईर्ष्या करते हैं। ज्ञानरंजन की भाषा सिर्फ कहानी तक सीमित नहीं है बल्क‍ि गद्येत्तर लेखन में उनकी भाषा जादूई है। उनके छोटे से छोटे वक्तव्य और व्यक्तिगत रूप से लिखे गए पत्र अपनी भाषा का जादू बिखेर देते हैं।

ज्ञानरंजन की दूसरी पारी पहल के प्रकाशन से 1973 में शुरु हुई। ज्ञानरंजन ने पहल का प्रकाशन प्रगतिशील परम्परा को वैचारिक व रचनात्मक दोनों स्तरों पर प्रभावशाली बनाने के लिए किया। पहल का आदर्श वाक्य ही था-इस महादेश की चेतना के वैज्ञानिक विकास के लक्ष्य और संकल्प के लिए प्रतिबद्ध। पहल एश‍िया महाद्वीप में वैज्ञानिक विचारों के विकास संकल्प को पूर्ण करने वाली एक अनिवार्य पत्रि‍का बनी। पहल का 125 अंक तक प्रकाशन हुआ तब तक इसकी प्रगतिशील मूल्यों के प्रति दृढ़ आस्था रही। बिना किसी संस्थान और संसाधन के पहल ने अपनी यात्रा तमाम प्रतिकूलता व अभाव के बावजूद सक्रि‍यता से बनाए रखी। पहल एक सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में स्वीकार की गई। ज्ञानरंजन ने हमेशा सामाजिक सरोकारों से ही विकसित साहित्य और सांस्कृतिक मूल्यों की हिमायत की। 

पहल की सबसे बड़ी विशेषता इसमें छपने वाली सामग्री की समकालीनता रही। पहल के प्रत्येक अंक में साहित्य व विचार की इतनी खुराक रहती थी कि पढ़ने वाले को तीन चार माह तो लग ही जाते थे। तब तक वह अंक पूरा होता नया आ जाता था। कहानी व कविता को ले कर पहल के चयन अप्रतिम है। बीच बीच में पहल द्वारा पुस्त‍िकाओं का प्रकाशन अद्भुत रहा। पहल सम्मान का जिक्र करना भी ज़रूरी हो जाता है। पहल सम्मान दरअसल पहल परिवार की आत्मीय सामूहिकता का ऐसा उदाहरण है जिसकी मिसाल हिन्दी में दूसरी नहीं।🔷 

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2022

जयप्रकाश चौकसे और जबलपुर


जयप्रकाश चौकसे के निधन की जानकारी आज 2 मार्च को सुबह कुछ देर पहले कवि कुमार अम्बुज से मिली। जयप्रकाश चौकसे का जबलपुर से अनोखा संबंध रहा है। उन्होंंने अपनी जिंदगी में फिल्मों पर दो या तीन व्याख्यान दिए हैं, जिसमें से एक जबलपुर में दिया था। वे पहल के संपादक व विख्यात कथाकार ज्ञानरंजन के रिश्ते में साढ़ू भाई थे। जयप्रकाश चौकसे की स्मृति जबलपुर के पाठकों को सदैव रहेंगी। इंदौर के गुजराती कॉलेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे जयप्रकाश चौकसे  पिछले 26 वर्षों से लगातार दैनिक भास्कर में परदे के पीछेकॉलम को लिख रहे थे। जयप्रकाश चौकसे का कॉलम 25 फरवरी को  आख‍िरी बार दैनिक भास्कर के पहले पृष्ठ पर छपा। वे इन दिनों कैंसर से जूझ रहे हैं। उनके कॉलम की अंतिम पंक्त‍ि है-‘’प्रिय पाठकों, प्रिय विदा है लेकिन अलविदा नहीं। कभी विचार की बिजली कौंधी तो फिर रूबरू हो सकता हूं लेकिन संभावनाएं शून्य हैं।‘’

कुछ वर्षों से जयप्रकाश चौकसे का कॉलम पता नहीं क्यों जबलपुर के दैनिक भास्कर में छपना बंद हो गया था, जबक‍ि सिटी भास्कर में सिर्फ दो ही कॉलम पठनीय हैं। जयप्रकाश चौकसे का परदे के पीछेऔर एन. रघुरमन का मैनेजमेंट फंडा। दोनों कॉलमनिस्ट का जबलपुर से गहरा संबंध है। जयप्रकाश चौकसे 26 वर्षों तक कभी चूके नहीं। हवाई जहाज या ट्रेन में यात्रा के दौरान उन्होंने अपने कॉलम को प्रतिदिन लिखा। तीन बार कैंसर से उबरने के बाद अब उनकी सहनशक्त‍ि जवाब देने लगी है। कैंसर के साइड इफेक्ट्स से वे अशक्त हो गए।   

आज दैनिक भास्कर के सभी संस्करणों में सुधीर अग्रवाल की भावुक पंक्त‍ि प्रकाशि‍त हुई है। सुधीर अग्रवाल ने लिखा-‘’ जयप्रकाश चौकसे पिछले 26 वर्षों से भास्कर में परदे के पीछे कॉलम रोजाना लिख रहे हैं। पिछले काफी वक्त से वे कैंसर से पीड़ित हैं परंतु अस्पताल और घर पर बिस्तर इन दोनों जगह भी उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा। आज सुबह उन्होंने मुझे फोन किया कि अभी तक बेसुध स्थिति में भी भास्कर के करोड़ों पाठकों की शक्ति उन्हें ऊर्जा दे रही थी और वे तमाम मुश्किलों के बाद भी रोजाना लिख लेते थे लेकिन अब ये नहीं हो पा रहा है, सेहत का मुश्किल दौर है इसलिए वे आज आखिरी कॉलम लिखना चाहते हैं। चौकसे जी के जज्बे और 26 सालों के परिश्रम को सलाम। ईश्वर से प्रार्थना है कि उनके साथ बहुत अच्छा हो। उनकी जगह और जज्बे को भरना असंभव है। भास्कर और उसके पाठक इन 26 वर्षों यात्रा के लिए हमेशा कृतज्ञ रहेंगे। इसलिए आज का कॉलम पहले पेज पर।‘’ सुधीर अग्रवाल ने संभवत: दैनिक भास्कर में पहली बार लिखा है।

            जयप्रकाश चौकसे ने अपने अंतिम कॉलम में जबलपुर का जिक्र भी किया है। वे लगभग दस-बारह वर्ष पूर्व पहलके आमंत्रण पर जबलपुर में सिनेमा पर व्याख्यान देने आए थे। जब जयप्रकाश चौकसे व्याख्यान देने जबलपुर आगमन हुआ था, तो वह उनकी वह यात्रा सरल व सहज नहीं थी। उस समय वे पुणे के पास सलमान खान के बिग बॉसकी स्क्र‍िप्ट‍िंग व प्रोडक्शन से जुड़े थे। जयप्रकाश चौकसे पुणे से बंबई, बंबई से इंदौर और इंदौर से जबलपुर ट्रेन से पहुंचे। हम लोगों की मेजबानी में तालमेल की कमी के कारण उनकी रूकने की व्यवस्था हमारे वरिष्ठ सहयोगी के घर में करना पड़ी। इस चूक को महसूस करने पर जब हम लोगों ने आनन फानन में उनकी व्यवस्था एक होटल में की। उन्होंने होटल में रूकने से इंकार कर दिया। जयप्रकाश चौकसे ने कहा-‘’ऐसा करना मेजबान का अपमान होगा।‘’

            अक्टूबर की महाअष्टमी की शाम स्थानीय रानी दुर्गावती कला संग्रहालय की कला वीथि‍का में जयप्रकाश चौकसे का व्याख्यान आयोजित हुआ। कई लोगों ने कहा अष्टमी के दिन व्याख्यान आयोजित कर बेवकूफी कर रहे हैं। कोई नहीं आएगा। सब लोग दुर्गा-काली के दर्शन करने जाएंगे। हम लोगों ने भी सोचा देखा जाएगा..अब तो कार्यक्रम तय हो ही गया है। उस शाम को जयप्रकाश चौकसे का व्याख्यान सुनने इतनी भीड़ उमड़ी कि पर्याप्त कुर्स‍ियों की व्यवस्था करने के साथ दरी बिछा कर दर्शकों-श्रोताओं को बैठाना पड़ा। कला वीथ‍िका के बाहर जयप्रकाश चौकसे के व्याख्यान सुनने व देखने के लिए ऑड‍ियो-विजुअल व्यवस्था करना पड़ी। जबलपुर रेलवे स्टेशन में जयप्रकाश चौकसे को विदा करते वक्त संकोच से एक लिफाफा देने का साहस किया गया, जिसे उन्होंने लेने से स्पष्टत: इंकार कर दिया। उन्होंने कहा-‘’पहल व जबलपुर के कारण मैं यहां व्याख्यान देने आया था।‘’ जयप्रकाश चौकसे देश में कहीं भी व्याख्यान देने नहीं जाते थे। आज कॉलम में उन्होंने लिखा भी है कि जबलपुर के अलावा वे सिर्फ महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा ही व्याख्यान देने गए थे।

            जयप्रकाश चौकसे का रानी दुर्गावती संग्रहालय की कला वीथ‍िका में व्याख्यान देने का सुफल पूरे जबलपुर शहर को मिला। उनका व्याख्यान सुनने जबलपुर के तत्कालीन कमिश्नर भी पहुंचे थे। कमिश्नर ने जब रानी दुर्गावती कला वीथ‍िका के हाल देखे तो उन्होंने तुरंत उसके नवीनीकरण का निर्णय लिया। वर्तमान में जबलपुर का साह‍ित्य‍िक व सांस्कृतिक जगत कला वीथ‍िका की सुविधाओं का जो लाभ उठा पा रहा है, उसका पूरे श्रेय जयप्रकाश चौकसे और उनके व्याख्यान को ही जाता है।

            विख्यात कथाकार व पहल के संपादक ज्ञानरंजन ने आज जब जयप्रकाश चौकसे से फोन पर बात की तो दोनों भावुक थे। ज्ञानरंजन ने पूछा कि क्या वे अब नहीं लिखेंगे, तब जयप्रकाश चौकसे ने कहा-तुम से ही तो मैंने सीखा है। तुम ने ल‍िखना छोड़ दिया। अब मैं भी नहीं लिखूंगा।

            मेरे जैसे लाखो पाठक जयप्रकाश चौकसे के प्रतिदिन प्रकाश‍ित होने वाले कॉलम परदे के पीछेके एड‍िक्ट हैं। इस कॉलम को पढ़े बिना चैन नहीं मिलता। कल से जयप्रकाश चौकसे का कॉलम पढ़ने को नहीं मिलेगा। जयप्रकाश चौकसे ने लिखा है कि कॉलम उनको बेहतर इंसान बनाता गया। हम लोग भी उन्हें एक बेहतर इंसान के रूप में पहचानते हैं। उनके 26 सालों के परिश्रम व जज्बे को सलाम।      

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

ज्ञानरंजन ने 48 वर्षों के बाद 'पहल' का क‍िया समापन

 

ज्ञानरंजन ने 48 वर्षों के पश्चात् पहल का प्रकाशन बंद करने का न‍िर्णय लिया है। पहल 125 के बाद अब यह प्रकाश‍ित नहीं होगी। ज्ञानरंजन ने पहल का प्रकाशन वर्ष 1973 में जबलपुर में प्रारंभ क‍िया था। वर्ष 2010 में पहल 90 के बाद  प्रकाशन स्थग‍ित कर द‍िया गया था। लगभग तीन वर्षों के पश्चात् वर्ष 2013 में पहल का प्रकाशन पुन: प्रारंभ क‍िया गया। इसके बाद पहल के 35 अंक प्रकाश‍ित हुए। ज्ञानरंजन ने समापन अंक 'पहल 125' में इस संबंध में ल‍िखा-

'पहल’ का अंक 125 हमारी और उसकी यात्रा का अब आख़िरी अंक होगा। अभी तक यह ख़बर अफ़वाहों में थी जो सच निकली। यह निर्णय हमारे और 'पहल’ से जुड़े तमाम लोगों के लिए तकलीफ़देह है। हर चीज़ की एक आयु होती है, जबकि हम अपनी सांसों से अधिक जी चुके हैं। हमारे संपादकीय साथी मिल जुल कर इससे सहमत हैं। उन्हें मेरी सेहत को लेकर चिन्ता और शुभकामना है। पहल के मंच का एक बैक स्टेज भी है जो सामने आया नहीं और संभवत: कभी नहीं आयेगा। वह एक बहुत बड़ी दुनिया है जो आती जाती रही, बदलती रही, घूमती रही।

जब हमने पहल शुरू की हम संपादक नहीं थे। उसकी कलाओं और मशक्कतों से अवगत नहीं थे। आज भी हम पूरा पूरी संपादक नहीं हैं, एक समूह है जो मिल जुल कर गाड़ी चलाता रहा। संपादन की मुख्य धाराओं के अगल बगल से निकलते रहे पर पारंगत नहीं हो सके। बस एक पंक्ति हमारी जरूर थी उस पर जोश, जज़्बे और आवेग के साथ चलते रहे। हमारी शैली यही थी जिसमें ताज़ा और आज़ाद ख्याल बने रहे। एक ज़रूरी सुचारु व्यवस्था न होने के कारण हम अब थक भी रहे हैं। हमने कभी 'पहल’ को एक संस्था या सत्ता की व्यवस्था नहीं दी। चीज़ें आती रहीं, हम निपटते रहे, अपने को भ्रष्ट होने से बचाते रहे।

हमें अपनी ही पंक्ति पर बार बार बदलते समय और उसमें आते जाते तूफानों और सच्ची प्रतिभाओं की पहचान करती थी सो हमें तटस्थता और कठोरता की शैलियों का पालन करना पड़ा। हज़ारों लोग पहल में छपने से वंचित रह गये। हम जितना कर सके वह खरा था। नये जमाने के शत्रुओं की पहचान भी ज़रूरी थी। प्रगति विरोधी, साम्प्रदायिक और तानाशाह शक्तियों और घरानों से हमारी मुठभेड़ चलती रही। हम पर्याप्त मरते जीते रहे। 'पहल’ का टिकट बहुतों ने लिया पर कुछ बीच में उतर गये, कुछ आजीवन साथ निभा सके, इसके लिए कमिटमेन्ट अनिवार्य था जो हमारे रक्त और रगों में था। इसमें पाठक, लेखक, वित्तीय सहयोगी, अनाम शुभचिन्तक, पक्षधर, मोहब्बत करने वाले, बैक स्टेज, अण्डरवर्ल्ड के लोग शामिल हैं। इसका बयान एक लम्बी जीवनी बन सकता है जिसकी ज़रूरत नहीं है। और 47 वर्ष बाद अनेक लोग गुमनामी में रहना चाहते हैं या लापता हैं।

हमारे पास फूटी कौड़ी नहीं थी और शुरूआत हो गई। आज भी हमारे पास फूटी कौड़ी नहीं है। मनोबल है। आश्चर्य की बात है कि ऐसे सैकड़ा में लोग हैं जो जब चाहे स्वयंस्फूर्त राशियाँ, छोटी बड़ी जब तब पहल के नाम करते रहे। कुछ तो ऐसे आजीवन है कि कतई व्यक्त नहीं होना चाहते। यही उनकी शर्त है। हम मानते हैं कि प्रायोजित सम्पदा से छोटी पत्रिकाओं का काम नहीं हो सकता। ईंधन चाहिए। जब ख़त्म होने लगे ईंधन जुटाया जाय और झोंक दिया जाय। फिर विचार की अग्नि और जीवन तथा साहित्य की बुनियादी लड़ाईयों का साथ न छोड़ा जाय। 50-60 साल के इतिहास में अनेक गर्वीली और शानदार साहित्यिक पत्रिकाएँ हिन्दी में निकलीं। कुछ अच्छी थीं पर उनके साथ संपादक की जीविका का सवाल था या संस्थान निर्भर थीं। बहरहाल, हमारा मार्ग यह था कि पत्रिका मात्र चंदे से नहीं असंख्य जुड़ावों से चले। पहल की आंतरिक रचना प्रक्रिया एक ऐसी कृतज्ञता में है जिसके हक़दार देश भर के अनगिनत साहित्य प्रेमी हैं। हमारे साथ चुपचाप सूंघने वाली, जलने वाली, दोहरा सलूक करने वाली हस्तियाँ भी छाया की तरह लगी रहीं, पर हमारे भीतर भी बिल्लियाँ और चीटियाँ चौबीस घंटे जीवन्त थीं।

हमने संपादकीय घोषणाएँ नहीं कीं और उसके अतिरेक से बचते रहे 50 साल में कोई फतवा हमारा नहीं है। हमने रचनाएँ आदर, प्यार, आग्रह से मांगीं और उन्हें प्रस्तुत किया। इस अंक में कृष्ण मोहन का एक उदाहरण है कि जिनसे बीस साल पहले कविताएँ मांगी थीं और बीस साल बाद उन्होंने स्मरण करते हुए कविताएँ भेजीं। भूखण्ड तप रहा है। संगतकार, कपड़े के जूते, रामसिंह, क्रागुएवात्स, कोठ का बांस, लेबर कॉलोनी के बच्चे, कविता की रंगशाला, ब्रूनो की बेटियाँ, सीलमपुर की लड़कियाँ, यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश, गांधी मझे भेंटला जैसी कविताएँ प्राप्त कीं और याद इसके साथ ही टूट जाती है। कुंवरनारायण, रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह के युग के बाहर जो नई कविता थी, पौद-फुलवारी बन रही थी, उसे एक संसार की रोशनी देने की कोशिश की और एक नया पाठक-वर्ग बनता रहा।

इससे अधिक कहना, अहंकार होगा। इसलिए बकवास और नहीं। एक मुहावरा याद आता है, जो सैनफ्रांसिस्को में एक नारे की तरह लगाया गया - शट अप एण्ड राइट। यह वाचिकों के लिए भी एक नसीहत है। कहना मात्र यह है कि पहल एक देह की तरह थी, जिसकी आयु भी है। यह आयु आ गई, इसको स्वीकार करते हैं। संपादन के लिए जहाँ सम्पादक पीर, बाबर्ची, भिश्ती, खर सब कुछ हो अच्छी सेहत ज़रूरी है। पर यह अंत श्मशान में नहीं, इतिहास में दर्ज हो सकेगा यह उम्मीद करते हैं। हम अमर नहीं थे और मर भी नहीं रहे हैं।

हमारा ढांचा शिथिल पड़ रहा है क्योंकि यह महामारी जाने से इन्कार नहीं कर रही है। इसने हमारे ताने बाने को उलट पलट दिया है। यह महामारी चंचल है, बार-बार अपने को बदलती है, इसने सत्ताओं को भीतरी तौर पर खुश और मन माफिक बनाया है। हमारे कई साथी जो प्रकाश स्तम्भ की तरह थे, इसकी चपेट में चले गये। कुछ को वर्तमान अंधी सत्ता ने मौन और निष्क्रिय कर दिया। हम मुखौटे उतारते रहे और अब प्रतिदिन नए मुखौटे तैयार हो रहे हैं। ऐसे वक़्त में हम आपसे विदा ले रहे हैं।

यही समय है जब हम कुछ अच्छी ख़बरें भी बताएँ और उन लोगों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करें जिन्होंने विविध प्रकार से, विभिन्न समयों में स्वयं स्फूर्त पहल को जारी रखने में सहयोग दिया। यह कतई व्यवसायिक मार्ग नहीं बना।

'पहल’ शुरू से ही चूंकि एक अनियतिकालीन क़िताब की शक्ल में निकलती रही, पत्रिका के फॉर्म में नहीं, इसलिए आपात काल की विपत्तियों में अपना बचाव केन्द्रीय गृह मंत्रालय और सूचना प्रसारण मंत्रालय की जटिल तहक़ीक़ातों से कर सके। बाद में रणनीतिक  कारणों से पहल के मुद्रणालय और प्रकाशक बदल बदल जाते रहे। ये केवल छापाख़ाने ही नहीं थे ये हमारे साथी थे जहाँ लेन देन का तात्कालिक दबाव नहीं था। इलाहाबाद प्रेस के स्वामी रवीन्द्र कालिया पर तो यदा-कदा पुलिस की छापामारी और पूछताछ भी होती रही। बहरहाल, जबलपुर के सामाजिक कार्यकर्त्ता दुर्गाशंकर शुक्ल के पंकज प्रिंटर्स और द्वारिका तिवारी के महाकोशल ऑफ़सेट, इलाहाबाद में परिमल प्रकाशन के शिवकुमार सहाय, इम्पैक्ट के राधारमण (पियरलेस प्रिंटर्स), रवीन्द्र कालिया के इलाहाबाद प्रेस, नीलाभ के नीलाभ प्रकाशन के सहयोग से 'पहल’ निकली। आपातकाल में जबलपुर के चित्रा प्रिंटर्स के यहाँ रातों को ट्रेडिल पर अत्यंत गोपनीय तरह से हमारे प्रतिरोधी पर्चे भी छपते रहे। 'पहल’ के अनेक अंक देश के सुप्रसिद्ध तबला वादक आह्लाद पंडित ने अपना काम छोड़ कर नागपुर के एक मराठी प्रेस से प्रकाशित कराए।

आपात काल में ही सतना के सिंधु प्रेस में पहल का एक अंक छापा गया। एक ऐसा दौर था जब 'पहल’ पंचकूला के देश निर्मोही ने आधार प्रकाशन से प्रकाशित किया। पहल के कुछ अंक छापा कला के उस्ताद मोहन गुप्त के सारांश प्रकाशन, दिल्ली में भी छपे। यह सब अबाध चलता रहा, हाँ मशक्कत बहुत थी। और अंतिम दौर का लम्बा समय यादगार है जब पहल के प्रकाशन, वितरण और तमाम दैनिक झंझटों को उठाने वाले गौरीनाथ ने अंतिका प्रकाशन से पहल को संभव बनाया। इसमें अशोक भौमिक और जितेन्द्र भाटिया की असाधारण भूमिका थी। पता ही नहीं चला कि एक बड़ा चित्रकार और एक बड़ा लेखक पहल की गाड़ी खींच रहा है। अब शिवकुमार सहाय, आह्लाद पंडित, राधारमण, नीलाभ, रवीन्द्र कालिया जीवित नहीं हैं कि इन पंक्तियों को पढ़ सकें। मात्र इसका ज़िक्र नाकाफ़ी है। ये लोग अपनी घनघोर मुसीबतों और तकलीफ़ों के मध्य पहल का काम प्राथमिकता से करते रहे। जब लगता था आगे रास्ता बंद हो जायेगा, इन्होंने रास्ते खोले।

बैक स्टेज और परदे के पीछे गहरे संकोच के साथ कुछ और लोग भी खड़े हैं जो कभी सामने आना नहीं चाहते थे। 'पहल’ की नींव का पत्थर उन्होंने लगाया है। पहल की दूसरी पारी में जब उसके पुनर्गठन की शुरूआत हुई तो मैंने अपने पुराने दोस्त राजकुमार केसवानी को आमंत्रित किया और वे मेरा आग्रह मान गये। वे नैतिक रूप से कठिन, बेहद मानवीय और एक छुपे हुए लेखक हैं। उर्दू रजिस्टर की कल्पना, योजना उन्हीं की थी जिससे पहल की एक बड़ी कमी पूरी हुई। राजकुमार का कलश भरा हुआ है और वह दुर्लभ है। इसको रचनावली में परिवर्तित करने के लिए स्वयं उन्हें कई जीवन लगेंगे। लेकिन उन्होंने पहल को गहरी प्राथमिकता के साथ अपना सर्वोत्तम दिया। जब कि वे एक पुरस्कृत पत्रकार हैं और उनका जीवन परिचय विरल है। राजसत्ता में गहरी पैठ के बावजूद उनकी स्वतंत्रता जानी मानी है और अभी भी वे पूरी तरह श्रमजीवी हैं। जब उन्हें पता चला कि हम 'पहल’ में सरकारी विज्ञापन नहीं लेंगे तो वे उत्साह और खुशी के साथ हमारे अभिन्न हुए।  पहल से जुडऩे के बाद उनकी जहान-ए-रूमी, दास्तान-ए-मुग़ले-आज़म और कशकोल जैसी कृतियाँ आईं। और काम अभी जारी है। उन्होंने हमें विपथगामी होने से बार-बार बचाया। नई पारी में वरिष्ठ कथाकार राजेन्द्र दानी और युवा रचनाकार पंकज स्वामी भी पहल की संपादक मंडली में शामिल हुए। वास्तव में पहल का प्रमुख काम यह लोग करते थे, मैं श्रेय लेता रहा। इन दोनों कथाकारों का रचनात्मक सफ़र जारी है। पंकज स्वामी का पहला संग्रह इस अंतिम अंक के साथ आ रहा है। उनका पदार्पण हिन्दी कथा मंच पर हो रहा है। पहल के मुखपृष्ठों की हिन्दी जगत में एक अलग पहचान है। मुखपृष्ठ कभी दोहराये नहीं गये। यह काम प्रयोगशील अवधेश वाजपेयी ने किया जिनकी चित्रकला की अब भारतभूमि में बड़ी पहचान बन रही है। मुखपृष्ठों को अंतिम रूप देने में संजय आनंद भुलाये नहीं जा सकेंगे, जबकि उनकी घनघोर व्यस्तताएँ रही हैं। और हमारे चुपचाप जुटे हुए श्रमिक मनोहर बिल्लौरे हैं जो सुबह शाम 'पहल’ के काम के लिए उपस्थित रहे। उन्होंने पहल का पूरा इतिहास और पहल संपादक की सारी बिखरी चीज़ें संभाल के रखी हैं। 'पहल’ की वेबसाइट को निरंतरता से संचालन करने वाले कुलभूषण का शुक्रिया जो सुदूर दक्षिण में रहते हुए यह काम अथक करते रहे। सहभागिता का एक उदाहरण यह भी है कि 'पहल’ का अक्षर संयोजन करने वाले पीयूष जोधानी अब तक उसके 50 अंकों को तैयार कर चुके है।

अंत में, पहल के झोंकों को सुगंध से भरने वाले दिवंगतों और जीवितों को हमारा सलाम और शुक्रिया।

सर्वश्री राहुल बारपुते, मायाराम सुरजन, कमलेश्वर, श्याम कश्यप, वीरेन्द्र कुमार बरनवाल, सुदीप बैनर्जी, एल.के. जोशी, रमाकांत, कामरेड रतिनाथ मिश्र, विनोद कुमार श्रीवास्तव, अनूपकुमार, बुद्धिनाथ मिश्र, प्रकाश दुबे, सुधीर अग्रवाल, परितोष चक्रवर्ती, एन.के. सिंह, कमलेश अवस्थी, चमनलाल, रमेश मुक्तिबोध, संजीव कुमार, ईशमधु तलवार, यशवंत व्यास, निरुपमा दत्त, शंकर, शैलेन्द्र शैल, सुशील शुक्ल, गुलाम मोहम्मद शेख, प्रदीप सक्सेना, दिवाकर झा, सत्येन्द्र सिंह ठाकुर आप सब बहुत याद आते हैं।

राजकुमार केसवानी पहल 91 से जुड़े थे। उन्होंने व‍िदाई नोट में ल‍िखा- 

दोस्तों,

यह 'पहल’ का अंतिम अंक है।

इस एक वाक्य को लिखने के लिए जितने साहस की आवश्यकता थी, उसे जुटाने में कई माह लग गए। इससे आगे की बात तो शायद किसी फूटे झरने की मानिंद बेतरतीब और बेसाख़्ता ही निकल पड़े।

47 बरस और 125 अंक। 47 बरस पहले कथाकार ज्ञानरंजन ने एक वैचारिक महायज्ञ की योजना बनाई। हर काल और हर समय में सामाजिक विषमताओं से जूझने के लिए ऐसे यज्ञ की आवश्यकता होती ही है। इस यज्ञ में पहली आहुति ख़ुद ज्ञानरंजन ने दी - अपने कथाकार की। उसके बाद उनकी तलाश शुरू हुई उन लोगों की जो जिनके भीतर सामाजिक प्रतिबद्धता और संवेदना की लौ लगी हो या उसका स्पर्श हो। अपने जाने-सुने और निज अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि ज्ञानरंजन ने कई सारे मामलों में अपने आप से बेख़बर लोगों को अल्लादीन के चराग़ की तरह रगड़-रगड़ कर उनके भीतर के जिन को बाहर निकाल दिखाया।

मेरे लिए निजी तौर पर 'पहल’ में ज्ञान जी के साथ संपादक का पद पाना ठीक वैसा ही है जैसे किसी स्कूल या कालेज के छात्र को उसी स्कूल-कालेज में टीचर का पद मिल जाए। फ़र्क है तो सिर्फ़ इतना कि यहां टीचर बनकर भी छात्र की तरह सीखने का क्रम ही जारी रहा। ख़ासकर अनुशासन।

'पहल’ में मेरी वास्तविक और सक्रिय सहभागिता कोई दस बरस पहले शुरू हुई, जब 90 अंक पर आकर इस पत्रिका का सफ़र कुछ अरसे के लिए थम गया था। पाठकों और लेखको में बराबर की बेचैनी थी। ज्ञान जी से मेरे मुहब्बत के रिश्तों से बाख़बर दोस्तों का एक ही सवाल होता - 'पहल’ बंद कैसे हो सकता है? आख़िर हुआ क्या है? यही वो अवसर था, जब मित्रों और अवसरवादियों की ख़ासी पहचान हुई। मित्रों को फ़िक्र थी कि 'पहल’ फिर से किस तरह शुरू हो तो अवसरवादियों की फ़िक्र थी इस बात की कहानियां कैसे बनें। कहानियां बनीं। कुछ देर, कुछ दूर तक चलीं और मुंह के बल गिर पड़ीं। 

इस वक़्त मुझे सबसे ज़्यादा याद आ रही है मंगलेश डबराल की। उसे स्वर्गीय नहीं लिख पाता सो नहीं लिख रहा। मंगलेश बार-बार फोन करके कहता कि राजकुमार, अगर 'ज्ञान भाई’ की सेहत की बात है या कोई आर्थिक संकट है, तो हम लोग मिलकर उनकी मदद क्यों नहीं कर सकते। तुम उन्हें समझाओ।

ज्ञानरंजन को समझाओ? कैसे? मैं ख़ुद नहीं जानता था कि यह किस तरह होगा, मगर यह ख़ुद-ब-ख़ुद ही हो गया। ज्ञान जी भोपाल आए। इस बार उनमें सामान्य चहचहाहट कम और संजीदगी ज़्यादा थी। मुझे लगने लगा कि उन पर 'पहल’ का प्रकाशन बंद हो जाने का नकारात्मक असर हुआ है। जिस लम्हे उन्होने ज़रा फ़ारिग़ होकर आसन जमाया तो अहसास हुआ कि 'पहल’ का प्रकाशन बंद नहीं हुआ। बस कुछ देर से थमा हुआ है।

मैने 'पहल’ को लेकर तमाम मित्रों की चिंताओं से उन्हें अवगत कराया। उनके जवाब से पता लगा कि वे इन तमाम बातें उन तक पहले से ही उन तक पहुंच चुकी हैं। कुछ देर की बातचीत से लगने लगा कि इस स्थिति से वे ख़ुद भी ख़ुश नहीं हैं लेकिन समस्याएं भी बहुत हैं। उनकी सेहत और आर्थिक आवश्यकताएं। फिर भी वे 'पहल’ को जारी रखने के लिए तैयार थे। मुझसे उन्होने एक सवाल किया - तुम साथ आओगे?

यह 2010 की बात है। मैं 'दैनिक भास्कर’ से संपादक के पद से रिटायर होकर बैठा था। उम्र भर की आपाधापी में छूट रहे लिखने-पढऩे वाले पचासों काम थे, जिनको पूरा करने का इरादा बांध रहा था। तभी ज्ञान जी का भोपाल आना हुआ।

अगले ही दिन से नई-नई योजनाएं बनने लगीं। नए-नए फ़ैसले हुए। सबसे अहम फ़ैसला था - 'पहल’ के लिए किसी सरकार से कोई विज्ञापन नहीं मांगेंगे। मुझे इस बात की ख़ुशी है कि इस फ़ैसले के बाद पूरे 35 अंक प्रकाशित हुए लेकिन कभी किसी सरकार या संस्थान से कोई इश्तिहार मांगा नहीं। हां, 'पहल’ के प्रेमियों ने स्व-स्फ़ूर्त पहल करके अपना प्रेम ज़रूर प्रदर्शित किया और भरपूर मदद की।

कई किस्से हैं. एक बार एक रिटायर्ड सेना अधिकारी ने अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद अपनी संपति से एक बड़ी राशि 'पहल’ के लिए देने की इच्छा प्रकट की। उनकी चाहत थी कि किसी आर्थिक उलझन की वजह से पत्रिका बंद न हो जाए। ऐसे अवसरों पर ज्ञान जी की हालत देखकर मुझे एक भोपाली शब्द बहुत याद आता था - भैरा जाना। ज्ञान जी किसी मोटी रकम की आहट भर से बुरी तरह भैरा जाते थे। उसी हालत में मुझसे बात करके अपना निर्णय सुना देते - नहीं यार यह ग़लत बात है। किसी की उम्र भर की कमाई लेकर हम क्यों काम करें?

एक योजना बनी कि 'पहल’ के पुराने विशेषांक, जिनकी बार-बार और लगातार मांग बनी रहती है, उनको पुस्तक रूप में प्रकाशित कर दिया जाए। इस तरह समाज के लिए कुछ ज़रूरी चीज़ें महफ़ूज़ भी हो जाएंगी और उपलब्धता भी बनी रहेगी। इसकी ज़िम्मेदारी भी मुझ पर छोड़ दी।

इस सिलसिले में वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी से बातचीत हुई। वह भोपाल आ गए. हम तीनो बैठे। अरुण इस प्रोजेक्ट को लेकर बहुत एक्साईटेड थे। उन्होने 'पहल’ के एक अंक के प्रकाशन पर आने वाले ख़र्च को लेकर सवाल किया। ख़ासी रक़म थी। एक मिनट के मौन के बाद उनका प्रस्ताव आया कि 'पहल सीरीज़’ की एक किताब छापने के एवज़ में वो 'पहल’ के एक अंक पर ख़र्च होने वाली राशि का भुगतान करेंगे। इस तरह हम आर्थिक चिंताओं से मुक्त हो जाएंगे।

प्रस्ताव काफ़ी लुभावना था। सहमति सी बन गई। लेकिन शांत चित होकर अकेले में विचार किया तो बात जमी नहीं। इसमे एक बहुत बड़ा नैतिक संकट था। इन सारे अंकों में प्रकाशित लेखकों में से कभी किसी को कोई मुवाअज़ा नहीं मिला। अब उनके श्रम को हम पत्रिका के प्रकाशन का साधन बना लें, यह उचित नहीं। बहुत सोच-विचार के बाद हमने प्रस्ताव दिया कि जितनी रकम वो ख़र्च करने का इरादा करते हैं, वह सारी रकम उस अंक के लेखकों में समान रूप से बांट दें। साथ ही बाद में अर्जित होने वाली रायल्टी भी सीधे उन्हीं को भेजी जाए।

इस बात पर सहमति हुई और काम शुरू हुआ। कारणों की तह में जाने की बात छोड़कर इतना भर बताऊंगा कि यह प्रोजेक्ट चार पुस्तकों के प्रकाशन तक सीमित होकर दम तोड़ गया। इन पुस्तकों में 'नव जागरण और इतिहास चेतना’ और 'मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र : एक चिंतन’ जैसी मह्त्वपूर्ण पुस्तकें सम्मिलित हैं।

'पहल’ की वापसी का भरपूर स्वागत हुआ। राजेंद्र यादव ने तो दैनिक 'अमर उजाला’ में बाकायदा एक लेख लिखा - 'इस पहल का स्वागत है।’ इस स्वागत में सैंकड़ों नाम शामिल होते चले गए। एक काबिले ज़िक्र बात यह भी कि इस स्वागत के साथ मदद के लिए भी कई सारे हाथ आगे बड़ते चले आए। इन सबकी प्रतिबद्धता किसी एक व्यक्ति या एक पत्रिका के प्रति नहीं बल्कि उस विचार के लिए थी जिस विचार के परिष्कार के लिए 'पहल’ पहचानी जाती रही है।

तैयारी शुरू हुई नई योजना बनाने से। इस योजना में उर्दू-हिंदी के साथ ही साथ समस्त भारतीय भाषाओं को शामिल करना भी था। हमेशा की तरह नहीं बल्कि इस तरह कि वह भाषा का एक मुक़म्मल नक़्शा बन जाए। हर रंग अलग मगर हर रंग में शामिल। इसी कोशिश में सरहद की हद को भी लांघने का इरादा बना लिया। कराची में 'आज’ जैसी प्रतिष्ठित उर्दू पत्रिका के संपादक, मित्र अजमल कमाल को 'पहल’ में साथी संपादक की भूमिका के लिए आमंत्रित किया। इस प्रस्ताव को स्वीकार करने में अजमल को कुछ देर ज़रूर लगी लेकिन सहयोग हमेशा मिलता रहा। बाद को अजमल को सार्क यूनीवर्सिटी, दिल्ली में अध्ययन के लिए स्कालरशिप मिली तो उसने एक अर्से तक बाकायदा संपादकीय भागीदारी भी निभाई। और बहुत ख़ूब निभाई।

इसी तरह विचार बना कि सामाजिक संवाद के लिए पत्रिका को अकेले अक्षर तक ही सीमित करना ज़रा अन्यायपूर्ण है। कार्टून जैसी प्रभावकारी विधा को समिलित करने की ग़रज़ से लेखक-कार्टूनिस्ट मित्र राजेंद्र धोड़पकर को आमंत्रित किया। राजेंद्र ने अपनी तमाम अख़बारी और दीगर ज़िम्मेदारियों के साथ ही साथ इस विचार का साथ देने का निर्णय लिया। और क्या ख़ूब साथ दिया। मित्रों की प्रशंसा का आधिक्य चाटुकारिता बन जाता है। सो इतना भर ज़रूर कहूंगा कि राजेंद्र धोड़पकर ने अपने योगदान से 'पहल’ के ज़रिए जो काम किया उसे आप सबने देखा और सराहा है।

इन सफ़लताओं के साथ ही कुछ असफ़लताएं याद करना भी ज़रूरी है। योजनाएं तो बहुत बनीं लेकिन सब सिरे नहीं लगीं। मसलन इंटरव्यू की श्रंखला। व्यक्ति और समाज। व्यक्ति और रचना। गोया उसका आंतरिक और बाहरी संसार। इसके लिए ज़रूरी संसाधन को दोष देते हुए अपनी व्यक्तिगत कमज़ोरियों को भी शामिल करना आवश्यक है।

इसी तरह 'पहल’ सम्मान को फिर से प्रचलित करने का विचार। यह काम ज़रूरी तो लगता था लेकिन अर्थशास्त्र के सिद्धांत इस विचार के आड़े आते रहे और यह भी हो न सका। इन्हीं सिद्धांतों ने कई सारी योजनाओं को ध्वस्त किया।

मेरी अपनी एक निजी असफलता का उल्लेख भी आवश्यक है। ज्ञानरंजन के साथ काम तो बांट लिया लेकिन उनकी चिंताए नहीं बाँट पाया। इसकी वजह शायद यह रही कि मैं 'पहल’ से अधिक ज्ञान जी से जुड़ा था, जबकि ज्ञानजी का सब कुछ 'पहल’ से जुड़ा था।

इस वक़्त न जाने क्यों मुझे पत्रिका 'शेष’ के प्रकाशक-संपादक हसन जमाल को याद करने का बहुत मन हो रहा है। वे ज़माने से बहुत ख़फ़ा हैं। ख़फ़्तगी ज़ाहिर करने का उनका तरीका ज़माने को भी नहीं भाता था। मैं निजी तौर पर मानता हूं कि ज़माने ने उनकी कोशिशों की क़द्र न की। एक सुंदर विचार और निस्वार्थ भाव से हिंदी-उर्दू की खाई को पाटने की कोशिश में उन्होने ख़ुद को खाई में फंसा लिया और 'शेष’ का प्रकाशन बंद हो गया। हसन जमाल 'पहल’ के साथी रहे हैं और उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है।

'पहल’ ज्ञानरंजन की एक लम्बी कहानी है, जिसके पात्र अनेकानेक कवि, लेखक, विचारक हैं। इनमे से अधिकांश ने अपने-अपने कारनामो से अपनी एक अलग पहचान बनाई। इस पहचान के साथ-साथ पहल की पहचान भी जुड़ती और बड़ती रही है।

हर कहानी का अंत होता है, लेकिन कहानी कभी ख़त्म नहीं होती। मनुष्य का पुनर्जन्म का सिद्धांत अब तक मात्र एक विचार है लेकिन कहानी के संदर्भ में यह एक स्थापित सत्य है। हर पुरानी कहानी नए संदर्भों में, नए देश-काल में, नए नाम और नए रंग-रूप में जन्म लेती रहती है। किसी कुम्हार के घड़े की तरह। मिट्टी वही लेकिन टूटकर बिखरकर भी बन जाती है कभी घड़ा, कभी कटोरा और कभी प्याला।


बुधवार, 29 अगस्त 2012

जे. सी. जोशी पंचम शब्द साधक साहित्य सम्मान एवं पाखी महोत्सव-2012: ज्ञानरंजन ने कहा- यह पुरस्कार राजपथ से जनपथ की तरफ जाने जैसा है

(प्रसिद्ध कहानीकार और पहल के संपादक ज्ञानरंजन को 25 अगस्त को जबलपुर में जे. सी. जोशी पंचम शब्द साधक साहित्य सम्मान एवं पाखी महोत्सव-2012 में शब्द साधक शिखर सम्मान से सम्मानित किया। समारोह में मुख्य अतिथि प्रसिद्ध कथाकार शेखर जोशी ने ज्ञानरंजन को 51 हजार रूपए की सम्मान राशि भेंट की। समारोह की अध्यक्षता नर्मदा यायावर, लेखक व कलाकार अमृतलाल बेगड़ ने की। इस अवसर पर ज्ञानरंजन ने अपने चिरपरिचित अंदाज में वक्तव्य दिया। उनका वक्तव्य यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत है) :-

माननीय अध्यक्ष नर्मदा के अविराम यात्री-सर्जक श्री बेगड़ जी, शेखर भाई, अपूर्व जोशी और मंचासीन आयोजक रचनाकार साथियों

    सभागार में बाहर से आए मेरे अनेक मित्र, कथाकार, कवि, कार्यकर्त्ता और स्थानीय नागरिक जीवन के नए-पुराने साथी बैठे हैं। प्यार करने वाले लोग हैं, तरह-तरह के जीवन साथी हैं, कुछ पुराने विद्यार्थी भी हैं। समझिए कि एक छोटा सा तारामंडल ही है। यह पहला सम्मान अथवा पुरस्कार है, जो मेरे गृह नगर में दिया गया, अन्यथा बाकी सभी दूर जगहों में ही दिए गए। इसी शहर में 50 वर्ष का मेरा जीवन बिखर गया है, जिसमें शानदार लोग रहते आए थे। इसलिए मैं किंचित भावुक और आवेगमय रहूं, तो क्षमा करेंगे। इस अवसर पर हम खुशी मनाने के साथ कुछ बेबाक भी रहें, तो बेहतर क्योंकि प्रसन्नताओं के साथ कुछ अफसोस और विषाद भी चिपके हुए हैं-जीवन का यह परम्परावादी विषय भी है कि उजालों के साथ छायाएं भी चलती हैं।

    मित्रों, अभी तक संसार के असंखयक सम्मानों, पुरस्कारों के अवसर पर बहुतेरे वक्तव्य दिए जा चुके हैं। ये वक्तव्य विचित्र, अद्वितीय और अविस्मरणीय हैं और गद्य तथा विचार के बहुमूल्य दस्तावेज भी। इस समुद्र में मेरी भी एक बूंद गिरती है, विलीन भी हो जाएगी। यह एक सुसंस्कृत ढर्रा है, जो मनुष्य जाति के बढ ते हुए नर्क को ढंग देता है। यह शिखर सम्मान, अभी तक मुझसे पर्याप्त वरिष्ठों और शीर्षस्थों को दिया जा चुका है। वरिष्ठों के अलावा चार समकालीन महापुरुषों को, जो हिन्दी की सांस्कृतिक सत्ता और सम्पदा के बड़े उदाहरण हैं। मेरे साथ आते ही यह सम्मान आयु में थोड़ा नीचे खिसक गया है, धारा बदल गई है, वह सामाजिक, सांस्कृतिक सत्ता से कुछ मुक्त हुआ है, भिन्न पंक्ति में बदल गया है, इसके तेवर में तब्दीली भी हुई है। यह शिखर सम्मान मुख्य धारा से अन्तर्धारा की तरफ खिसका है। एक वाक्य में कहना हो तो कहूंगा कि वह राजपथ से जनपथ की तरफ चला है। यह नियोजकों की विचार सरणि है, विवेक मार्ग है या नीति कहा नहीं जा सकता, पर केवल मेरे लिए नहीं, हिन्दी के प्रतिरोधी समाज के लिए यह सुखद है।
    मेरी अपनी जिंदगी, धातु, कोटि और उसके सामाजिक दर्शन में इतना जरूर दिखता रहता है कि मृत्यु के आसपास भारतीय बड़े माने जाने वालों की दुनिया में एक हड़बड़ी होना शुरू हो जाती है। उन पर किताबें आने लगती हैं, उन्हें पुरस्कृत किया जाने लगता है, उनकी अस्वस्थता का प्रसार सहानुभूति के साथ होता है, उन पर यांत्रिक संस्मरण लिखे जाने लगते हैं, उनके प्रति भक्ति, भावुकता और अंधत्व जागृत होने लगता है, उनके एकांत का अपहरण होने लगता है, चिंदी-चिंदी स्वाहा होने लगती है। उनके साक्षात्कारों में 'अनंत' जैसी दार्शनिकता का सवाल जवाब उत्पन्न होता है। इस प्रकार का जीवन व्यवहार और कुछ नहीं विदाई देने की टिपिकल भारतीय शैली है। चुपचाप जाने नहीं देंगे। जैसा जीवन रहा है, वैसी मृत्यु होने नहीं देंगे। प्रायः लोग सम्मानजनक अवसरों पर वृद्ध होने तक एक दार्शनिक भाषा आविष्कृत करते हैं। मेरी चिंता है कि क्या भारतीय समाज में शानदार विदाई संभव है ? जब किसी को पुरस्कृत सम्मानित किया जाता है, तो उम्मीद की जाती है कि वह कुछ विरल करेगा, पर मेरे लिए जीवन ने ऐसा कुछ छोड़ा नहीं है। वास्तव में, मैं यह चाहता था कि जिंदगी मेरा पीछा छोड़े। मेरी दुनिया तो उसी दिन खत्म हो रही थी, जिस दिन सड कों से पोस्ट बॉक्स गायब होने लगे थे। मेरी आवारगी का केंचुल बदल रहा था। मुझे चौराहे, अड्डे, मचान सुकून पसंद हैं और यह जबलपुर जहां मेरे जीवन के अंतिम लोग रहते हैं। आवारगी में अन्य बातों के साथ-साथ यह एक बुनियादी विचार निहित है रहता है कि निठल्लेपन के फल, श्रम के फलों से कम मूल्यवान नहीं हैं। उसकी आंखें खुली रहती हैं, उसके कान तैयार रहते हैं, वह किसी नितांत भिन्न चीज को खोलता रहता है, जो भीड  कभी नहीं देख सकती। यह मुझे वाल्टर बेंजामिन ने बताया। मैं मानता था कि जीवन से हम चीजों को सीधे उठा सकते हैं।

    साथियों, पिछली सदी के शुरूआत में एक आदमी बिना नागा धूप या बर्फ की परवाह किए बिना हर रोज वियना की सड कों पर टहलता दिखाई देता था-यह आदमी बिथोवेन था, जिसने अपनी घुमक्कड़ी के बीच अपनी शानदार स्वर लहरियों का कम्पोजिशन किया। आज कोई इस शैली, इस मार्ग का अनुसरण नहीं करता-पर मेरे लिए अब भी यह मूल्यवान है।

    तरह-तरह की बातें उमड़ रही हैं। लिखने की दुनिया के साथी याद आ रहे हैं। लिखने का मतलब है, अपने को अतिरेक में दिखाना। इसलिए लिखते समय जितना भी अकेलापन हो, वह काफी अकेलापन नहीं है, कितनी ही खामोशी हो वह पर्याप्त खामोशी नहीं है, कितनी ही रात हो वह काफी रात नहीं है। लिखते समय सारा समय ही बहुत कम है, क्योंकि सड कें अंतहीन लंबी हैं और रास्ते से कभी भी भटका जा सकता है। शुक्र है कि मैं भटका नहीं, पर बहुत से लोग मानते हैं कि कहानी से 'पहल' की तरफ जाना मेरा भटकाव ही है। इसके लिए- अपने डिफेंस के लिए मैं आपके सामने मोहम्मद इकबाल का एक शेर पढ ता हूं, जो मैंने 40 वर्ष पहले अपने कहानी संग्रह 'सपना नहीं' के प्रारंभ में दिया था-

                न बचा बचा के तू रख इसे
                    तिरा आईना है वो आईना
                कि शिकस्त हो तो अजीजतर
                    है निगाहे आईना साज  में

    मैं अपनी वास्तविक बात अपने साथी, आज के मुख्य अतिथि शेखर जोशी से शुरू करूंगा। इलाहाबाद में वे मेरे पड़ोसी थे। उनके और मेरे कई समान मित्र थे। उनकी कहानी 'कोसी का घटवार' पढ  कर मैं निर्जन में चला जाता था, मेरा दिल डूबता था- श्रम, दायित्व और एकांत का एक अपरिचित अनुभव मुझे मिला। आप एक दुर्लभ कथाकार हैं। इन्हें मैं अपने कई हीरो में एक मानता था, एक गुरुदत्त थे। मेरे पड़ोस में शेखर जी के अलावा कुछ और युग प्रवर्तक लोग थे। नरेश मेहता, उपेन्द्र नाथ अश्क, सरस्वती शरण कैफ, भैरव प्रसाद गुप्त, दूधनाथ सिंह और नीलाभ और भारती भंडार के सुप्रसिद्ध बैठकबाज वाचस्पति पाठक, जिन्होंने जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त, इलाचंद्र जोशी, निराला-हिन्दी की महान विभूतियों की किताबें छापीं।

    दरअसल मैं बताना चाहता हूं कि मैं किस तरह बन रहा था, मैं किस तरह की मोहब्बत और सोहबत में गढा जा रहा था। यह एक अत्यंत अमूर्त कहानी है। मैं प्रतिभा का नक्षत्र नहीं था, समूह समाज का एक बुनने वाला कीड़ा था। इस कीड़े को भद्र समाज ने थोड़ा-थोड़ा संशकित हो कर स्वीकार किया। अन्यथा नामवर सिंह, विष्णु प्रभाकर, श्रीलाल शुक्ल और राजेन्द्र यादव के साथ मेरी पंक्ति बैठती नहीं। मैं एक भिन्न पंक्ति का लेखक हूं। अगर बहुत सारी पंक्तियां इस दुनिया में या किताब के एक पृष्ठ पर जरूरी हैं, तो मैं किसी भी पंक्ति में रखा जा सकता हूं।

    बहुतों के साथ हुआ होगा, पर मेरे साथ भी यह हुआ कि चालीस से अधिक प्रतिनिधि संकलनों में, पाठ्‌य पुस्तकों और फिल्म निर्माणों में मेरी कहानी 'पिता', 'फेंस के इधर और उधर', 'अमरूद का पेड़' संकलित की गई। ये नरम लड़ाईयों, मामूली तौर पर परिवर्तनगामी और सुशील पीड़ा या बैचेनी की कहानियां हैं। ये कुशल हैं, मार्मिक हैं, तब्दीली का बुनियादी संकेत करती हैं, पर हमारे सभ्यता विमर्श को हल्के से छूती हैं। यह सब बड़े समाज को प्रिय है। लेकिन बहिर्गमन, छलांग, सम्बन्ध, अनुभव, घंटा नहीं संग्रहीत की गई, जो बुनियादी हैं, कुचलती हैं स्तब्ध करती हैं, हमारे सांस्कृतिक समूह को अवाक्‌ करती हैं। तीन दशक बाद भी इन कहानियों का मुहावरा और जबरदस्त हो कर एक राक्षस की तरह जीवित है। कायर समाज इसके बगल हो कर गुजरता है। इन कहानियों में एक अनिवार्य हिंसा और अश्लीलता है। पुराने मानकों और नीतिशास्त्र के मुताबिक ये कहानियां तंग करने वाली हैं। जब ये कहानियां छप कर आती थीं, तो मेरी मां पत्रिकाओं को तकिए के नीचे छिपा देती थीं। कितनी मासूम थीं मेरी मां। ये कहानियां इसलिए जीवित हैं कि हिन्दुस्तान अपने मिजाज में भीतर से बदला नहीं है। मैनरिज्म और शिल्प को छोड  दें, तो कमीनापन बैलोस बढा है।

    बेगड़ जी, शेखर जी, जोशी जी और भाई प्रेम भारद्वाज आज तक मैंने किसी को वास्तविक धन्यवाद नहीं दिया और मैं डिमेंशिया से पीड़ित नहीं हूं, इसलिए इस शिखर के बहाने अपने बनाने वालों, गढ ने वालों को याद करना चाहता हूं।

    धीरेन्द्र वर्मा, रामकुमार वर्मा, डा. रघुवंश, पं. उदय नारायण तिवारी और धर्मवीर भारती जैसे लोग मेरे अध्यापक थे। गार्डन सी रोडारमल, एग्नेश्का सोनी, अरविंद कृष्ण मेहरोत्रा, गिरधर राठी, विष्णु खरे और सुभाष मुखोपाध्याय जैसे मेरी कहानी के अनुवादक रहे। डा. इन्द्रनाथ मदान, उपेन्द्र नाथ अश्क, नेमिचंद्र जैन, नामवर सिंह, सुरेन्द्र चौधरी, विश्वनाथ त्रिपाठी, नागेश्वर लाल, परमानंद श्रीवास्तव, शिवकुमार मिश्र, सुवास कुमार और शंभुनाथ मेरे आलोचक हुए, मुझ पर लिखा। विभिन्न पुरस्कारों की घोषित जूरी में सर्वश्री नामवर सिंह, शानी, सोमदत्त, मैत्रेयी पुष्पा, विनोद कुमार शुक्ल, सत्यप्रकाश, हरिनारायण व्यास, ममता कालिया और नरेश सक्सेना जैसे निर्णायक रहे। मेरे संपादकों की दुनिया उल्लेखनीय है। प्रेमचंद के ज्येष्ठ और कनिष्ठ पुत्र श्रीपत राय और अमृत राय, शैलेष मटियानी, मार्कण्डेय, अशोक बाजपेयी, रमेश बक्षी, धर्मवीर भारती, भैरव प्रसाद गुप्त, चन्द्रभूषण तिवारी मेरे स्मरणीय संपादक थे। धर्मवीर भारती ने मेरी पांच कहानियां छापीं। भारती जी मेरे गुरू भी थे, पर इलाहाबाद में हमारी उनसे तलवार खिंची रहती थी। वे परिमलियन और मैं प्रगतिशील। पर वे लम्बे पत्रों के द्वारा गहरा दबाव बनाते और मैं उनके लिए लिखता। मार्कण्डेय ने 'कथा' में मेरी 'घंटा' कहानी छापी। इस कहानी के लिए उन्होंने मेरा इतना पीछा किया कि सुबह चार बजे उनकी नींद टूट जाती थी और मैं कहानी में जुट जाता। भीष्म साहनी ने मेरी 'संबंध' छापी और कहा कि प्यार और कठोरता का यह अद्‌भुत घर है। कमलेश्वर ने 'फेंस के इधर और उधर' तथा 'पिता' छापी। फेंस के इधर और उधर में एक पंक्ति को तितर-बितर करके उन्होंने कहानी को संवार दिया। 'अनुभव' चन्द्रभूषण तिवारी ने वाम में छापी और भैरव जी ने 'दिवास्वप्नी' छापने से पहले मुझसे बहस की-क्या ऐसा जीवन संसार है कहीं ? मैंने कहा हां है। अगर स्वप्न है तो दिवास्वप्नी भी है-यथार्थ और स्वप्न में गहरा सरगम है। और भैरव जी ने कहानी के उस अपरिचित संसार को स्वीकार किया। मित्रों, भैरव जी को हिन्दी कहानी का सबसे गुरुतर संपादक माना जाता था।

    मैं 'पाखी' के युवा संपादक को और आपको यह सूचना ताजा करना चाहता हूं कि देश के प्रथम आपात्‌काल में 'पहल' पर गहरे आक्रमण किए गए और 'पहल' ने उसका सामना किया। अखबारों के कुछ मशहूर संपादक, स्तंभकार और पत्रकारों ने 'पहल' का जी खोल कर समर्थन किया। टाइम्स ऑफ इंडिया के एक केबिन से पहल पर आक्रमण होता था और दूसरे केबिन से उसका समर्थन। मशहूर पत्रकार मायाराम सुरजन, राहुल बारपुते, कमलेश्वर, राजेन्द्र माथुर, एन. के. सिंह ने अपने स्तंभों और अग्रलेखों में पहल की भूमिका की सराहना की। यह वह समय था, जब देश के अखबार सन्नाटे में थे। मेरा आग्रह है कि नए संपादक सत्य का अन्वेषण करें। सच्चाई की कानाफूसी नहीं होती।

    संपादकों की यह शानदार परम्परा थी। आज कोई संपादक यह नहीं कह सकता कि उसके पूर्वज कुछ दे कर नहीं गए। पर आज के अधिकांश उस मार्ग पर चलना नहीं चाहते। वे भक्त चाहते हैं, उपकृतों का संसार चाहते हैं, लिटरेरी क्लबों का जायका चाहते हैं-हिन्दी की दुनिया कितनी बड़ी, कितनी दूर तक है और कितनी नामालूम पट्टियों तक फैली है, उसकी खोज निरंतर जरूरी है। इस प्रकार इस स्मृति में, मैं अपने अध्यापकों, आलोचकों और पाठकों के प्रति कृतज्ञता प्रकट कर रहा हूं। धन्यवाद दे रहा हूं।

    मुझे निर्जन जगहें पसंद थीं, पर वहां भी अपराधी और पालीथिन पहुंच चुके हैं। सवाल यह है कि क्या एक सक्रिय व्यक्ति को निर्जन में जाने का हक नहीं है ? लेकिन दुर्भाग्य से इस भवसागर में परिंदे ही फंसते हैं। यह जलसा एक झोंके की तरह आया है। मैं लगभग सो रहा था, जीवन संग्राम से बिछुड  गया था कि पाखी और इंडिपेंडेंट मीडिया ने जगाया और कहा कि सुबह हुई है आपको याद किया जा रहा है।

    अंत में मित्रों, मेरा जबलपुर जिसमें मैं रहता हूं उसकी मूल आत्मा भूमंडल के खिलाफ है-वह स्थूल रूप से खिलाफत करता नहीं दिखता पर अपनी जीवन भाषा में अपनी ही मौज में रहता है। कॉफी हाउस से निकल कर जिस पुराने शहर और बस्तियों से होता हुआ घर वापस लौटता हूं, वह कभी दमिश्क का बाजार होता है, कभी ताशकंद का कोना और कभी 'उसने कहा था' की गलियां और कभी बनारस की झलक। यहां 1940-50 के गाने सुनाते हुए रेडियो होते हैं। मैंने सारे कामों को अंजाम दे कर, सारे सौदे बंद करने के बाद, दिल्ली से संबंध विच्छेद करते हुए कुछ फिल्मों, कुछ संगीत और कुछ अमर किताबों, जिसमें मेरे पिता की गालिब भी शामिल है और कुछ शानदार दोस्तों के सहारे इस दुनिया को छोड़ा था, पर बीच-बीच में शनि चमक उठता है और मेरी बुनियादी आवारगी पर विराम लगाता है। मैंने पच्चीस दिन तक इस घोषित सम्मान की चिट्ठी को बच्चों, धर्मपत्नी से छिपाया पर टेलीफोनों में खुसर-पुसर से संदेह पैदा हो गए। क्या मैं वापस आ रहा हूं ? नहीं ! काशीनाथ, रवीन्द्र कालिया और दूधनाथ सिंह, मैं आपको आश्वस्त करता हूं कि मैं वापस नहीं आ रहा हूं। मैं वापस नहीं आ सकता।

    आयोजकों, देश भर के लेखक साथियों, जबलपुर के यारों और आदरणीय भद्रजनों को हार्दिक अभिवादन।

   

   

रविवार, 29 जुलाई 2012

पहल में सरकारी विज्ञापन नहीं छपेंगे

हिंदी साहित्य जगत की अनिवार्य पत्रिका के रूप में मान्य पहल को विख्यात साहित्यकार, संपादक और कहानीकार ज्ञानरंजन ने पुन: निकालने का निश्चय किया है। उन्होंने तीन वर्ष पहल का प्रकाशन स्थगित कर दिया था। पहल का प्रकाशन बंद करते समय ज्ञानरंजन की टिप्पणी थी कि उन्होंने पहल को किसी आर्थिक दबाव या रचनात्मक संकट के कारण बंद नहीं किया है, बल्कि उनका कहना था-‘‘पत्रिका का ग्राफ निरंतर बढ़ना चाहिए। वह यदि सुन्दर होने के पश्चात् भी यदि रूका हुआ है तो ऐसे समय निर्णायक मोड़ भी जरूरी है।’’ उन्होंने उस समय स्पष्ट किया था कि यथास्थिति को तोड़ना आवश्यक हो गया है। नई कल्पना, नया स्वप्न, तकनीक, आर्थिक परिदृश्य, साहित्य, भाषा के समग्र परिवर्तन को देखते हुए इस प्रकार का निर्णय लेना जरूरी हो गया था। ज्ञानरंजन ने तब कहा था कि इस अंधेरे समय में न्यू राइटिंग को पहचानना जरूरी हो गया है, लेकिन ऐसा नहीं करना भी बेईमानी होगी। ज्ञानरंजन कहते हैं कि विकास की चुनौती और शीर्ष पर पहल को बंद करने का निर्णय एक दुखद सच्चाई है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार का निर्णय लेना भी एक कठिन कार्य है।

ज्ञानरंजन ने पहल के पुनर्प्रकाशन की घोषणा pahal2012.wordpress.com ब्लाग के माध्यम से की। शुरुआती तौर पर पाठकों से संवाद होगा। ब्लाग में दो पहल संवाद जारी हो चुके हैं। अब पहल के प्रकाशन में प्रसिद्ध पत्रकार राजकुमार केशवानी भी सहयोग करेंगे। जबलपुर में ज्ञानरंजन ने बातचीत में कहा कि पहल में सरकारी विज्ञापन बिलकुल नहीं छापे जाएंगे। तीन माह तक जमीनी काम किया जाएगा और फिर पत्रिका का प्रकाशन होगा। पत्रिका के प्रकाशन तक ब्लाग के माध्यम से पाठकों से संवाद होगा। पहल को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए वेबसाइट का भी उपयोग होगा। 
ज्ञानरंजन को पहल के संबंध में प्रतिक्रियाएं देने के लिए इन ईमेलों पर सम्पर्क किया जा सकता है-  gyanranjanpahal@gmail.com, rkpahal2@gmail.com

बुधवार, 31 अगस्त 2011

जबलपुर में परसाई जन्मदिवस आयोजित: राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोषी, राहुल बारपुते और आलोक मेहता ने खुल कर एकतरफा शरद जोशी का महिमा मंडन किया, परसाई का नहीं-ज्ञानरंजन

बलपुर में 22 अगस्त को प्रसिद्ध व्यंग्यकार और विचारक हरिशंकर परसाई का जन्मदिवस ‘विवेचना’ और ‘पहल’ के संयुक्त तत्वावधान में मनाया गया। विवेचना कई वर्षों से 22 अगस्त को परसाई का जन्मदिवस विचार गोष्ठी और परसाई की सूक्तियों पर आधारित कार्टून प्रदर्शनी के माध्यम से आयोजित करती आ रही है। इस वर्ष जबलपुर में डा. विश्वनाथ त्रिपाठी, कवि नरेश सक्सेना और लीलाधर मंडलोई को आमंत्रित किया गया था। डा. विश्वनाथ त्रिपाठी अस्वस्थता के कारण जबलपुर नहीं आ सके, लेकिन नरेश सक्सेना, लीलाधर मंडलोई के साथ कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डा. अरूण कुमार ने परसाई के व्यंग्य को नए रूप में परिभाषित किया। लीलाधर मंडलोई ने कहा कि परसाई ग्रामीण व कस्बाई परिवेश के जीवंत व्यक्तित्व थे, जो परिवार का बोझ उठाना जानते थे। उनके अपने जीवन संघर्ष की छाया, उनके लेखन में झलकती है। नरेश सक्सेना ने वर्ष 1952 से अपने जबलपुर के संबंधों को याद करते हुए कहा कि परसाई जी उनको जीने की राह दिखाई। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डा. अरूण कुमार ने कहा कि लोकप्रिय किंतु सृजनात्मक साहित्य पर आलोचकों की दृष्टि नहीं पड़ती। परसाई जी की रचनाएं समाज की आंखें खोलती हैं। उनकी रचनाएं छोटी होते हुए भी सारगर्भित हैं। कार्यक्रम में कार्टूनिस्ट राजेश दुबे की परसाई के व्यंग्य और सूक्तियों पर आधारित पोस्टर प्रदर्शनी ने सोचने को मजबूर किया।

विचार गोष्ठी के पश्चात् नरेश सक्सेना और लीलाधर मंडलोई ने अपनी नई व पुरानी कविताओं से उपस्थित लोगों को उद्वेलित किया। इस कार्यक्रम में पहल के संपादक और विख्यात साहित्यकार ज्ञानरंजन ने हरिशंकर परसाई पर विचारोत्तेजक लिखित वक्तव्य दिया। यह वक्तव्य यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत है:-

सभागार में भाई नरेश सक्सेना, लीलाधर मंडलोई और आपकी मंच पर उपस्थिति, जबलपुर के वर्तमान में स्वर्गीय हरिशंकर परसाई के संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण है। देश के सुप्रसिद्ध चित्रकार और नर्मदा के मशहूर यात्री अमृतलाल वेगड़ हमारे अभिन्न श्रोता रहे हैं। यहां दमोह, सिवनी, नरसिंहपुर, कटनी और श्रीधाम से भी लोग आए हैं। नगर के गणमान्य संस्कृतिकर्मी, रचनाकार और बुद्धिजीवी भी उपस्थित हैं। दमोह के सामाजिक कार्यकर्ता, यहां परसाई जी का तैल चित्र ले कर आए हैं, जो सभागार में रखा है। परसाई जी पर आयोजन हम इसलिए नहीं करते कि यह एक स्थानीय धर्म है, परसाई का काम एक बड़े आकार का और बड़े संदेशों से भरपूर है, परसाई किचिंत स्थानीयता के चंगुल में रहे थे, पर उनका लेखन इससे मुक्त था। हम चाहते हैं कि परसाई पर बात कुछ आगे बढ़े।

परसाई के अनेक भक्त उनके लायक नहीं थे। कई गुमनाम रूप से उनके खिलाफ भी थे, क्योंकि परसाई के व्यंग्य और उनके विचार को पचाना बहुत मुश्किल था। वह उनके भीतर ही घुसपैठ करता था और वे लाचार होते थे। समकालीनता परसाई के खिलाफ थी। परसाई रचनावली का आना बहुत महत्वपूर्ण हुआ, पर उसके अध्यापक, संपादक, परसाई के बड़े अवदान की बावत न तो ठीक से बता सके और न उनसे संबंधित बहसों को जन्म दे सके। परसाई के समकालीन दुर्भाग्यों पर मैं कई बार टिप्पणी कर चुका हूं। सातवें दशक में परिमल की विचारधारा और उसके शस्त्रों ने श्रीलाल शुक्ल का विनोदपूर्ण उपहास करके यह बता दिया था कि परसाई के लिए भी कांटे तैयार हैं। जिस समय परसाई अपने प्रारंभिक दौर में थे, उस समय बहुत कम लोगों का रूझान परसाई के प्रति था। मैं साहित्यिक संसार की बात कर रहा हूं। नामावर लोग तो दूर थे। मुक्तिबोध ने परसाई का साथ दिया, पर वह गहरा आलोचकीय साथ नहीं था। वह एक गहरी मैत्री थी और विचारों का साथ था। मध्यप्रदेश में ही आप देखें, राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोषी, राहुल बारपुते और आलोक मेहता जैसे बड़े और दिग्गज पत्रकारों-संपादकों ने खुल कर एकतरफा शरद जोशी का महिमा मंडन किया, परसाई का नहीं। एकमात्र मायाराम सुरजन, परसाई के सपोर्टर बने। इस सब के अलावा कुछ बेहद जरूरी नाम हैं, जो परसाई की मूल्यवान आलोचना में अग्रणी हैं। दो नाम मैं यहां पर लूंगा-सर्वश्री सुरेन्द्र चौधरी और विश्वनाथ त्रिपाठी का। सुरेन्द्र चौधरी एक बड़ी प्रतिभा थी, उनमें बोहमीन तत्व भी थे, संभवतः इसलिए उनको घेर लिया गया। उन्होंने परसाई के बारे में थोड़ा ही लिखा पर उनकी पहचान गहरी और से भरी-पूरी थी। मित्रों, कृपया देखें कि सुरेन्द्र चौधरी जिनकी रचनावली अभी हाल ही में आई है, ने हमारे परसाई पर अनोखी बातें क्या कहीं ? वे जब परसाई पर विचार करते थे, तो हिंदी व्यंग्य की जातीय परंपरा उनके सामने रहती थी। इसलिए उन्होंने लिखा-‘‘ व्यंग्य जातीय इच्छा की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति है।’’ परसाई को उन्होंने व्यंग्य का विचारक कहा। अप संस्कृति के स्त्रोतों पर परसाई निरंतर व्यंग्य करते हैं, अपराजित उत्साह के साथ। इसके बाद सबसे यादगार काम किया आलोचक व रचनाकार डा. विश्वनाथ त्रिपाठी ने। उन्होंने परसाई पर एक मोनोग्राफ जैसी विधा में जो लिखा है, वह परसाई पर अकेली कृति है। त्रिपाठी जी ने परसाई को देश-दृष्टि और विश्व-दृष्टि से जोड़ा, उनकी यह कृति मूल्यवान किंतु अधूरी है। अधूरी इस मामले में कि, डा. साहब के पास परसाई पर लिखने के लिए जो कुछ बकाया है, वह उनके अधूरे साक्षात्कार को एक बड़े और संपूर्ण साक्षात्कार में बदल देगा। मित्रों, परसाई पर अगला अध्याय इस देश में त्रिपाठी जी लिख सकते हैं। हमारे दुर्भाग्य से वे गहरी अस्वस्थता के कारण हमारे बीच नहीं आ सके। विश्वनाथ त्रिपाठी जिनको प्यार करते हैं, उन पर लिखते जरूर हैं। अभी-अभी उन्होंने हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे महान गद्य-शिल्पी पर अपनी ताजा कृति प्रकाषित की है। परसाई जी के प्रति उनकी जो साध है, वह पुरानी है, गहरी है। त्रिपाठी जी ने ही लिखा था कि परसाई जी की रचनाएं स्वातंत्रोत्तर भारत का चेहरा है।

श्रोताओं। मैं आपको यह बता दूं कि निमाड़ के मशहूर कला समीक्षक और निबंधकार नर्मदा प्रसाद उपाध्याय पिछले दस वर्षों से परसाई पर एक ग्रंथ की कल्पना ले कर काम कर रहे हैं और उनसे मैं जुड़ा हूं, पर वह काम विश्वनाथ जी के काम की जगह नहीं ले सकता। नए लोग भी काम करेंगे। नरेश सक्सेना और लीलाधर मंडलोई, परसाई जी के प्रियतम रहे हैं। नरेश जी ने जबलपुर में पढ़ाई की और परसाई जी का गहरा सानिध्य प्राप्त किया। लीलाधर मंडलोई जो आज न केवल एक बड़े कवि हैं, बल्कि हिंदी मीडिया के गहरे जानकार भी, वे भी जबलपुर-काल में परसाई की छाया में ही आगे बढ़े। हमारे अध्यक्ष अरूण कुमार जी परसाई पर जो कुछ बोलते हैं, वह पूरी तरह मौलिक होता है। मौलिक चीजें जीवंत और ताजा होती हैं। ये बातें हमें सीधे स्पर्श करती हैं।

अंत में मित्रों, कहना चाहूंगा कि परसाई पर आलोचनात्मक लेखन हो, परिचर्चा हो, बहसें हों, फिल्म या धारावाहिक का निर्माण हो, रंगकर्म हो, कुछ भी करते हुए परसाई जी के आत्मकथ्य के गंभीर बिंदुओं पर हमें ध्यान रखना चाहिए। 1997 में हरिशंकर परसाई ने एक आत्मकथ्य तैयार किया था, उसका संक्षिप्त सा हिस्सा यहां पढ़ कर, मैं अपनी बात समाप्त करूंगा, सबका स्वागत करूंगा और भविष्य में परसाई के बहाने गंभीर आयोजनों में आप सब की भागीदारी की कामना करूंगा। ‘विवेचना’ यह आयोजन वर्षों से करती आ रही है। ‘परसाई’ विवेचना के निर्माता थे।

‘‘अपनी कैफियत दूं, तो हंसना-हंसाना, विनोद करना अच्छी बातें होते हुए भी, मैंने मनोरंजन के लिए कभी नहीं लिखा। मेरी रचनाएं पढ़ कर हंसी आना स्वाभाविक है। यह मेरा यथेष्ट नहीं। और चीजों की तरह मैं व्यंग्य को उपहास, मखौल न मान कर एक गंभीर चीज मानता हूं। साहित्य के मूल्य, जीवन मूल्यों से बनते हैं। वे रचनाकार के एकदम अंतस से पैदा नहीं होते। जो दावा करते हैं कि उनके अंतस से ही सब मूल्य पैदा होते हैं, वे पता नहीं किस दुनिया में रहते हैं। जीवन जैसा है, उससे बेहतर होना चाहिए। राजनीति से मुझे परहेज नहीं है। जो लेखक राजनीति से पल्ला झाड़ते हैं, वे वोट क्यों देते हैं। वोट देने से ही राजनीति शुरू होती है। बुद्धिजीवी चाहे सक्रिय राजनीति से भाग न लें, पर वह अराजनैतिक नहीं हो सकता। जो अराजनैतिक होने का दावा करते हैं, उनकी राजनीति बड़ी खतरनाक और गंदी है।’’

शनिवार, 25 अप्रैल 2009

ज्ञानंरजन ने कहा-पारदर्शी हो साहित्यिक पुरस्कारों की प्रक्रिया



प्रसिद्ध साहित्यकार और पहल के संपादक ज्ञानरंजन ने कहा है कि प्राय: पुरस्कृत और सम्मानित लोग आत्मकथन की तरफ जाते हैं, परन्तु मेरे लिए भारतीय भाषा परिषद का सम्मान एक दर्पण की तरह है, जिसमें मैं खुद को और अपने अतीत को निहारता हूं। मत-मतांतर के साथ पत्रकारी किस्म के विवाद व अवसर के बाद विलक्षणता की ऐसी घड़ी चल रही है, जिसमें एक घातक हिंसा पैदा हो चुकी है। उन्होंने कहा कि साहित्य व राजनीति के बीच किसी भी तरह का फर्क गायब हो चुका है। ज्ञानरंजन कहते हैं कि उनकी सोच यह है कि हमें अपने समस्त सांस्कृतिक उपक्रमों व उसके प्रबंधन पर बाजार के रिवाज से हट कर नए सिरे से विचार कर एक नया सांस्कृतिक आंदोलन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें अपने पुरस्कारों की प्रक्रिया को खोल देना चाहिए और उसकी राजनीति व गोपनीयता को भंग कर देना चाहिए। ज्ञानरंजन ने कहा-‘‘मैंने जो कुछ भी कहा है, वह मेरी तथा मेरी कहानियों की ही आवाज है।"

उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध साहित्यकार और पहल के संपादक ज्ञानरंजन को पिछले दिनों कोलकाता में हिंदी साहित्य में अमूल्य योगदान देने के लिए भारतीय भाषा परिषद ने वर्ष 2008 के साधना सम्मान से सम्मानित किया। ज्ञानरंजन सहित डा. महिंदर कौर गिल (पंजाबी), आर. वैरामुत्थु (तमिल) और रामचंद्र बेहरा (उड़िया) को भी साधना सम्मान से सम्मानित किया गया। युवा साहित्यकारों में हिंदी के लिए डा. अल्पना मिश्रा, निर्मला पुतुल (संथाली), मधुमीत बावा (पंजाबी) और एस. श्रीराम (तमिल) को अपनी-अपनी भाषा के साहित्य में योगदान देने के लिए युवा साहित्कार सम्मान से अलंकृत किया गया। उड़िया के साहित्यकार रमाकांत रथ ने साहित्यकारों को सम्मानित किया।

रमाकांत रथ ने इस अवसर पर कहा कि साहित्य में जूनियर व सीनियर नहीं होता। साहित्य एक परम्परा है, जो निरंतर गतिशील रहती है। साहित्यकार को अपने आप को स्टेनोग्राफर से ज्यादा नहीं समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान करते हैं। भाषा मानवीय संस्कृति को जोड़ती है। कुछेक भारतीय भाषाओं को क्लासिकल भाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए। भारतीय भाषाओं को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है।

तमिल के सम्मानित कवि वैरामुत्थु ने कहा कि जब जीवन के प्रति ललक खत्म हो जाए व पृथ्वी विस्मित करने लगे कविता वहीं समाप्त हो जाती है। उड़िया साहित्यकार डा. रामचंद्र बेहरा ने कहा कि रचनात्मक लेखन आत्म अभिव्यक्ति का माध्यम है। लेखक की रचना में जीवन के उनके अनुभवों और दृष्टि की झलक दिखती है।

युवा साहित्कार डा. अल्पना मिश्रा ने कहा कि साहित्य में समय और समाज को अभिव्यक्त करना चाहिए। स्त्री को आलू छीलने से ले कर चिप्स तक की पीड़ा को समझने की जरूरत है।

संथाली साहित्यकार निर्मला पुतुल ने कहा-‘‘मुझे जो सम्मान मिला है, वह संथाल समुदाय का सम्मान है। संथाली साहित्य में गीतों की प्रमुखता है। इसके बोल बड़े कीमती हैं। लोक कंठों और परम्पराओं में संथाली साहित्य सुरक्षति है। दुर्भाग्य है कि कुछ साहित्यकारों ने संथाली क्रांतिकारियों को लुच्चा कहने में भी संकोच नहीं किया है। कुछ भद्र जन संथाली भाषा को संविधान की आठवीं सूची में जगह मिलने से भयभीत हैं।’’

समापन भाषण देते हुए रामकुमार मुखोपाध्याय ने कहा कि साहित्य हमारे लिए आवश्यक है। साहित्य अतीत व वर्तमान को जोड़ता है। कार्यक्रम का संचालन भारतीय भाषा परिषद की कुसुम खेमानी ने किया। स्वागत भाषण संस्था के निदेशक डा. विजय बहादुर सिंह ने दिया।

रविवार, 6 अप्रैल 2008

ज्ञानरंजन कहानी क्यों नहीं लिखते ?


कोलकाता में साहित्यिक पत्रिका वागर्थ ने नव कथाकारों के लिए एक कहानी प्रतियोगिता का आयोजन किया। प्रतियोगिता के विजेताओं को पहल के संपादक ज्ञानरंजन ने पिछले दिनों कोलकाता में पुरस्कृत किया। उन्होंने इस पुरस्कार वितरण समारोह में नौ पृष्ठ का वक्तव्य दिया। ज्ञानरंजन के वक्तव्य हर समय बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। कोलकाता में भी उनका बोला गया एक-एक शब्द अपने आप में अर्थपूर्ण था। ज्ञानरंजन ने वक्तव्य में स्पष्ट कर दिया कि बाजार और कहानी की अस्मिता या उसके साहित्यपन की अनिवार्यता से जुड़ी बातें ही उनका मुख्य उद्देश्य हैं। उन्होंने कहा कि हमारे भीतर एक अखबार और एक रचनाकार साथ-साथ बना रहता है। इसके लिए रचनाकारों के स्नायुतंत्र में जबरदस्त हलचल और बेचैनी होती रहना जरुरी है।
ज्ञानरंजन ने नए कथाकारों से आग्रह किया कि सबसे जटिल वास्तविकताओं वाले वर्तमान में हम एक अंश तक कहानी के यथार्थ यानी उसके चतुर्दिक यथार्थ के चक्रव्यूह में प्रवेश कर सकें तो यह उनका एक मूल्यवान कदम होगा एवं बड़ी सफलता होगी। यह तभी संभव है, जब हमारे अपनी विधा को केवल डिफेंड करने की शैली न अपनाई जाए। इससे पाठकों, साहित्य रसिकों, कहानीकारों और कहानी के आंदोलनकर्ताओं की समृद्धि हो सकेगी। लेकिन इस सच्चाई के बावजूद कि विधाओं में उपद्रव और विखंडन हो रहा है ऐसा हो नहीं पाता,क्योंकि अखबारों ने समकालीन राजनीति के तहलकों, अत्यधिक चमकती तकनीक ने हमें इतना डांवाडोल कर दिया है कि हम कहानी को अपने नए यथार्थ से जोड़ नहीं पा रहे हैं। यह वेल्डिंग या नवनिर्माण आसान नहीं है। लगभग 50 साल की जबरदस्त बाजार की धधक, धुएं और कोहराम के बाद महान कथाकार सारामागो ने 'केव' उपन्यास लिख कर बाजार की ताकत, उसकी समझ और भूमंडल के षड़यंत्र पर गहरा आक्रमण किया है। अब इसकी भरपूर चर्चा है, क्योंकि सृजनात्मक साहित्य की दुनिया में बाजार की फैन्टेसी का पेंच प्रभावी तौर पर सारागामो ने तोड़ दिया है।
ज्ञानरंजन ने कहा कि इस प्रकार नए जमाने के रचनाकारों के लिए यथार्थ और रचना प्रक्रिया का प्रदर्शन किया है। कहानी का अर्थ भारत जैसे विकासशील, अर्ध विकसित अथवा पिछड़े देशों के समाजों में अभी मरा नहीं है, बल्कि स्पंदित और जीवित है। इसको मूर्छित होने से बचाने का काम नए कहानीकारों का है। तभी उनकी विधा बचेगी अथवा नहीं। एक लेखक को मानना होगा कि उसका काम केवल लिख डालना नहीं है। उन्हें अपनी मेधा को एक दार्शनिक या वैज्ञानिक या चिंतक के साथ बहुआयामी बनाना है। भारतीय भाषाओं में अवशिष्ट रुप में कहानी अभी भी वह कर दिखाती है, जो उपन्यास नहीं दिखा पा रहा है। लेकिन उपन्यास का जबड़ा बहुत बड़ा है, जैसा पश्चिम ने प्रमाणित कर दिया है। ज्ञानरंजन नए कहानीकारों से कहते हैं कि कहानी लिखे ही लिखे मत जाओ, उसका बंकर भी बनाओ।
ज्ञानरंजन नव कथाकारों से कहते हैं- "बाजार एक बतकही नहीं है, वह विशाल जबड़ा है। इस कड़वाहट को पी लेने से लाभ ही है कि शायद हमारे कहानीकार उतने कलावंत नहीं है, उतने सचेत नहीं है, जितना अनिवार्य है। कहानी हमें हंसते-हंसते, तृप्ति देते, आस्वाद से छलते हुए इतना चिंताग्रस्त कर देती है कि क्या कहा जाए। आखिर हम एकत्र होते ही किस लिए हैं। यह हंसी-खुशी कितनी मारक है, कितनी हिंसक है, अर्थवान है। कहानी में यह संभव है।"
दुनिया में कहानी की स्थिति के संदर्भ में ज्ञानरंजन कहते हैं- "तथाकथित शिष्ट दुनिया में या जहां पूंजी की नोक पर सभ्यताएं तांडव कर रही हैं, वहां उनकी भाषाओं में कहानी मर चुकी है। अफ्रीकी देशों, दक्षिणी अमेरिका, कुछ छोटे नामालूम से देशों कहीं-कहीं एशिया और भारत में (पाकिस्तान भी) कहानी का अस्तित्व बना हुआ है। और वह बाजार से टकरा रही है, बाजार में प्रवेश कर रही है और बाजार द्वारा फेंकी जा रही है। बाजार वह जगह है जहां स्वागत किया जाता है, अंगीकृत किया जाता है, सजाया जाता है, बेचा जाता है और फालतू भी कर दिया जाता है।"
ज्ञानरंजन कहते हैं कि उन्हें कहानी के सौंदर्यशास्त्र की बनिस्बत कहानी के बाहरी समाज में दो चीजें अधिक सता रही है। एक तो कहानी का साहित्य भी बने रहना और दूसरा कहानी का बाजार में स्पेस। वे कहते हैं कि समकालीनता और बाजार का गहरा रिश्ता है। दुनिया की किसी भी भाषा की तुलना में हिन्दी में समकालीनता का जोर सबसे अधिक है साहित्य में। परम्परा और भविष्य की बात तो हम कभी-कभी कर लेते हैं। कहानी की रचना में कहानी के पठन पाठन में में हम यूज एण्ड थ्रो के काफी नजदीक रेंग रहे हैं। अब सवाल यह है कि हमारे कहानीकार समझदारी और अपनी सर्वोत्तम सृजनात्मक के साथ इन सबसे मुठभेड़ नहीं कर सकते तो न तो वे समकालीन ही रह सकते हैं और न चर्चित और लोकप्रिय। ऐसा न कर सकने के कारण उनकी कहानी की अवधि भी 6 महीने रह जाएगी। बाजार उनसे डिमांड करेगा नव्यतम की और परिवर्तित ढांचे की। और क्या आप इस तरह लगातार दौड़ते रह सकते हैं। आपका मिजाज, आपकी रचना, आपका तापमान, आपकी बुनावट इस तरह की नहीं है। फिर क्यों उसकी तरफ आकर्षित होते हैं। जो बाजार हमारा विरोधी है, हमारा साथ नहीं देता, हमारे लिए जहां जगह नहीं है, उसका विकल्प खोजने का काम भी हमारी सर्वोच्च चिंता है।
ज्ञानरंजन बाजार की तरफ रचनाकारों के आकर्षण और विवशता के संबंध में कहते हैं कि इसका प्रमुख कारण रचनाकारों को पिछड़ने का डर लगता है। तटस्थ और क्रूर, स्तृतिविहीन समय में समकालीनता बचाती है और हमें लगातार उपस्थित रखती है। यद्यपि समकालीनता के लिए बाजारु विकल्प कम हैं। कुछ साहित्यिक परिशिष्ट अखबारों के, एक-दो साप्ताहिक, जिसमें साहित्यिक अभिव्यक्ति लगभग हाशिए पर है। भारत की किसी भी भाषा की तुलना में समकालीनता हिन्दी में सबसे अधिक है। समकालीनता का एक प्रतिफल और हो गया है कि हिन्दी कहानी भी अब गीत की तरह मंच पर है। मंच माने कहानी के गुटीय अड्डे। अब हिन्दी समाज में 3-4 कहानी की पत्रिकाएं हैं बस। उसमें भी आधी कहानी है, आधा विमर्श। विमर्श भी आप देखें की स्त्री विमर्श, मीडिया विमर्श और दलित विमर्श। समकालीन बाजार में ये टाप थ्री विमर्श हैं, बल्कि केन्द्रीय विमर्श बन गए हैं। साहित्य में राजनीति की कार्बन कापी हो रही है। अभी-अभी कविता के भविष्य पर भी आलोचना ने चिंता प्रगट की है। कहानी की पत्रिकाओं से ही कहानी विमर्श गायब हो गया है। बस कहानी की छुटपुट रिपोर्ट बची है। देश के किसी भी शापिंग आर्केड में साहित्य कला की कोई जगह नहीं है। अफसोस और खेद और कोसने के साथ हम दिन भर अपनी बतकही करते हैं। अपने आचरण को साहित्य की शर्तों पर मोड़ने की कोशिश नहीं करते। बाजार को असहाय झांकते रहते हैं। बाजारों में कुछ अंग्रेजी की जगहें हैं। अंग्रेजी में भी समकालीन किताबें और बेस्ट सेलर हैं। अमेरिका और इंग्लैंड के सबसे शानदार साहित्यिक प्रकाशक धूल चाट रहे हैं। नया बाजार बढ़ रहा है।
ज्ञानरंजन कहते हैं कि उन्होंने अपने वक्तव्य में एक जगह साहित्यपन या साहित्यिकता का उपयोग किया है। बाजार और समकालीनता के बीच ज्ञानरंजन इसे आज भी एक जरुरी मुद्दा मानते हैं। वे कहते हैं कि साहित्य हमारा कवच है। यह हमारी अस्मिता की रक्षा करता है। हमें इस दिशा की तरफ ध्यान देना चाहिए। जिसे बाजार की तरफ जाना हो पापुलर व्यवसायी और खपत वाली कहानी लिखनी हो वे अवश्य लिखें। यह उनका चुनाव है। यह एक जरुरी रास्ता भी है पर जो साहित्य कला जीवन का रसायन बनाना चाहें और भाषा की मौलिक समृद्धि उन्हें भी अपनी जद्दोजहद कायम करनी चाहिए। कहानी, नई कहानियां, उर्दू कहानी, सारिका के अलावा हिन्दी की अन्य शानदार पत्रिकाओं में कहानी को एक विशिष्ट दर्जा था। चाहे वह कल्पना हो, लहर हो, परिमल गुट की पत्रिकाएं हों या प्रगतिशील गुट की। श्रीपतराय, श्यामू सन्यासी, उपेन्द्रनाथ अश्क, धर्मवीर भारती, भैरवप्रसाद गुप्त, मोहन राकेश, बलवंत सिंह, रामनारायण शुक्ल कहानी संपादन के ये सर्वाधिक सम्मानीय नाम हैं। इनके संपादन में निकलने वाली कहानी पत्रिकाओं के प्रिंट आर्डर हजारों में थे, लेकिन कहानी बाजार के चंगुल से स्वतंत्र थी। उन्होंने कहानी की टोटल रक्षा की। ज्ञानरंजन कहते हैं कि इस भव्य परंपरा को तोड़ने या उससे विचलित होने, विरत होने की जरुरत क्यों हुई ? उसे समृद्ध क्यों नहीं किया गया। पता नहीं किन घड़ियों में यह खंडन हुआ, यह अध्ययन का विषय है। जिस तरह समय की राजनीति करवट लेती है, उसी तरह साहित्य की दुनिया में करवटें नहीं बदली जातीं। साहित्य में अगर हमने मांग-आपूर्ति का नियम लागू कर दिया तो यह एक प्रकार की व्यापार प्रणाली होगी।
ज्ञानरंजन कहते हैं- "बाजार के बारे में मेरा नजरिया नकारात्मक नहीं है। बाजार इतनी बुरी जगह नहीं है। गृहस्थों के लिए, जनगण के लिए वह जरुरी ही नहीं जीवित रहने का एक मजबूत आधार है। वह लोकप्रिय कारीगारी के लिए हमारी भूख प्यास के लिए भी एक स्थल है। पर एक रचनाकार के लिए उसमें बहुत अधिक जरुरी चीजें उपलब्ध नहीं हैं। एक साहित्यकार को उसमें प्रवेश की अनिवार्यता नहीं है। हम पानी में जाते हैं, पानी में तैरते हैं, उससे लड़ते हैं। हम बाजार में जाते हैं, बाजार से लड़ते हैं। लेखक की दुनिया अलग है। वह निर्माता है, खोजी है, विचारक है, वह भविष्य और अपने समय में धंसता है, वह बेपरवाह है। जिस दिन हम अपना इनोसेंस खो देते हैं, उस दिन हम एक होशियार आथर हो जाते हैं। अमानवीयकरण का सुराख बनने लगता है। हमारा सृजनात्मक वार्तालाप ही बदल जाता है।
ज्ञानरंजन कहते हैं कि उन्हें संपादक होने के नाते हर पल चेतना और जागरण की जरुरत पड़ती है। इसका कोई अंत नहीं है। वे अपने साहित्य समाज से ही सीखते चलते हैं। कहानी के लिए यह अदभुत समय है। परिपक्व और समृद्ध समाजों में कहानी पदच्युत हो चुकी है। लेकिन यहां भारतीय समाज में हर चीज पिघल रही है। भाषाएं प्रतिभाओं की धनी हैं। यथार्थ तार-तार और विखंडित हो रहा है।
ज्ञानरंजन ने अपने वक्तव्य को समाप्त करते हुए सबसे महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा- " मुझसे यह सवाल पूछा जा सकता है कि आप इतना जान समझ रहे हैं तो लिखते क्यों नहीं कहानी ? इसका जवाब है कि मैं नहीं लिख सकता। लिख सकता हूं पर वह महज ज्ञानवान क्रिया हो्गी जिसका कोई अर्थ नहीं। जानना और सूचित होना पर्याप्त नहीं है। लिखते जाना भी पर्याप्त नहीं है। छपते जाना भी पर्याप्त नहीं है। नए मुहावरे को जन्म देना, त्रासदी के मध्य डूबना-उतरना और लगभग अकेले पड़ जाना, आवेग, धीरज और श्रम और ताजगी और कम उम्र इसके लिए जरुरी है। और भी बहुतेरी चीजें जरुरी हैं। पचासों साल बीत जाने और अनन्य लफड़ों में विचरने वाले बूढ़े अपने समाज में कोई बड़ी भूमिका अदा नहीं कर सकते।"
(ज्ञानरंजन जी का पूरा वक्तव्य वागर्थ के नए अंक में प्रकाशित होगा)

खि‍लंदड़, खांटी, जीवंत और वैचारिकी से मजबूत सीताराम सोनी ने नुक्कड़ नाटक और जनगीत को कैसे बनाया लोकप्रिय

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