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गुरुवार, 25 मई 2023

जबलपुर के एक बेनाम 'अन्ना का डोसा' कॉफी हाउस की नामी शोहरत

    अन्ना का डोसा कॉफी हाउस और
यहां 57 वर्ष से काम कर रहे रैफल
 जबलपुर में जिस समय वर्ष 1958 में इंडियन कॉफी वर्कर्स कोऑपरेटिव सोसायटी लिमिटेड जबलपुर इंडियन कॉफी हाउस (ICH) शुरु करने की तैयारी कर रहा था उसी समय केंट सदर क्षेत्र में महावीर टॉकीज प्रांगण  में एसआर राजन अपना साउथ इंडियन रेस्त्रां शुरु कर डोसा व इडली परोसने लगे थे। उस समय तक दक्षिण भारतीय व्यंजनों का परिचय करवाने का श्रेय नि:संदेह यहां आने वाले दक्षिण भारतीय परिवारों को था। जबलपुर में डोसा व कॉफी को लोकप्रिय बनाने का श्रेय  के इंडियन काफी हाउस को जाता है लेकिन जबलपुर के केंटोमेंट क्षेत्र में पुरानी महावीर टाकीज प्रांगण में स्थित एक बेनाम निजी कॉफी ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। पिछले 65 वर्षों से यह दक्षिण भारतीय व्यंजन परोसने वाला कॉफी हाउस अपने अनोखे स्वाद, गुणवत्ता और दूसरों की तुलना में उतने ही मूल्य में ज्यादा खाद्य सामग्री परोसने के कारण अत्यंत लोकप्रिय है।

अन्ना का डोसा-1958 में एसआर राजन ने कभी नहीं सोचा नहीं था कि 65 वर्ष बाद उनके द्वारा स्थापित किया गया कॉफी हाउस जबलपुर के परिवारों में इतना लोकप्रिय हो कर एक परंपरा बन जाएगा। आज मार्डन काफी हाउस के नाम से पहचाना जाने वाला रेस्त्रां वैसे तो बोलचाल की भाषा में ‘अन्ना का डोसा’ ही कहलाया जाता है। अब इसे राजन के बड़े बेटे राजकुमार सिंह (राजू) संभाल रहे है। वे भी पिछले 46 वर्षों से अपने पिता के शुरू किए गए व्यवसाय को देख रहे हैं। उनके कॉफी हाउस में डोसा व इडली के साथ सांभर और चटनी खाने वालों की संख्या सबसे ज्यादा रहती है। वैसे इस कॉफी हाउस की एक विशेषता यह भी है कि जो भी व्यक्ति या परिवार यहां एक बार आया वह इससे जुड़ गया।

यहां आने वालों का अनुभव कभी खराब नहीं रहा-शहर के एक प्रसिद्ध उद्योगपति यहां अक्सर आते रहते हैं। वे पिछले तीन दशक से इस  कॉफी हाउस में नियमित रूप से आ रहे हैं। वे सप्ताह में यहां एक बार जरूर आते हैं। इतने वर्षों में उनका अनुभव कभी खराब नहीं रहा। अनुभव का अर्थ ग्राहकों की त्वरित सेवा, गुणवत्ता और खाद्य सामग्री का दूसरे रेस्त्रां या काफी हाउस की तुलना में ज्यादा परोसना ऐसी बातें हैं, जिनसे कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहता है। डोसा तो आजकल हर जगह बनता है लेकिन यहां की बात कुछ निराली और अलग है। यहां परोसने वाले लोगों के व्यवहार की भी तारीफ है। एक व्यवसायी का मानना है कि किसी भी संस्थान की पहचान और लोकप्रियता में व्यवहार कुशलता की भी अहम भूमिका रहती है।

स्टूडेंट लीडर का रहा अड्डा-अन्ना का डोसा कॉफी हाउस शुरु से किशोर उम्र के लड़के लड़कियों में भी बेहद लोकप्रिय है। एक समय में यह जबलपुर के स्टूडेंट लीडरों का अड्डा भी रहा है। इसका कारण रेस्त्रां का अपना एक अनुशासन भी है। वैसे इस रेस्त्रां में एक बार में 35 से 50 लोग बैठ सकते हैं, लेकिन यहां रविवार और मंगलवार को बेहद भीड़ रहती है, इसलिए कई बार तो लोगों को अपने परिवार के साथ अपनी बारी का इंतजार भी करना पड़ता है। फास्ट फूड का क्रेज बढ़ गया है इसके बावजूद स्वाद की बात आती है तो लोग यहां के स्वादिष्ट डोसे को ही प्राथमिकता देते हैं।

किसी भी प्रकार की जीत और अन्ना का डोसा-अन्ना का डोसा कॉफी हाउस जीवन में किसी प्रकार की जीत और खासतौर से शर्त जीतने पर अन्ना का डोसा खाने के लिए भी पहचाना जाता है। जबलपुर के लाखों लोग फुटबाल, हॉकी, बिलियर्ड, स्नूकर में जीतने या किसी भी तरह शर्त जीतने पर अन्ना का डोसा खाने की शर्त रखते आ रहे हैं। 

57 वर्ष से गहरा नाता है रैफल का रेस्त्रां से-इस रेस्त्रां की एक खास बात यहां के मेन कुक या हेड शेफ रैफल हैं। वे रेस्त्रां से 1966 से जुड़े हुए हैं। उस समय उनकी उम्र 8-9 वर्ष थी और वे परोसने का काम करते थे। उन्होंने धीरे-धीरे मालिक राजन से दक्षिण भारतीय खाना बनाना सीखा और आज लोग रैफल के बनाए डोसे, इडली, सांभर चने की दाल की चटनी को चटखारे ले कर खा रहे हैं। इस रेस्त्रां की दूसरी खासियत इसका पिछले 65 सालों से एक सा स्वाद है। रेस्त्रां में किसी भी चीज में कोई खास मसाला नहीं डाला जाता और जैसी मान्यता है उसी के अनुसार बनाया जाता है। लेकिन दूसरे रेस्त्रां या काफी हाउस के मुकाबले वे डोसा या इडली बनाते समय चावल व उड़द दाल का एक अलग मिश्रण व अनुपात रखते हैं। इस वजह से उनका डोसा व इडली नरम रहते हैं और खाने में लजीज लगते हैं। रेस्त्रां में दो छोटे हॉल व दो छोटे कमरे हैं। यहां की क्राकरी साधारण है। अन्ना के डोसे में महंगाई से खाद्य सामग्री का मूल्य तय होता है। जब रेस्त्रां शुरु हुआ था तब एक मसाला डोसा 15 पैसे में और वर्ष 1966 में 25 पैसे में आता था। अब इसकी कीमत 70 रुपए हो गई।🔷

गुरुवार, 11 मई 2023

किसने जबलपुर सहित मध्यप्रदेश में सर्वप्रथम चायनीज फुड परोसने और खाने का सलीका स‍िखाया

 
  आज चायनीज फुड देश में शहरों से गांव मजरा टोलों तक पहुंच गए हैं। रेस्त्रां से ले कर शादी ब्याह, जन्मदिन पार्टी प्रत्येक इवेंट में चायनीज फुड जरूरी हो गया है। चाय-चाट के ठेलों से ज्यादा चायनीज के ठेले हो गए। सुबह के नाश्ते से रात के डिनर तक लोग चायनीज फुड ही खा रहे हैं। जबलपुर के सीएम वांग (CM WANG) को हम श्रेय दे सकते हैं कि उन्होंने जबलपुर सहित पूरे मध्यप्रदेश को चायनीज फुड परोसने की शुरुआत  कर इसको खाने का सलीका सिखाया। आज से 75 वर्ष पहले सीएम वांग ने जबलपुर में घंटाघर के पास अपना क्लॉक टॉवर चायनीज रेस्त्रां शुरु किया था। उस समय जबलपुर के काफ़ी कम लोग चायनीज फुड खाने में रुचि रखते थे। लोगों को चायनीज फुड के बारे में कई तरह के भ्रम थे। इस तरह के भ्रम के कारण वांग अपने क्लॉक टॉवर चायनीज रेस्त्रां में चाय के साथ भारतीय खाने पीने के सामग्री रखते थे। लोगों की फरमाइश होने पर वे चायनीज फुड तैयार कर परोस देते थे। भारत में सातवें दशक में अचानक चायनीज फुड का क्रेज बढ़ने लगा और इसके साथ ही सीएम वांग का क्लॉक टॉवर चायनीज रेस्त्रां भी लोकप्रिय होने लगा। जबलपुर के शौकीन लोगों को चायनीज सूप ने सबसे पहले आकर्ष‍ित किया। उस समय छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने भारतीय प्रशासनिक सेवा की शुरुआत की थी और उनकी जबलपुर में नियुक्त‍ि थी। वे क्लॉक टॉवर चायनीज रेस्त्रां के नियमित व सम्मानित कस्टमर हुआ करते थे। वे चौथे पुल के पास रहते थे और शाम के समय उनका अध‍िकांश समय चायनीज रेस्त्रां में बीता करता था। उनके नजदीकी लोगों ने बताया कि उस समय अजीत जोगी के पास एक स्वेगा (मोपेड) हुआ करती थी जिसे चलाते हुए वे अंकल वांग के रेस्त्रां में पहुंच जाया करते थे।

सातवें दशक में जब भारतीयों को चायनीज फुड भाने लगा तब उनके सामने चॉप स्ट‍िक (दंडी के आकार की चम्मच) से खाने की समस्या आने लगी। मालूम हो पूर्वी एश‍ियाई देशों चीन, जापान, थाईलैंड में कोई भी भोजन चॉप स्ट‍िक से ही खाया जाता है और यूरोपीय देश के छुरी-चम्मच का उपयोग करते हैं। हम भारतीयों को हाथ से ही खाना रुचि कर लगता है। बासु चटर्जी की छोटी सी बातफिल्म में अशोक कुमार द्वारा अमोल पालेकर को चॉप स्ट‍िक के सलीके से उपयोग का मज़ेदार दृश्य आज भी लोगों को गुदगुदाता है। सीएम वांग ने चॉप स्ट‍िक की समस्या का समाधान कांटे-चम्मच से कर के स्थानीय लोगों की झि‍झक को दूर किया।

जब चायनीज रेस्त्रां की बात हो रही है तो यह भी जानना जरूरी हो जाता है कि चीनी लोग जबलपुर में कैसे रच बस गए। बताया जाता है कि कुछ चीनी परिवार वर्ष 1930 में बर्मा (अब म्यान्मार) से जबलपुर पहुंचे थे। उस समय रंगून से पानी के जहाज से कलकत्ता आने में लगभग तीन-चार दिन का समय लगता था। कुछ परिवार कलकत्ता पहुंचे और उसमें से कुछ ने जबलपुर का रूख किया। वर्ष 1942-43 में कलकत्ता से डा. वू स‍िएन जबलपुर पहुंचे और यहीं बस गए। डा. सिएन दांत के डाक्टर के रूप में मशहूर हुए। उनके पुत्र टीएच लियाओ (Dr.Tsai Teh Liao) ने 1965-66 में डाक्टरी की पढ़ाई पूरा कर के डेंट‍िस्ट बन गए। पिता-पुत्र की इस जोड़ी ने जबलपुर में हजारों लोगों की नकली बत्तीसी बना कर प्रस‍िद्ध‍ि पाई। अब इनकी तीसरी पीढ़ी डा. सीएच लियाओ मैदान में है।

सीएम वांग के क्लॉक टॉवर चायनीज रेस्त्रां से ले कर आगे तक की दस-बारह मकान व दुकाओं के मालिक जबलपुर के एक पारसी फ़ि‍रोज़ दारूवाला थे। बाद में उन्होंने वांग को वह जगह बेच दी। वांग जबलपुर वर्ष 1943 में कलकत्ता से पहुंचे थे और वर्ष 1948 में उन्होंने रेस्त्रां की शुरुआत कर दी थी। वांग का निधन वर्ष 1997 में हो गया। वांग की चार पुत्रि‍यां हैं। जिसमें मी ह्वा वांग  (MEE HWA WANG) जबलपुर में रहती हैं और शेष बाहर। मी ह्वा वांग वर्तमान में रेस्त्रां का संचालन करती हैं। वांग के प्रिय माइकल लेपचा रहे हैं। वे बचपन से ही रेस्त्रां के कामकाज से जुड़ गए थे और आज इसका कुशलता से प्रबंधन कर रहे हैं।🔹

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