दैनिक भास्कर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दैनिक भास्कर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2022

जयप्रकाश चौकसे और जबलपुर


जयप्रकाश चौकसे के निधन की जानकारी आज 2 मार्च को सुबह कुछ देर पहले कवि कुमार अम्बुज से मिली। जयप्रकाश चौकसे का जबलपुर से अनोखा संबंध रहा है। उन्होंंने अपनी जिंदगी में फिल्मों पर दो या तीन व्याख्यान दिए हैं, जिसमें से एक जबलपुर में दिया था। वे पहल के संपादक व विख्यात कथाकार ज्ञानरंजन के रिश्ते में साढ़ू भाई थे। जयप्रकाश चौकसे की स्मृति जबलपुर के पाठकों को सदैव रहेंगी। इंदौर के गुजराती कॉलेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे जयप्रकाश चौकसे  पिछले 26 वर्षों से लगातार दैनिक भास्कर में ‘परदे के पीछे’ कॉलम को लिख रहे थे। जयप्रकाश चौकसे का कॉलम 25 फरवरी को  आख‍िरी बार दैनिक भास्कर के पहले पृष्ठ पर छपा। वे इन दिनों कैंसर से जूझ रहे हैं। उनके कॉलम की अंतिम पंक्त‍ि है-‘’प्रिय पाठकों, प्रिय विदा है लेकिन अलविदा नहीं। कभी विचार की बिजली कौंधी तो फिर रूबरू हो सकता हूं लेकिन संभावनाएं शून्य हैं।‘’

कुछ वर्षों से जयप्रकाश चौकसे का कॉलम पता नहीं क्यों जबलपुर के दैनिक भास्कर में छपना बंद हो गया था, जबक‍ि सिटी भास्कर में सिर्फ दो ही कॉलम पठनीय हैं। जयप्रकाश चौकसे का ‘परदे के पीछे’ और एन. रघुरमन का ‘मैनेजमेंट फंडा’। दोनों कॉलमनिस्ट का जबलपुर से गहरा संबंध है। जयप्रकाश चौकसे 26 वर्षों तक कभी चूके नहीं। हवाई जहाज या ट्रेन में यात्रा के दौरान उन्होंने अपने कॉलम को प्रतिदिन लिखा। तीन बार कैंसर से उबरने के बाद अब उनकी सहनशक्त‍ि जवाब देने लगी है। कैंसर के साइड इफेक्ट्स से वे अशक्त हो गए।   

आज दैनिक भास्कर के सभी संस्करणों में सुधीर अग्रवाल की भावुक पंक्त‍ि प्रकाशि‍त हुई है। सुधीर अग्रवाल ने लिखा-‘’ जयप्रकाश चौकसे पिछले 26 वर्षों से भास्कर में परदे के पीछे कॉलम रोजाना लिख रहे हैं। पिछले काफी वक्त से वे कैंसर से पीड़ित हैं परंतु अस्पताल और घर पर बिस्तर इन दोनों जगह भी उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा। आज सुबह उन्होंने मुझे फोन किया कि अभी तक बेसुध स्थिति में भी भास्कर के करोड़ों पाठकों की शक्ति उन्हें ऊर्जा दे रही थी और वे तमाम मुश्किलों के बाद भी रोजाना लिख लेते थे लेकिन अब ये नहीं हो पा रहा है, सेहत का मुश्किल दौर है इसलिए वे आज आखिरी कॉलम लिखना चाहते हैं। चौकसे जी के जज्बे और 26 सालों के परिश्रम को सलाम। ईश्वर से प्रार्थना है कि उनके साथ बहुत अच्छा हो। उनकी जगह और जज्बे को भरना असंभव है। भास्कर और उसके पाठक इन 26 वर्षों यात्रा के लिए हमेशा कृतज्ञ रहेंगे। इसलिए आज का कॉलम पहले पेज पर।‘’ सुधीर अग्रवाल ने संभवत: दैनिक भास्कर में पहली बार लिखा है।

            जयप्रकाश चौकसे ने अपने अंतिम कॉलम में जबलपुर का जिक्र भी किया है। वे लगभग दस-बारह वर्ष पूर्व ‘पहल’ के आमंत्रण पर जबलपुर में सिनेमा पर व्याख्यान देने आए थे। जब जयप्रकाश चौकसे व्याख्यान देने जबलपुर आगमन हुआ था, तो वह उनकी वह यात्रा सरल व सहज नहीं थी। उस समय वे पुणे के पास सलमान खान के ‘बिग बॉस’ की स्क्र‍िप्ट‍िंग व प्रोडक्शन से जुड़े थे। जयप्रकाश चौकसे पुणे से बंबई, बंबई से इंदौर और इंदौर से जबलपुर ट्रेन से पहुंचे। हम लोगों की मेजबानी में तालमेल की कमी के कारण उनकी रूकने की व्यवस्था हमारे वरिष्ठ सहयोगी के घर में करना पड़ी। इस चूक को महसूस करने पर जब हम लोगों ने आनन फानन में उनकी व्यवस्था एक होटल में की। उन्होंने होटल में रूकने से इंकार कर दिया। जयप्रकाश चौकसे ने कहा-‘’ऐसा करना मेजबान का अपमान होगा।‘’

            अक्टूबर की महाअष्टमी की शाम स्थानीय रानी दुर्गावती कला संग्रहालय की कला वीथि‍का में जयप्रकाश चौकसे का व्याख्यान आयोजित हुआ। कई लोगों ने कहा अष्टमी के दिन व्याख्यान आयोजित कर बेवकूफी कर रहे हैं। कोई नहीं आएगा। सब लोग दुर्गा-काली के दर्शन करने जाएंगे। हम लोगों ने भी सोचा देखा जाएगा..अब तो कार्यक्रम तय हो ही गया है। उस शाम को जयप्रकाश चौकसे का व्याख्यान सुनने इतनी भीड़ उमड़ी कि पर्याप्त कुर्स‍ियों की व्यवस्था करने के साथ दरी बिछा कर दर्शकों-श्रोताओं को बैठाना पड़ा। कला वीथ‍िका के बाहर जयप्रकाश चौकसे के व्याख्यान सुनने व देखने के लिए ऑड‍ियो-विजुअल व्यवस्था करना पड़ी। जबलपुर रेलवे स्टेशन में जयप्रकाश चौकसे को विदा करते वक्त संकोच से एक लिफाफा देने का साहस किया गया, जिसे उन्होंने लेने से स्पष्टत: इंकार कर दिया। उन्होंने कहा-‘’पहल व जबलपुर के कारण मैं यहां व्याख्यान देने आया था।‘’ जयप्रकाश चौकसे देश में कहीं भी व्याख्यान देने नहीं जाते थे। आज कॉलम में उन्होंने लिखा भी है कि जबलपुर के अलावा वे सिर्फ महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा ही व्याख्यान देने गए थे।

            जयप्रकाश चौकसे का रानी दुर्गावती संग्रहालय की कला वीथ‍िका में व्याख्यान देने का सुफल पूरे जबलपुर शहर को मिला। उनका व्याख्यान सुनने जबलपुर के तत्कालीन कमिश्नर भी पहुंचे थे। कमिश्नर ने जब रानी दुर्गावती कला वीथ‍िका के हाल देखे तो उन्होंने तुरंत उसके नवीनीकरण का निर्णय लिया। वर्तमान में जबलपुर का साह‍ित्य‍िक व सांस्कृतिक जगत कला वीथ‍िका की सुविधाओं का जो लाभ उठा पा रहा है, उसका पूरे श्रेय जयप्रकाश चौकसे और उनके व्याख्यान को ही जाता है।

            विख्यात कथाकार व पहल के संपादक ज्ञानरंजन ने आज जब जयप्रकाश चौकसे से फोन पर बात की तो दोनों भावुक थे। ज्ञानरंजन ने पूछा कि क्या वे अब नहीं लिखेंगे, तब जयप्रकाश चौकसे ने कहा-तुम से ही तो मैंने सीखा है। तुम ने ल‍िखना छोड़ दिया। अब मैं भी नहीं लिखूंगा।

            मेरे जैसे लाखो पाठक जयप्रकाश चौकसे के प्रतिदिन प्रकाश‍ित होने वाले कॉलम ‘परदे के पीछे’ के एड‍िक्ट हैं। इस कॉलम को पढ़े बिना चैन नहीं मिलता। कल से जयप्रकाश चौकसे का कॉलम पढ़ने को नहीं मिलेगा। जयप्रकाश चौकसे ने लिखा है कि कॉलम उनको बेहतर इंसान बनाता गया। हम लोग भी उन्हें एक बेहतर इंसान के रूप में पहचानते हैं। उनके 26 सालों के परिश्रम व जज्बे को सलाम।      

बुधवार, 15 दिसंबर 2021

यायावर सोशलिस्ट जुगनू शारदेय


 मित्र दिनेश चौधरी की सूचना से जानकारी मिली कि हिन्दी के जाने-माने पत्रकार जुगनू शारदेय का 14 दिसंबर को दिल्ली के एक वृद्धाश्रम में 72 वर्ष की आयु में निधन हो गया। एक दिन पहले 13 दिसंबर को उनके चाहने वालों व मित्रों ने फेसबुक में जन्मदिन की बधाई व शुभकामनाएं दी थीं। 'जन', 'दिनमान' और 'धर्मयुग' से शुरू कर वे कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन व प्रकाशन से जुड़े रहे। पत्रकारिता संस्थानों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में शिक्षण व प्रशिक्षण का भी काम किया। नीतीश कुमार के रेल मंत्री काल में वे उनके मीडिया सलाहकार भी रहे। अपने बेबाक विचारों की वजह से उन्होंने कहीं भी ज्यादा समय टिकना उचित नहीं समझा, लिहाजा वे लगातार यहां-वहां भटकते रहे। उनके इस घुमक्कड़ स्वभाव ने उन्हें जंगलों में भी भटकने के लिए प्रेरित किया। जंगलों के प्रति यह लगाव वहाँ के जीवों के प्रति लगाव में बदला। सफेद बाघ पर उनकी चर्चित किताब ‘मोहन प्यारे का सफ़ेद दस्तावेज़’ (रेनबो पब्लिशर्स, 2004) हिंदी में वन्य जीवन पर लिखी अनूठी किताब है। इस किताब को पर्यावरण मंत्रालय ने 2007 में प्रतिष्ठित ‘मेदिनी पुरस्कार’ से नवाजा है।

जुगनू शारदेय ने वर्ष 1975 में बंबई प्रवास के दौरान फिल्म निर्देशक बीआर इशारा के निर्देशन विभाग में इंटर्ननुमा सहायक रहे थे। यह वही समय था, जब उनकी प्रगाढ़ता सुरेन्द्र प्रताप सिंह (एसपी) से हुई।  उस समय जुगनू को मानसिक अवसाद ज्यादा था। जुगनू को मानसिक अवसाद से निकालने में बीयर व रम ने बहुत मदद की। कुछ मदद बीआर इशारा की लायब्रेरी में पढ़ी जेआर कृष्णमूर्ति की पुस्तकों से मिली और कुछ एसपी सिंह की समझदार बातों से मिली। एसपी सिंह समझाइश देते हुए जुगनू को कहते थे कि बिना जेल जाए भी इमरजेंसी के खिलाफ लिखा-बोला जा सकता है। बस वह तरीका समझना होगा कि आदमी बोल भी दे और लिख भी दे। जुगनू का लेखन उस बात को उस समय समझ नहीं पाया। जुगनू शारदेय जीवन आज में नहीं, अभी में नहीं बल्कि क्षणों में जीते थे। वे अपने आप से उदासीन, असामाजिक और आवारा थे। मगर एसपी सिंह के साथ बिताए क्षणों में वे असामाजिकपन और आवारापन से बाहर भी निकले थे। जुगनू और एसपी कई शाम के बीयर के पार्टनर रहे। एक बार जुगनू ने एसपी से कहा था कि वे काफी उम्र में भी बीयर पी लेता हूं-और मरने के लिए हर पल जीता हूं।     

जुगनू शारदेय जन्मजात यायावर थे इसलिए जबलपुर कुछ दिनों के लिए ठिकाना बना। वर्ष 2008-09 में दैनिक भास्कर जबलपुर में घुमंतू पत्रकार के रूप में कार्यरत थे। उस समय उन्होंने विधानसभा व लोकसभा चुनाव की विशिष्ट रिपोर्टिंग की थी। वे अपनी शर्त पर काम करने वाले अद्भुत पेशेवर रुख वाले पत्रकार थे। वे अखबार मालिक को जूते की नोक पर रखते थे। अखबार आफिस में सहकर्मियों के साथ उनकी बातचीत न के बराबर होती थी। जुगनू शारदेय इससे पहले संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सम्मेलन में वर्ष 1969 में जबलपुर आए थे। उनकी यह जबलपुर यात्रा मात्र एक-दो दिन की थी। यहीं उनकी मुलाकात धर्मयुग के गणेश मंत्री से हुई थी।       

दैनिक भास्कर जबलपुर के सिविल लाइंस आफिस के सामने फुटफाथ में रहने वाला रिक्शा चालक टिग्गा उनका शहर में एकमात्र आत्मीय या कह लें दोस्त था। टिग्गा बहुजन समाज पार्टी का कट्टर समर्थक व कार्यकर्ता था और जुगनू खांटी समाजवादी थे। दोनों का जब तक साथ रहा संभवत: वे एक-दूसरे की राजनैतिक विचारधारा से अनभ‍िज्ञ रहे। टिग्गा उनको दिन भर रिक्शे में घुमाता था। दोनों सदर काफी हाउस में साथ में ब्रेक फास्ट, लंच व डिनर साथ में किया करते थे। जुगनू शारदेय को काफी हाउस का उपमा रुचिकर लगता था। या यों कह लें कि वे उपमा के दीवाने थे। कई बार वे केंट के किसी बार में मदिरापान भी साथ-साथ किया करते थे। जुगनू शारदेय जो मदिरा पीते थे, वही मदिरा टिग्गा को पिलाया करते थे। वैसे जुगनू बीयर के शौकीन थे। टिग्गा रात में जुगनू को सिविल लाइंस के अप्सरा अपार्टमेंट के उनके ठिकाने में प्रतिदिन छोड़ने जाया करता था। यहां जुगनू टेरिस में बने एक कमरे में रहते थे। जुगनू जी खीसे में हाथ डालते थे और जितने पैसे आते थे वह टिग्गा का मेहनताना हो जाते थे। जुगनू जी जितने दिन जबलपुर में रहे, उस अवधि में टिग्गा के रिक्शे में कोई सवारी नहीं बैठी। मुझे भी कई बार जुगनू शारदेय के साथ सदर काफी हाउस में साथ में बैठने का मौका मिला और उनके साथ स्ट्रांग काफी सुड़कने का अवसर मिला। बातचीत में अक्सर कहा करते थे कि वे बड़ी आशा से जबलपुर आए, लेकिन यहां आ कर उन्हें निराशा ही मिली। वे पहल के संपादक व विख्यात कथाकार ज्ञानरंजन से मिलना चाहते थे। साथ में जाने की बात हुई थी, लेकिन एक दिन वे अचानक दैनिक भास्कर की नौकरी छोड़ कर पटना रवाना हो गए। उनकी कई स्मृति ज़ेहन में हैं। पटना वापस जाने पर उनसे बात होती रहती थी। पिछले एक साल से उनकी जीवन जीने की इच्छा खत्म हो गई थी। वे फेसबुक में भी अपनी मृत्यु की बात करने लगे थे।

गुरुवार, 3 अप्रैल 2008

महिला डॉन का निधन और दैनिक देशबन्धु के सरोकार

ऊपर की कतरन जबलपुर से प्रकाशित दैनिक देशबन्धु के 1 अप्रैल के अंक में छपी हुई एक सिंगल कॉलम की खबर है। इस खबर के प्रकाशन के कई मायने हैं। पहला तो देशबन्धु के क्राइम बीट के रिपोर्टर ने अपनी ड्यूटी निभाते हुए जबलपुर की एक महिला डॉन चित्रा के निधन की खबर को लिखा है। उसकी जैसी समझ थी, उसने खबर को लिखा और समाचार पत्र में उसे प्रस्तुत किया गया। दूसरा क्या महिला डॉन के निधन को इतनी जगह देनी चाहिए ? देशबन्धु जैसे सरोकार वाले समाचार पत्र में किसी महिला डॉन के निधन और उसके कार्यों की अतिरंजित प्रस्तुति, यह सोचने को मजबूर करती है कि इसी समाचार पत्र को ग्रामीण पत्रकारिता के लिए एक बार नहीं, बल्कि कई बार स्टेट्समेन अवार्ड जैसे पुरस्कार मिल चुके हैं।
देशबन्धु में 'और दहाड़ हो गई शांत' शीर्षक से प्रकाशित समाचार का सार यह है कि जबलपुर की महिला डॉन चित्रा का बीमारी से निधन हो गया। वह पुलिस के लिए चुनौती थी और उसके निधन से सिंहनी जैसी दहाड़ भी शांत हो गई। उसने महिला होते हुए शहर में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। अवैध महुआ से शराब बनाने वाली चित्रा ने पुलिस को नाकों चने चबाने विवश कर दिया था। बेधड़क कच्ची शराब का कारोबार करने वाली चित्रा पुलिस के लिए हमेशा सिरदर्द बनी रही और उसने पुलिस का डट कर मुकाबला किया। निधन की खबर सुन कर उसके घर में स्थानीय लोग व व्यापारियों का तांता लग गया।
देशबन्धु में प्रकाशित समाचार से यह बोध होता है कि जैसे चित्रा नाम की महिला डॉन महिलाओं के लिए एक आदर्श थी। उसने शायद लीक से हट कर कोई काम किया हो। जैसे स्वतंत्रता के पूर्व अंग्रेजों से डट कर मुकाबला किया जाता था, वैसे ही उसने पुलिस से मुकाबला किया। मुद्दा यह है कि समाज में किसी भले आदमी या स्वतंत्रता सेनानी के निधन के समाचार को क्या इतना स्थान मिलता है, जितना महिला डॉन चित्रा के निधन को स्थान मिला ? क्या नेक या अच्छे काम करने वाले के लिए समाचार पत्र में जगह नहीं बची ? लगता है कि टेलीविजन चैनलों की तरह यहां भी टीआरपी का चक्कर है या प्रिंट मीडिया में काम करने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया से प्रभावित हो कर आपराधिक दुनिया को महिमा मंडित करने लगे हैं।
दरअसल देशबन्धु कभी भी मध्यप्रदेश या छत्तीसगढ़ में बिक्री के मामले में नंबर वन नहीं रहा, लेकिन समाचारों की दृष्टि से उसे हर समय गंभीरता से लिया जाता रहा है। देशबन्धु ने सामाजिक सरोकारों को प्राथमिकता देते हुए खबरों का प्रस्तुतिकरण किया है। मुझे याद है कि लगभग 12-13 वर्ष पूर्व भोपाल के अग्रणी समाचार पत्र के संपादक ने कहा था कि यदि समाचार पढ़ना है, तो जबलपुर में देशबन्धु से बेहतर कोई समाचार पत्र नहीं है। 90 की शुरुआत में जब रमेश अग्रवाल समूह ने जबलपुर से नव-भास्कर निकाला, तब गिरीश अग्रवाल ने स्वीकारा था कि देशबन्धु का पेज मेकअप और ले-आउट सबसे अच्छा है। इस दृष्टि से देखें तो उपर्युक्त टिप्पणियां यह सिद्ध करती हैं कि देशबन्धु एक उत्कृष्ट स्तर के समाचार पत्र के रुप में मान्य था।
जबलपुर में देशबन्धु और युगधर्म पत्रकारिता के स्कूल माने जाते थे। दोनों समाचार पत्रों के संपादक स्वर्गीय मायाराम सुरजन (देशबन्धु) और भगवतीधर वाजपेयी (युगधर्म) जबलपुर की पत्रकारिता के पितृ के रुप में मान्य थे। देशबन्धु में कार्यरत कई पत्रकार वर्तमान में प्रदेश व देश के प्रमुख समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर रहे हैं, इसकी सिर्फ एक वजह उनका देशबन्धु में कार्य करना रहा है। देशबन्धु रायपुर के संपादक ललित सुरजन को तो एक समय भारत के सबसे उदीयमान संपादक तक माना गया था। देशबन्धु जबलपुर में कार्य कर चुके राजेश पाण्डेय और राजेश उपाध्याय क्रमशः वर्तमान में नई दुनिया इंदौर और दैनिक भास्कर भोपाल जैसे संस्करणों के संपादक हैं।
7 अप्रैल से देशबन्धु का दिल्ली संस्करण शुरु हो रहा है। हो सकता है इससे वह राष्ट्रीय समाचार पत्रों में गिने जाने लगे, लेकिन इस प्रकार के समाचार उसकी प्रतिष्ठा को ही धूमिल करेंगे। हम सब जानते हैं कि देशबन्धु की एक उत्कृष्ट परंपरा रही है और क्षेत्रीय स्तर पर उसे एक मिसाल के रुप में देखा जाता है।

खि‍लंदड़, खांटी, जीवंत और वैचारिकी से मजबूत सीताराम सोनी ने नुक्कड़ नाटक और जनगीत को कैसे बनाया लोकप्रिय

  सीताराम सोनी जैसे खि‍लंदड़ , खांटी , जीवंत और वैचारिकी से मजबूत व्यक्ति के जीवन का पटाक्षेप ऐसा होगा इसके बारे में किसी ने कभी सोचा नहीं थ...