कवि लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कवि लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 11 जनवरी 2024

श्रद्धांजलि: मलय एक महत्वपूर्ण कवि जिनकी हमेशा उपेक्षा की गई

प्रगतिशील कविता के अग्रणी कवि मलय का 9 जनवरी को जबलपुर में 94 वर्ष की आयु में  जबलपुर में निधन हो गया। वे हिन्दी साहित्य में मुक्तिबोध युगीन अंतिम कवि थे। डा. मलय ने अविभाजित मध्यप्रदेश में विभिन्न शासकीय कॉलेज में हिन्दी विषय का अध्यापन किया। इस दौरान राजनांदगांव में मलय गजानन माधव मुक्त‍िबोध के सम्पर्क में आए। इसके बाद कविता मलय के जीवन की जिजीविषा बन गई। मलय को नयी कविता के बाद और अकविता से पहले के कवि माना जाता है। मलय को इसलिए भी याद करना चाहिए क्योंकि वे परसाई रचनावली के संपादकों में से एक थे। परसाई के व्यंग्यशास्त्र को ध्यान मे रखकर व्यंग्य का सौंदर्य शास्त्र लिखना हिन्दी साहित्य में उनका योगदान माना जाता है।

मलय की शुरुआती कविताएँ लयबद्ध व छन्दबद्ध थीं और बाद में वे मुक्त कविता की ओर बढ़े और फिर रूके नहीं। मुक्तिबोध ने मलय की कविताओं पर लम्बा पत्र लिखा था जो मुक्तिबोध रचनावली में प्रकाशित है। इस पत्र को संपादकों ने पहले गलत पाठ के साथ छाप दिया था लेकिन अब रचनावली के नए संस्करण में सही पाठ के साथ प्रकाशित हुआ। गलत पाठ ने मलय का तब तक बहुत नुकसान कर दिया था। 

मलय हिन्दी के एक ऐसे विरल और महत्वपूर्ण कवि हैं, जिनकी लगातार उपेक्षा की गई और हिंदी आलोचना ने उनके साथ भी कभी समुचित न्याय नहीं किया। वे इन सबसे मुक्त होकर लगातार कविता लिखते रहे। इस कारण से उनकी कविताओं में नैसर्गिक प्रभाव कायम रहा है। मलय ने हर बार नवीनता और अनुभव की उच्चतर सघनता के साथ नई कविताएँ लिखीं।

यह सच है कि हिन्दी के नामवर आलोचकों ने मलय को कभी तवज्जो नहीं दी। आलोचकों ने उन्हें नकारा, पर हिन्दी के कवियों ने उन्हें स्वीकारा और खूब मान दिया। मलय को हिन्दी के कवियों का खूब प्यार व सम्मान मिला। मलय पर वरिष्ठ के साथ युवा कवियों ने लिखा और इसे महत्वपूर्ण माना गया। इन सारे आलेखों को कवि ओम भारती ने संपादक के रूप में एक पुस्तक के रूप में निकाल कर बड़ा व महत्वपूर्ण काम किया। इस पुस्तक का शीर्षक है- ‘जीता हूँ सूरज की तरह’। 

कवि नरेंद्र जैन ने ‘जबलपुर में मलय’ शीर्षक कविता में गहरा व्यंग्य किया है-

“आलोचक दिल्ली में विराजे हैं

जबलपुर में मलय कविता लिख रहे हैं

आलोचक द्वारा न पढ़े जाने से

क्या बना-बिगड़ा कविता का?

जबकि आलोचक

अपने औज़ार तेज करने से

हाथ धो बैठे


यहाँ

भयावह मोर्चा लग चुका है आलोचना को

वहाँ

जबलपुर में मलय

कविता में डूबे हैं.” 


मलय की कविता की बात की जाए तो वह उसमें नई भाषा है। मलय का शिल्प सीधा नहीं था. थोड़ा आड़ा-तिरछा था। पर वह सब उनका सचेत चयन था। उन्होंने कठिन और लंबी राह ही चुनी थी। मलय की कविता में अनगढ़ता का सौंदर्य है। सरलता और सादगी का सौंदर्य है। इसमें काट-छाँट, तराश, करीनापन नहीं है, बल्कि ठेठ हिंदुस्तानी का जीवन सौन्दर्य बोध यहाँ झलक मारता है। मलय की काव्य-संवेदनाओं में कहीं कोई दरार नहीं मिलेगी, जो उनकी सरल-सिधाई और ईमानदारी का प्रमाण भी है। मलय की काव्य यात्रा कभी पूरी न होने वाली एक कविता की ही अनवरत यात्रा है। यह यात्रा अँधेरे से उजाले की ओर अनवरत अग्रसर होने की यात्रा रही है। उनकी यात्रा अँधेरे से लड़कर, अँधेरे को चीरकर, प्रकाश की ओर आने की एक जिद्दी यात्रा है। यह मलय की जिजीविषा के कारण ही संभव हो पाई है। 

मलय के प्रकाशित 13 काव्य संग्रह हैं। उनका आलोचनात्मक कार्य व्यंग्य का सौंदर्य शास्त्र काफ़ी सराहा व महत्वपूर्ण माना गया है। जीता हूँ सूरज की तरह (मलय पर केन्द्रित मूल्यांकन परक आलेखों, साक्षात्कारों एवं कुछ अन्य सामग्रियों का संकलन) पिछले दिनों प्रकाशित हुआ था। मलय को सप्तऋषि सम्मान, मध्यप्रदेश साहित्य परिषद के अखिल भारतीय भवानी प्रसाद मिश्र कृति पुरस्कार, मध्यप्रदेश साहित्य सम्मेलन का भवभूति अलंकरण,  आचार्य रामचन्द्र शुक्ल शोध संस्थान, वाराणसी का चन्द्रावती शुक्ल पुरस्कार व हरिशंकर परसाई सम्मान से सम्मानित किया गया था।

गुरुवार, 10 अगस्त 2023

अगस्त क्रांति और जबलपुर के कवि इन्द्र बहादुर खरे

अगस्त क्रांति और जबलपुर के कवि इन्द्र बहादुर खरे का गहरा संबंध है। पहले समझ लें अगस्त क्रांति क्या है? भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए तमाम छोटे-बड़े आंदोलन किए गए। अंग्रेजी सत्ता को भारत की जमीन से उखाड़ फेंकने के लिए गांधी जी के नेतृत्व में जो अंतिम लड़ाई लड़ी गई थी उसे 'अगस्त क्रांति' के नाम से जाना गया है। इस लड़ाई में गांधी जी ने 'करो या मरो' का नारा देकर अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए पूरे भारत के युवाओं का आह्वान किया था। यही वजह है कि इसे 'भारत छोड़ो आंदोलन' या क्विट इंडिया मूवमेंट भी कहते हैं। इस आंदोलन की शुरुआत नौ अगस्त 1942 को हुई थी, इसलिए इसे अगस्त क्रांति भी कहते हैं। इस आंदोलन की शुरुआत मुंबई के एक पार्क से हुई थी जिसे अगस्त क्रांति मैदान नाम दिया गया।

पूरे भारत में जहां भी अगस्त क्रांति का आयोजन 9 अगस्त को होता है, तब जबलपुर के कवि इन्द्र बहादुर खरे का गीत-

नौ अगस्त हो गया अस्त, पर अस्त न हो पायी वह लाली,

जिसने अपनी स्वर्णाभा से, चमका दी युग रजनी काली ।।

जिसका उजियाला भारत में, अमर जागरण लेकर आया,

जिसने नगर-डगर घर-घर में जनता को ललकार जगाया।।

उत्साह व उमंगता के साथ गाया जाता है। मुंबई के गवालिया टैंक मैदान (अगस्त क्रांति मैदान)  में इन्द्र बहादुर खरे लिखा देशभक्त‍ि गीत प्रत्येक वर्ष गूंजता है। स्वतंत्रता की इस अलख ने एक कवि हृदय को भी झकझोरा और कलम से जन्मा एक ऐसा गीत, जिसे आज भी उसी अगस्त क्रांति मैदान पर शहीदों की स्मृति में गुनगुनाया जाता है। कवि इन्द्र बहादुर खरे ने भी इसी दिन 9 अगस्त को अपनी भावनाओं को शब्दों में ढाला था। पिछले कई वर्षों से मुंबई में सोमनाथ पर्व की गायन मंडली उनका लिखा गीत 'नौ अगस्त हो गया अस्त..पर अस्त न हो पाईं वह लाली..’ कर शहीदों को श्रद्धासुमन अर्पित करती आ रही है।

गाडरवारा में जन्मे प्रो. इन्द्र बहादुर खरे ने जबलपुर के हितकारिणी सिटी कॉलेज से बीए किया। नागपुर यूनिवर्सिटी से एमए करने के पश्चात उन्होंने मॉडल स्कूल में सन् 1946 से 1947 तक अध्यापन किया। महाराष्ट्र हाई स्कूल में उन्होंने सन् 1947 से 1948 तक अध्यापन किया। हितकारिणी महाविद्यालय में वे सन् 1949-52 तक प्राध्यापक रहे। इसके पश्चात गन गैरिज फैक्टरी में नौकरी की। आज उनकी लिखी कविताएं स्कूलों, कॉलेज व विश्वविद्यालय में पढ़ाई जा रही है। भोर के गीत, सुरबाला, विजन के फूल, सिन्दूरी किरण, रजनी के पल उनके प्रसिद्ध काव्य संग्रह हैं, वहीं सपनों की नगरी, जीवन पथ के राही जैसे कहानी संग्रह भी लोकप्रिय हुए हैं। इन्द्र बहादुर खरे का सिर्फ 31 वर्ष की अल्पायु में 1953 में निधन हो गया। 81 वर्षों बाद जब 9 अगस्त आता है तब इन्द्र बहादुर खरे याद आते हैं। 

🟦

खि‍लंदड़, खांटी, जीवंत और वैचारिकी से मजबूत सीताराम सोनी ने नुक्कड़ नाटक और जनगीत को कैसे बनाया लोकप्रिय

  सीताराम सोनी जैसे खि‍लंदड़ , खांटी , जीवंत और वैचारिकी से मजबूत व्यक्ति के जीवन का पटाक्षेप ऐसा होगा इसके बारे में किसी ने कभी सोचा नहीं थ...