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मंगलवार, 8 जुलाई 2025

उनके कंधे पर अंतिम समय तक टंगा रहा कैमरा

आज सुबह यानी कि 4 जुलाई 2025 को जिस प्रकार बरसात हो रही है वह मीडिया के लिए आज व कल सुर्खी ज़रूर बनेगी। घर के भीतर से बाहर देखते हुए गत दिवस दिवंगत हुए नितिन पोपट का चेहरा याद आने लगा। याद आने लगे वह दृश्य जब छायाकार नितिन पोपट ज्यादा बरसात में जबलपुर के उन निचले इलाकों में जहां पानी भरा रहता था वहां पेंट घुटने तक मोड़ कर अपने कैमरे में तस्वीर कैद करने लगते थे। जबलपुर की ठेठ बोली में लिखें तो वे दिलेर, दबंग, स्पष्टवादी, मेहनत से खींची गई अपनी फोटो को अखबार में जगह दिलाने के लिए मुठभेड़ करने वाले व्यक्ति थे। वे अपनी फोटो को अखबार में छपवाने के लिए अखबार के संपादकीय कर्मियों व संपादक से बहस तक कर लेते थे। नितिन पोपट ने प्रेस फोटोग्राफी कभी व्यावसायिक रूप से नहीं की। सातवें दशक से 2017 तक वे छायांकन एक मिशन के रूप में करते रहे। व‍िभ‍िन्न घटनाओं की फोटो लेकर वे जबलपुर के सभी अखबारों को निस्वार्थ रूप से भेज देते थे। कैमरा का बेग उनके कंधे से कभी उतरा नहीं। बाद के दिनों में जब उन्होंने फोटोग्राफी करना छोड़ दिया तब भी कैमरा उनके कंधे पर लटकता रहता था। नितिन पोपट अपने साथ काम करने वाले छायाकार को गुरू मंत्र के रूप में यही संदेश देते थे कि कंधे पर कैमरा हर समय टंगे रहना चाहिए। नितिन पोपट के जीवन में कैमरे के अलावा दूसरी चीज नहीं छूटी वह उनकी मोपेड थी। लम्बे समय तक सुवेगा मोपेड में बैठकर वे जबलपुर की सड़कों पर फोटो की तलाश में घूमते रहे। बाद में यह सुवेगा मोपेड को उन्होंने छायाकार मदन सोनी को दे दी और नई मोपेड ले ली। मोपेड के अलावा वे कभी दूसरे वाहन में नहीं चले। 


नितिन पोपट प्रेस फोटोग्राफी करते रहे इसलिए उनकी फोटोग्राफी में छायांकन का सौन्दर्य तो नहीं रहता था लेकिन तत्कालिकता, सजग दृष्ट‍ि, न्यूज सेंस उनका अद्भुत था। वे फोटोग्राफी सौन्दर्य के जबर्दस्त पक्षधर थे, इसलि‍ए जबलपुर की रानी दुर्गावती कला वीथि‍का में लगने वाली प्रत्येक फोटो प्रदर्शनी में पहुंचने वाले वे पहले व्यक्ति होते थे। नितिन पोपट अपने से पूर्व व बाद की पीढ़ी के छायाकार शश‍िन् यादव, हरि महीधर, रजनीकांत यादव, डा. जेएस मूर्ति के छायांकन की प्रशंसा करते थे और इन सबको खूब सम्मान देते थे।


विल्स सिगरेट का कश लेने के शौकीन और कड़क काफी पीने वाले नितिन पोपट ने जयंती टॉकीज (पूर्व में प्लाजा) के सामने अपने आफ‍िस व हर्षा प्रिंटर के डॉर्क रूम में किसी को प्रविष्ट नहीं होने दिया। ब्लेक एन्ड व्हाइट फोटोग्राफी के समय में नितिन पोपट स्वयं डॉर्क रूप में काम करना पसंद करते थे। वे फोटो की प्रोसेसिंग व डेव्लपिंग स्वयं करते थे। उनके सहायकों को इस बात की जानकारी नहीं रहती थी कि कौन सी फोटो उस समय नवभारत, नवीन दुनिया, देशबन्धु या युगधर्म में छपने के लिए भेजी जाएगी। नितिन पोपट फोटोग्राफी में इतने रम गए थे कि उन्हें अपने हर्षा प्रिंटर की कभी कोई ध्यान नहीं रहा। कम मात्रा या परिमाण में उनका विश्वास नहीं था इसलिए वे फिल्म के रोल और फोटो को प्रिंट करने के पेपर बड़ी संख्या में आर्डर करते थे। जिस समय ऑफसेट प्रिटिंग का चलन नहीं था तब स्वयं जेब से खर्च करके फोटो के ब्लॉक बनवाते और प्रेस में देकर आते थे। इस सदाशयता में उनकी हर्षा प्रिंटर सर्वाध‍िक रूप से प्रभावित हुई। यह भी दुख की बात है कि नितिन पोपट ने जिन अखबारों को फोटो उपलब्ध कराने के लिए दिन रात एक किया और आंधी बरसात की चिंता नहीं कि उन्होंने नितिन पोपट को एक्र‍िड‍िएशन या मान्यता प्रदान करने वाली एक अदद चिठ्ठी देने में कभी रुचि नहीं दिखाई। नितिन पोपट जिंदगी भर एक्र‍िड‍िएशन प्राप्त करने के लिए परेशान रहे।   


छायाकार नितिन पोपट को जबलपुर की एक पहचान व ब्रांड भी कहा जा सकता है। जब भी जबलपुर में  राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, कला क्षेत्र की कोई विभूति जबलपुर आती थी तब उसकी मुलाकात नितिन पोपट से अवश्य होती थी। यदि विभूति का पहली बार जबलपुर आगमन होता था, तो दूसरी बार जबलपुर आने पर उनकी निगाह नितिन पोपट को ज़रूर दूंढ़ती थी। राष्ट्रीय स्तर की सैकड़ों विभूतियों से नितिन पोपट के व्यक्तिगत संबंध थे। कवि नीरज से नितिन पोपट की प्रगाढ़ता जग जाहिर थी। ब्रांड के रूप में नितिन पोपट इसलिए याद आते हैं क्योंकि जब उनका श‍िखर था तब बहुत से लोग नवभारत में फोटो क्रेडिट में उनका नाम देखकर विवाह समारोह में फोटो खींचने के लिए सम्पर्क करते थे। कई लोग नितिन पोपट का पता पूछते हुए जयंती टॉकीज के सामने हर्षा प्रिंटर पहुंच जाते थे। इस प्रकार का कार्य उन्होंने किया लेकिन बहुत कम। 


जबलपुर के मीडिया में छायाकारों की दूसरी पंक्ति तैयार करने में नितिन पोपट का सबसे बड़ा योगदान है। नितिन पोपट के मार्गदर्शन में बसंत मिश्रा, सुगन जाट, पप्पू शर्मा, तापस सूर, अनिल तिवारी, पंकज पारे जैसे छायाकार उभरे और उन्होंने अपना व‍िश‍िष्ट स्थान बनाया। सुगन जाट तो नितिन पोपट के डॉर्क रूम में काम करके खींची गई फोटो को अपनी कला से छायांकन की दृष्ट‍ि से दर्शनीय व सुंदर बना देते थे।  


नितिन पोपट को दिवंगत होने के बाद याद करने के कई कारण हैं। पहला तो नई पीढ़ी उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानती और दूसरा उनके जैसे लोग जबलपुर में लगातार कम होते जा रहे हैं। नितिन पोपट के whatsapp प्रोफाइल में एक कोटेशन था-‘हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया’। वाकई में नितिन पोपट हर फ्रि‍क को धुएं में उड़ाते रहे और इसे उड़ाते हुए संसार से चले गए। श्रद्धांजलि 🔷

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

विश्व छायांकन दिवस के अवसर पर विशेष- डा. जे. एस. मूर्ति: पचास वर्षों की सौम्य और शांत छायांकन यात्रा



डा. जे. एस. (जेम्स सुंदर) मूर्ति की पहचान जबलपुर ही बल्कि पूरे देश में फोटो जर्नलिज्म, नेचर और वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर के रूप में है। उन्होंने फोटो जर्नलिज्म और कलात्मक छायांकन के मध्य अद्भुत संतुलन बना कर काम किया है। यह दोनों बातें किसी एक छायाकार में काफी कम देखने में आती है। उनके द्वारा खींचे गए छायाचित्र द संडे टाइम्स,द इंडियन एक्सप्रेस, सोशल वेल्फेयर, द हिन्दु जैसे प्रतिष्ठित समाचार व पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होते रहे हैं। उनके कई छायाचित्रों को जर्मनी, कनाडा, नीदरलैंड में आयोजित अंतरराष्ट्रीय छायाचित्र प्रतियोगिताओं में स्वीकृतियां के साथ पुरस्कृत किया गया है। डा. मूर्ति जबलपुर में फोटो आंदोलन को सक्रियता देने में हर समय आगे रहे हैं। छठे दशक में उन्होंने इसके लिए सर्वप्रथम प्रयास किया और नौवे दशक में डा. मूर्ति ने फोटोग्राफिक सोसायटी आफ जबलपुर (पीएसजे) को व्यवस्थित रूप दे कर नए फोटोग्राफर को एक मंच प्रदान किया। पीएसजे की गणना आज देश में सबसे सक्रिय सोसायटी के रूप में होती है। इसके पीछे डा. मूर्ति की मेहनत और समर्पण को कोई नकार नहीं सकता।
डा. मूर्ति को वर्ष 1969 में उस समय छायांकन में सबसे बड़ी सफलता मिली, जब उनकी छाया चित्र प्रविष्टि को फोटोग्राफिक सोसायटी आफ बंगाल (पीएबी) के द्वारा आयोजित ऑल इंडिया फोटोग्राफिक सैलून में स्वीकृत किया गया। सैलून के निर्णायकों को उनका छायाचित्र में विषय और तकनीकी रूप से नई ताजगी देखने को मिली। इसके पश्चात् डा. मूर्ति की छायांकन यात्रा आज तक जारी है। इसके बाद तो डा. मूर्ति के छाया चित्र देश-विदेश में आयोजित असंख्य सैलून में स्वीकृत हो कर पुरस्कृत हुए। इनमें टी. काशीनाथ मेमोरियल अवार्ड लखनऊ, भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के फोटो डिवीजन का अवार्ड, एग्री-हार्टीकल्चरल सोसायटी आफ इंडिया (एएचएसआई) के द्वारा कोलकाता में वर्ष 2011 में आयोजित प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि का पुरस्कार महत्वपूर्ण है।
ललित कला अकादमी, नई दिल्ली के द्वारा आयोजित प्रथम छाया चित्र प्रतियोगिता के अवसर पर जारी किए गए केटलाग में डा जे. एस. मूर्ति की प्रविष्टि सहित प्रोफाइल के प्रकाशन को अन्य छायाकार एक बड़ी उपलब्धि मानते हैं। इसके अतिरिक्त डा. मूर्ति की उपलब्धियों में फोटोलवर्स आफ इंडिया स्लाइड सर्किट इंदौर, होरीजन इंडिया इंटरनेशनल सर्किट लखनऊ, एसएएम इंटरनेशनल दिल्ली, और नार्थ ईस्टर्न फोटोग्राफिक एसोसिएशन (नेपा) असम द्वारा आयोजित सैलून में प्राप्त स्वीकृतियां भी हैं। उन्हें यूपी बोर्ड आफ बॉयो-डायवरसिटी, लखनऊ द्वारा ‘टाइगर’ प्रविष्टि के लिए प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया।
छायांकन में अनवरत् पचास वर्ष डूब कर काम करने वाले डा. जे. एस. मूर्ति को वर्ष 2005 में फेडरेशन आफ इंडियन फोटोग्राफी (एफएफआईपी) ने फेलोशिप से सम्मानित किया। वर्ष 2008 में उन्हें इंडिया इंटरनेशनल फोटोग्राफिक काउंसिल (आईआईपीसी) दिल्ली द्वारा
प्लेटिनम एक्जीबिटर ग्रेड से सम्मानित किया। डा. मूर्ति ने कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय फोटोग्राफी सैलून में निर्णायक की भूमिका भी निभाई है। देश की सबसे पुरानी फोटोग्राफिक सोसायटी आफ इंडिया (पीएसआई) मुंबई द्वारा आयोजित आल इंडिया सैलून आफ फोटोग्राफी में निर्णायक के मनोनयन को वे एक उपलब्धि के रूप में देखते हैं। डा. मूर्ति द्वारा वर्ष 1997 में जबलपुर के भूकंप के समय खींचे गए छाया चित्र न्यूज एजेंसी प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया (पीटीआई) और यूनाइटेड न्यूज आफ इंडिया (यूएनआई) द्वारा देश व विदेश में जारी किए गए, जिन्हें व्यापक रूप से सराहना मिली।
डा. जे. एस. मूर्ति का छायांकन के साथ-साथ पत्रकारिता शिक्षा में भी विशिष्ट स्थान है। उन्हें ‘मॉस कम्युनिकेशन एंड इट्स वेरियस डाइमेंशन’ पाण्डुलिपि पर वर्ष 1989 में प्रधानमंत्री द्वारा भारतेंदु हरिश्चंद्र राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार प्रदान किया गया।
डा. मूर्ति पचास वर्ष के छायांकन जीवन में पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के फोटो लेने को अविस्मरणीय अनुभव मानते हैं। पंडित नेहरू के उतारे गए फोटो को वर्ष 1991 में उन्होंने प्रधानमंत्री राजीव गांधी को जबलपुर प्रवास के समय भेंट किया था। उन्होंने इंदिरा गांधी के एक पोट्रेट को भी राजीव गांधी को भेंट किया था। जो बाद में 1 सफदरजंग रोड स्थित इंदिरा गांधी सेक्रेटेरियट मेमोरियल में प्रदर्शित हुआ।
पत्रकारिता एवं संचार प्राध्यापक के रूप में उन्होंने मनीला-फिलीपींस, क्वालालाम्पुर, श्रीलंका सहित देश में कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सेमीनार में भाग ले कर महत्वपूर्ण शोध पत्र प्रस्तुत किए। डा. मूर्ति ने मॉस कम्युनिकेशन विषय पर एक पुस्तक लिखी, जिसकी वर्तमान में भी शिक्षकों सहित विद्यार्थियों में बहुत मांग है। वे इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी (इग्नू) में कम्युनिकेशन विषय के रूप काउंसलर के रूप में कार्य कर चुके हैं। डा. मूर्ति जबलपुर, चित्रकूट और बीएचयू-बनारस विश्वविद्यालय में अतिथि शिक्षक के रूप में सेवाएं देते रहे हैं। डा. मूर्ति ने लगभग 10 वर्षों तक न्यूयार्क (अमेरिका) से प्रकाशित न्यू वर्ल्ड आउटलुक आर्डर के लिए कई कवर स्टोरी सहित महत्वपूर्ण रिपोर्टिंग की है।
अभी हाल ही में एकेडमी आफ फाइन आटर्स (सेंट्रल गेलरी) कोलकाता में उनकी एकल छायाचित्र प्रदर्शनी ‘एनकेचिंग कोलकाता’ आयोजित की गई, जिसे दर्शकों के साथ क्रिटिक की प्रशंसा भी मिली।
डा. जे. एस. मूर्ति अब अपने कर्मक्षेत्र जबलपुर में नहीं रहते, जिसका उन्हें दुख है, लेकिन पारिवारिक परिस्थितियों ने उन्हें कोलकाता में रहने को मजबूर कर दिया है। कर्मक्षेत्र बदलने और आयु के 70 वें वर्ष में पहुंचने के बावजूद वे निरंतर सक्रिय हैं। उन्होंने फोटोग्राफी सदैव ‘शांति व एकता’ के एक सूत्र को ध्यान में रख कर की और इसमें वे सफल भी हुए।

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