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बुधवार, 25 जनवरी 2023

पौराण‍िक पात्रों से समकालीन सवालों का साहस है ‘भूमि’/पंकज स्वामी


लगभग डेढ़ दशक में देश के समकालीन रंगकर्म में जबलपुर के रंग समूह समागम रंगमंडल की विशि‍ष्ट पहचान बन चुकी है। हिंदी पट्टी में समागम रंगमंडल को सर्वाध‍िक संभावनापूर्ण और प्रयोगधर्मिता के लिए जाना-पहचाना जाता है। समागम रंगमंडल के मंचित नाटकों की विशेषता उनका समकालीन मुद्दों से टकराहट है। समागम रंगमंडल ने आशीष पाठक लिखि‍त और स्वाति दुबे निर्देश‍ित नए नाटक ‘भूमि’ का मंचन पिछले दिनों जबलपुर में किया। यह नाटक का दूसरा मंचन था। इस मंचन से कुछ दिन पूर्व नाटक का पहला मंचन जयपुर के जयरंगम में हुआ। 

‘अगरबत्ती’ की सफलता के बाद आशीष पाठक से उनके नाट्य लेखन को ले कर हर समय उत्सुकता रहती है। उन्होंने 25 वर्षों के नाट्य जीवन में 17 नाटक लिखे हैं। आशीष पाठक ने इंटर कॉलेज नाट्य प्रस्तुतियों के लिए स्वयं के लिखे विषकन्या नाटक से शुरूआत की थी। इसके पश्चात् सुगंधि, सोमनाथ व अगरबत्ती का निर्देशन किया। हयवदन के निर्देशन ने उनके लिए व्यापकता व विस्तार का द्वार खोला। 

वर्ष 2008 में आशीष पाठक ने समागम रंगमंडल नाट्य समूह गठित किया। समूह के गठन के साथ उन्होंने पॉपकार्न नाटक का लेखन किया और समागम की पहली प्रस्तुति के रूप में दर्शकों के समक्ष पेश किया। एकल अभ‍िनय पर केन्द्र‍ित पॉपकार्न दर्शकों के लिए हवा का ताजा झोंका था। पॉपकार्न के पश्चात् आशीष पाठक ने एक नया नाटक रेड फ्रॉक को लिख कर मंच पर प्रस्तुत किया। यह प्रस्तुति भी विचारधारा के अंतर्विरोध को दर्शाती थी। नाटक की विषयवस्तु ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया। इस नाटक के पश्चात् समागम रंगमंडल ने अपनी प्रस्तुतियों में मुख्यधारा के कलाकारों से किनारा कर लिया और कॉलेज के विद्यार्थ‍ियों व नवोदित कलाकारों को अवसर देना प्रारंभ किया। आशीष पाठक यहां से एक बार फिर बुनियादी स्तर की लौटे। उन्होंने डकैत चूहे में बेक स्टेज करने वाले एक कलाकार को मुख्य भूमिका निभाने का अवसर दिया।

आशीष पाठक ने समागम रंगमंडल के माध्यम से पारम्परिक स्क्र‍िप्ट के स्थान पर स्वयं के लिखे या असामान्य विषयों को नाट्य रूपांतरण कर नाटक की विषयवस्तु बनाया है। नाट्य रूपांतरण के रूप में प्रस्तुत किया गया आशीष पाठक का सुदामा के चावल उनकी महत्वपूर्ण प्रस्तुति है। हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचना को उन्होंने तीव्रता के साथ मंच पर प्रस्तुत किया। सुदामा के चावल से राजनैतिक सत्‍ता पर कठोर प्रहार किया है। इस नाट्य प्रस्‍तुति को राजनैतिक दवाब का सामना भी करना पड़ा है। मध्‍यप्रदेश में तो आयोजक सुदामा के चावल के मंचन से बचने लगे हैं। सुदामा के चावल को अहीराई नृत्‍य शैली में प्रस्‍तुत कर रंगकर्म का नया फार्म प्रस्‍तुत किया गया। इस प्रस्तुति में परसाई काव्‍यात्‍मक रूप में दर्शकों के समक्ष आए।

समागम रंगमंडल की इसके पश्‍चात् की प्रस्‍तुतियां रावण, सराय और यहूदी की लड़की में लोक तत्‍व एवं संगीत  का उपयोग बखूबी किया गया। यहां एक बात गौरतलब है कि प्रस्तुतियों का लोक तत्‍व जटिल नहीं है, बल्कि वह दर्शकों से तदात्‍म स्‍थापित कर लेता है। लोर्का लिखित बिरजिस कदर का कुनबा समागम रंमंडल की एक महत्‍वपूर्ण प्रस्‍तुति है। जटिल विषय पर आधारित इस प्रस्‍तुति में कॉलेज विद्यार्थ‍ियों जैसे अनगढ़ कलाकारों से होशि‍यारी से काम लिया गया। समागम रंगमंडल अपनी प्रस्‍तुतियों में नाट्य लेखक को बराबरी से श्रेय देती है। महेश एलकुंचवार के वासांसि जीर्णानी के मंचन के लिए आशीष पाठक व स्वाति दुबे ने लेखक से व्‍यक्तिगत मिलने की काफी जद्दोजहद की। नागपुर में बार-बार जा कर आखि‍र एक दिन आशीष पाठक महेश एलकुंचवार से मिलने में सफल हो गए। नाटक की चर्चा के साथ आशीष पाठक लेखक को उनकी रायल्‍टी देने में भी ईमानदारी दिखाई। इस प्रस्‍तुति को एक संवाद की यात्रा के नाम से प्रस्‍तुत करते रहे। आशीष पाठक अपने लिखे नाटक को निरंतर अद्यतन करते हुए प्रयोग की प्रक्रिया में रहते हैं। अगरबत्ती नाट्य प्रस्तुति के लिए उन्होंने काफ़ी शोध‍ किया। इसके लिए वे और स्वाति दुबे बुंदेलखंड एवं जालौन और आसपास के क्षेत्रों में गाए जाने वाले गीतों को खोज कर नाटक में प्रस्तुत किया है।  अगरबत्ती की खास‍ियत उसकी परिकल्पना व जटिलता है। आशीष पाठक अन्य नाट्य लेखक व निर्देशकों की तुलना में जटिलता में ज्यादा जाते हैं। 

आशीष पाठक ने ‘भूमि’ को लिखने में लगभग तीन-चार वर्ष का समय लगाया है। इसके लिए उनकी योजना एक डेढ़ वर्ष पूर्व शुरू हो चुकी थी। ‘भूमि’ दरअसल महाभारत के पात्र बभ्रुवाहन पर केन्द्र‍ित है लेकिन नाटक में अर्जुन और चित्रांगदा के चरित्र उभर कर सामने आते हैं। इन दोनों पात्रों के संवाद व विषयवस्तु के माध्यम से आशीष पाठक ‘भूमि’ को समकालीनता सवालों से जोड़ देते हैं। नाटक के पात्र और उनके विचार प्रतीक के रूप में सामने आते जाते हैं। नाटक के मुख्य पात्र अर्जुन व बभ्रूवाहन पुरूष हैं तो चित्रांगदा व उलूपी महिलाओं का प्रतिन‍िध‍ित्व करते हुए द्वन्दों को उभारती हैं। आशीष पाठक नाटक में अश्वमेध यज्ञ के माध्यम से साम्राज्यवादी विस्तार व इच्छाओं को इंगित करते हैं तो भूमि को स्त्री से जोड़ते हैं। वे भूमि को मिथकों से जोड़ते हैं। 

अर्जुन ने श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा के अलावा दो और विवाह किए थे। अर्जुन ने दूसरा विवाह मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा जिसका पुत्र बभ्रुवाहन और तीसरा विवाह उलूपी से किया था जिसका पुत्र अरावन था। बभ्रुवाहन अपने नाना की मृत्यु के बाद मणिपुर का राजा बनाया गया। जब युधिष्ठिर ने अश्वमेघ यज्ञ करवाया तो यज्ञ के घोड़े को बभ्रुवाहन ने पकड़ लिया था। घोड़े की रक्षा के लिए अर्जुन मौजूद थे तब बभ्रुवाहन का अपने पिता से युद्ध होता है और युद्ध में बभ्रुवाहन जीत जाता और अर्जुन मूर्छित हो जाता है। अपनी मां चित्रांगदा के कहने पर बभ्रुवाहन मृतसंजीवक मणि द्वारा अर्जुन को चैतन्य कर देता है। 

अर्जुन, चित्रांगदा, बभ्रूवाहन जैसे पात्रों को केन्द्र में रख कर रवीन्द्र नाथ टैगोर नाटक और जयशंकर प्रसाद ने कहानी लिखी है। इस कथा पर कन्नड़ व तेलगु में फिल्में बनी है। इन फिल्मों में कन्न्ड़ के सुपर स्टार राजकुमार और एनटीआर जैसे कलाकारों ने अभ‍िनय किया। हिन्दी में भी अलग अलग समय में दो फिल्मों का निर्माण हुआ। आधुनिक काल में आशीष पाठक ने इस विषयवस्तु पर नाटक लिख कर इसे समसामयिकता दी है। नाटक लिखने के बाद स्वति दुबे ने मण‍िपुर की यात्रा कर वहां की संस्कृति, वेशभूषा, मार्शल आर्ट जैसी बारीक बातों का अध्ययन कर उसे नाटक में उतारा। पिछले वर्ष जुलाई-अगस्त में समागम रंगमंडल ने मण‍िपुरी मार्शल आर्ट थांग-टा का बीस दिनों का एक वर्कशॉप आयोजित किया। इसके लिए उन्होंने मण‍िपुर से विशेष रूप से चिंगथम रंजीत खुमान को आमंत्र‍ित कर अपने कलाकारों को प्रश‍िक्षण दिया। थांग-टा मण‍िपुर का पारम्परिक मार्शल आर्ट है, जिसमें सांस की लय के साथ समन्व‍ित रूप से शारीरिक नियंत्रण का अभ्यास किया जाता है। थांग-टा में कलाकारों को भाले व तलवार का प्रश‍िक्षण भी दिया गया। जबलपुर के अमित सुदर्शन कलाकारों को केरल के मार्शल आर्ट कलारी पट्टू के साथ मणिपुरी मार्शल आर्ट का लगातार प्रशिक्षण देते आ रहे हैं। 

शोध, लेखन, यात्रा, प्रश‍िक्षण, थकाऊ रिहर्सल के बाद ‘भूमि’ दर्शकों के समक्ष मंचन के रूप में सामने आया। इस नाटक की डिजाइनिंग, क्राफ्ट व परिकल्पना में निर्देशक स्वाति दुबे की मेहनत स्पष्ट रूप से झलकती है। 90 मिनट की प्रस्तुति में उन्होंने एक एक दृश्य में खासी मेहनत की है। कलाकारों की आंगिक क्र‍ियाएं मंच पर देख कर महसूस होता है कि वे भी पूरे नाटक में डूबे हुए हैं। कलाकारों की स्पीच पर खूब मेहनत की गई। लंबे संवाद कहीं बोझ‍िल नहीं होते बल्क‍ि दर्शक मंच पर सामने देखते हुए एक एक शब्द व सशक्त संवाद को सुनने का जतन करते हैं। नाटक का गीत जाओ तुम पुरवा के संग लौट आना तुम में नृत्य व संगीत रिलेक्स पैदा करता है। यह गीत सोम ठाकुर का है और इसे संगीतबद्ध संजय उपाध्याय ने किया है। किसी पारम्परिक मणिपुरी लोक संगीत की तुलना में इस गीत को मंच पर प्रस्तुत करना ज्यादा प्रभावकारी सिद्ध हुआ।आशीष पाठक की लाइट डिजाइनिंग अद्भुत रही। बांस का सेट विषयवस्तु को आधार व मजबूती देता है। नाटक के अंत में अर्जुन व बभ्रूवाहन के बीच का खड्ग युद्ध की मौलिकता व स्वाभाविकता इससे पूर्व नाटकों में कभी देखने को नहीं मिली। स्वाति दुबे चित्रांगदा की भूमिका को अपने संवादों के जरिए विस्तार के साथ प्रभावी बनाती हैं। नवयुवती के अल्हड़पन से मां तक के भाव सहजता के साथ सम्प्रेष‍ित होते हैं। अर्जुन के रूप में हर्ष‍ित सिंह कहीं कहीं अनुभवी कलाकार स्वाति दुबे के समक्ष मंच पर संकोची प्रदर्श‍ित होते हैं। उन्हें मंच पर यह संकोच का भाव छोड़ना होगा। 

आशीष पाठक व स्वाति दुबे मण‍िपुरी पृष्ठभूमि में ‘भूमि’ को जिस सफलता से प्रस्तुत किया है, संभवत: ऐसा मण‍िपुर के रंग समूह नहीं कर सकेंगे। आशीष व स्वाति अगरबत्ती के धूसर से भूमि के व‍िभ‍िन्न रंगों में आए हैं। यह एक बदलाव है। ऐसी विविधता की ख्वाहिश लेखक व निर्देशक में होना अच्छी बात है। आशीष पाठक स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि जब वे मौलिक विषय पर नाटक लिखते हैं तो उनको स्वतंत्रता रहती है। यही स्वतंत्रता उनकी चिंगारी है। इस चिंगारी की कमी ‘भूमि’ में खलती तो ज़रूर है। बहरहाल आशीष व स्वाति की चम्बल से दूर पूर्वोत्तर की यह यात्रा लंबे समय तक देश के मंचों पर दिखती रहेगी और सराहना भी बटोरेगी।

मंगलवार, 23 मार्च 2021

हम इक उम्र से वाकिफ हैं: हरिशंकर परसाई के संस्मरणात्मक आत्मकथ्य का गंभीर कोलाज




 हरिशंकर परसाई के अपने संघर्षों को लेकर उनके अपने विश्वास थे। जो उनके अपने जीवन के आगे बढ़ते-बढ़ते दृढ़ से दृढ़तर होते चले गए। उनका आत्म कथ्य है-हंसना-हंसाना, विनोद करना अच्छी बातें होते हुए भी, उन्होंने मनोरंजन के लिए कभी नहीं लिखा। उनकी रचनाएं पढ़ कर हंसी आना स्वाभाविक है। यह उनका यथेष्ट नहीं। वे और चीजों की तरह व्यंग्य को उपहास, मखौल न मान कर एक गंभीर चीज मानते थे। उनका विश्वास था कि साहित्य के मूल्य, जीवन मूल्यों से बनते हैं। उनका मानना था कि जीवन जैसा है, उससे बेहतर होना चाहिए। इस परिप्रेक्ष्य में एक शेर ज़हन में उभरता है- "सितम-ए-राह पर रखते चलो सरों के चिराग, जब तलक कि सितम की सियाह रात चले।" जिन रचनाकारों की या किसी प्रबुद्ध नागरिक की यदि इस घटाटोप समय में संवेदना और विवेक खंडित नहीं हैं तो वह अच्छी तरह जानता है कि इस सियाह रात का अभी अंत नहीं हुआ है। अपनी दुनिया को पाने के लिए मीलों दूर जाना है। हरिशंकर परसाई इस राह पर आजीवन चलते रहे। किशोरावस्था से ही उनके जीवन में दुखों ने अपना घेरा इस तरह बनाया कि वे लंबे समय तक उससे लड़ते रहे। संभवतः आयु की उस सक्रांति के वक्त ही उनके अंदर एक बड़े रचनाकार ने जन्म लिया। परसाई व्यंग्य के विचारक हैं। अप संस्कृति के स्त्रोतों पर परसाई निरंतर व्यंग्य करते हैं, अपराजित उत्साह के साथ। उनकी रचनाएं स्वातंत्रोत्तर भारत का चेहरा है।

परसाई की मृत्यु 1995 के पूर्व से उनके व्यंग्य पर आधारित नाटकों का मंचन प्रारंभ हुआ। तीस वर्षों में जितने भी


नाटक हुए वे व्यंग्य के साथ हास्य की धारा को साथ ले कर चले। इन नाटकों से परसाई के शब्द व विचार तो जरूर दर्शकों तक पहुंचे लेकिन उनके लेखन के पीछे कौन से कारण रहे हैं उस पर रंग निर्देशकों का ध्यान बिल्कुल नहीं गया। रंगकर्म‍ियों को परसाई के व्यंग्य बाणों ने आकर्ष‍ित किया। यह आकर्षण स्वाभाविक था। कुछ नाट्य निर्देशकों ने परसाई के व्यंग्य के मर्म ने पहचाना तो कुछेक परसाई की लोकप्र‍ियता से प्रभावित हुए। परन्तु हरिशंकर परसाई का मानना था कि सही व्यंग्य व्यापक जीवन परिवेश को समझने से आता है। व्यापक सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक परिवेश की विसंगति, मिथ्याचार, असामंजस्य, अन्याय आदि की तह में जाना, कारणों का विश्लेषण करना, उन्हें सही परिप्रेक्ष्य में देखना-इससे सही व्यंग्य बनता है। जरूरी नहीं कि व्यंग्य में हंसी आए। यदि व्यंग्य चेतना को झकझोर देता है, विद्रूप को खड़ा कर देता है, आत्मसाक्षात्कार कराता है, सोचने को बाध्य करता है, व्यवस्था की सड़ांध को इंगित करता है और सबसे महत्वपूर्ण बात, यदि वह परिवर्तन के लिए प्रेरित करता है, तो वह सफल व्यंग्य है। जितना विस्तृत परिवेश होगा, जितनी गहरी विसंगति होगी और जितना तिलमिया देने वाली अभिव्यक्ति होगी, व्यंग्य उतना सार्थक  होगा। परसाई व्यंग्य को एक स्पिरिट मानते थे, विधा नहीं। वे कहते थे- व्यंग्य विधा नहीं है- जैसे कहानी, नाटक और उपन्यास। व्यंग्य का कोई निश्चित स्ट्रक्चर नहीं है। वह निबंध, कहानी, नाटक-सब विधाओं में लिखा जाता है। व्यंग्य लेखक को यह शिकायत नहीं होना चाहिए कि विश्वविद्यालय व्यंग्य को विधा क्यों मानते। उन्हें संतोष करना चाहिए व्यंग्य का दायरा इतना विस्तृत है कि वह सब विधाओं को ओढ़ लेता है।

पिछले दिनों समागम रंगमंडल ने हम इन उम्र से वाकिफ हैंनाटक के माध्यम से हरिशंकर परसाई को नए रूप में प्रस्तुत किया। हम इन उम्र से वाकिफ हैंपरसाई के संस्मरण का कोलाज है। वे संस्मरण लिखने जब बैठे तो उन्हें फ़ैज अहमद फ़ैज का यह शेर याद आया-

हम इक उम्र से वाकिफ हैं अब न समझाओ

के: लुत्फ़ क्या है मेरे मेहरबां सितम क्या है।


परसाई ने शेर का आरंभ का हिस्सा शीर्षक बना दिया- हम इन उम्र से वाकिफ हैं। समागम रंगमंडल ने परसाई के संस्मरणों के कोलाज को मंच पर उतारा है। यह नाटक पिछले तीस वर्षों से परसाई के नाटकों से इस मायने में भिन्‍न है कि इसमें कहीं भी व्यंग्य या हास्य नहीं है। यह परसाई व उनकी गंभीरता और उसके पीछे की तह को सिलसिलेवार सुगड़ता के साथ परोसता है। परसाई के जीवन संघर्ष के अनुभव, कड़ुवाहट, अपमान और उत्पीड़न, अन्याय, यातना की स्मृतियां, विष को पचा कर जीने और लड़ने की स्मृति नाटक के अलग-अलग दृश्यों में आती जाती हैं और दर्शक आंख गढ़ाए उन्हें देख कर नॉस्टेलजिया में गोते लगाता है। परसाई के संस्मरण में वे कम हैं, लेकिन बदलता ज़माना ज्यादा है। परसाई को सभी लोग एक लेखक के रूप में पहचानते हैं और इस काम को उन्होंने पूरे जीवन ईमानदारी के साथ किया। उन्होंने अपने त्याग व बलिदान को महिमा मंडित नहीं किया। नाटक की प्रथम प्रस्तुति को रॉ-कटकहना ज्यादा उपयुक्त होगा। समागम रंगमंडल के आशीष पाठक व स्वाति दुबे के काम करने का तरीका है कि वे स्क्र‍िप्ट तैयार कर नाटक प्रस्तुत नहीं करते बल्क‍ि वे दृश्यों को संयोजित कर पहले मंच पर जाते हैं और कई प्रस्तुतियों के पश्चात् उनके नाटक परिपूर्ण स्क्र‍िप्ट में सामने आते हैं। अगरबत्ती और एक अकाउंटेंट की डायरी में मिट्टी की सौंधी सुगंध जैसे उनके नाटक इसी रूप में सामने आए हैं। अगरबत्ती मंच पर पहले आया और लगभग दस वर्षों के पश्चात् इसकी स्क्र‍िप्ट परिपूर्ण रूप में आयी। ऐसे ही गौरीनाथ की कहानी पर आधारित अकाउंटेंट की डायरी नाटक भी है। गौरीनाथ को उस समय आश्चर्य हुआ जब इस नाटक के पहले मंचन के समय उन्हें जानकारी मिली कि नाटक की कोई स्क्र‍िप्ट नहीं है। नाटक में इस प्रकार का काम करने का तरीका जटिल व कठिन है, लेकिन संभवत: यह समागम रंगमंडल और उसके निर्देशक आशीष पाठक व स्वाति दुबे की परम्परा बनता जा रहा है।

            ‘हम इक उम्र से वाकिफ हैं’ नाट्य प्रस्‍तुति का स्‍पष्‍ट संदेश है- परसाई के जीवन और चिंतन एक दूसरे के पूरक हैं। परसाई के जीवन की अंतरर्दृष्टि का विकासक्रम, उनके जीवन संदर्भों से जुड़ा हुआ है। नाटक में परसाई के जीवन चक्र व चिंतन दोनों मिल कर विलक्षण अंतरर्दृष्टि का निर्माण करते हैं। इसमें लोग व घटनाएं भी दृष्टि को नया आयाम देती है। जीवन की विभिन्‍न  स्थितियों व घटनाओं से न केवल उनके रचनाकार व्‍यक्तित्‍व का निर्माण हुआ बल्कि उनकी लेखनी को भी धार मिली। परसाई का जीवन, उसमें शामिल लोग, घटनाएं, चिंतन, अंतरर्दृष्टि ये सब तत्‍व मिल कर उन्‍हें लेखक के साथ-साथ जन शिक्षक के रूप में स्‍थापित करते हैं।

            लगभग 65 मिनट अवधि के नाटक में परसाई के जीवन व चिंतन को समेटना चुनौतीपूर्ण काम है, लेकिन बिना


किसी स्क्रिप्‍ट के सिर्फ क्राफ्ट व ‘डिवाइस की सहायता से विभिन्‍न व्‍यक्तियों, परिस्थितियों व कालखंड की अद्भुत अनुभूति को जन्‍म देता और महसूस करवाता है। समागम रंगमंडल की अन्‍य प्रस्‍तुतियों की तरह यह नाटक भी कथ्‍य एवं प्रस्‍तुति के कारण जटिल है। नाटक देखते वक्‍त पूरे समय दर्शक को एकाग्र रहना पड़ता है। एक घंटे से अधिक समय की प्रस्‍तुति में लगभग दस दृश्‍य संयोजित किए गए हैं। नुक्‍कड़ शैली में ऐसे नाटक का मंचन करना मुश्किल है, और वह भी नवोदित कलाकारों के साथ। प्रस्तुत अवश्य नुक्कड़ शैली की है लेकिन कैनवास बड़ा है। नाटक के प्रत्येक दृश्य में ब‍िम्बों या प्रतीक का प्रयोग है। प्रतीक के जरिए नए अर्थ खोजे गए हैं। प्रस्तुति में कई उद्देश्यों को पाने के लिए जटिल बिम्बों का प्रयोग करना जरूरी हो जाता है। स्वाति दुबे ने एनएसडी की सैद्धांतिक व व्यावहारिक प्रशि‍क्षण का निर्देशन में बुद्धिमानी से उपयोग कर रही हैं। इस प्रस्तुति में भी उन्होंने डिवाइसकी सहायता से इनफार्मेशन व इमोशनके माध्यम से परसाई के विचार, समकालीन समय व कलाकारों की समझ को नया आयाम दिया। परसाई की दृष्ट‍ि‍ में संस्मरण के साथ वर्तमान झलक के रूप में नहीं बल्क‍ि स्पष्ट व मजबूती के साथ प्रगट होता है।

           


हम इक उम्र से वाक‍िफ हैंमें प्रत्येक दृश्य महत्वपूर्ण है। चाहे वह गोदो का हो या फुटबाल कमेंट्री का या पूरे नाटक में मौजूद ईंटों की दीवार हो- वे मूर्त चरित्र के साथ अमूर्त चरित्र के रूप में दर्शकों को बैचेन करते रहते हैं। यह प्रस्तुति एक बार देखने की नहीं है। बार-बार जब यह नाटक देखा जाए तो दर्शकों को हर बार नए अर्थ देखने को मिलेंगे। श‍िक्षक परसाई द्वारा छोटी बच्ची को स्कूल न आने का कारण पूछने और बच्ची द्वारा पिता की मृत्यु का कारण बताने वाला दृश्य भावुकता के साथ करूणा के भाव भर देता है। इस दृश्य को देख कर आभास होता है क‍ि हरिशंकर परसाई के लेखन में गहरी करूणा और गहरा व्यंग्य दोनों एक साथ है। करूणा के भाव को सिर्फ महसूस किया जा सकता है। इस प्रकार की घटनाओं से परसाई में वर्ग-चेतना भी जागी। उनके सरोकार की जानकारी म‍िली। इसी प्रकार परसाई का क‍िशोर अवस्था में अछूत कन्याफ‍िल्म देखना और मैं बन की चिड़‍ियागीत और फुटबाल खेलते हुए गेंद के गायब होने और गरीब होने पर चोर ठहराने का दृश्य सन्न कर देते हैं। नाटक में परसाई के स्कूल राधा स्वामी हाई स्कूल ट‍िमरनी के श‍िक्षक केशव चंद्र बग्गा का वृतांत भी है। इन्हीं श‍िक्षक से परसाई को साहित्य के संस्कार दिए और ज्ञान की अनंत पिपासा दी। केशव चंद्र बग्गा से परसाई को इतिहास चेतना व बोध म‍िला। परसाई के जीवन में केशव चंद्र बग्गा अमिट प्रभाव रहा। परसाई ने श‍िक्षा की विसंगतियों जो प्रहार क‍िया उसके अंश भी नाटक के दृश्य में देखने को मिले। एक महत्वपूर्ण दृश्य वह है जिसमें परसाई व ज्ञानरंजन राजनांदगांव पहुंच कर मुक्त‍िबोध के अंतिम दिनों में इलाज की व्यवस्था करते हैं और उन्हें भोपाल लाते हैं। वह परसाई का प्रारंभि‍क दौर था, उस समय बहुत कम लोगों का रूझान परसाई के प्रति था। उस समय परसाई के व्यंग्य और उनके विचार को पचाना बहुत मुश्‍क‍ि‍ल था। समकालीनता परसाई के ख‍िलाफ थी। उस समय मुक्तिबोध ने परसाई का साथ दिया, पर वह गहरा आलोचकीय साथ नहीं था। वह एक गहरी मैत्री थी और विचारों का साथ था। नाट्य प्रस्तुति के दौरान पहल के संपादक ज्ञानरंजन दर्शक दीर्घा में थे। इस दृश्य और पूरे नाटक को देख कर ज्ञानरंजन भावुक हो गए।

            हम इक उम्र से वाक‍िफ हैंकी व‍िश‍िष्टता इसके नवोदित कलाकारों का अभ‍िनय है। पूरे नाटक में कई कलाकार


परसाई के रूप में सामने आते हैं। निर्देशक स्वाति दुबे भी एक दृश्य में परसाई के रूप में सामने आती हैं। जटिल नाटक को यदि स्वयं कलाकार समझ ले तो यह प्रस्तुति की सबसे बड़ी सफलता है। मानसी रावत, ज्योत्सना कटारिया, आयुषी राव, श‍िवांजलि गजभ‍िए, रश्म‍ि त्र‍िपाठी, साक्षी दुबे, प्रवर जैन, उत्सव हांडे, श‍िवाकर सप्रे, हर्ष‍ित सिंह, बसंत पांडे, व‍िधान कटारे, अमन राय, राहुल थापा, भूम‍ि दुबे, आद‍ित्य ने व‍िभि‍न्न पात्रों की भूमिका तन्मयता के साथ न‍िभाई। आशीष पाठक की स्पीच व एक्ट‍िंग ट्रेनिंग और ध्वन‍ि व प्रकाश संरचना ने नाटक को काव्यात्मक रूप दिया। स्वाति दुबे की डिजाइनिंग नाटक को विशाल रूप देती है। जैसा क‍ि ल‍िखा गया क‍ि यह प्रस्तुति रॉ-कट है, उसके मुताबिक भविष्य में नाटक के मंचन के अनुसार कथ्य व प्रस्तुति गढ़ती जाएगी और एक न‍िर्णायक बिन्दु पर समग्र रूप में आएगी। आशीष पाठक व स्वाति दुबे दोनों का कहना है क‍ि उनके काम करने का ढंग अलग है। वे थोड़े में संतुष्ट नहीं होते। वे नाटक के अंत से संतुष्ट नहीं हैं। उनका मानना है क‍ि नाटक का अंत ही परसाई के चिंतन व विचार की उत्पत्त‍ि है। परसाई लेखन, विचार व चिंतन के लिए याद क‍िए जाते हैं। हम इक उम्र से वाक‍िफ हैंनाट्य प्रस्तुति परसाई के चिंतन व विचार को व्यापक व प्रभावी रूप से सम्प्रेष‍ित करने में सफल हुई। निश्च‍ित रूप से जैसे-जैसे इसके मंचन होंगे, उसे देखने वाले परसाई को ज्यादा बेहतर ढंग से समझ सकेंगे और उनमें युवा वर्ग की संख्या बहुतायत से होगी। वर्ष 2024 परसाई का जन्म शताब्दी वर्ष है। ठीक तीन वर्ष पूर्व हम इक उम्र से वाक‍िफके मंचन की शुरूआत होना एक शुभ संकेत है।

            

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