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शनिवार, 25 अप्रैल 2009

ज्ञानंरजन ने कहा-पारदर्शी हो साहित्यिक पुरस्कारों की प्रक्रिया



प्रसिद्ध साहित्यकार और पहल के संपादक ज्ञानरंजन ने कहा है कि प्राय: पुरस्कृत और सम्मानित लोग आत्मकथन की तरफ जाते हैं, परन्तु मेरे लिए भारतीय भाषा परिषद का सम्मान एक दर्पण की तरह है, जिसमें मैं खुद को और अपने अतीत को निहारता हूं। मत-मतांतर के साथ पत्रकारी किस्म के विवाद व अवसर के बाद विलक्षणता की ऐसी घड़ी चल रही है, जिसमें एक घातक हिंसा पैदा हो चुकी है। उन्होंने कहा कि साहित्य व राजनीति के बीच किसी भी तरह का फर्क गायब हो चुका है। ज्ञानरंजन कहते हैं कि उनकी सोच यह है कि हमें अपने समस्त सांस्कृतिक उपक्रमों व उसके प्रबंधन पर बाजार के रिवाज से हट कर नए सिरे से विचार कर एक नया सांस्कृतिक आंदोलन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें अपने पुरस्कारों की प्रक्रिया को खोल देना चाहिए और उसकी राजनीति व गोपनीयता को भंग कर देना चाहिए। ज्ञानरंजन ने कहा-‘‘मैंने जो कुछ भी कहा है, वह मेरी तथा मेरी कहानियों की ही आवाज है।"

उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध साहित्यकार और पहल के संपादक ज्ञानरंजन को पिछले दिनों कोलकाता में हिंदी साहित्य में अमूल्य योगदान देने के लिए भारतीय भाषा परिषद ने वर्ष 2008 के साधना सम्मान से सम्मानित किया। ज्ञानरंजन सहित डा. महिंदर कौर गिल (पंजाबी), आर. वैरामुत्थु (तमिल) और रामचंद्र बेहरा (उड़िया) को भी साधना सम्मान से सम्मानित किया गया। युवा साहित्यकारों में हिंदी के लिए डा. अल्पना मिश्रा, निर्मला पुतुल (संथाली), मधुमीत बावा (पंजाबी) और एस. श्रीराम (तमिल) को अपनी-अपनी भाषा के साहित्य में योगदान देने के लिए युवा साहित्कार सम्मान से अलंकृत किया गया। उड़िया के साहित्यकार रमाकांत रथ ने साहित्यकारों को सम्मानित किया।

रमाकांत रथ ने इस अवसर पर कहा कि साहित्य में जूनियर व सीनियर नहीं होता। साहित्य एक परम्परा है, जो निरंतर गतिशील रहती है। साहित्यकार को अपने आप को स्टेनोग्राफर से ज्यादा नहीं समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान करते हैं। भाषा मानवीय संस्कृति को जोड़ती है। कुछेक भारतीय भाषाओं को क्लासिकल भाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए। भारतीय भाषाओं को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है।

तमिल के सम्मानित कवि वैरामुत्थु ने कहा कि जब जीवन के प्रति ललक खत्म हो जाए व पृथ्वी विस्मित करने लगे कविता वहीं समाप्त हो जाती है। उड़िया साहित्यकार डा. रामचंद्र बेहरा ने कहा कि रचनात्मक लेखन आत्म अभिव्यक्ति का माध्यम है। लेखक की रचना में जीवन के उनके अनुभवों और दृष्टि की झलक दिखती है।

युवा साहित्कार डा. अल्पना मिश्रा ने कहा कि साहित्य में समय और समाज को अभिव्यक्त करना चाहिए। स्त्री को आलू छीलने से ले कर चिप्स तक की पीड़ा को समझने की जरूरत है।

संथाली साहित्यकार निर्मला पुतुल ने कहा-‘‘मुझे जो सम्मान मिला है, वह संथाल समुदाय का सम्मान है। संथाली साहित्य में गीतों की प्रमुखता है। इसके बोल बड़े कीमती हैं। लोक कंठों और परम्पराओं में संथाली साहित्य सुरक्षति है। दुर्भाग्य है कि कुछ साहित्यकारों ने संथाली क्रांतिकारियों को लुच्चा कहने में भी संकोच नहीं किया है। कुछ भद्र जन संथाली भाषा को संविधान की आठवीं सूची में जगह मिलने से भयभीत हैं।’’

समापन भाषण देते हुए रामकुमार मुखोपाध्याय ने कहा कि साहित्य हमारे लिए आवश्यक है। साहित्य अतीत व वर्तमान को जोड़ता है। कार्यक्रम का संचालन भारतीय भाषा परिषद की कुसुम खेमानी ने किया। स्वागत भाषण संस्था के निदेशक डा. विजय बहादुर सिंह ने दिया।

गुरुवार, 9 अप्रैल 2009

विख्यात साहित्यकार ज्ञानरंजन को भारतीय भाषा परिषद का प्रतिष्ठित साधना सम्मान

हिंदी के विख्यात साहित्यकार और पहल के संपादक ज्ञानरंजन को हिंदी साहित्य में अमूल्य योगदान देने के लिए भारतीय भाषा परिषद ने वर्ष 2008 के साधना सम्मान से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। साधना सम्मान के रूप में ज्ञानरंजन को कोलकाता में 18 अप्रैल को एक भव्य समारोह में 51,000 रूपए की सम्मान निधि और स्मृति चिन्ह प्रदान किया जाएगा। ज्ञानरंजन के अलावा तमिल साहित्य के लिए वेरामुत्थु, उड़िया साहित्य के लिए रामचंद्र बेहरा और पंजाबी साहित्य के लिए डा. महेन्द्र कौर गिल को भी सम्मानित किया जाएगा। सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी चारों साहित्यकारों को सम्मानित करेंगी। उल्लेखनीय है कि भारतीय भाषा परिषद एक प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था है और पिछले 35 वर्षों से भारतीय भाषा के साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में कार्यरत है। परिषद द्वारा हिंदी में मासिक पत्रिका वागार्थ का प्रकाशन भी लंबे समय से किया जा रहा है। परिषद ने विभिन्न भाषाओं के चार युवा साहित्यकारों को भी युवा पुरस्कार से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। निर्मला पुतुल को संथाली भाषा के लिए, अल्पना मिश्रा को हिंदी, एस. श्रीराम को तमिल और मधुमित बावा को पंजाबी भाषा के साहित्य में योगदान देने के लिए युवा पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।

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